गृह निर्माण एवं सुख समृद्धि का वास्तु

गृह निर्माण एवं सुख समृद्धि का वास्तु  

गृह निर्माण व वास्तु सम्मत नियमों का समावेश करने से जीवन को और अधिक सुखी एवं समृद्ध बनाया जा सकता है। इस आलेख में लेखक ने गृह निर्माण के लिए भूमि चयन व गृह निर्माण की इन्हीं बारीकियों को उजागर करने का प्रयास किया है। गृह निर्माण हेतु नगर/मोहल्ले का चयन: यदि हम कोई मकान या गृह निर्माण हेतु भूमि का क्रय करने जा रहे हैं तो सर्वप्रथम इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि हम जिस नगर या मोहल्ले में मकान/फ्लैट/भूमि का क्रय करना चाहते हैं वह नगर या मोहल्ला हमारे लिए अनुकूल अर्थात सफलतादायक होगा या नहीं। इसके लिए अपनी नाम राशि (जन्म राशि नहीं) व नगर या मोहल्ले के नाम की जानकारी ही पर्याप्त है। ‘‘यदि क्रयकर् की नाम राशि से नगर या मोहल्ले की नाम राशि 2, 5, 9, 10 या 11वीं हो तो उक्त नगर या मकान/फ्लैट/भूमि के क्रय करने हेतु उचित रहेगा, अन्यथा नहीं। यदि क्रयकर् की नाम राशि से नगर या मोहल्ले की नाम राशि 1, 3, 4, 6, 7, 8, 12वीं हो तो रोग व शत्रु बाधा का सामना करना पड़ सकता है। अतः गृह निर्माण हेतु नगर/मोहल्ले के चयन में विशेष सावधानी अपेक्षित है। भूमि/मकान/फ्लैट का चयन: नगर/मोहल्ले के चयनोपरांत अब बात आती है कि हम भूमि/ मकान/फ्लैट का चयन किस प्रकार करें जो हमारे लिए अनुकूल हो, इसके लिए निम्नलिखित वास्तु सम्मत नियमों का ध्यान रखना चाहिए। - जिस भूमि पर आम, पपीता, अनार, अमरूद व पलाश के वृक्ष हों या उस भूमि पर आसानी से उग सकते हों वह भूमि सर्वदा शुभकारी होती है। कड़वे व खट्टे फल वाले वृक्ष यथा बेर, शमी आदि के वृक्ष वाली भूमि अशुभकारी होती है। - भूखंड/मकान के दक्षिण या पश्चिम दिशा में ऊंचा भवन, पहाड, टील, पडे शभ् मान जात ह। - भूखंड/मकान के पूर्व या उर दिशा की ओर कोई नदी, नहर या ट्यूबवेल हो तो यह एक शुभकारी स्थिति है। - दो बड़े भूखंडों के बीच एक छोटा भूखंड या दो बड़े मकानों के बीच एक छोटा मकान किसी भी दिशा में उम नहीं होता है। - भवन के द्वार के सामने मंदिर, पोल या गड्ढा होना सही नहीं होता। - आयताकार एवं वर्गाकार भूखंड ठीक रहते हैं। इसमें वर्गाकार भूखंड तो अति उम है। भवन के मुख्य द्वार का वास्तु: - भवन के प्रवेश द्वार में दो पल्लों का दरवाजा शुभ रहता है। - भवन के मुख्य द्वार पर ऊँ, मंगल कलश, मछली का जोड़ा, स्वास्तिक का चिह्न अवश्य स्थापित करना चाहिए। - भवन के मुख्य द्वार पर तुलसी का पौधा रखना चाहिए तथा नित्य प्रातःकाल जल व सायंकाल घी का दीपक अर्पित करना चाहिए। इससे घर के सभी सदस्यों में आत्म विश्वास की बढ़ोरी होती है। सीढ़ियां, दरवाजे व खिड़कियों से संबंधित वास्तु: घर में यदि सीढ़ियां, दरवाजे व खिड़कियां वास्तु सम्मत हैं तो सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह निरंतर बना रहता है। इसके लिए निम्न बातों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है: - सीढ़ियों का निर्माण भवन के दक्षिण या पश्चिम भाग में करना उम रहता है। - सीढ़ियों का घुमाव दक्षिणावर्ती होना चाहिए। - सीढ़ियों के सामने कोई बंद दरवाजा नहीं होना चाहिए। - सीढ़ियों के नीचे शौचालय कदापि नहीं होना चाहिए। - सीढ़ियां विषम संख्या में बनवानी चाहिए। विषम संख्या इस प्रकार हों जिसमें 3 का भाग देने पर 2 शेष बचे। जैसे 17, 23...आदि। - भवन के पूर्व या उर दिशा में दरवाजे या खिड़कियां बनवाने को प्राथमिकता देनी चाहिए जिनकी संख्या सम हो तो उम रहता है। परंतु इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि सम संख्या इस प्रकार न हो जिसमें इकाई के स्थान पर शून्य अंक हो। जैसे-10, 20, 30... आदि। - दरवाजे व खिड़कियां अंदर की तरफ खुलना चाहिए। द्वार खुलते समय किसी भी प्रकार की कर्कश ध्वनि नहीं आनी चाहिए। यदि ऐसा है तो मानसिक असंतुलन की स्थिति आ सकती है। - खिड़कियां दरवाजे के पास तो होनी चाहिए परंतु दरवाजे से सटी नहीं होनी चाहिए। शयन कक्ष एवं अन्य कक्षों से संबंधित वास्तु: - गृहस्वामी का शयन कक्ष नै त्य कोण व अन्य सदस्यों के लिए पश्चिम दिशा में होना उŸाम होता है। - शयन कक्ष में पूजा घर या पूजा की आलमारी नहीं होनी चाहिए। यदि ऐसा है तो उसमें लाल कपड़े का पर्दा अवश्य लगाना चाहिए। - शयन कक्ष में तेज आवाज करने वाले पंखे नहीं होने चाहिए। - शयन कक्ष में प्रेम भावना उभारने वाले चित्रों का होना आवश्यक है। - शयन कक्ष में बेड इस प्रकार डालना चाहिए कि बेड का दीवारों से शेष बना रहे। बेड से सटाकर ड्रेसिंग टेबल कदापि न रखें। - शयन कक्ष में खेलकूद का सामान कदापि न रखें। इससे थकावट का एहसास होता है। - सोते समय सिर सदैव दक्षिण की तरफ होना चाहिए। इससे निरोगता एवं आयु बढ़ती है। - ड्राइंग रूम उर-पूर्व दिशा में होना चाहिए। इससे गृहस्वामी के प्रति आगन्तुकों की सकारात्मक विचारधारा बनती है। - किसी भी कक्ष में हिंसक पशुओं एवं युद्ध की तस्वीरें नहीं लगानी चाहिए। - ड्राइंग रूम में रखी सेन्ट्रल टेबल पर अधिक सामान न रखें। इससे गृहस्वामी के निर्णय लेने की क्षमता घटती है। - ड्राइंग रूम में सुनहले प्रकाश व शयन कक्ष में हल्के प्रकाश की व्यवस्था होनी चाहिए। - बेड में बिछी बेडशीट का चयन इस प्रकार होना चाहिए: बुजुर्गों के लिए पीले रंग की, विद्यार्थियों के लिए हरे रंग की, लेखन, अध्ययन के लिए हल्के नीले रंग की व नवविवाहितों के लिए लाल- गुलाबी रंग की बेड शीट प्रयोग की जानी चाहिए। - घर के किसी भी कक्ष में टूटा-फूटा सामान नहीं होना चाहिए। - घर के किसी भी कक्ष में फर्नीचर का आकार गोल, त्रिकोण या अण्डाकार नहीं होना चाहिए। - अविवाहित कन्याओं के कक्ष में सफेद चांद का चित्र अवश्य लगाना चाहिए। - भण्डार कक्ष वायव्य क्षेत्र में बनाना उचित है। रसोईघर-भोजन-कक्ष से संबंधित वास्तु: रसोईघर मं अग्नि तत्व की प्रधानता है, अतः रसोईघर का निर्माण घर के आग्नेय कोण में होना चाहिए। - गैस-चूल्हा व सिलेण्डर आग्नेय कोण में रखना चाहिए। - गृहस्वामी या गृहस्वामिनी को रसोईघर में भोजन करना चाहिए। - काफी मशीन, टोस्टर, सैण्डविच मेकर, मिक्सी, ओवेन आदि उपकरण दक्षिण-पूर्व दिशा में रखना चाहिए। - यदि मकान दो मंजिल का बना है तो नीचे वाली मंजिल में बना रसोईघर ऊपर वाली मंजिल में बने पूजाघर, शौचालय अथवा शयन कक्ष के नीचे नहीं रहना चाहिए। - रसोईघर की खिड़की पूर्व दिशा की दीवार में होनी चाहिए। - रात्रि को सोते समय रसोईघर अच्छी तरह साफ करके सोना चाहिए। - डायनिंग रूम घर में पश्चिम दिशा में होना चाहिए। डायनिंग टेबल आयताकार हो तो उम है। - टी.वी. देखते समय भोजन कदापि नहीं करना चाहिए। इससे भोजन का पाचन अच्छी तरह नही हाते ह। - भोजन कक्ष में भारी-भरकम सजावट नहीं करना चाहिए। फलों की तस्वीर लगा सकते हैं क्योंकि फल प्रचुरता का प्रतिनिधित्व करते हैं। - सदैव पूर्व या उर की तरफ मुख करके भोजन करना चाहिए। पूर्व की ओर मुख करके भोजन करने से आयु बढ़ती है तथा उर की तरफ मुख करके भोजन करने से आयु व धन संप की वृद्धि होती है। पूजा कक्ष से संबंधित वास्तु: पूजाकक्ष के लिए भवन में उर-पूर्व दिशा सर्वोम मानी गयी है। विकल्प के तौर पर पूर्वी दिशा की दीवार में मंदिर स्थापित किया जा सकता है क्योंकि पूजा करते समय मनुष्य का मुखमण्डल पूर्वी दिशा में होना सर्वोम है। इसके अतिरिक्त पूजाकक्ष से संबंधित वास्तु का ध्यान रखना चाहिए जो कि निम्नवत् हैं: - पूजा स्थान में बड़ी मूर्तियां नहीं होनी चाहिए। पूजा स्थान में दो शिवलिंग, तीन गणेश, दो शंख, तीन देवी प्रतिमाएं व 2 शालिग्राम नहीं होनी चाहिए।



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