मंत्रों की उपयोगिता

मंत्रों की उपयोगिता  

जन्मकुंडली में अध्ययन के पश्चात उसमें से निष्कर्षित व्यवधानों, या समस्याओं के उपचार के लिए 2 प्रकार के उपाय किये जाते हैं। निर्बल ग्रह को बली कर के, उससे अधिक शुभ फल प्राप्त किये जाते हैं और दूसरा बली पापी ग्रह को शांत कर के उससे होने वाले अनिष्ट फल की प्राप्ति से बचा जा सकता है। जिन निर्बल ग्रहों को बली करना होता है, उनके लिए रत्न और नग पहनना उचित माना जाता है और जो ग्रह पापी होते हैं, उनके लिए पूजा, व्रत, दान, हवन आदि करना उचित होता है। इन पापी ग्रहों के अशुभ फलों से बचने के लिए मंत्रों का उपयोग सर्वाधिक उपयोगी माना जाता है। इस मंत्र के उपयोग से काल के ग्रास में जाते हुए व्यक्ति को भी बचाया जा सकता है, जैसे कोई व्यक्ति यदि मरणासन्न अवस्था में है, तो महामृत्युंजय के निम्न मंत्र का जाप परम लाभदायक सिद्ध हो सकता है। ऊँ त्र्यंबकं यजामहे सुगन्धिंपुष्टि वर्धनम्, ऊर्वारुकमिव् बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात। इस मंत्र की महिमा का बखान करना सूरज की रोशनी को दीपक दिखाने के समान है। किसी भी मंत्र के कार्य करने की प्रणाली ठीक उसी तरह की है, जैसे जब कोई व्यक्ति संकट में पड़ जाता है, तो वह अपने सबसे प्रिय जन को याद करता है और संकट से उबरने के लिए सच्ची फरियाद करता है। यह सच है कि अगर कोई व्यक्ति किसी को सच्चे मन से याद करे और अपनी सहायता के लिए उसे बुलाये, तो टेलीपैथी के द्वारा उस बुलाये गये व्यक्ति को अहसास हो जाता है कि कोई उसे पुकार रहा है और कोई प्रिय व्यक्ति मुसीबत में है। कभी-कभी वह व्यक्ति उस बुलाये गये व्यक्ति की सहायता के लिये चल भी पड़ता है और सहायता करता है। ठीक इसी प्रकार किसी मंत्र विशेष का उच्चारण पूरी निष्ठा, विश्वास और शुद्धता के साथ करते हैं, तो उस मंत्र में निहित देवी-देवता तथा शक्ति का आवाहन होता है एवं वह शक्ति मंत्र उच्चारण से अनुनादित होती है, जिसके कारण उस शक्ति को जातक की समस्या का अहसास होता है तथा वह शक्ति, जातक के निवेदन को स्वीकारते हुए, उसकी सहायता के लिए अग्रसर होती है। इस मंत्र शक्ति की प्रणाली को इस प्रकार भी समझ सकते हैं कि जब कोई दुष्ट व्यक्ति किसी सज्जन प्राणी को प्रताड़ित करता है, तो वह सज्जन व्यक्ति यदि अपने आप, नत मस्तक हो कर, उससे दया की भीख मांगता है, तो वह दुष्ट व्यक्ति भी यह सोच कर कि ‘‘एक मरे हुए को क्या मारना’’ छोड़ देता है। इसी प्रकार पापी ग्रह के मंत्रों का जाप करने से वह पापी ग्रह, अपने पापी फलों को छोड़ कर, सम फल देना आरंभ कर देता है और जातक, पापी ग्रह की दशा में मिलने वाले अनिष्ट फलों से बच कर, सम फलों की प्राप्ति करता है। हर मंत्र के जाप करने की संख्या निश्चित की गयी है। लेकिन किसी भी मंत्र का जाप करने के लिए कम से कम 108 संख्या निर्धारित की गयी है। यह मंत्रों की संख्या नक्षत्रों की संख्या 27 पर निर्धारित की गयी है। प्रत्येक नक्षत्र के 4 चरण होते हैं। इस प्रकार कुल 108 चरण होते हैं। नक्षत्रों के इन्हीं चरणों की संख्या के आधार पर मंत्रों की संख्या निर्धारित की गयी है; अर्थात जातक जब किसी ग्रह के मंत्रों का जाप करता है, तो वह ग्रह, किसी भी नक्षत्र के किसी भी चरण में स्थित हो, उस नक्षत्र विशेष के चरण विशेष में जा कर आंदोलित करता है और ग्रह को अपनी ओर सहायता के लिए आकर्षित करता है। इस प्रकार जाप करते समय कम से कम 108 जाप अवश्य करने चाहिएं। मंत्रों के जाप के विषय में ध्यान देने योग्य बात यह है कि मंत्रों का जाप यदि स्वयं किया जाए, तो विशेष लाभकारी होता है। क्योंकि जो व्यक्ति जाप करता है, वह स्वयं आत्मिक रूप से उस ग्रह से पीड़ित होता है। इसलिए जितनी निष्ठा, विश्वास और लगन उस पीड़ित व्यक्ति के मन में होती है, उतनी निष्ठा, विश्वास और लगन किसी अन्य व्यक्ति के मन में हो ही नहीं सकती। क्योंकि कोई व्यक्ति जब किसी अन्य माध्यम व्यक्ति की सहायता न ले कर स्वयं किसी शक्ति को अपनी सहायता के लिए पुकारता है, तो वह शक्ति सीधे ही उस व्यक्ति की सहायता के लिए प्रेरित हो जाती है और सीधा लाभ उस जातक को प्राप्त होता है। इसलिए मंत्रों के लिए विशेष बात है कि उनका जाप जितनी निष्ठा और विश्वास से किया जाएगा, फल उतना ही अधिक और शीघ्र प्राप्त होगा। परिस्थितिवश यदि जाप स्वयं न किया जा सके, तो किसी विद्वान पंडित द्वारा ही मंत्रों का जाप कराया जाना चाहिए। शास्त्रों का मत है कि जब भी किसी मंत्र का जाप किया जाए, तो उसके दशांश संख्याओं का हवन उस मंत्र के उच्चारण के साथ किया जाए, तो विशेष फलदायी होता है। इसका आशय यह है कि जब किसी शक्ति, या देवी-देवता को अपनी सहायता के लिए आमंत्रित करते हैं, तो उस शक्ति को भोजन कराना भी आवश्यक होता है। उस शक्ति को भूखे पेट वापिस नहीं भेजा जा सकता। इन मंत्रों की जाप संख्या को याद रखने के लिए माला का विधान किया गया है। इसमें 108 दाने होते हैं, जिससे एक माला जाप करने से 108 संख्या में मंत्रों का जाप हो जाता है। सामान्य रूप से तो मंत्रों का जाप रुद्राक्ष की माला पर किया जा सकता है, परंतु विशेष फल प्राप्ति के लिए माला विशेष का भी विधान किया गया है, जैसे लक्ष्मी पूजा और मंत्र जाप के लिए कमल गट्टे की माला, गुरु के मंत्रों का जाप करने के लिये हल्दी की माला, चंद्र के मंत्रों के जाप के लिए मोती की माला, विष्णु भगवान के मंत्रों के जाप के लिए तुलसी की माला एवं ऊँ नमः शिवाय के मंत्रों के जप के लिए रुद्राक्ष की माला अभीष्ट फल देने में विशेष फलदायी होती हैं। ऐसी भी धारणा है कि किसी ग्रह के मंत्र उसी ग्रह के यंत्र के समक्ष किये जाएं, तो फल कई गुणा अधिक प्राप्त होते हैं तथा इस प्रकार यंत्र भी सिद्ध हो जाते हैं। मंत्रों के जाप के दौरान जातक को अपने आचार-विचार तथा व्यवहार में संयम बरतने से मंत्रों का लाभकारी फल शीघ्र ही प्राप्त होता है। अन्य उपयोगी मंत्र सरस्वती मंत्र ऊँ ऐं श्रीः नमः गायत्री मंत्र ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् नव ग्रह मंत्र ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशिः भूमिसुतो बुधश्च। गुरुश्च शुक्रः शनि राहु केतवः सर्वे ग्रहाः शांतिकरा भवन्तु णमोकार महामंत्र णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं, णमो उवज्झायाणं णमो लोए सब्वसाहुणं अर्थ: अरिहंतों को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार और इस लोक के सभी साधुओं को नमस्कार है।


रिसर्च जर्नल आरंभिक विशेषांक  जनवरी 2004

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