बसंत पंचमी एवं मां सरस्वती

बसंत पंचमी एवं मां सरस्वती  

बसंत पंचमी एवं माँ सरस्वती की कथा के. के. निगम मन भावन बसंत ऋतु का आगमन शीत ऋतु की समाप्ति पर होता है। वैदिक कालों से इस उमंग, उल्लास और उत्साह से भरे बसंत पंचमी पर्व को मनाने का प्रचलन है। माघ शुक्ल पंचमी को मनाया जाने वाला पर्व बसंत पंचमी माँ सरस्वती का जन्म दिन भी है। ब संत पंचमी के दिन प्रकृति की रमणीयता तथा अद्भुत सौंदर्य को देखकर सभी प्राणियों के हृदय में उमंगों का संचार होने लगता है, इस बसंत ऋतु को काम अनुरागी भी कहा जाता है। सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए बसंत पंचमी के दिन चावल से स्त्रियां अष्टदल कमल बनाकर उस जल से परिपूर्ण कलश रखती हैं और पूजन करती हैं या इसी प्रकार के माली द्वारा दिये ‘बसंत गढ़वा’ का पूजन कर कामना करती हैं कि उनका सुहाग अक्षुण्ण एवं दाम्पत्य जीवन सुखमय रहे। इस दिन हरे, पीले वस्त्रों को धारण करने का रिवाज है। वस्तुतः पीला रंग शुभता और ज्ञान का प्रतीक होता है। माघ शुक्ल पंचमी को मन, बुद्धि, ज्ञान, संगीत व ललित कलाओं की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती का जन्म दिवस भी है। उनको प्रसन्न करने एवं उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए ऐसा किया जाता है। इस दिन विष्णु, सूर्य, शिव और पार्वती की भी पूजा करने का विधान है। बसंत पंचमी के दिन से ही होली की लकड़ियां चैराहे पर इकट्ठी किये जाने का प्रचलन है। बसंत पंचमी हमारे जीवन में आनंद, उल्लास, उमंग का सर्वोŸाम पर्व है। ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की तो यह सृष्टि मूक थी। यह देखकर ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे पेड़-पौधे फूल खिल उठे तथा उनसे एक शक्ति उत्पन्न हुई। उस देवी ने वीणा वादन प्रारंभ किया तो सारी सृष्टि, पेड़ पौधे, झूमने लगे और इससे मधुर वाणी निकलने लगी, सभी पशु-पक्षी कलरव करने लगे। प्रकृति मोहक, वाणी युक्त संगीत से ओतप्रोत तथा सुहावनी हो गई। इन्हीं देवी को माँ सरस्वती कहा गया। उसी दिन से बसंत पंचमी पर्व मनाने की परिपाटी चल पड़ी। एक अन्यकथा के अनुसार आद्याशक्ति ने अपने को पांच भागों में बांट लिया। ये पांच भाग क्रमशः दुर्गा, सरस्वती, पदमा, सावित्री, राधा कहलाईं। श्रीमद देवी भागवत और दुर्गा सप्तशती में कुछ इसी प्रकार का वर्णन है। माँ सरस्वती का पूजन करने हेतु बसंत पंचमी के दिन प्रातःकाल उठकर दैनिक क्रियाओं से निवृŸा होकर पीले वस्त्र धारण कर पूजा स्थल पर परिवार के साथ सफेद या पीले आसन पर बैठें। सामने माँ सरस्वती जी की मूर्ति या चित्र लगाएं। उसके सामने बसंत गड़वा रखें। फिर षोडशोपचार पूजा अर्चनकर सरस्वती का मंत्र ‘‘ऊँ ऐं सरस्वत्यै ऐं नमः’’ का 108 बार जप करें। फिर अपने बच्चों को तिलक कर पीले पुष्पों की माला पहनाकर उनकी जीभ पर केसर से चांदी की सलाई द्वारा ‘ऐं’ बीज मंत्र लिखें। इस क्रिया को करने से बच्चों की वाणी में मिठास, बुद्धि में बढ़ोŸारी, पढ़ाई में मन लगने लगेगा। बसंत पंचमी के शुभ मुहूर्त के बारे में मान्यता है कि कार्यों को करने में जब मन में उत्साह हो तो वह कार्य सिद्ध होता है और बसंत पंचमी के दिन मनुष्य ही क्या, सारी प्रकृति में उल्लास, उमंग और आनंद व्याप्त होता है और ज्ञान वाणी की देवी सरस्वती का जन्म दिन भी उसी दिन होने के कारण इस स्थिति से अधिक शुभ मुहूर्त और क्या हो सकता है? इसे सर्वमान्य शुभ फलदायी मुहूर्त घोषित करते हुए कहा गया कि इस दिन कोई भी मांगलिक कार्य बिना पंचांग एवं ज्योतिषीय परामर्श के सम्पन्न किया जा सकता है। इस तरह बसंत पंचमी अनपूछा मुहूर्त के अंतर्गत आता है।



हस्तरेखा विशेषांक  April 2017

फ्यूचर समाचार के हस्त रेखा विशेषांक अप्रैल 2017 में हस्त रेखा विज्ञान सम्बन्धित विस्तृत जानकारी, विभिन्न शोधपरक लेख जिनमें अंगूठे का महत्व, हथेली में विभिन्न रोगों के लक्षण, जातक नौकरी करेगा अथवा व्यवसाय तथा हस्तरेखा से अनुमानित आयु आदि प्रमुख हैं। सत्य कथा में चैन्नई की राजनेता शशिकला के सितारे तथा विचार गोष्ठी में हस्तरेखा एवं कुण्डली मिलान के अतिरिक्त डाॅ. राकेश कुमार सिन्हा का पावन स्थल नामक स्थायी स्तम्भ में श्री हरिहर क्षेत्र का वर्णन अत्यन्त रोचक है। वास्तु परामर्श में फ्लैट का वास्तु विश्लेषण नामक विषय पर चर्चा की गई है। सम्पादकीय में यह दर्शाया गया है कि किस प्रकार हस्त रेखाओं का ज्ञान स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी के लिए विशेष रूप से उपयोग में लाया जा सकता है। अन्य स्थायी स्तम्भों में दी गई जानकारी भी नियमित पाठकों के लिए उपायोगी सिद्ध होगी।

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