नव रत्नों का संक्षिप्त परिचय

नव रत्नों का संक्षिप्त परिचय  

अथ ग्रहाणां दौष्टय परिहार पूर्वकं तुष्टि संयादनार्थ। नवरत्न समुदाय धारणं शालिन्याहवज्रं शुक्रेऽव्जे।। सुमुक्ता प्रवालं भौमेऽगौ गोमेद मार्को सुनीलम्। केतौवैदूर्यं गुरौ पुष्पकं ज्ञे पाचिः प्राङ्माणिक्यमर्के तु मध्ये।। गोचर में दुष्ट ग्रह जनित दोष शांति के लिए रत्नों का धारण नव ग्रह यंत्र में 9 भाग की हुई सोने की अंगूठी में रत्न जोड़ने के स्थान पर रत्नों के जड़ने के लिए 9 कोष्ठों का सुंदर कोणों वाला चतुरस्त्र या अष्ट दल कमल आदि के आकार का, किसी बुद्धिमान् शिल्प कला प्रवीण स्वर्णकार से, पूर्व के क्रम से, शुक्र की प्रसन्नता के लिए वज्र (हीरा) चंद्रमा की तुष्टि के लिए अग्नि कोण में सुंदर मोती, मंगल की प्रसन्नता हेतु दक्षिण में मूंगा, राहु के प्रीत्यर्थ नैर्ऋत्य में गोमेद, शनि के प्रीत्यर्थ पश्चिम में सुंदर नीलम, केतु के प्रसन्नतार्थ वायव्य में वैदूर्य, गुरु के प्रीत्यर्थ उत्तर में पुष्पक (पुखराज) बुध की प्रसन्नतार्थ ईशान कोण में पन्ना और सूर्य के प्रीत्यर्थ बीच में माणिक्य जड़वा कर (रत्नों की प्राण प्रतिष्ठा कर के) धारण करना चाहिए। इसको लोक में नव ग्रह की अंगूठी, या नव ग्रह यंत्र की अंगूठी कहते हैं। नव ग्रह यंत्र स्वरूप ईशान कोण पूर्व दिशा अग्नि कोण बुध -पन्ना शुक्र -हीरा चंद्र-मोती उत्तर दिशा मध्य भाग दक्षिण दिशा गुरु-पुखराज सूर्य-माणिक्य मंगल-प्रवाल वायव्य कोण पश्चिम भाग नैर्ऋत्य कोण केतु-वैदूर्य शनि-नीलम राहु-गोमेद विशेष: सूर्यादि नव ग्रह पूजा-हवन में भी, इसी प्रकार ग्रहों की स्थापना कर के, यथोपचार पूजा का विधान है। यद् ग्रह कृतं दौष्टयं तद् ग्रह रत्न धारण मिन्द्रव्जयाह माणिक्य मुक्ता फल विद्रुमाणि गारूत्मकं पुष्पक वज्र नीलम्। गोमेद वैदूर्य कमर्कतः स्यू रत्नान्यथोज्ञस्य मुदे सुवर्णम्। ग्रह कृत दुष्ट प्रभाव शमनार्थ ग्रह रत्न धारण ।। सूर्यादि नव ग्रहों के अपने-अपने रत्न: सूर्य की प्रीति के लिए विद्रुम (मूंगा) बुध के लिए गारूत्मक (पन्ना) गुरु के लिए पुष्पक (पुखराज) शुक्र के लिए वज्र(हीरा) शनि के लिए नीलम, राहु के लिए गोमेद तथा केतु के लिए वैदूर्य नाम का रत्न धारण करना चाहिए। बुध की प्रसन्नता के लिए सुवर्ण भी धारण करना चाहिए। जन्मकुंडली में जन्म लग्न, या जन्म राशि (गोचर) से अशुभ फलदायक ग्रहों की शांति (दोष निवारणार्थ) के लिए नव ग्रह यंत्र का विधान सभी के लिए संभव नहीं है। इसलिए जो ग्रह अरिष्ट सूचक हों, केवल उन्हीं का रत्न धारण आवश्यक होता है। धार्यं लाजा वर्तकं राहु केत्वों रौप्यं शुक्रद्वोश्च मुक्त गुशेस्तु। लौहं मंदस्यार भान्वोः प्रवालं तारा जन्मक्र्षात्मिरा वृतितः स्यात।। अल्प मूल्य वाले रत्न: राहु और केतु के लिए लाजवर्त नाम का रत्न, शुक्र तथा चंद्रमा के लिए चांदी, गुरु के लिए मोती, शनि के लिए लोहा, मंगल और सूर्य के लिए मूंगा धारण करना चाहिए। सूर्य का रत्न माणिक्य: सूर्य का रत्न माणिक्य है। इसको पùराग भी कहते हैं। इसकी उत्पति सौगंधिक (गंधक) कुरूबिंद और स्फटिक से होती है। यह भ्रमर, आंजन, नील कमल एवं जामुन के रस के समान लाल वर्ण की कांति वाला सौगंधिक होता है। शबल (श्वेत कृष्ण मिश्रित वर्ण) कम चमकीला, धातु मिश्रित कुरूबिंद होता है एवं स्फटिक से उत्पन्न माणिक्य अति चमकीला, अनेक प्रकार की किरणों वाला और विशुद्ध होता है। यह सर्वश्रेष्ठ लाभकारी होता है। उत्तम माणिक्य अत्यंत चिकना, प्रभा युक्त, अति स्वच्छ किरणयुक्त, भारीपन युक्त, सुडौल (देखने में मन मोहक) भीतर से प्रभा तथा लालिमा से युक्त होता है। इसके धारण से सुख में वृद्धि और अनिष्टों का विनाश होता है। यह कठोरता में हीरे से ही हार मानता है। रत्न, निर्माण मुहूर्त में, सोने की अंगूठी में जड़वा कर, प्राण प्रतिष्ठा कर के, शुभ मुहूर्त में, भगवान सूर्य का स्मरण कर के धारण करना चाहिए। दंपति के मिथः व्यभिचार की सूचना इससे प्राप्त होती है। उस समय इसका रंग बदला हुआ प्रतीत होता है। आठवें स्थल में सूर्य, या षष्टमेश सूर्य हो, तो माणिक्य नहीं पहनना चाहिए। इसके धारण से रक्त शांत हो जाता है। चंद्र का रत्न मोती: हाथी, सांप, सीपी, शंख, मेघ (बादल) बांस, मछली और सूअर- इतने स्थानों से मोती उत्पन्न होता है। उनमें सीपी का मोती सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। सिंहल, पार सीक, सौराष्ट, ताम्रपणी नदी, पारशव, कौबेर पांड्यवाटक एवं हैम। इन देशों में मोतियों की खाने हैं। अच्छी जाति के मोती को, चांदी की अंगूठी में, गुरु, रविवार, पुष्य नक्षत्र के योग में, प्रथम प्रहर में, मढ़वा कर, बायें हाथ की कनिष्ठिका अंगुली में धारण करना चाहिए। मंगल का रत्न मूंगा: प्राचीन काल में इसे प्रवाल लता कहते थे और यह समुद्र में उत्पन्न होता है। किंतु आधुनिक वैज्ञानिक इसे जंतुओं से उत्पन्न मानते हैं। ये जंतु समुद्र की तह में अधिक बालू वाले प्रदेश में रहते हैं। इसके धारण से मंगल ग्रहकृत सब दोष नष्ट हो जाते हैं। जब मंगलवार को मेष, या वृष राशि पर चंद्रमा, या मंगल हों एवं 2 चरण वाले (मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा) नक्षत्र हों, उस दिन, सूर्योदय से 10 बजे दिन के पहले उत्तम प्रकार के मूंगे को सोने की अंगूठी में जड़वा कर पहनने से उत्तम फल की प्राप्ति होती है। मूंगे की माला भी पहनी जाती है। आयुर्वेद में मूंगे की भस्म का सेवन करने से अनेक रोग तथा शरीर की दुर्बलता नष्ट हो जाती है। बुध का रत्न पन्ना: यह हरे रंग का रत्न है। यह कोमल, चमकीला एवं पारदर्शी होता है। इसको सोने की अंगूठी में मढ़वा कर धारण किया जाता है। बुधवार, हस्त, ज्येष्ठा, रेवती नक्षत्र एवं पूवाह्न का समय जड़वाने के लिए उत्तम कहा गया है। बुध की प्रसन्नता हेतु, उसके समस्त दोषों की शांति के लिए यह धारण किया जाता है। यदि अत्यंत निर्मल, निर्दोष पन्ना धारण कर के न्यायालय में जाएं, तो अनुकूल न्याय की उपलब्धि होती है। गुरु का रत्न पुष्पक (पुखराज): पुष्पक का वर्णन भारत के प्राचीन रत्न परिचायक ग्रंथों में पाया जाता है। यह तौल में भारी और पारदर्शी होता है। यह जहरीले (विषधारी) जानवर के विष का प्रभाव उस स्थान पर रगड़ने से, कम कर देता है। गुरु दोष शमनार्थ, गुरु पुष्य में, दिन के पूवार्द्ध में, सोने की अंगूठी में मढ़ा हुआ पुखराज धारण करना चाहिए। रत्न धारण का मुहूर्त भी देख लेना चाहिए। जिस कन्या के विवाह में निरर्थक विलंब होता हो, उसे पुखराज धारण करने से शीघ्र सफलता मिलती है। शुक्र का रत्न हीरा: हीरा अत्यधिक कठोर रत्न है। हीरा की कठोरता के बारे में कहा है: ‘हीरा वही धन चोट न फूटे’। यह खानों से निकाला जाता है एवं परिष्कृत (परीक्षण) करने पर इसका मूल्य तथा गुण बढ़ जाते हैं। यह शुक्र दोष का शामक, पति-पत्नी के परस्पर प्रेम का वर्धक है और भस्म का आयुर्वेद में बड़ा महत्व है, जो अनेक राजरोगों को दूर कर देता है। दोषमुक्त हीरा, सोने की अंगूठी में जड़वा कर, शुक्रवार, भरणी, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में, या रत्न धारण मुहूर्त में धारण करने का विधान है। शनि का रत्न नीलम: भारत के कश्मीर का उत्पन्न नीलम सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। निर्दोष नीलम को शनिवार, चित्रा, स्वाती, विशाखा, श्रवण एवं धनिष्ठा नक्षत्र में, सोने या पंच धातु की अंगूठी में मढ़वा कर धारण करना चाहिए। धारण करने से पहले इसकी परीक्षा कर लेनी चाहिए। सोते समय स्वच्छ वस्त्र में बांध कर अपने दाहिनी भुजा पर बांध कर सो जाना चाहिए। यदि सुस्वप्न दिखलाई पड़े, तो उतम, दुःस्वप्न दिखलाई पड़े, तो अनिष्टकारक माना जाता है। राहु का रत्न गोमेद: यह हिमालय पर्वत पर पैदा होता है। इसका गोमूत्र के समान स्वछ रंग होता है। यह भी गुण-दोष से मुक्त नहीं है। स्वच्छ गोमेद धारण करने से राहु ग्रह जनित समस्त रोग-शोक शांत हो जाते हैं। राजकीय कर्मचारी, वकील, न्यायाधीश आदि को इसके धारण से बड़ी मदद मिलती है। इसके धारण से मृगी (मिरगी) बावासीर, तिल्ली, वायु विकार आदि रोगों से आशातीत लाभ होता है। इसको सोना, या उतम लोहा या पंच धातु की अंगूठी में, बुध, या शनिवार, स्वाती, शतभिषा एवं आद्र्रा नक्षत्र के योग में मढ़वा कर, पहनना चाहिए। केतु का रत्न वैदूर्य, या लहसुनियां: केतु की प्रसन्नता के लिए लहसुनियां धारण किया जाता है। बिल्ली की आंख के समान इसका रंग होता है। जिस दिन मेष, मीन, या धनु राशि में चंद्रमा हो, उस दिन लोहे, या सोने की अंगूठी में जड़वा कर, इसे धारण करना चाहिए। नव रत्न की अंगूठी धारण करने की क्षमता न होने पर अनिष्ट ग्रह का ही रत्न धारण करना चाहिए। सूर्य की प्रसन्नता के लिए माणिक्य, चंद्रमा की प्रसन्नता के लिए मोती, मंगल की प्रसन्नता के लिए मूंगा, बुध के प्रीत्यर्थ पन्ना, गुरु के प्रीत्यर्थ पुखराज, शुक्र के लिए हीरा, शनि के लिए नीलम, राहु के लिए गोमेद और केतु के प्रीत्यर्थ वैदूर्य धारण करना चाहिए। यदि इन रत्नों को धारण करने की क्षमता (शक्ति) न हो, तो बुध की प्रसन्नता के लिए सुवर्ण धारण करना चाहिए।


रिसर्च जर्नल आरंभिक विशेषांक  जनवरी 2004

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