अंक कुण्डली का निर्माण एवं फलादेश

अंक कुण्डली का निर्माण एवं फलादेश  

अंक कुण्डली नाम तथा जन्मतिथि की एक जगह पर ही सभी प्रकार की गणनाओं का विस्तृत तस्वीर प्रस्तुत करता है। चरित्र विन्यास एवं भूत, वर्तमान तथा भविष्य की जानकारी का अध्ययन एक साथ किया जाना चाहिए, चूँकि दोनों एक-दूसरे के साथ मिश्रित हैं। सभी प्रकार की गणनाएँ एक ही पृष्ठ पर की जानी चाहिए ताकि व्यक्ति के जीवन का हर पहलु हमारी आँखों के सामने हो और हम उनका सापेक्षिक अध्ययन कर सकें। हम इस प्रकार आगे बढ़ते हैं चरण 1: सभी विशिष्ट एवं सामान्य अंकों, प्रबल बिन्दुओं, स्वभाव के धरातलों, कलश तथा चुनौतियों की गणना करें। कलश एवं चुनौती अंकों को उम्र समूह के साथ लिखें। चरण 2: जन्म के वर्ष एवं बाद के लगातार वर्ष, जहाँ तक हम चाहते हैं, पहली लाइन में लिखें। दूसरी लाइन में जन्म वर्ष के ठीक नीचे व्यक्ति की उम्र लिखें जो कि जन्म वर्ष में ‘0’ से शुरू होगा। तीसरी लाइन में व्यक्ति का पहला नाम इस प्रकार लिखें कि प्रत्येक अक्षर अपने आंकिक मूल्य के अनुसार दुहराया जा सके। चैथी लाइन में दूसरा नाम लिखें। तीसरा नाम पाँचवीं लाइन में लिखें। यदि तीसरा नाम नहीं है तो आगे बढ़ं। चैथा, पाँचवाँ नाम रहने पर इसी तरह से लिखते जायें। अगली लाइन में (E.No.) परिघटना अंक लिखें जो कि प्रत्येक वर्ष के अक्षरों के आंकिक मूल्यों का योग होगा। यह कुंडली के प्रथम भाग की समाप्ति है, इसे दो रेखाएँ खींचकर चिह्नित कर दें। अगली लाइन में व्यक्तिगत वर्ष (P.Y.) लिखें। फिर अगली लाइन में चालू वर्ष (C.Y.) लिखें। फिर अगली लाइन में जन्म बल काल (B.F.P.) लिखें। फिर अगली लाइन में कलश (Pinnacle) लिखें। अब पूर्ण कुण्डली बनकर तैयार हो गई। पुनः इसे दो रेखाएँ खींचकर चिह्नित करें। चरण 3: जाँच करें कि जन्म के समय का व्यक्तिगत वर्ष (P.Y.) एवं चालू वर्ष (C.Y.) उम्र ‘0’ के सामने लिखे हैं या नहीं। जन्म के वर्ष में व्यक्तिगत वर्ष एवं योग्यता अंक एक ही होते हैं। दूसरा, तीसरा एवं चैथा कलश हमेशा प्रथम व्यक्तिगत वर्ष से प्रांरभ होता है। जहाँ कहीं भी अक्षर, परिघटना अंक (E.No.), जन्म बल काल (B.F.P.) अथवा कलश में परिवर्तन हो वहाँ पर खड़ी रेखा खीचें। चरित्र का विश्लेषण करें। विशिष्ट गुणों जैसे दोहरी ऊर्जा, प्रबल बिन्दु एवं स्वभाव के धरातल पर ध्यान दें। व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं को स्पष्ट करें। बड़ी उम्र के लोगों के लिए सामान्यतः कम अवधि की कुण्डली बनाई जाती है जिसमें 5 वर्ष पीछे से 10 वर्ष आगे तक की अवधि होती है। अध्ययन जितनी छोटी अवधि के लिए किया जाएगा विश्लेषण उतना ही गहरा एवं गंभीर होगा। घटनाओं की प्रकृति एवं उसके स्वरूप को परिघटना अंक, अक्षरों, व्यक्तिगत वर्ष, चालू वर्ष, जन्म बल काल एवं कलश के साथ मिलकर निर्धारित करते हैं। कलश एवं जन्म बल काल कार्य की सामान्य श्रेणी को प्रकट करते हैं, इसके साथ परिघटना अंक (E.No.) का समक्रमण करके ही अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए। यदि विशिष्ट अंक अथवा विशेष बल परिघटना अंक तथा कलश के साथ सौहार्दपूर्ण हैं तो परिणाम काफी सुखद होगा। अंकों के बीच तालमेल की कमी दुःखद, परिणाम के द्योतक होंगे।



पर्व व्रत विशेषांक  दिसम्बर 2013

फ्यूचर समाचार पत्रिका के पर्व व्रत विषेषांक में व्रत और पर्वों से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी, उनका धार्मिक महत्व, उनसे जुड़ी शास्त्रोक्त लोक गाथाएं तथा विभिन्न पर्वों के मनाए जाने की विधि और उनके सांस्कृतिक महत्व को दर्शाने वाले अनेकानेक आलेख जैसे विराट संस्कृति के परिचायक हैं भारतीय पर्व, आस्था एवं शांति का पर्व मकर संक्रांति एवं सरस्वती पूजा, होली, गुरु पूर्णिमा, स्नेह सद्भावना एवं कर्Ÿाव्य का सूत्र रक्षाबंधन, शारदीय नवरात्र, महापर्व दीपावली एवं छठ पर्व की आलौकिकता व पर्व व्रत प्रश्नोŸारी सम्मिलित किये गये हैं इसके अतिरिक्त नवंबर मास के व्रत त्यौहार, अंक कुंडली का निर्माण एवं फलादेश, आरुढ़ लग्न का विचार, एश्वर्य और सौंदर्य की रेखाएं, त्रिक भावों ग्रहों का फल एवं उपाय तथा गूगल बाॅय कौटिल्य नामक सत्यकथा को भी शामिल किया गया है।

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