प्रेम का प्रतीक फिरोजा

प्रेम का प्रतीक फिरोजा  

किसी के प्रति अपना प्रेम प्रकट करना हो, तो उसे फिरोजा की बनी मुद्रिका भेंट करनी चाहिए। यह प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी, अथवा मित्र किसी को भी भेंट की जा सकती है। इसमें अनुराग का रंग चढ़ा होता है। अगर पहले से प्रेम अंकुरित है, तो वह पल्लवित होगा, पुष्पित होगा और अंत में फलित भी होगा। यदि पहले से कुछ न हो, तो तब भी प्रेम अंकुरित होने लगेगा। विवाहित युगल एक जैसी दो अंगूठियां फिरोजा की बनवाएं और प्रेमपूर्वक एक दूजे को पहनाएं, तो प्रेम संबंधों में प्रगाढ़ता आएगी। यदि किसी प्रकार का मतभेद है, तो वह समाप्त हो कर निकटता बढ़ेगी। दो मित्र, अथवा दो सहेलियां भी अपने प्रिय को फिरोजा की अंगूठी, अथवा लाॅकेट भेंट करें, तो मित्रता का रंग चोखा चढ़ेगा। फिरोजा में सात्विक किस्म की वशीकरण शक्ति होती है। एक विशेष प्रयोग के बारे में लिखा जा रहा है। तीन मित्र थे। तीनांे में से दो में किसी बात को ले कर मतभेद हो गया। एक ही शहर में रह कर दोनों ने पांच साल तक बोलचाल बंद रखी। तीसरे मित्र ने, जो दोनों का परम मित्र और शुभ चिंतक था, एक ही तरह की तथा एक ही वजन की तीन फिरोजा की अंगुठियां बनवायीं। अभिमंत्रित होने के बाद तीनों मित्रों ने अंगुठियां पहनीं। दोनों फिरोजा पहने रूठे मित्रों को आपस में हाथ मिलाते देर नहीं लगी। यह सिद्ध हुआ कि फिरोजा नफरत को शांत कर निश्छल प्रेम बढ़ाता है। इस परोपकारी रत्न के अनेक नाम हैंः संस्कृत में पेरोजक, पैरोज, व्योमाभ, नीलकंठक, फारसी में फिरोजा तथा अंग्रेजी में टर्कोइज कहते हैं। शास्त्रों में इसकी उत्पत्ति दैत्यराज बली के शरीर की नसों से बतलायी गयी है। फिरोजा फारस (नौशपुर नामक स्थान) तिब्बत, अफगानिस्तान, मिस्र, अमेरिका एवं तुर्की आदि देशों में पाया जाता है। इसका रंग गहरा नीला, आसमानी नीला और हरापन लिए होता है। शुद्ध नीले रंग की मांग अधिक होती है। तिब्बत में हरा रंग पसंद किया जाता है। गर्मी, तेज प्रकाश और पसीने से इसका रंग खराब हो सकता है। फिरोजा अपारदर्शक होते हुए भी अपने रंग की चमक के कारण सुंदर रत्नों की श्रेणी में आता है। फिरोजा का काठिन्य 5.6 से 6 तथा अपेक्षित गुरुत्व 2.6 से 2.8 तक होता है। रसायन शास्त्र के अनुसार यह एल्युमीनियम, लोहा, तांबा और फाॅस्फेट का यौगिक है। औषधीय गुण फिरोजा का शोधन करने के पश्चात भस्म, या पाक का औषधीय प्रयोग किया जाता है। यह प्रयोग अनुभवी चिकित्सक के मार्गदर्शन में ही करना उचित है। यह नेत्र एवं वाणी दोष, मुंह और गले के रोग, उदर शूल और पुराने विष का प्रभाव नष्ट करता है। अनिद्रा रोग में भी यह लाभदायक है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि फिरोजा के धारक के निकट बिच्छु नहीं आता। उसे बिजली और पानी का भय नहीं रहता है। ज्योतिषीय गुण लग्न के आसपास के भावों में, या लग्न में पापी, या अनिष्टकारक ग्रह हो, तो फिरोजा उन ग्रहों के दोष से लग्न को सुरक्षित करता है। फिरोजा के धारण हेतु अलग-अलग ज्योतिषीय मत इस प्रकार हैं: 1- भारतीय जन्म मास के आधार पर पौष महीने में अगर जातक का जन्म हुआ हो, तो फिरोजा अवश्य पहनें। 2-जातक की राशि कुंभ हो, तो फिरोजा धारण करें। 3-अंग्रेजी मास के आधार पर दिसंबर में जन्मा व्यक्ति फिरोजा धारण करे। 4- सूर्य राशि के अनुसार 21 दिसंबर से 19 जनवरी के मध्य जन्मा व्यक्ति फिरोजा पहन सकता है। 5- फिरोजा का रंग हरा हो, तो बुध के लिए, गहरा नीला हो, तो शनि के लिए और आसमानी हल्का नीला हो, तो शुक्र के लिए पहना जाता है। 6- केतु दोष होने पर फिरोजा पहनें। इसे किसी रत्न विशेष का उपरत्न बतलाना न्यायसंगत नहीं है। इसे तो एक स्वतंत्र रत्न की संज्ञा दी जानी चाहिए। इसके उपयोग हेतु किसी राशि-लग्न का विचार ही नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह सबका मित्र है; शत्रु किसी का भी नहीं। इसे तो प्रेम और बलिदान का संदेशवाहक और जन-जन का दुलारा होना चाहिए। कारण, यह रत्न आने वाले कष्ट को अपने ऊपर ले लेता है और धारक को बचा लेता है। धारक के विरूद्ध किसी प्रकार का षड्यंत्र हो रहा हो, तो यह स्वयं का रंग बदल कर धारक को सावधान करता है। आने वाली विपत्ति का भी वह इसी प्रकार संकेत देता है। कहने का मतलब यह है कि फिरोजा सच्चे स्वामी भक्त की तरह चैकस रह कर धारक को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है और बदले में कुछ भी नहीं चाहता। किंतु फिरोजा खरीद कर पहनने पर लाभ उतना नहीं होता, जितना कि किसी के द्वारा भेंट करने पर होता है। यह एक मुलायम, खूबसूरत और चिकना रत्न है। विश्वभर में, खास कर मिस्र देश में प्राचीन काल से ही फिरोजा के सोने-चांदी के गहने बनते रहे हैं। ईरान में तो फिरोजा को राष्ट्रीय सम्मान का रत्न माना जाता है।


पराविद्या विशेषांक  जुलाई 2013

फ्यूचर समाचार पत्रिका के पराविद्या विशेषांक में शिक्षा के क्षेत्र में सफलता/असफलता के योग, मानसिक वेदना, विवाह के लिए गुरु, शुक्र एवं मंगल का महत्व, ईश्वर एवं देवताओं के अवतार, वास्तु दोष व आत्महत्या, श्रीयंत्र का अध्यात्मिक स्वरूप, पितृमोक्ष धाम का महातीर्थ ब्रह्म कपाल, फलित ज्योतिष में मंगल की भूमिका, प्रेम का प्रतीक फिरोजा, स्त्री रोगों को ज्योतिष व वास्तु द्वारा आकलन, हृदय रोग के ज्योतिषीय कारण, क्या है पूजा में आरती का महत्व, राजयोग तथा विपरीत राजयोग, चातुर्मास का माहात्म्य इत्यादि रोचक व ज्ञानवर्धक आलेखों के अतिरिक्त दक्षिणामूर्ति स्तोत्र, अंक ज्योतिष के रहस्य, सीमा का वहम नामक सत्यकथा, अर्जुन की शक्ति उपासना नामक पौराणिक कथा, कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए लालकिताब के अचूक उपाय, भगवान श्री गणेश और उनका मूल मंत्र तथा जियोपैथिक स्ट्रेस व अन्य नकारात्मक ऊर्जाओं आदि विषयों पर भी विस्तृत रूप से चर्चा की गई है।

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