दिशा का ग्रहों से संबंध एवं दोष निवारण के उपाय

दिशा का ग्रहों से संबंध एवं दोष निवारण के उपाय  

प्रश्न: किसी भी भवन में दक्षिण दिषा का क्या महत्व है? इस दिषा में दोष होने पर क्या प्रभाव पडता है? उत्तर: दक्षिण दिषा का स्वामी यम, आयुध दंड एवं प्रतिनिधि ग्रह मंगल है। मंगल सांसारिक कार्यक्रम को संचालित करने वाली विषिष्ट जीवनदायिनी शक्ति है। यह सभी प्राणियों को जीवन शक्ति देता है और उत्साह और स्फूर्ति प्रदान करता है। किंतु इसके बुरे प्रभाव से शारीरिक, भावनात्मक, मानसिक एवं आध्यात्मिक व्यग्रता बनी रहती है। यह धैर्य तथा पराक्रम का स्वामी होता है। दक्षिण दिषा से कालपुरुष के सीने के बाएं भाग, गुर्दे एवं बाएं फेफड़े का विचार किया जाता है। कुंडली का दषम् भाव इसका कारक स्थान है। यदि घर के दक्षिण में कुआं, दरार, कचरा, कूड़ादान एवं पुराना कबाड़ हो तो ह्रदय रोग, जोड़ांे़ का दर्द, खून की कमी, पीलिया आदि की बीमारियां होती हैं। यदि दक्षिण मंे कुआं या जल हो तो अचानक दुर्घटना से मृत्यु होती है। दक्षिण द्वार नैऋत्याभिमुख हो तो दीर्घ व्याधियां एवं अचानक मृत्यु होती है। साथ ही दिषा दोषपूर्ण होने पर स्त्रियों में गर्भपात, मासिक धर्म में अनियमितता, रक्त विकार, उच्च रक्तचाप, बवासीर, दुर्घटना, फोड़े-फुंसी, अस्थि मज्जा, अल्सर आदि से संबंधित बीमारियाँ देती है तथा नौकरी-व्यवसाय में नुकसान, समाज में अपयष, पितृ सुख मंे अवरोध, पिता के व्यसनी होने, सरकारी कामों में असफलता आदि की संभावना रहती है। प्रश्न- किसी भी भवन में ईषान दिषा का क्या महत्व है? इस दिषा में दोष होने पर क्या प्रभाव पड़ता है? उत्तर- ईषान दिषा का स्वामी रुद्र, आयुध त्रिषूल एवं प्रतिनिधि ग्रह बृहस्पति है। बृहस्पति को सर्वाधिक शुभ ग्रह कहा गया है। खासकर आध्यात्मिक विकास के लिए प्रयत्नषील जिज्ञासुओं के लिए बृहस्पति अति शुभ होता है। इसका प्रभाव सर्वदा सात्विक होता है। यह प्रत्येक उस वस्तु को, जिससे इसका संबंध हो, बड़ा बनाता है। यही कारण है कि गुरु वृद्धिकारक है और परिवार की वृद्धि के प्रतीक पुत्र का कुंडली में प्रतिनिधित्व करता है। बड़ा होने से ही बृहस्पति बड़े भाई का प्रतिनिधि है। साथ ही बड़ा होने से बृहस्पति स्त्री की कुंडली मंे उसका पति है। जन्म कुंडली का द्वितीय एवं तृतीय भाव ईषान में आते हंै। अत्यधिक पवित्र दिषा होने के कारण इसकी सुरक्षा अनिवार्य है। यदि ईषान दिषा में दोष हो तो पूजा पाठ के प्रति रुचि की कमी, ब्राह्मणों एवं बुजुर्गों के सम्मान में कमी, धन एवं कोष की कमी एवं संतान सुख में कमी बनी रहती है। साथ ही वसा जन्य रोग और लीवर, मधुमेह, तिल्ली आदि से संबंधित बीमारियां आदि होने की संभावना रहती है। यदि उत्तर-पूर्व में रसोई घर हो तो खांसी, अम्लता, मंदाग्नि, बदहजमी, पेट में गड़बड़ी और आंतांे के रोग आदि होते हैं। प्रश्न- किसी भी भवन में वायव्य दिषा का क्या महत्व है? इस दिषा में दोष होने पर क्या प्रभाव पड़ता है? उत्तर- वायव्य दिषा का स्वामी वायु एवं आयुध अंकुष है। इस दिषा का प्रतिनिधि ग्रह चंद्र है। चंद्र मंे शुभ और अषुभ तथा सक्रिय एवं निष्क्रिय दोनों प्रकार की क्षमता होती है। जब चंद्र शुभ होता है तब जातक को सुकीर्ति और यष मिलता है। उसका समुचित मानसिक विकास होता है, पारिवारिक जीवन सुखमय होता है और मातृ सुख का अनुभव होता है। वह देष-विदेष का भ्रमण करता है। वह विद्वान, कीर्तिवान, वैभवषाली एवं सम्मानित होता है और उसे राज-सम्मान की प्राप्ति होती है। परंतु वायव्य के अषुभ होने पर जातक निर्धन, मूर्ख, उन्मादग्रस्त तथा कदम-कदम पर ठोकरें खाने वाला होता है। यह कालपुरुष के घुटनांे एवं कोहनियों को प्रभावित करता है। जन्म कुंडली का पांचवां एवं छठा भाव वायव्य के प्रभाव में आते हंै। इस कोण मंे दोष रहंेगे तो जातक को पेट मंे गैस, चर्म रोग, छाती में जलन, दिमाग के रोग और स्वभाव में क्रोध रहता है साथ ही जातक को षत्रु अधिक होंगे। प्रश्न- किसी भी भवन में आग्नेय दिषा का क्या महत्व है? इस दिषा में दोष होने पर क्या प्रभाव पड़ता है? उत्तर- आग्नेय का स्वामी गणेष, आयुध शक्ति एवं प्रतिनिधि ग्रह शुक्र है। शुक्र समरसता तथा परस्पर मैत्री संबंधांे का ग्रह माना जाता है। शुक्र से प्रभावित भवन में वास करने वाले आकर्षक, कृपालु, मिलनसार तथा स्नेही होते हैं। शुक्र का संबंध संगीत, कला, सुगंध, भोग-विलास, ऐष्वर्य एवं सुंदरता से है। शुक्र का प्रधान लक्ष्य परमात्मा की सृष्टि को आगे बढ़ाना है। इसका जीवमात्र की प्रजनन क्रिया और काम जीवन पर अधिकार बताया गया है, जिसके फलस्वरूप यह क्रियात्मक क्षमता के द्वारा विकास क्रम में योगदान देता है। इसकी स्थिति से पत्नी, कामषक्ति, वैवाहिक सुख, सांसारिक एवं पारिवारिक सुख का विचार किया जाता है। यह कालपुरुष की बायीं भुजा, घुटने एवं बाएं नेत्र को प्रभावित करता है। जन्म कुंडली के एकादष एवं द्वादष भावों पर इसका असर रहता है। इस दिषा में दोष रहने पर दाम्पत्य सुख में, मौजमस्ती एवं शयन सुख में कमी बनी रहती है। साथ ही नपुंसकता, मधुमेह, जननेंद्रिय, रति, मूत्राषय, तिल्ली, बहरापन, गूंगापन और छाती आदि से संबंधित बीमारियांे की संभावना रहती है। प्रश्न- किसी भी भवन में नैर्ऋत्य दिषा का क्या महत्व है? इस दिषा में दोष होने पर क्या प्रभाव पड़ता है? उत्तर- नैर्ऋत्य दिषा का स्वामी राहु है। राहु एक शक्तिषाली छाया ग्रह है। इसके प्रभावों का कोई निवारण नहीं है। इस ग्रह की शांति करके इसके प्रत्यक्ष रूप में अनिष्टकारी फल दूर नहीं किए जा सकते हैं। केवल ज्ञान तथा बुद्धिपूर्वक इससे सहयोग करके ही इसके दुष्प्रभावों को कम किया जा सकता है। यह काल पुरुष के दोनों पांवांे की एड़ियां एवं बैठक है। जन्म कुंडली का आठवां एवं नौवां स्थान नैर्ऋत्य के प्रभाव मंे रहते हैं। यदि घर के नैर्ऋत्य में खाली जगह, गड्ढा, भूतल, जल की व्यवस्था या कांटेदार वृक्ष हो तो गृहस्वामी बीमार होता है, उसकी आयु क्षीण होती है, षत्रु पीड़ा पहंुचाते हैं तथा संपन्नता दूर रहती है। नैर्ऋत्य दिषा से पानी दक्षिण के परनालां से बाहर निकलता हो तो स्त्रियों पर तथा पष्चिम के परनालों द्वारा पानी निकलता हो तो पुरुषों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। नैर्ऋत्य के दोषपूर्ण होने पर अकस्मात दुर्घटनाएं, अग्निकांड एवं आत्महत्या जैसी घटनाएं होती रहती हैं। इसके अतिरिक्त परिवार के लोगों को त्वचा रोग, कुष्ठ रोग, छूत के रोग, पैरां की बीमारियां, हाइड्रोसील एवं स्नायु से संबंधित बीमारियां की संभावना रहती है।


स्वपन, शकुन एवं टोटके विशेषांक  जून 2014

फ्यूचर समाचार के स्वपन, शकुन एवं टोटके विशेषांक में अनेक रोचक और ज्ञानवर्धक आलेख हैं जैसे- शयन एवं स्वप्नः एक वैज्ञानिक मीमांसा, स्वप्नोत्पत्ति विषयक विभिन्न सिद्धान्त, स्वप्न और फल, क्या स्वप्न सच होते हैं?, शकुन विचार, यात्राः शकुन अपषकुन, जीवन में शकुन की महत्ता, काला जादू ज्योतिष की नजर में, विवाह हेतु अचूक टोटके, स्वप्न और फल, धन-सम्पत्ति प्राप्त करने के स्वप्न, शकुन-अपषकुन क्या हैं?, सुख-समृद्धि के टोटके शामिल हैं। इसके अतिरिक्त जन्मकुण्डली से जानें कब होगी आपकी शादी?, श्रेष्ठतम ज्योतिषी बनने के ग्रह योग, सत्यकथा, निर्जला एकादषी व्रत, जानें अंग लक्षण से व्यक्ति विषेष के बारे में, पंच पक्षी की गतिविधियां, हैल्थ कैप्सूल, भागवत कथा, सीमन्तोन्नयन संस्कार, लिविंग रूम व वास्तु, वास्तु प्रष्नोत्तरी, पिरामिड वास्तु, ज्योतिष विषय में उच्च षिक्षा योग, पावन स्थल, वास्तु परामर्ष, षेयर बजार, ग्रह स्थिति एवं व्यापार, आप और आपका पर्स आदि आलेख भी सम्मिलित हैं।

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