वास्तु एवं बागवानी

वास्तु एवं बागवानी  

वास्तु एवं बागवानी ओमप्रकाश दार्शनिक मभवन के प्रवेश द्वार के आस-पास और चहार दीवारी (प्रवेश द्वार की ओर) के पास केला, चमेली, चम्पा, रातरानी आदि अत्यंत शुभ फलप्रद होते हैं। इसके अलावा संपूर्ण भवन क्षेत्र की बागवानी में नारियल, अंगूर, अनार, चंदन, जूही, मोगरा, रातरानी, केसर, केतकी, गेंदा, गुलाब आदि का होना शुभ माना जाता है। इन सभी का दिशानुरूप पौधारोपण शुभत्व उत्पन्न करने वाला होता है। त्स्य पुराण के अनुसार सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने मनु ऋषि को वास्तु शास्त्र के सूत्रों को मानव जीवन के कल्याणार्थ बताया। वास्तु की उत्पत्ति ‘‘वसु’’ शब्द से हुई है, जिसका अर्थ पृथ्वी है अर्थात पृथ्वी पर किसी प्रकार का निर्माण अथवा विकास वास्तुशास्त्र के अंतर्गत आता है। वास्तुशास्त्र के नियमों को अपने जीवन में प्रतिपादित करने से ब्रह्मांड एवं मानव के मध्य एकरूपता का संबंध स्थापित होता है तथा ऊर्जाओं का सकारात्मक प्रयोग मानव प्रजाति को और अधिक उन्नत बनाने एवं भविष्य को सुंदर, सुव्यवस्थित एवं ऐश्वर्यशाली बनाने में सहायक होता है, जिससे स्वयं के साथ-साथ स्वस्थ समाज का विकास होता है, जो कि राष्ट्र की प्रगति में सहायक होते हैं। वास्तुशास्त्र में 18 आचार्यों में विश्वकर्मा एवं शिव पुत्र ‘मय’ का विशेष स्थान है। भगवान मधुसूदन की आज्ञा का अनुपालन करते हुए ‘मय’ ने धर्म पुरुष युधिष्ठिर के लिए भव्य सभाभवन का निर्माण किया, जबकि विश्वकर्मा जी ने अनेक महलों का निर्माण कर अपनी विशिष्टता को बनाये रखा तथा उसमें सुरपति इंद्र का महल तो आकाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर चलायमान है, उसमें किसी प्रकार के शोक का प्रवेश नहीं है तथा उसमें अनेक वृक्षों में कल्पतरू का विशेष महत्व है जो कि आपकी सभी इच्छाआंे की पूर्ति करता है। आवासीय भवन में भूमि का कुछ न कुछ भाग खाली जमीन के रूप में छोड़ना वास्तु निर्दिष्ट होता है। आवासीय परिसर के साथ वास्तु विचारित पौधा रोपण गृह निवासियों के लिए अत्यंत लाभकारी होता है। यद्यपि बागवानी हेतु भूमि ईशान एवं उŸारी दिशा में हो, तो सर्वोŸाम रहता है। इसके अतिरिक्त हम निजी अथवा किराये के कैसे भी आवास में निवास कर रहे हों, हमें निम्नानुसार बागवानी की व्यवस्था करन े पर पयार्व रण की वास्त ु ऊर्जा का लाभ मिल सकता ह ै: Û अशोक, आम, पीपल, कनेर आदि के पŸाों को किसी भी विशेष पर्व, उत्सव में प्रवेश द्वार पर एक धागे में पिरोकर तोरण की तरह बांध दें, उन्हें ऐसा तब तक रहने दें, जब तक कि अगली बार पुनः बांधने का अवसर न आये। वास्तु दृष्टि से उक्त पŸो काफी शुभत्व पैदा करते हैं। उŸार, पूर्व एवं ईशान में सभी प्रकार के सुगंधित पुष्प देने वाले पौधे उगाने चाहिए। साथ ही केला, अकाव, गमले में बड़ या पीपल भी लगाया जा सकता है। Û दक्षिण, पश्चिम, नै त्य में आम, नींबू, संतरा, बड़, पीपल जैसे बड़े या भारी वृक्ष लगाना चाहिए लेकिन वृक्ष मकान की ऊंचाई से दो गुना दूरी पर हो।



वास्तु विशेषांक  दिसम्बर 2012

फ्यूचर समाचार पत्रिका के वास्तु विशेषांक में वास्तुशास्त्र के सिद्धांत - वर्तमान समय में उपयोगिता, ज्योतिष, वास्तु एवं अंकशास्त्र के संयुक्त क्रियान्वयन की रूपरेखा, वास्तुशास्त्र एवं फेंगशुई- समरूपता एवं विभिन्नता, वास्तु पुरूष का प्रार्दुभाव एवं पूजन विधि, वास्तु शास्त्र का वैज्ञानिक दृष्टिकोण, भूखंड चयन की गणीतीय विधि, गृह निर्माण एवं सुख समृद्धि का वास्तु, वास्तु एवं फेंगशुई, वास्तु दोष कारण व निवारण, वास्तु एवं बागवाणी, वृक्षों व पौधों से वास्तु लाभ कैसे लें, वास्तु मंत्र, वास्तु शास्त्र एवं धर्म, वास्तुशास्त्र में शकुन एवं अपशकुन, लाभदायक वास्तु सामग्री, क्रिस्टल की उपयोगिता, फलादेश में अंकशास्त्र की भूमिका, पाइथागोरियन अंक ज्योतिष, वास्तु के अनुसार शेक्षणिक संस्थान, हवन प्रदूषण में कमी लाता है, मां त्रिपुर सुंदरी का चमत्कारी शक्तिपीठ, वास्तु परामर्श, वास्तु प्रश्नोतरी, विवादित वास्तु, यंत्र समीक्षा/मंत्र ज्ञान, हेल्थ कैप्सुल, अंक ज्योतिष के रहस्य, आदि विषयों पर गहन चर्चा की गई है।

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