सूर्य आराधना का प्राच्य स्थल देव

सूर्य आराधना का प्राच्य स्थल देव  

सूर्य आराधन का प्राच्य स्थल ‘देव’ डाॅ. राकेश कुमार सिन्हा ‘रवि’ आदि-अनादि काल से धर्मध्वजी भारत देश में सभ्यता-संस्कृति की अमिट निशानी व जीवंत यादगार के रूप में मंदिरों का विशिष्ट स्थान रहा है। धर्म, विद्या, कल्याण व जीवन-मार्ग के केंद्र के रूप में इन मंदिरों को आरंभ काल से ही समाज में उच्चासन प्राप्त है। यही कारण है कि देश के प्रायः हरेक क्षेत्र में मंदिरों का अस्तित्व आज भी कायम है जिनके सामाजिक, धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व से इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसा ही एक ख्यातिनाम देवालय है देव का सूर्य मंदिर, जो अपनी बनावट, अद्भुत कलाकारिता व पश्चिममुखी द्वार के नाम पर देश-प्रसिद्ध हैं। पू रे देश में ‘देव’ नाम से जुड़े कितने ही तीर्थ स्थल हैं यथा ‘देवघर, ‘देवघाट,’ ‘देवकुंड, देवपुर, देवपुरम्, देवगृह, देवदेवेश, देवराजपुर, देवपुरी व देववंशपुर। पर इन सभी के बीच ‘देव’ का अपना अलग महत्व है जहां के अनगढ़ मूल पत्थरों में अपूर्व छंदों का जो प्रकाश हुआ है, अतीत का वह महाकाय दर्शकों के मन में अज्ञात रहस्य की ख्याति परिपुष्ट करता है। भारतीय शिल्पकला व भास्कर का अपूर्व निदर्शन देव का सूर्य मंदिर बिहार राज्य के औरंगाबाद जिला मुख्यालय से 18 किमी. दक्षिण पूर्वी कोण पर अवस्थित है जो प्रमंडल मुख्यालय गया से 61 किमी. दूरी पर है। यहां पटना, सासाराम डाल्टनगंज व वाराणसी से आना सहज है। राष्ट्रीय राजमार्ग 2 पर बने ‘‘देव सूर्य द्वार’’ से 5 किमी. अंदर मंदिर तक आने के लिए छोटे-बड़े वाहन आसानी से मिल जाते हैं। इस मंदिर के बारे में साहित्यिक सूचना मिलती है कि बारह लाख तेरह हजार त्रेता युग बीत जाने के बाद माघ शुक्ल पंचमी गुरुवार को राजा इला के पुत्र ऐल ने इस मंदिर का निर्माण शुरू करवाया। इस संदर्भ में एक किवदंती है कि राजा ऐल शिकार करते-करते अपने संगी साथियों से काफी आगे निकल गये देव के इस अरण्य क्षेत्र में आ गए जहां प्यास बुझाने के उद्देश्य से सैनिकों के द्वार पास के कुंड से लाए गए जल में जैसे ही मुख प्रक्षालन किया कि उनका वर्षों पुराना असाध्य चर्म रोग सदा-सर्वदा के लिए जाता रहा। उसी रात देव देवज्ञ आदित्य नाथ की कृपा से उन्हें स्वप्न में ज्ञात हुआ कि उसी कुंड में श्री सूर्य नारायण की तीन प्रतिमा तथा उदयकाल, मध्याह्न काल व संध्याकाल गड़े पडे हैं। दूसरे ही दिन राजा ने नेम धर्म के साथ उन तीनों विग्रहों को निकलवाया और त्वरित राजकोष से एक विशाल मंदिर बनाकर उसे प्राण-प्रतिष्ठित किया गया। साथ ही पास के कुंड का नव श्रृंगार करवाया जिसे आज सूर्य कुंड कहा जाता है। बिहार प्रदेश के सप्त सूर्य कुंडों में एक इसी कुंड के जल से यहां स्नान, पूजापाठ व प्रसाद निर्माण होता है। जनश्रुति है कि ब्रह्माजी के आदेश से देव शिल्पी विश्वकर्मा जी ने एक रात में मगध में जिन तीन मंदिरों को बनाया उसमें देव का सूर्य मंदिर प्रथम है। अन्य दो देवालय हैं देवकुंड का दूधेश्वर नाथ मंदिर और उपगा का सूर्य मंदिर। इन तीनों की स्थिति त्रिर्यक की है और सभी जगहों पर एक ही स्टाइल की मूर्ति-मंदिर देखी जा सकती है। इतिहास-संस्कृति के ये तीनों स्थल औरंगाबाद जिला में ही है। गया तीर्थ के सौर्य धाम के रूप में प्रतिष्ठित देव का यह सूर्य मंदिर अपने बाह्य व आंतरिक बनावट के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। बाद में देव राजवंश के कितने ही राजाओं में सुरक्षा-संरक्षा प्रदान कर अपने राज्य के यश वैभव को सूर्य नारायण की कृपा से आगे बढ़ाया। मध्यकालीन शिल्पकला से युक्त देव का वर्तमान मंदिर 600 वर्ष प्राचीन है। अभिलेखीय विवरण स्पष्ट करते हैं कि उमगा के राजा भैरवेंद्र ने 1450 ई. में इस मंदिर का नव संस्कार करवाया। यहां की प्राचीन मूर्तियां पालकालीन हैं। इस मंदिर में सूर्य देवता के तीन विग्रह का होना ‘आदित्य हृदय स्तोत्रम्’ के एकदम अनुरूप है जहां उल्लेखित है। उदये ब्राह्मणों रूपं मध्याह्ने तु महेश्वरः। अस्तमाने स्वयं विष्णु त्रिमूर्तिश्च दिवाकरः।। अर्थात् यह वही दिवाकर हैं जो उदय काल में ब्रह्मा के रूप में, मध्य काल में शिव जी के रूप में और सायं काल में श्री विष्णु रूप में रहते हैं। इस स्थल में पूजा, उपासना के साथ उपवास का माहात्म्य बहुत अधिक बताया गया है। ऐसे तो यहां साल भर भक्तगण आते रहते हैं पर साल के दोनों छठ और रविवार व्रत करने वालों के आगमन से यहां विशाल मेला लग जाता है। मनोकामना पूरन स्थल के रूप में इसकी चर्चा दूर-दूर तक है। देव का सूर्य मंदिर अपनी ऐतिहासिकता, धार्मिकता तथा कलात्मक भव्यता के लिए विख्यात तो है ही पर सबसे ज्यादा यहां की चर्चा इस बात से है कि यहां का प्रधान देश द्वार (मंदिर प्रवेश द्वार) सामान्यतः पूरब की ओर न होकर पश्चिम की ओर है। मंदिर का अवलोकन व निरीक्षण स्पष्ट करता है कि इसका निर्माण इसी तरह हुआ पर .... क्यों? इस संदर्भ में एक लोकप्रिय कथा लोग आज भी बड़े मनोयोग से सुनाते हैं। बात उस समय की है जब औरंगजेब का प्रांतीय सेनापति काला पहाड़ अन्यान्य मंदिरों को ध्वस्त करते हुए यहां आया तो स्थानीय विप्रो ने उसे यहां की विशिष्टता बतायी साथ ही अनुनय विनय किया कि इसे ध्वस्त न किया जाए। इसी पर काला पहाड़ ने दंभ के साथ कहा कि ठीक है। अगर रातांे रात मंदिर का रूख पूरब से पश्चिम हो जाए तो मैं यहां कुछ नहीं करूंगा। सभी विप्र परेशान व चिन्तित हो उठें और आदित्य देव से प्रार्थना करने लगे। आधी रात को ‘देव इच्छा प्रबलं’ ....... की भांति जोरदार गड़गड़ाहट हुई और मंदिर का द्वार पूरब से पश्चिम हो गया। देखने से ऐसा लगता है जैसे इसकी निर्माण योजना मूलतः यही है। इस पर जानकार विद्वान पं. धनंजय मिश्र का मानना है कि मंदिर के द्वितीय निर्माता ने उसे विशिष्टता व अनूठा रूप प्रदान करने के लिए ऐसा निर्माण कराया। ऊंचे-ऊंचे चहारदीवारी से परिवृत्त करीब 900 फीट ऊंचा यह मंदिर मुख्यतः चूना, गारा, पत्थर, ईंट, लकड़ी व लोहे के सहयोग से बना है। जिसके शिखर व उस पर विराजमान कमल जगन्नाथपुरी के मंदिर से मेल खाता है। मंदिर के सामने की दीवार पर गणपति की मूर्ति है। इस पूरे परिवार में कितने ही महत्व के देव विग्रह देखे जा सकते हैं। जो चहारदीवारी और मंदिर की दीवारों के ताखों में विराजमान हैं। देव की गौरव - गरिमा को प्रसारित करने में बिहार सरकार के पर्यटन मंत्रालय द्वारा आयोजित ‘‘देव महोत्सव’’ का अच्छा योगदान है ऐसी 1986 में गठित ‘देव सूर्य मंदिर धार्मिक न्यास समिति’ यहां के विकास हेतु सदैव प्रयत्नशील प्रतीत होता है। ‘देव’ के आस-पास कुछ दर्शनीय स्थल भी हैं जिनमें ‘रानी पोखर’ रानी कुआं, मिला, गुजरी मां का गुरुद्वारा,’ ‘उमगा तीर्थ’ व अंबा प्रमुख हैं। कुल मिलाकर प्राच्य सभ्यता संस्कृति और मगध देशीय ब्राह्मणों की स्थली-मगध का यह देवालय यहां का अप्रतिम और बेमिसाल कृति है जहां के दर्शन-पूजन की बात लोग वर्षों याद रखते हैं।



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