शनि के जन्म के विषय में एक रोचक कथा है। उनका जन्म पिता सूर्य व माता छाया से हुआ था। सूर्य का विवाह सुवर्णा नामक एक अतिरूपवती कन्या से हुआ। कथा के अनुसार सूर्य अपनी पत्नी को बहुत चाहते थे तथा कभी भी उससे दूर नहीं रहना चाहते थे। किन्तु सूर्य का प्रकाश व तेज इतना अधिक था कि सुवर्णा उसे सहन नहीं कर पाती थी। उसके पास कोई मार्ग नहीं था और वह अपने को कष्ट में महसूस कर रही थी। तभी उसे एक विचार आया तथा उसने अपनी छाया से अपना एक प्रतिरूप तैयार किया तथा उसे सूर्य के पास छोड़कर चली गई। सूर्य दोनों में अन्तर को नहीं जान पाए और छाया को अपनी प्रकृति के चलते सूर्य के तेज से कोई कष्ट नहीं था। अतः उन दोनों के समागम के परिणामस्वरूप कुछ समय पश्चात् शनि का जन्म हुआ। सूर्य ने अपने पुत्र शनि को देखा जो कि काला, कुरूप, बड़ी - बड़ी लाल जलती हुई आंखों वाला तथा अपंग था तो उसे इस बात का विश्वास नहीं हुआ कि उस जैसे रूपवाले पुरूष का ऐसा कुरूप पुत्र भी हो सकता है। सूर्य बहुत क्रोधित हुए तथा शनि को अपने सौर जगत से पृथ्वी पर फेंक दिया। ऐसी मान्यता है कि तभी से संसार में दुख, कष्ट, व्याधि, अप्रसन्न्ता, दर्द तथा व्यथा ने जन्म लिया। यहां तक कि पृथ्वी पर मृत्यु का प्रारम्भ भी शनि के बाद ही हुआ। यह सभी कथाएं प्रतीकात्मक हैं तथा यदि हम ध्यानपूर्वक इनका विश्लेषण करें तो यह हमें ग्रहों के स्वभाव और प्रकृति के विषय में बहुत कुछ बताती हैं। सूर्य तो अपने आप में ही तेज और प्रकाश का पुंज है तथा छाया तो प्रकाश के बिल्कुल विपरीत है। संसार में विवाह दो विपरीत स्वभाव के स्त्री व पुरूष में होता है तो वह विशेष अर्थ रखता है। सूर्य स्वयं तेज पुंज है। अपनी पत्नी छाया से आनन्दपूर्वक सहवास प्राप्त करता है। विवाह अथवा आंतरिक सम्बंधों में जब पूरी तरह डूब जाया जाता है तभी नए आयामों का उद्भव होता है। सूर्य को पूर्ण विशान्ति की आवश्यकता है जो उसे छाया के पास जाने से ही प्राप्त हो सकती है तथा छाया की परिगति भी सूर्य को पूर्ण समर्पण में ही है। विवाह संसार की एक पवित्र संस्था है जो अनादि काल से इस संसार के सभी भागों में चली आ रही है। भारतवर्ष के मनीषियों ने इस पर विशेष ध्यान दिया है। आदि काल से ही ऋषियों का मत रहा है कि समाज में विवाह का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि समाज को अपने भविष्य व विकास के लिए संतति की आवश्यकता होती है तथा वह विवाह जैसी संस्था से ही संभव है कि समाज चलाने के लिए योग्य संतति प्राप्त हो सके। ऐसी संतति समाज को पूर्ण ही नहीं महत्वपूर्ण भी बनाती है। इसी तथ्य का विचार कर यहां व्यक्तियों के साथ परिवार को भी महत्व दिया गया है। भारत में विवाह दो व्यक्तियों के बीच नहीं बल्कि दो परिवारों के बीच होता है। अतः सफल संतति के लिए वैज्ञानिक सिद्धान्तों का निर्माण किया गया। यह आज भी एक नियम है कि लड़के या लड़की के लिए साथी देखते हुए दोनों ओर की सात - सात पीढ़ियों के रक्त सम्बंधियों में विवाह नहीं किया जाता, इसमें मुख्य विचार है दोनों के गुणसूत्रों में पर्याप्त अंतर होना चाहिए जो कि अच्छी संतान के लिए नितांत आवश्यक है। इस सिद्धान्त को न मानने के कारण अनेकों राष्ट्रों व जातियों का अंत हो गया। इसका अभी हाल में ही ताजा उदाहरण पारसी समाज है जोकि निकट संबंधियों के बीच विवाहों के चलते आज लगभग समाप्ति की ओर है। शनि के जन्म की यह कथा उसके विषय में बहुत कुछ कहती है। सूर्य जो कि दूरस्थ ग्रह है, यदि एक छोर है तो पत्नी छाया एक विपरीत छोर है। जब भी इस प्रकार दो विपरीत छोर एक दूसरे से मिलते हैं तो परिणाम निश्चय ही विस्मयकारी होते हैं। आधुनिक वैज्ञानिक भी मानते हैं कि यदि स्त्री एवं पुरूष के गुणसूत्रों अर्थात् जीन्स में पर्याप्त अंतर हो तो उनकी संतति विशिष्ट गुणवान होती है। यही बात सूर्य व छाया के पुत्र ‘शनि’ के विषय में भी सत्य है कि अपने माता - पिता से भिन्न होते हुए भी उसका व्यक्तित्व अपने आप में महत्वपूर्ण व अद्भुत है। उसमें कार्य करने की पद्धति किसी की देन नहीं है। इसी कारण शनि अपनी सदा विशेष छाप छोड़ता है, चाहे वह जल हो, पृथ्वी हो, आकाश हो या वायु हो। शनि के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने वाली एक अन्य कथा के अनुसार सिकन्दर महान अपनी विश्व विजयी यात्रा में कुछ समय भारत में भी रहा था। उस समय उसे पता चला कि भारत में किसी विशेष स्थान पर अमृत से भरा तालाब है। मनुष्य अजर - अमृत्व की इच्छा लेकर ही पैदा होता है। सिंकंदर भी इसका अपवाद नहीं था। अतः वह अकेला ही उस तालाब की खोज में निकल पड़ा क्योंकि वह अमृत को किसी से बांटना नहीं चाहता था। तालाब पर पहुंचते ही उत्सुकतावश अपनी तलवार किनारे रख अमृत पीने के लिए झुका ही था कि एक आवाज ने उसे रोका ‘ओ सिकन्दर अमृतपान को आतुर, पहले मुझ से मिल ले’। सिकन्दर ऐसी आवाज सुन, अपनी तलवार उठा, आवाज की दिशा में बढ़ चला, वहां बहुत से पेड़ों के बीच एक डाल पर बैठा हुआ कौआ, इंसान की आवाज में बोल रहा था। सिकन्दर उसे देख अवाक रह गया क्योंकि कौवे के तन पर एक भी पंख नहीं था। उसके नाखून टूट गये थे। वह मानों हड्डियों का एक ढांचा रह गया था जिन्हें सिकन्दर अपनी आंखों से गिन सकता था। कौवे की केवल दो आंखों में ही चमक रह गयी थी। कौवे ने सिकन्दर से कहा कि मैंने सदियों पहले इस अमृत को पिया था। अब बढ़ी हुई आयु के कारण मेरी यह दशा हो गई है कि मैं हर पल मृत्यु की कामना करता हूं किन्तु दुर्भाग्य से मैं मर भी नहीं सकता। उस कौवे की बात को समझकर, सिकन्दर अमृत को पीने की बात त्यागकर अपने शिविर की ओर लौट गया। जीवन का मार्ग तो अनित्यता से भरा पड़ा है तथा इसका सौन्दर्य भी इसके परिवर्तित होते रहने से ही है। जीवन नैया तो परिवर्तन के इस उठते - गिरते द्विस्वभावी ज्वार - भाटे पर ही यात्रा करती है। रात - दिन, खुशी - गम, अच्छा - बुरा तथा ऐसे ही असंख्य द्वैव जीवन की घटनाओं में नयारंग व चमत्कार भरते रहते हैं। जीवन का सही मूल्यांकन तो इन अनुभवों की गहराई में है। दिन की सुन्दरता व महत्व नहीं है यदि उसके बाद रात न हो तो दुखों में डूबे जीवन में आई एक ही खुशी वर्षों के दुख कष्ट को एक नई दृष्टि से देखने को बाध्य कर देती है। ज्योतिष के अनुसार सूर्य चेतन आत्म का द्योतक है तथा चेतन आत्म में अपनी एक अहंकारिक छवि रहती है जोकि व्यवहार के धरातल पर उसकी परख हुए बिना ही बनी होती है। शनि जीवन के विषय में इस व्यर्थ (उथली) समझ को स्वीकार नहीं करता। उसके अनुसार जीवन के प्रत्यक्ष पक्ष को व्यवहार के रूप में जाने बिना पूर्ण संतुलन नहीं पाया जा सकता तथा कसौटी पर कसने से ही सही पहचान हो सकती है। मूलतः शनि काल का नियन्ता (प्रतिनिधि) है, काल का मूल है। अभी और यहीं वृद्धि व विस्तार तथा संकुचन किसी भी बीज वृद्धि का क्या फल होगा यह निर्णय शनि के पास है तथा शनि ही ऐसा ग्रह है जो परिणाम को परिमित अथवा असीम कर देते हैं। शनि के निर्णय को कोई चुनौती नहीं दे सकता क्योंकि वह ऐसा सूक्ष्म निरीक्षण व विश्लेषण के बाद ही करता है और उसमें कोई कसर नहीं छोड़ता। इसी कारण से शनि कंजूस, विघ्नकारी, कष्टदायक, दयाहीन, निराशावादी, शुष्क, स्वेच्छाचारी, हठी, दृढ़, अड़ियल, क्रूर, संदेही व अप्राप्य माना जाता है क्योंकि पूर्णतावादी होने के कारण शनि यह निश्चित कर लेना चाहता है कि अहंकार, अहं रहित होकर मानवीय पक्ष को विकसित करता है या नहीं तथा व्यक्ति को मानवता के मार्ग पर महान से महानतम् बनाना चाहता है। बिना प्रयास, मेहनत और खून पसीना बहाए मिली सफलता मानव मन के लिए कोई महत्व नहीं रखती। ऐसा शनि का विचार है। शनि चाहते हैं कि व्यक्ति को जीवन में जो कठिनाइयां आएं उन चुनौतियों का सामना करे। इस कठिन परीक्षा के बाद प्राप्त विजय के बाद व्यक्ति के ऊपर शनि की कृपा की वर्षा होती है। शनि, व्यक्ति की छुपी हुई प्रतिभा, संयम तथा सहन शक्ति की भी परख करता है तथा उसे यह शिक्षा देता है कि उसमें इतनी क्षमताएं हं कि उसे किसी भी दूसरे के सहारे की आवश्यकता नहीं है। शनि व्यक्ति से उत्साही, दक्ष, मर्यादावादी, अध्यवसायी, परिश्रमी, आज्ञाकारी, आत्म संयम से भरपूर तथा पूर्णतया व्यावहारिक होने की आशा करता है। एक बार व्यक्ति संकटों, समस्याओं, कठिनाइयों, बाधाओं, तनावों, चिन्ताओं से पार पा लेता है तो वह अपनी सफलता का पुनः मूल्यांकन करने लगता है तथा उसका दृष्टिकोण अपने व दूसरों के प्रति बदलने लगता है। शनि का यह भी मानना है कि बिना खुद दुख, दर्द, कष्ट को भोगे कोई भी दूसरे के दर्द को पूरी तरह नहीं जान सकता। शनि कठोर प्रकृति गुरू है परन्तु एक बार उनकी शिक्षा को हृदयगत कर लेने पर वह प्रसन्न होकर व्यक्ति पर अपना आशीर्वाद, कृपा और अतुलनीय प्रेम न्यौछावर कर देते हैं। इसमें संदेह नहीं कि प्रारम्भ में शनि जीवन में दुर्गति कर देता है क्योंकि वह इच्छाओं को नहीं योग्यताओं को पुरस्कृत करने वाला ग्रह है। यदि शनि की कृपा हो जाए तो व्यक्ति सांसारिक स्तर पर सदा रहने वाली संपदा, यश, ख्याति तथा इच्छित वस्तुओं को प्राप्त करता है। किन्तु शनि का मूल संदेश है कि सांसारिक उपलब्धियों का कोई स्थाई महत्व नहीं है तथा उन्हें एक न एक दिन नष्ट होना ही है। अतः यदि आध्यात्मिक उन्नति नहीं हुई तो सब कुछ व्यर्थ है। शनि यह समझाना चाहते हैं कि जैसे फल को बीच से तोड़ा जाये तो बहुत से बीज होते हैं और यदि बीज को तोड़ा जाये तो उसके भीतर कुछ भी नहीं होता, परन्तु उस कुछ भी नहीं में ही वृक्ष का अस्तित्व होता है। एक बार उस कुछ भी नहीं में छुपी संभावनाओं के आनन्द को जान लेने पर जीवन का दृष्टिकोण बदलकर उसे और भी गहरे रंगों से भर देता है। शनि में व्यक्ति को स्थूल भौतिकता से निर्वाण की उच्चतम अवस्था तक ले जाने की क्षमता है। शनि मकर व कुम्भ दो राशियों का स्वामी है। कुम्भ राशि में 0 से 20 अंश तक वह मूल त्रिकोण होता है तथा शेष 20 से 30 अंश तक अपने स्वामित्व में होता है। तुला राशि में शनि उच्च का होता है तथा उसका उच्चतम् अंश 20 होता है। इसी प्रकार मेष राशि में वह नीच का तथा 20 अंश पर नीचतम् होता है।



पर्व व्रत विशेषांक  दिसम्बर 2013

फ्यूचर समाचार पत्रिका के पर्व व्रत विषेषांक में व्रत और पर्वों से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी, उनका धार्मिक महत्व, उनसे जुड़ी शास्त्रोक्त लोक गाथाएं तथा विभिन्न पर्वों के मनाए जाने की विधि और उनके सांस्कृतिक महत्व को दर्शाने वाले अनेकानेक आलेख जैसे विराट संस्कृति के परिचायक हैं भारतीय पर्व, आस्था एवं शांति का पर्व मकर संक्रांति एवं सरस्वती पूजा, होली, गुरु पूर्णिमा, स्नेह सद्भावना एवं कर्Ÿाव्य का सूत्र रक्षाबंधन, शारदीय नवरात्र, महापर्व दीपावली एवं छठ पर्व की आलौकिकता व पर्व व्रत प्रश्नोŸारी सम्मिलित किये गये हैं इसके अतिरिक्त नवंबर मास के व्रत त्यौहार, अंक कुंडली का निर्माण एवं फलादेश, आरुढ़ लग्न का विचार, एश्वर्य और सौंदर्य की रेखाएं, त्रिक भावों ग्रहों का फल एवं उपाय तथा गूगल बाॅय कौटिल्य नामक सत्यकथा को भी शामिल किया गया है।

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