वास्तु का कुंडली से सम्बन्ध

वास्तु का कुंडली से सम्बन्ध  

व्यूस : 6236 | दिसम्बर 2012
अक्सर देखा जाता है कि एक व्यक्ति को गृह परिवर्तन के बाद भी उसी प्रकार के वास्तु दोष सहित दूसरा घर प्राप्त होता है। अर्थात कुछ वास्तु दोष ऐसे होते हैं जो हमारी कुंडली के दोषों को दर्शाते हैं या यूं कहें कि हमारी कुंडली के ग्रहानुसार ही हमें अपना घर प्राप्त होता है। इसलिए हम सभी वास्तु दोषों को चाहते हुए भी दूर नहीं कर पाते हैं या ग्रह दोष दूर कर भी दिये जायें तो भी पुनः वे दोष अनजाने में वापस आ जाते हैं। भवन सुख हेतु कुंडली में चतुर्थ भाव व चतुर्थेश का महत्वपूर्ण स्थान है।

लाल किताब के अनुसार मकान का कारक ग्रह शनि है। किसी की जन्मकुंडली में शनि बली हो तो पूर्ण भवन सुख मिलता है। यदि शनि नीच, अस्त या शत्रु ग्रहों से अस्त हो तो जातक को शनि दशा में मकान सुख से वंचित रहना पड़ता है। लाल किताब में मकान का कारक दूसरे भाव को माना गया है। सातवें भाव से भी भवन के सुख-दुःख का विचार किया जाता है। शनि यदि गोचर में दूसरे, चैथे या सातवें भाव पर भ्रमण करे तो गृह परिवर्तन के योग बनते हैं। लाल किताब के अनुसार यदि शनि पहले घर में हो तथा सातवां व दसवां घर खाली हो तो अच्छे घर की प्राप्ति होती है वरना मकान बनाने में जातक ऋणी हो जाता है।

  • यदि शनि दूसरे भाव में हो तो मकान का निर्माण मध्य में नहीं रोकना चाहिए अन्यथा कष्ट भोगने पड़ते हैं।
  • यदि शनि तीसरे स्थान में हो तो व्यक्ति मकान बनाने के बाद तीन कुŸो पालें वरना दुःख भोगने पड़ते हैं।
  • यदि शनि चैथे घर में हो तो मकान बनाने से सास, माँ, मामा, दादी को कष्ट उठाने पड़ते हैं।
  • यदि शनि 5वें घर में हो तो मकान बनने के बाद संतान को पीड़ा रहती है। इसके विपरीत यदि संतान मकान बनवाए तो खुशहाल रहती है।
  • यदि शनि छठे घर में हो तो बेटी के ससुराल में परेशानी हो जाती है।
  • यदि शनि 7वें घर में शुभ हो तो व्यक्ति एक के बाद एक मकान बनवाता है और अशुभ हो तो अपना मकान भी बेचना पड़ जाता है।
  • यदि शनि आठवें भाव में हो तो मकान बनाने में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
  • यदि शनि नवम् भाव में हो तो मकान निर्माण से पिता को मृत्युतुल्य कष्ट प्राप्त होते हैं।
  • 10वें शनि के कारण व्यक्ति अपने घर में जाते ही दरिद्र हो जाता है इससे अच्छा है वह किराये के मकान में रहे।
  • 11वें में शनि हो तो बुढ़ापे में मकान बनता है।
  • 12वें भाव में शनि हो तो धीरे-धीरे मकान बनता है।

इस प्रकार ये थे घर के कारक शनि के फल। कुंडली में विभिन्न ग्रह विभिन्न दिशाओं के सूचक होते हैं। कुंडली में उनकी स्थिति ही हमें प्राप्त वास्तु दोषों के बारे में जानकारी देती है।

कुंडली में लग्न को पूर्व दिशा माना गया है एवं सप्तम भाव को पश्चिम। इसी प्रकार चतुर्थ भाव उत्तर दिशा है व दशम भाव दक्षिण। द्वितीय व तृतीय भाव ईशान कोण को दर्शाते हैं, पंचम व षष्ठ भाव वायव्य कोण, अष्टम व नवम् भाव नैऋत्य कोण एवं एकादश व द्वादश भाव आग्नेय कोण को दर्शाते हैं। जिस भाव का स्वामी उच्च या प्रबल होकर केंद्र त्रिकोण में स्थित होता है उस दिशा से संबंधित वास्तु दोष नहीं होते तथा जिस भाव का स्वामी नीच, अस्त या शत्रुक्षेत्रीय होता है अथवा शत्रुओं के साथ बैठा हो तो उस भाव से संबंधित दिशा के दोष उत्पन्न होते हैं।

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इसी प्रकार से विभिन्न ग्रह भी विभिन्न दिशाओं के स्वामी होते हैं। जैसे- सूर्य-पूर्व, चंद्र-उत्तर-पश्चिम, मंगल-दक्षिण, बुध-उत्तर, गुरु-उत्तर-पूर्व, शुक्र-दक्षिण-पूर्व, शनि-पश्चिम व राहु-केतु दक्षिण-पश्चिम कोण का आधिपत्य रखते हैं। यदि कोई ग्रह नीच, अस्त या शत्रुक्षेत्रीय हो तो उस ग्रह से संबंधित दिशा में वास्तु विकार पाये जाते हैं।

  • लग्नेश लग्न भाव में (शुभ ग्रह) हो तो पूर्व में खिड़कियां होने का योग बनता है।
  • लग्नेश का लग्न में नीच, पीड़ित होना पूर्व दिशा के दोष को दर्शाता है। यह योग वास्तुदोष के साथ-साथ जातक के स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। इस दोष के कारण जातक का मस्तिष्क पीड़ित हो सकता है। व्यक्ति के देह सुख में कमी होती है।
  • लग्नेश जन्मकुंडली में 6, 8, 12वें भाव में पीड़ित हो तो व्यक्ति को घर की पूर्व दिशा में दोष देता है।
  • षष्ठेश लग्न भाव में होने से पूर्व भाग आवाज व शोर शराबे वाला होता है।
  • लग्नेश जन्मकुंडली में तृतीय भाव में होने पर ईशान कोण में टूट-फूट व ईंट का निर्माण कार्य शेष होने का सूचक होता है।
  • लग्नेश का पंचम भाव में स्थित होना वायव्य कोण में वास्तुदोष की संभावना बनाता है।
  • एकादश, द्वादश में पाप ग्रह, षष्ठेश, अष्टमेश होने पर घर का ईशान कोण दोषयुक्त होता है।
  • सप्तमेश षष्ठ भाव में हो तो पश्चिम दिशा में वास्तुदोष देता है।
  • अष्टमेश पंचम में हो तो नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) दिशा में वास्तुदोष होने की संभावना रहती है।
  • दशमेश षष्ठ भाव में हो तो दक्षिण दिशा में वास्तुदोष देता है।
  • राहु/केतु की युति उस ग्रह संबंधी दिशा में दोष उत्पन्न करती है जिस दिशा में कुंडली में राहु-केतु स्थित हों।
  • कुंडली में बृहस्पति की दिशा अर्थात ईशान कोण शुभ ग्रहयुक्त हो तो घर के ईशान कोण में खुली जगह, खिड़की, रोशनदान, धार्मिक वस्तुएं होती हैं।
  • यदि जन्मकुंडली में चंद्रमा शुभ ग्रहों के साथ हो तो घर की उत्तर-पश्चिम दिशा वास्तु दोषों से रहित होती है।
  • जन्मकुंडली में शुक्र का उच्च या बली होना दक्षिण पूर्व दिशा में वाहन व सुख संबंधी वस्तुएं होने का सूचक है।
  • जन्मकुंडली में मंगल की शुभता दक्षिण दिशा के वास्तु दोषों में कमी के साथ खान-पान संबंधी वस्तुओं की अधिकता प्रदान करती है।
  • बुध का शुभ होना उत्तर दिशा को शुभ बनाता है तथा उत्तर दिशा में अध्ययन कक्ष या शिक्षा संबंधी वस्तुएं होने की सूचना देता है।
  • पश्चिम दिशा का स्वामी शनि है। कुंडली में शनि पीड़ित हो तो पश्चिम दिशा में लोहे या लकड़ी का पुराना सामान पड़ा हो सकता है।

उक्त परिणाम तब अधिक आयेंगे जब गोचरीय व जन्मकालिक महादशाएं भी प्रतिकूल हों। जन्मकुंडली में बलवान ग्रह शुभ भाव, केंद्र व त्रिकोण में, शुभ स्थिति में हों तो उनसे संबंधित दिशा वास्तुदोष से मुक्त होकर जातक को श्रेष्ठ परिणाम देने वाली होती है।

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