पंचांग - सुधार आवश्यक क्यों?

पंचांग - सुधार आवश्यक क्यों?  

व्यूस : 5783 | अप्रैल 2010

पंचांग-सुधार आवश्यक क्यों? ब्रजेंद्र श्रीवास्तव भारतीय पंचांग सृष्टि की कालगणना का महत्वपूर्ण आधार है। इसमें सृष्टि के आरंभ संबंधी ठोस और वैज्ञानिक तथ्य उल्लिखित हैं। इसकी वैज्ञानिकता की पुष्टि आज के भौतिक शास्त्री भी कर रहे हैं। अंतरिक्ष वैज्ञानिक और मंगल ग्रह पर अंतरिक्ष यान वाइकिंग उतारने वाले दल के सदस्यगण तथा बहुचर्चित टीवी सिरियल कॉस्मॉस के निर्देशक और कॉस्मॉस पुस्तक के लेखक कार्ल सागा भी भारतीय पंचांग पद्धति की महत्ता को स्वीकारते हैं। उनका मानना है कि भारतीय पंचांग में पृथ्वी की और फिर सृष्टि की कालगणना निश्चित इकाइयों में दी गई है जो आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान की गणना से पूरी तरह मेल खाती है। कार्ल सागा का कहना है कि पृथ्वी पर केवल यहीएक धार्मिक परंपर है जो सही समय मापदंड की बात करती है। उनके अनुसार काल की यह भारतीय अवधारणा सही और विज्ञानसम्मत है।

उक्त तथ्यों को देखते हुए भारतीय कालगणना के आधार पंचांगों की संरचना और गणना प्रणाली को तथा विभिन्न पुराणों में दी गई सृष्टि रचना की सैद्धांतिक विधियों पर खुले मन से विचार करने की आवश्यकता है। पंचांग को धार्मिक कार्य या मुहूर्त की सूची मात्र समझने के भ्रम से उबरना आवश्यक है। जब पंचांग की कालगणना सृष्टि रचना से सीधे तौर पर जुड़ी है (यह आज का विज्ञान मानता है), तो फिर इसे पाठ्यक्रम की खगोल, भूगोल, समाजशास्त्र, ब्रह्मांड विज्ञान, एस्ट्रोफिजिक्स इत्यादि की किसी शाखा में सैद्धांतिक अवधारणा के रूप में माध्यमिक या स्नातक स्तर पर शामिल किया जाना ही चाहिए। इससे पंचांग संबंधी जो अशुद्धियां, विसंगतियां आदि आज देखने में आ रही हैं, उन पर चर्चा के लिए बहुत बड़ा सुशिक्षित वर्ग उपलब्ध होगा। पंचांगों की अशुद्धियां और मतभेद क्या हैं? सामान्य लोगों को पंचांगों के सैद्धांतिक मतभेदों से कुछ लेना देना नहीं होता। उन्हें तो व्रतों, त्योहारों, पर्वों आदि की एक निश्चित तारीख व निश्चित समय की जानकारी की ही अपेक्षा रहती है। पंचांगों की कुछ प्रमुख विसंगतियां इस प्रकार हैं। व्रत, त्योहार आदि की तारीखें अक्सर दो दिन बताई जाती हैं। एक ही क्षेत्र के दो पंचांगों में तिथियों, नक्षत्रों आदि के आरंभ व समाप्ति काल, सूर्योदयास्त, चंद्रोदयास्त, गुरु, शुक्र लोपदर्शन अर्थात सूर्य से ग्रहों के अस्त एवं उदय में दिनों व घंटों का अंतर देखा जाता है। मूहर्तों पर मतभेद रहते हैं।

इस अंतर के कारणों का संक्षिप्त विश्लेषण यहां प्रस्तुत है। सूर्य सिद्धांत तथा इसके आधार पर बने करण ग्रंथों जैसे ग्रह लाघवीय, मकरंदीय आदि सभी में इस बात पर जोर है कि ग्रहों की स्थिति बताने वाले गणित में समय-समय पर बीज संस्कार करते रहना चाहिए अर्थात सूत्रों में सुधार करते रहना चाहिए तथा प्राप्त ग्रह गणित की पुष्टि आकाश में ग्रहों के प्रत्यक्ष वेध से करते रहना चाहिए। परंतु भास्कराचार्य (12वीं सदी) के बाद से ग्रह गणित के सूत्रों में सुधार-संशोधन नहीं के बराबर किए गए हैं। इसलिए अलग-अलग सिद्धांतों के फलस्वरूप ग्रहों की अलग-अलग स्थिति आती है जो अक्सर आकाश में वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाती। तिथि काल पर मतभेद जब सूर्य और चंद्र के बीच परस्पर कोणात्मक अंतर 12 अंश का हो जाता है, तो एक तिथि पूरी होती है। इस प्रकार 360 अंशों में 12-12 अंशों के अंतर से 30 तिथियां होती हैं। चूंकि चंद्र की चाल या गति अस्थिर है, इसलिए वह 12 अंशों के काल खंड को परंपरागत मान्यता के अनुसार अधिकतम 65 घटियों अर्थात् 26 घंटों में और न्यूनतम 54 घटियों अर्थात 21 घंटे और 36 मिनट में पूरा करता है।

वहीं आधुनिक वैज्ञानिक गणना के अनुसार चंद्र को तिथिखंड पूरा करने में अधिकतम 67 घटियों अर्थात 26 घंटे और 48 मिनट से न्यूनतम 50 घटियों अर्थात 20 घंटों तक का समय लग सकता है। इस प्रकार इन दो मतों के अनुसार तिथि की अधिकतम लंबाई 26 घंटे से 26 घंटे 48 मिनट तक न्यूनतम लंबाई 20 घंटे से 21 घंटे 36 मिनट तक हो सकती है। इस कारण तिथि आधारित व्रतों, त्योहारों के निर्णय में मतभेद आना स्वाभाविक है। उदाहरणस्वरूप, यदि एकादशी का निर्णय करने में 45 घटियों (रात्रि 12 बजे) से जरा भी अधिक दशमी हो, तो दशमी विद्धा होने के कारण वह एकादशीे भागवत पुराण के अनुसार त्याज्य होगी।

अधिकांश पंचांग आधुनिक मत की तिथि मान लेते हैं पर ग्रह लाघवीय मत से बने पंचांग 60 घटी में बाण वृद्धि (बाण अर्थात काम देव के 5 बाण के 5 अंक बढ़ाकर) तथा रसक्षय (रसक्षय अर्थात 60 घटी में रस अर्थात षड्रस के 6 अंक घटाकर) अर्थात 54 घटी तक तिथि का मान लेते हैं। इससे व्रत निर्णय में भिन्नता आती है। इसी से जुड़ी एक अन्य बात है, वह यह कि चंद्र का गणित भूपृष्ठीय (टोपोसेंट्रिक) होने पर भूकेंद्रीय (जियोसेंट्रिक) गणित से लगभग डेढ़ अंश का अंतर आता है, जो तिथिमान में अंतर पैदा करता है। तिथि किस कार्य में भूपृष्ठीय हो और किस में भूकेंद्रीय इसका स्पष्ट निर्देश शास्त्रों में मिलता है, पर शास्त्रकारों में मतभेद हैं। ये शास्त्रकार तर्क एवं विवेक से काम लेने के बदले अपनी-अपनी परंपरा का पोषण करते हैं।

शुभ कार्यों में गुरु और शुक्र के उदयास्त का विशेष महत्व है। अक्षांश भेद से इनके उदयास्त में अंतर आना स्वाभाविक है जैसा कि सूर्योदयास्त में होता है। इसलिए किसी क्षेत्र के पंचांग को देखकर पुरोहितगण अपने-अपने क्षेत्र में उस ग्रह के उदयास्त पर विचार किए बिना फैसला सुना देते हैं जो शास्त्र विरुद्ध है। सूर्य से जितने अंश की दूरी पर कोई ग्रह उदय या अस्त होता है, उसे कालांश कहते हैं। इन कालांशों पर सिद्धांतों में मतभेद है। ग्रह की चमक और उन्नतांश का विचार भी करना चाहिए, जो प्रायः नहीं किया जाता है। सबसे दुखद और आश्चर्य की बात तो यह है कि अधिकांश ज्योतिषी न तो किसी ग्रह को पहचान सकते हैं और न ही किसी नक्षत्र या राशि को। ये ज्योतिषी किसी ग्रह के उदय या अस्त को प्रत्यक्ष देखने का कष्ट भी नहीं करते। पंचांगों की ऋतुगणना वास्तविक ऋतु आंगमन से 24 दिन पीछे हो चुकी है।

हमारी कालगणना न तो पूरी तरह सूर्य के वार्षिक भ्रमण पर आधारित है और न ही पूरी तरह चंद्र के वार्षिक भ्रमण पर आधारित है। हमारे पंचांगों की गणना सौर-चंद्र आधारित अर्थात लूनीसोलर है। इस पद्धति में मासों की गणना तथा मासों पर आधारित त्योहारों की गणना तो चंद्र के आधार पर चैत्र, वैशाखादि नाम से है, पर चंद्र का वार्षिक भ्रमण काल सूर्य के वार्षिक भ्रमण काल से 11 दिन छोटा है। दूसरी ओर ऋतुएं सूर्य पर आधारित हैं, इसलिए चांद्र मासों से ऋतु की संगति बैठाने के लिए लगभग 3 वर्ष में एक अधिक मास जोड़कर चांद्र मासों के व्रतों, त्योहारों आदि को ऋतुनिष्ठ बनाने का उपक्रम किया जाता है। पर यह पर्याप्त नहीं है। अधिकांश ज्योतिषीगण पंचांग के सिद्धांतों का अध्ययन नहीं करते, केवल फलित ज्योतिष में ही व्यस्त रहते हैं। ऐसा मानते हैं कि अधिक मास व्यवस्था से ऋतुओं से हमारी कालगणना का सामंजस्य हो जाता है, पर तथ्य ऐसा नहीं है।

इसका प्रमुख कारण यह है कि हमारे पंचांगकरों ने जिस काल को सूर्य का वार्षिक भ्रमण काल मान लिया है, जो सूर्य के नक्षत्र से चलकर वर्ष भर में पुनः उसी नक्षत्र पर आने का समय होता है, (इसे नक्षत्र वर्ष या साइडीरियल वर्ष कहते हैं) उसका मान ऋतुनिष्ठ या ट्रॉपिकल वर्षमान से लगभग 24 मिनट अधिक है। इस प्रकार प्रत्येक वर्ष वास्तविक ऋतु से 24 मिनट बाद वर्ष आरंभ होने से प्रतिवर्ष 0.01656 दिन के हिसाब से यह अशुद्धि लगभग 71 वर्ष में 1 अंश या एक दिन की हो जाती है। पिछले डेढ़ हजार वर्ष का ऋतुनिष्ठ वर्षमान न लेकर नाक्षत्र वर्ष मान लेने के कारण यह अशुद्धि 2010 में 24 दिन की हो गई है अर्थात ऋतु 24 दिन पहले तथा पंचांग की गणना की अशुद्ध ऋतु 24 दिन बाद आ रही है। शुभ कार्यों में गुरु और शुक्र के उदयास्त का विशेष महत्व है। अक्षांश भेद से इनके उदयास्त में अंतर आना स्वाभाविक है जैसा कि सूर्योदयास्त में होता है। इसलिए किसी क्षेत्र के पंचांग को देखकर पुरोहितगण अपने-अपने क्षेत्र में उस ग्रह के उदयास्त पर विचार किए बिना फैसला सुना देते हैं जो शास्त्र विरुद्ध है।

वराहमिहिर ने भी विसंगति मानी है, जैसा कि नीचे उल्लिखित है। अशुद्ध वर्षमान लेने के कारण ही, जो उत्तरायण 21 दिसंबर को वास्तविक रूप से होता है (उत्तरायण से दिन बड़े होने लगते हैं यह देखने समझने के लिए खगोल गणितज्ञ होने की जरूरत नहीं, दिनों का बड़ा होना 21 दिसंबर से ही शुरू होता है), पंचांग में 14 जनवरी को दिखाया जाता है। पृथ्वी की एक तीसरी गति के कारण अयन और संपात बिंदु लगभग 50 सेकेंड आफ आर्क प्रतिवर्ष, राशि चक्र के संदर्भ से पीछे खिसक रहे हैं तथा 26 हजार वर्ष में ये अयन संपात बिंदु पुनः उसी स्थान पर आ जाते हैं। भारतीय पंचांग कारों ने संपात बिंदु मेष आरंभ पर तथा उत्तरायण बिंदु मकर आरंभ पर स्थिर मान लिया है।

वहीं वराहमिहिर ने छठी सदी के अपने ग्रंथ बृहत्संहिता के आदित्यचार अध्याय में इन बिंदुओं का पीछे खिसकना स्वीकार किया है। ''यह निश्चत है कि किसी समय आश्लेषा के आधे भाग से (अर्थात कर्क के आखिरी अंशों से) सूर्य का दक्षिणायन होता था तथा धनिष्ठा के आदि भाग से (अर्थात् मकर राशि के आखिर में जहां धनिष्ठा के दो चरण मकर में आते हैं) उत्तरायण की प्रवृत्ति थी क्योंकि पूर्व में इसकी चर्चा होती थी। (परंतु) इस समय (वराह मिहिर के काल छठी सदी में) कर्क के आरंभ से (अर्थात् पुनर्वसु से) सूर्य के दक्षिणायन की तथा मकरादि से (अर्थात उत्तराषाढ़ नक्षत्र से) उत्तरायण की प्रवृत्ति होती है। (आदित्यचार अध्याय 1-2) इस प्रकार वास्तविक ऋतु से पंचांगों की ऋतु 24 दिन बाद आरंभ हो रही है।

धर्मशास्त्रों के अनुसार सभी धार्मिक कार्य निर्दिष्ट ऋतुओं में ही होने चाहिए, क्योंकि ऋतुएं ही पृथ्वी पर प्राण का आधार हैं। भक्ति व प्रकृति के बीच लयात्मक संबंध ऋतुएं ही स्थापित करती हैं। संवत्सर का अर्थ ही है वह, जिसमें ऋतुओं का वास हो। इस दृष्टि से देखें तो क्या पंचांग धर्म में अधर्म का कार्य करते नहीं दिखते? पंचांगों का एक द्वंद्व यह है कि धर्मशास्त्रों में व्रत, त्योहार आदि का निर्देश चांद्र मास के आधार पर दिया गया है, जैसे भाद्रपद चातुर्मास में श्री कृष्ण जन्माष्टमी, चैत्र चातुर्मास में रामनवमी इत्यादि। यदि ये मास प्रति 71 वर्ष में एक दिन के हिसाब से ऋतुओं से आगे बढ़ते जाएंगे, तो अभी जो अंतर 24 दिनों का है वह 1500-2000 वर्ष में एक डेढ़ मास कर हो जाएगा।

तब सर्दी में जन्माष्टमी और गर्मी में रामनवमी मनाने से धर्मशास्त्र का वास्तविक उद्‌ेदश्य कैसे पूरा होगा? मधुमास पुनीता रामजन्म का मास है, जो वसंतसूचक है। चैत्र मास गौण है। इसलिए वर्तमान पंचांगों की समस्या वर्षमान अशुद्धि के कारण उत्पन्न चांद्र मास और सौर मास में तालमेल की भी है। यह समस्या मात्र खगोलीय या धर्मशास्त्रीय नहीं है, बल्कि समाजशास्त्रीय भी है। जो बात समाज में डेढ़ हजार वर्ष से रूढ़ हो गई है, उसके समाधान के लिए सभी स्तर पर प्रयास करने की आवश्यकता है। तात्पर्य यह कि जो पंचांग सृष्टि की वैज्ञानिक और सटीक कालगणना कर सकते हैं, उनसे हमारी संस्कृति और जीवन पद्धति भी जुड़ी है, इसलिए पंचांगों में सुधार की तत्काल आवश्यकता है।

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