रत्न-रुद्राक्ष कवच

रत्न-रुद्राक्ष कवच  

व्यूस : 2171 | नवेम्बर 2006

वर्तमान समय में मनुष्य के जीवन में इतनी अधिक व्यस्तता बढ़ गई है कि प्रत्येक व्यक्ति के पास प्रतिदिन पूजा पाठ के लिए अतिरिक्त समय निकालना कठिन सा हो रहा है। आज विज्ञान जितनी भौतिक उन्नति कर रहा है, दूसरी ओर उतने ही अनुपात में व्यक्ति की समस्याओं में भी वृद्धि हो रही है ऐसी परिस्थितियों में सरल आध्यात्मिक उपायों के द्वारा व्यक्ति अपनी समस्याओं को सुलझा सकता है।


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निम्न रत्न एवं रुद्राक्ष कवच, रत्न एवं रुद्राक्ष का शुभ संगम है। अपनी समस्या के अनुसार विधिपूर्वक इन्हें धारण करने से अभीष्ठ फल की प्राप्ति होती है। उŸाम बुद्धि एवं विद्या कवच: यह कवच बुद्धि के कारक बुध एवं विद्या के कारक बृहस्पति का प्रतीक है। रत्न बुध का रत्न है तथा चारमुखी रुद्राक्ष बृहस्पति ग्रह से संबंधित है। उŸाम बुद्धि एवं विद्या के बल से व्यक्ति अपना चैमुखी विकास कर सकता है। सद्बुद्धि कवच को धारण करने से शिक्षा में उन्नति होती है। और बुद्धि का विकास होता है।

बुधवार अथवा बृहस्पतिवार को गंगाजल से अभिषिक्त तथा धूप और अगरबŸाी से पूजन कर सुबह के समय धारण करें, धारण करने से पूर्व निम्नलिखित मंत्र का 108 बार जप करें।

मंत्र - ¬ ऐं महासरस्वत्यै नमः धन, यश, कीर्ति कवच: यह कवच लक्ष्मी, यश तथा संपŸिादायक रुद्राक्ष एवं रत्नों का स्वरूप है। एकमुखी काजूदाना रुद्राक्ष एवं माणिक्य रत्न यश, पद, प्रतिष्ठा में वृद्धि करते हैं। मूंगा एवं मोती उŸाम संपŸिा एवं लक्ष्मी की प्राप्ति में सहायक होते हैं। इस कवच को धारण करने से लक्ष्मी यश, संपŸिा, पद, प्रतिष्ठा आदि में वृद्धि होती है।

इस कवच को सोमवार को गंगाजल अथवा पंचामृत से अभिषिक्त कर धूप दीप से पूजन करके सुबह के समय धारण करें, धारण करने से पूर्व निम्नलिखित मंत्र का 108 बार जप करें।

मंत्र - ¬ सौभाग्यलक्ष्म्यै नमः शनि देव कवच: यह कवच शनि ग्रह के उपरत्न नीली तथा शनि दोष शांति कारक सातमुखी रुद्राक्ष का स्वरूप है। जिन लोगों की शनि की साढ़ेसाती, ढैया, महादशा या अन्तर्दशा चल रही हो, वे इसे धारण कर सकते हैं। इस कवच को धारण करने से शनि ग्रह दोष की शांति होती है। इसे शनिवार को गंगाजल अथवा शुद्ध जल से अभिषिक्त करके सायंकाल के समय धारण करें, धारण करने से पूर्व निम्नलिखित मंत्र का 108 बार जप करें।

मंत्र - ¬ प्रां प्रीं प्रौं सः शनये नमः कालसर्प कवच: यह कवच काल सर्प दोष शांति कारक रत्न गोमेद, लहसुनिया और नीली एवं राहु शांति कारक आठमुखी रुद्राक्ष का प्रतीक है। कालसर्प दोष से ग्रस्त लोग इस कवच को धारण कर सकते हैं। इसे धारण करने से बाधाओं का शमन होता है तथा जीवन में सुख शांति बढ़ती है। इसे बुधवार अथवा शनिवार को गंगाजल अथवा पंचामृत से अभिषिक्त करके सूर्यास्त के बाद धारण करें, धारण करने से पूर्व निम्नलिखित मंत्र का 108 बार जप करें।

मंत्र - ¬ नमः शिवाय आरोग्य कवच: यह कवच परम शांतिदायक शिव स्वरूप पांचमुखी रुद्राक्ष तथा स्वास्थ्यवर्धक रत्न मोती, उपरत्न सुनैला एवं मंूगे से बना है। पांचमुखी रुद्राक्ष एवं उक्त रत्नों के मेल से बने इस कवच को धारण करने से रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है जिससे व्यक्ति स्वस्थ्य रहता है और उसे आनंद की प्राप्ति होती है। इसे सोमवार को प्रातः काल के समय पंचामृत अथवा गंगाजल से अभिषिक्त करके धारण करें, धारण करने से पूर्व निम्नलिखित मंत्र का 108 बार जप करें।

मंत्र - ¬ हौं जूं सः माम पालय-पालय सः जूं हौं ¬ प्रेमाकर्षण कवच: यह कवच प्रेम और आकर्षण के कारक ग्रह शुक्र के उपरत्न जरकन तथा प्रेम संबंधों में स्थायित्व के कारक शनि ग्रह के उपरत्न नीली का प्रतीक है। इसमें जटिल छहमुखी रुद्राक्ष शुक्र के शुभफल में वृद्धि करता है। इसे धारण करने से पति-पत्नी व प्रेमी-प्रेमिका के बीच प्रेम और आकर्षण में वृद्धि होती है, इस कवच को शुक्रवार को प्रातः काल के समय धारण करना चाहिए, धारण करने से पूर्व निम्नलिखित मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए।


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मंत्र - ¬ क्लीं नमः

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