हृदय रोग के ज्योतिषीय कारण

हृदय रोग के ज्योतिषीय कारण  

हृदय शरीर का वह अंग होता है, जहां शुद्ध एवं अशुद्ध दोनों ही तरह के रक्त पहुंचते हैं एवं वहां से पूरे शरीर में पहुंचाये जाते हैं, जो शरीर की खुराक होती है। ज्योतिष में काल पुरुष के अंगों में चार अंक की राशि कर्क को हृदय का स्थान माना जाता है एवं वहीं पांच अंक की राशि सिंह हृदय का सूचक मानी जाती है। अतः जहां भी हृदय की बात उठेगी, वहां कर्क एवं सिंह राशि, चंद्र एवं सूर्य ग्रह की बात अवश्य ही उठेगी। इन चार अंगों के साथ-साथ किसी भी व्यक्ति की कुंडली में चतुर्थ भाव, पंचम भाव, चतुर्थ एवं पंचम के स्वामी अगर अशुभ ग्रहों की दृष्टि, या साथ की वजह से दूषित होते है, तो हृदय में रोग हो सकता है। तेज चलने वाले ग्रहों से दूषित होने पर रोग के जल्दी ठीक होने, या फिर हल्के प्रभाव की उम्मीद की जा सकती है और धीमी गति से चलने वाले ग्रहों के प्रभाव से रोग की मियाद लंबी होगी। ज्योतिष में राहु, केतु, शनि, गुरु धीमी गति वाले ग्रह हैं। मंगल, सूर्य, चंद्र, बुध, शुक्र तेज गति वाले हैं। हृदय का मुख्य काम खून का संचार करना है एवं खून एक जलीय पदार्थ है। अतः इसका संबंध जलीय राशि कर्क, वृश्चिक एवं मीन से बना रहेगा। राहु-केतु का प्रभाव अचानक होता है एवं शनि का धीरे-धीरे। मंगल भी एकाएक प्रभाव डालता है। इन ग्रहों के अतिरिक्त एक और ग्रह है, जिसकी जानकारी कम लोगों को होती है। यह हृदय रोग एवं दिल का दौरा पड़ने के लिए प्रबल जिम्मेदार होता है। यह ग्रह है यूरेनस। यह भी किसी काम का अंजाम एकाएक देता है। काल पुरुष के अंगों में इसको 11 अंक की राशि कुंभ मिली है। हृदय आघात एवं हृदय गति अवरुद्ध करने में हृदय को सिंह राशि के अधीन रखा गया है। अतः उससे सातवीं कुंभ राशि यूरेनस को दी गयी है। इसके पीछे दूसरी बात यह भी है कि यूरेनस ‘सेंट्रल नर्वस सिस्टम’ (मुख्य स्नायु तंत्र) का सूचक है, जिसकी वजह से दिमाग के तेज एवं अनुसंधान करने वाले लोग इसके प्रभाव में रहते हैं। अतः जब भी यूरेनस किसी व्यक्ति की कुंडली में पंचम, या एकादश भाव में हो, या सिंह, या कुंभ राशि पर हो एवं अश्भ ग्रहों के प्रभाव से दूषित हो रहा हो, तो यह हृदय रोग, या हृदय गतिरोध का कारण हो सकता है। शनि की मकर एवं कुंभ दोनों ही राशियां हैं एवं ये दोनों राशियां कर्क राशि एवं सिंह राशि से सप्तम राशि होती है। अतः शनि भी हृदय रोग के लिए जिम्मेदार समझा जाने वाला ग्रह है। पर क्योंकि शनि की क्रिया प्रणाली धीरे-धीरे चलती है, अतः यह एकाएक रोग को अंजाम देने वाला ग्रह नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे रोग को अंजाम देता है। शनि एवं बुध दोनों ही नस के कारक माने जाते हैं, अतः शनि मुख्य रूप से धमनी के छेद को संकरा बना कर रोग को अंजाम देता है। इसी ग्रह के प्रभाव में धमनी धीरे-धीरे संकरी होती चली जाती है एवं एक समय ऐसा आ जाता है कि छेद बंद हो जाता है, जिससे रक्त का प्रवाह रुक जाता है एवं इसी स्थिति को दिल का दौरा पड़ना कहा जाता है। यहां पर सबसे आश्चर्य की बात यह होती है कि शनि अगर रक्त के मार्ग के प्रवाह में अवरोध पैदा करता है, तो चिंता की बात नहीं, क्योंकि शनि को अशुभ ग्रह के नाम से जाना जाता है एवं इसे मृत्युकारक ग्रह के रूप में देखा जाता है। पर आश्चर्य तो उस समय होता है, जब इस काम में देव गुरु एवं शुभ ग्रह समझे जाने वाले बृहस्पति का सहयोग प्राप्त होता है। खून में कोलेस्ट्रोल की मात्रा बढ़ने पर वह रक्त नलिका के किनारों पर चिपकना शुरू कर देता है एवं धीरे-धीरे खून के प्रवाह के रास्ते में अवरोध पैदा कर देता है। कोलेस्ट्रोल ज्यादा चर्बीयुक्त भोजन के प्रभाव से बढ़ता है एवं चर्बी का कारक बृहस्पति होता है। अतः किसी व्यक्ति की कुंडली में हृदय रोग के लिए जिम्मेदार राशि कर्क, सिंह, वृश्चिक, मीन, मकर, कुंभ, इनके अधिपति चंद्र, सूर्य, मंगल, यूरेनस, गुरु, शनि के अलावा राहु, केतु होंगे। इसी तरह से कुंडली के चतुर्थ एवं पंचम भाव एवं इनके स्वामी ग्रह, इनमें से ज्यादा से ज्यादा ग्रह एवं भाव में राशि दूषित होगी, तो हृदय रोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा कुछ योग भी मुख्य ग्रंथों में दिये गये हैं, जिनके आधार पर हृदय रोग की संभावना बतायी जा सकती है। 1- चंद्रमा जन्म समय में कुंभ राशि पर हो, तो हृदय का रोग हो सकता है। 2- कुछ मुख्य ग्रंथों की राय में जन्म लग्न से द्वितीय द्रेष्काॅण के पंचम एवं नवम् भाव अशुभ ग्रहों से पीड़ित हों, तो हृदय रोग की संभावना बढ़ जाती है, क्योंकि द्वितीय द्रेष्कॅण के पंचम् भाव से हृदय के दायें भाग एवं नवम् भाव से हृदय के बायें भाग का बोध होता है। 3- सिंह लग्न हो एवं लग्न नक्षत्र (चंद्र नक्षत्र नहीं) केतु हो, तो हृदय रोग की संभावना अधिक होती है। वैसे क्योंकि सिंह राशि हृदय की कारक मानी जाती है, अतः इस राशि में कुछ खास अंशों पर जन्म लेने पर हृदय रोग की संभावना अधिक ही रहती है। ये अंश हैं: (क) 00-00-00 से 00 46-40 (ख) 30-40-00 से 40 46-40 (ग) 40 46-40 से 50 33-20 (घ) 90 20-00 से 110 26-40 (ड.) 110 26-40 से 130 20-00 (च) 150 33-20 से 160 13-20 (छ) 290 13-20 से 300 00-00 4- सिंह लग्न की कुंडली हो एवं लग्न मंगल एवं शनि के प्रभाव से दूषित हो रहा हो, तो हृदय रोग की संभावना बनती है। 5- सिंह लग्न की कुंडली हो एवं मकर और कुंभ में दुष्ट ग्रह स्थित हों, तो पहले पैर में सूजन होती है एवं बाद में हृदय रोग। 6- हृदय रोग का एक मुख्य कारण चिंता भी होती है एवं मिथुन लग्न के लोग जरूरत से ज्यादा सोचते हैं एवं चिंता करते हैं। इससे मानसिक तनाव बढ़ने के साथ-साथ हृदय रोग भी हो जाता है। अगर मिथुन लग्न की कुंडली में चंद्र कुंभ में हो, शनि-मंगल सिंह में, सूर्य-बुध वृश्चिक में, तो हृदय रोग अवश्य होगा। चंद्र एवं बुध पर अशुभ प्रभाव से चिंता बढ़ेगी। सिंह राशि, सूर्य एवं पंचम भाव के दूषित होने से हृदय रोग होगा। 7- चंद्रमा सिंह राशि में हो एवं सूर्य कर्क राशि में, तो इनसे हृदय रोग की संभावना बनती है और यहां सूर्य राहु से दूषित हो जाए, तो केवल संभावना ही नहीं, अवश्यंभावी हो जाती है। 8- सिंह पर यूरेनस एवं कुंभ पर सूर्य हो, लग्न में राहु हो, तो दिल का दौरा पड़ने की संभावना अधिक होती है। 9- यदि शनि, अथवा बृहस्पति षष्ठेश होकर चतुर्थ स्थान में हो एवं पाप ग्रह से दृष्ट हो, तो जातक को हृदय रोग होने की संभावना रहती है। 10- यदि सूर्य षष्ठ का स्वामी, पाप ग्रह के साथ चतुर्थ स्थान में हो, तो जातक को हृदय रोग की संभावना रहती है। 11- यदि मंगल, शनि एवं बृहस्पति चतुर्थ स्थान में हों, तो जातक को हृदय रोग की संभावना रहती है। 12- यदि राहु चतुर्थ स्थान में हो, लग्नेश निर्बल हो एवं लग्नेश पर पाप ग्रह की दृष्टि हो, तो जातक को हृदय रोग की संभावना रहती है। 13- यदि तृतीय का स्वामी राहु, या केतु के साथ हो, तो भी हृदय रोग की संभावना बनती है। 14- यदि पंचमेश एवं सप्तमेश षष्ठ स्थान में हों और पंचम एवं सप्तम में पाप ग्रह हों, तो जातक को पेट, या हृदय रोग की संभावना रहती है। 15- यदि पंचम भाव एवं पंचम के स्वामी पर पाप ग्रह की दृष्टि हो, पंचम भाव दो पाप ग्रहों से घिरा हो, तो हृदय रोग की संभावना होती है। 16- यदि पंचम का स्वामी षष्ठ, अष्टम, या द्वादश में द्वादश के स्वामी के साथ हो, या फिर पंचम एवं द्वादश में राशि परिवर्तन हो रहा हो, तो भी हृदय रोग की संभावना होती है।


पराविद्या विशेषांक  जुलाई 2013

फ्यूचर समाचार पत्रिका के पराविद्या विशेषांक में शिक्षा के क्षेत्र में सफलता/असफलता के योग, मानसिक वेदना, विवाह के लिए गुरु, शुक्र एवं मंगल का महत्व, ईश्वर एवं देवताओं के अवतार, वास्तु दोष व आत्महत्या, श्रीयंत्र का अध्यात्मिक स्वरूप, पितृमोक्ष धाम का महातीर्थ ब्रह्म कपाल, फलित ज्योतिष में मंगल की भूमिका, प्रेम का प्रतीक फिरोजा, स्त्री रोगों को ज्योतिष व वास्तु द्वारा आकलन, हृदय रोग के ज्योतिषीय कारण, क्या है पूजा में आरती का महत्व, राजयोग तथा विपरीत राजयोग, चातुर्मास का माहात्म्य इत्यादि रोचक व ज्ञानवर्धक आलेखों के अतिरिक्त दक्षिणामूर्ति स्तोत्र, अंक ज्योतिष के रहस्य, सीमा का वहम नामक सत्यकथा, अर्जुन की शक्ति उपासना नामक पौराणिक कथा, कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए लालकिताब के अचूक उपाय, भगवान श्री गणेश और उनका मूल मंत्र तथा जियोपैथिक स्ट्रेस व अन्य नकारात्मक ऊर्जाओं आदि विषयों पर भी विस्तृत रूप से चर्चा की गई है।

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