जिस समय महाभारत युद्ध में कौरव और पाण्डव दोनों पक्षों के बहुत से वीर-वीरगति को प्राप्त हो चुके थे और भीमसेन की गदा के प्रहार से दुर्योधन की जांघ टूट चुकी थी, तब अश्वत्थामा ने अपने स्वामी दुर्योधन का प्रिय कार्य समझकर द्रौपदी के सोते हुए पुत्रों के सिर काटकर उसे भेंट किये, यह घटना दुर्योधन को भी अप्रिय ही लगी; क्योंकि ऐसे नीच कर्म की सभी निंदा करते हैं। उन बालकों की माता द्रौपदी अपने पुत्रों का निधन सुनकर अत्यंत दुःखी हो गयी। अर्जुन ने द्रौपदी को सान्त्वना दी और श्रीकृष्ण की सलाह से उन्हें सारथी बनाकर कवच धारण कर और अपने भयानक गाण्डीव धनुष को लेकर वे रथ पर सवार हुए तथा गुरुपुत्र अश्वत्थामा के पीछे दौड़ पड़े। बच्चों की हत्या से अश्वत्थामा का भी मन उद्विग्न हो गया था। जब उसने दूर से ही देखा कि अर्जुन मेरी ओर झपटे हुए आ रहे हैं, तब वह अपने प्राणों की रक्षा के लिए जहां तक भाग सकता था, भागा। जब उसने देखा कि मेरे रथ के घोड़े थक गये हैं और मैं बिलकुल अकेला हूं, तब उसने अपने को बचाने का एकमात्र साधन ब्रह्मास्त्र ही समझा। यद्यपि उसे ब्रह्मास्त्र को लौटाने की विधि मालूम न थी, फिर भी प्राण संकट में देखकर उसने आचमन किया और ध्यानस्थ होकर ब्रह्मास्त्र का संधान किया। उस अस्त्र से सब दिशाओं में एक बड़ा प्रचण्ड तेज फैल गया। अर्जुन ने देखा कि अब तो मेरे प्राणों पर ही आ बनी है, तब उन्होंने श्रीकृष्ण से प्रार्थना की। श्रीकृष्ण ने कहा कि अर्जुन यह अश्वत्थामा का चलाया हुआ ब्रह्मास्त्र है। यह बात समझ लो कि प्राणसंकट उपस्थित होने से उसने इसका प्रयोग तो कर दिया है, परंतु वह इस अस्त्र को लौटाना नहीं जानता। किसी भी दूसरे अस्त्र मंे इसको दबा देने की शक्ति नहीं है। तुम शस्त्रास्त्र-विद्या को भलीभांति जानते ही हो, ब्रह्मास्त्र के तेज से ही इस ब्रह्मास्त्र की प्रचण्ड आग को बुझा दो। अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र का संधान किया और उसे चलाया। दोनों अस्त्रों के आपस में टकराने से प्रलय सी स्थिति उत्पन्न हो गयी। अंत में अर्जुन ने अश्वत्थामा को पकड़ लिया और बांधकर द्रौपदी के समक्ष ले गये। श्रीकृष्ण ने भी कुपित होकर कहा- ‘अर्जुन! इस ब्राह्मणाधम को छोड़ना ठीक नहीं है, इसको तो मार ही डालो। इसने रात में सोये हुए निरपराध बालकों की हत्या की है। धर्मव पुरुष असावधान, मतवाले, पागल, सोये हुए, बालक, स्त्री, विवेक ज्ञानशून्य, शरणागत, रथहीन और भयभीत शत्रु को कभी नहीं मारते। परंतु जो दुष्ट और क्रूर पुरुष दूसरों को मारकर अपने प्राणांका पोषण करता है, उसका तो वध ही उसके लिए कल्याणकारी है। इस पापी कुलांगर आततायी ने तुम्हारे पुत्रों का वध किया है और अपने स्वामी दुर्योधन को भी दुःख पहुंचाया है। इसलिए अर्जुन! इसे मार ही डालो। भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन के धर्म की परीक्षा लेने के लिए इस प्रकार प्रेरणा की, परंतु अर्जुन का हृदय महान् था। यद्यपि अश्वत्थामा ने उनके पुत्रों की हत्या की थी, फिर भी अर्जुन के मन में गुरु पुत्र को मारने की ईच्छा नहीं हुई। अर्जुन ने द्रौपदी को उसे सौंप दिया। द्रौपदी ने देखा कि अश्वत्थामा पशु की तरह बांधकर लाया गया है। निन्दित कर्म करने के कारण उसका मुख नीचे की ओर झुका हुआ है। अपना अनिष्ट करने वाले गुरु पुत्र अश्वत्थामा को इस प्रकार अपमानित देखकर द्रौपदी का कोमल हृदय कृपा से से भर आया और उसने अश्वत्थामा को नमस्कार किया। गुरु पुत्र का इस प्रकार बांधकर लाया जाना सती द्रौपदी को सहन नहीं हुआ। उसने कहा- ‘छोड़ दो इन्हें, छोड़ दो। ये ब्राह्मण हैं, हम लोगों के अत्यंत पूजनीय हैं। जिनकी कृपा से आपने रहस्य के साथ सारे धनुर्वेद और प्रयोग तथा उपसंहार के साथ संपूर्ण शस्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया है, वे आपके आचार्य द्रोण ही पुत्र के रूप में आपके सामने खड़े हैं। आर्युपुत्र! आप तो बड़े धर्मज्ञ हैं। जिस गुरुवंश की नित्य पूजा और वंदना करनी चाहिए, उसी को व्यथा पहुंचाना आपके योग्य कार्य नहीं है। द्रौपदी की बात धर्म और न्याय के अनुकूल थी। उसमें कपट नहीं था, करुणा और समता थी। अतएव राजा युधिष्ठिर ने रानी के इन हितभरे श्रेष्ठ वचनों का अभिनंदन किया। क्रोधित होकर भीमसेन ने कहा, ‘जिसने सोते हुए बच्चों को न अपने लिए और न अपने स्वामी के लिए, बल्कि व्यर्थ ही मार डाला, उसका तो वध ही उम है। भगवान् श्रीकृष्ण ने द्रौपदी और भीमसेन की बात सुनकर और अर्जुन की ओर देखकर हंसते हुए कहा: ‘पतित ब्राह्मण का भी वध नहीं करना चाहिए और आततायी को मार ही डालना चाहिए’- शास्त्रों में मैंने ही ये दोनों बातें कही हैं। इसलिए मेरी दोनों आज्ञाओं का पालन करो। अर्जुन भगवान् के हृदय की बात तुरंत ताड़ गये और उन्होंने अपनी तलवार से अश्वत्थामा के सिर की मणि उसके बालों के साथ उतार ली। बालकों की हत्या करने से वह श्रीहीन तो पहले ही हो गया था, अब मणि और ब्रह्म तेज से भी रहित हो गया। इसके बाद उन्होंने रस्सी का बंधन खोलकर उसे शिविर से निकाल दिया।


नववर्ष विशेषांक  जनवरी 2013

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