हिंदू मान्यताओं का वैज्ञानिक आधार

अनादि काल से ही हिंदू धर्म में अनेक प्रकार की मान्यताओं का समावेश रहा है। विचारों की प्रखरता एवं विद्वानों के निरंतर चिंतन से मान्यताओं व आस्थाओं में भी परिवर्तन हुआ। क्या इन मान्यताओं व आस्थाओं का कुछ वैज्ञानिक आधार भी है? यह प्रश्न बारंबार बुद्धिजीवी पाठकों के मन को कचोटता है। धर्मग्रंथों को उद्धृत करके‘ ‘बाबावाक्य प्रमाणम्’ कहने का युग अब समाप्त हो गया है। धार्मिक मान्यताओं पर सम्यक् चिंतन करना आज के युग की अत्यंत आवश्यक पुकार हो चुकी है।

प्रश्न: धार्मिक कृत्यों में आसन क्यों बिछाया जाता है?

उत्तर: धर्मशास्त्र के अनुसार बिना आसन के व्यक्ति को अपने धार्मिक कृत्यों-अनुष्ठानों में सिद्धि नहीं मिलती। ब्रह्मांड पुराण तंत्रसार के अनुसार खाली भूमि पर बैठने से दुःख, लकड़ी पर दुर्भाग्य, बांस पर दरिद्रता, पत्थर पर बैठने से रोग, घास-फूस पर अपमर्श, पत्तों पर बैठने से चित्तभ्रम और कपड़े पर बैठने से तपस्या में हानि होती है।

पूजा-पाठ व धार्मिक अनुष्ठान करने से व्यक्ति के भीतर एक विशेष प्रकार के आध्यात्मिक शक्ति-पुंज का संचय होता है। यह शक्ति-संचय ‘लीक’ होकर व्यर्थ न हो जाय इसलिये आसन इसके बीच विद्युत कुचालक का काम करता है। इसी शक्ति संचय के कारण इष्टबली व्यक्ति के चेहरे पर तेज एवं विशेष प्रकार की चमक प्रत्यक्ष देखी जाती है। यही कारण है कि भारतीय ऋषि मृग-चर्म, कुशा आसन, गोबर का चैका, एवं लकड़ी की खड़ाऊं का प्रयोग किया करते थे।

प्रश्न: सूर्य को अघ्र्य क्यों?

उत्तर: साधारण मान्यता है कि सूर्य को अघ्र्य देने से पाप नष्ट हो जाते हैं। स्कन्दपुराण में लिखा है- सूर्य को अघ्र्य दिये बिना भोजन करना पाप खाने के समान है।

वेद घोषणा करते हैं-

अथ सन्ध्याया यदपः प्रयुक्ते ता विप्रषो वज्रीयुत्वा असुरान पाघ्नन्ति।।-

अर्थात सन्ध्या में जो जल का प्रयोग किया जाता है, वे जलकण वज्र बनकर असुरों का नाश करते हैं। सूर्य किरणों द्वारा असुरों का नाश एक अलंकारिक भाषा है। मानव जाति के लिये ये असुर हैं-टाइफाइड, राजयक्ष्मा, फिरंग, निमोनिया जिनका विनाश सूर्य किरणों के दिव्य सामथ्र्य से होता है। एन्थ्रेक्स के स्पार जो कई वर्षों के शुष्कीकरण से नहीं मरते, सूर्य प्रकाश से डेढ़ घंटे में मर जाते हैं। इसी प्रकार हैजा, निमोनिया, चेचक, तपेदिक, फिरंग रोग आदि के घातक कीटाणु, गरम जल में खूब उबालने पर भी नष्ट नहीं होते। पर प्रातःकालीन सूर्य की जल में प्रतिफलित हुई अल्ट्रावायलेट किरणों से शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। -

प्रश्न: संकल्प में जल-ग्रहण क्यों? -

उत्तर: वेदादि शास्त्रों में जल उपस्पर्श पूर्वक संकल्प करने का विधान है। जल में वरुणदेव का निवास माना गया है। वेदों में कहा गया है कि यह वरुण प्रतिज्ञा पालन न करने वाले को कठोर दंड देता है। प्राण शक्ति भी पीये गये जल का अंतिम परिणाम है। लोगों में यह उक्ति प्रसिद्ध है कि - ‘यदि मैं अमुक कार्य न करूं तो मुझे जल पीने को न मिले।’

हिंदु धर्म में अपने जीवित अवस्था में किये गये धर्मानुष्ठानों एवं मरणोपरांत भी पितृ तर्पण में जल की महती आवश्यकता रहती है।

प्रश्न: आचमनी क्यों करें?

उत्तर: संकल्प के लिये जिस तांबे या चांदी के चम्मच में जल ग्रहण किया जाता है, उसे आचमनी कहते हैं।

कंठशोधन करने के लिये आचमन किया जाता है। आचमनी करने से कफ के निःस्रित हो जाने के कारण श्वास-प्रश्वास क्रिया में और मंत्रादि के शुद्ध उच्चारण में भी अपेक्षित सहकार्य प्राप्त होता है।

प्रश्न: आचमन तीन बार क्यों किया जाता है?

उत्तर: तीन बार आचमन करने की क्रिया धर्मग्रंथों द्वारा निर्दिष्ट है। तीन बार आचमन करने से कायिक, मानसिक और वाचिक त्रिविध पापों की निवृत्ति होकर व्यक्ति को अदृष्ट फल की प्राप्ति होती है।



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