मंगल एवं शुक्र की भूमिका: संदर्भ सप्तम भाव

मंगल एवं शुक्र की भूमिका: संदर्भ सप्तम भाव  

चंद्र मन का प्रतिनिधित्व करता है और मन काम शक्ति का कारक है। सभी प्रकार के संबेधों का कारण भी चंद्र होता है। जब चंद्र की दृष्टि, युति आदि सूर्य से हो, तो संबंध में आश्रय पाने के विचार होते हैं। मंगल कारण कर्मठ व्यक्तियों से, बुध के कारण व्यापारी वर्ग से, गुरु के कारण आध्यात्मिक क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों से, शुक्र के कारण विपरीत लिंग से और शनि के कारण आलोचना करने वालों से संबंध होते हैं। राहु-केतु के कारण उनके स्वामी के अनुरूप ही संबंध होते हैं। मंगल तथा शुक्र के कारण कामुक संबंध स्थापित होते हैं। लेकिन इनके साथ चंद्र की भी अहं भूमिका होती है। और इन योगों में शनि का योगदान अनैतिक संबंध कारक माना जाता है। चतुर्थ भाव का संबंध नैतिक तथा पवित्र माना जाता है। लेकिन सप्तम, अष्टम एवं द्वादश भाव का संबंध उपर्युक्त योगों के साथ अनैतिक होता है। निर्बल मंगल गोपनीय संबंध बनाकर विवाहोपरांत जीवन को कष्टमय बना देता है। लेकिन मंगल और शुक्र दोनों बलवान हों तो बहु संबंधों के साथ बहुविवाह भी सफल होते हैं। विवाह आठ प्रकार के होते हैं- ब्राह्मण विवाह, प्राजापत्य विवाह, आर्ष विवाह, देव विवाह, गांधर्व विवाह, आसुर विवाह, राक्षस विवाह, पैशाच विवाह। इन आठ प्रकार के विवाहों में ब्राह्मण वर्ण के लिए ब्रह्म विवाह, प्राजापत्य विवाह, आर्ष विवाह और देव विवाह सर्वश्रेष्ठ होते हैं। क्षत्रिय वर्ण के लिए आसुर विवाह और राक्षस विवाह श्रेष्ठ माने जाते हैं। वैश्य तथा शूद्र वर्णों के लिए गांधर्व विवाह तथा पैशाच विवाह श्रेष्ठ माने जाते हैं। गांधर्व विवाह की अनुमति सभी वर्णों के व्यक्तियों को होती है क्योंकि इस विवाह का कारक चंद्र, मंगल और शुक्र हैं। इसके अंतर्गत पुरुष स्त्री से प्रेम संबंध स्थापित कर विवाह कर लेता है। यह दोनों की सहमति से ही होता है। उपर्युक्त योगों के साथ-साथ अन्य ग्रहों की भी अपनी-अपनी भूमिका होती है। जैसे लग्नेश यदि चतुर्थ भाव में हो तथा चतुर्थ एवं सप्तम भाव मंगल और राहु से प्रभावित हों, तो जातक या जातका के कई स्त्रियों या पुरुषों से संबंध होते हैं। इसी प्रकार सप्तम भाव व सप्तमेश, पंचम भाव व पंचमेश तथा द्वादश भाव व द्वादशेश का किसी भी रूप में संबंध हो, तो स्त्री या पुरुष कामुकता के वशीभूत होकर विवाहेतर संबंध बनाते हैं। ज्योतिष में शुक्र दूसरों को रोमांस की दृष्टि से आकर्षित करने की क्षमता का परिचायक है। वह जातक या जातका को उसकी कामेच्छा, अभिलाषा, अभीप्सा आदि की पूर्ति हेतु संघर्ष के लिए प्रेरित करता है। बहु संबंध एवं बहु विवाह का एक प्रमुख कारण स्थान विशेष का वातावरण भी होता है। स्वभाव से पुरुष सौंदर्यप्रिय तथा स्त्री धनप्रिय होती है। वर्तमान काल में 40 प्रतिशत विवाह धन के कारण तथा 30 प्रतिशत विवाह सौंदर्य के कारण होते हैं। शेष 30 प्रतिशत विवाह निवास या कार्यालय के वास्तुदोषों के कारण होते हैं। लेकिन इन सभी कारणों में उपर्युक्त ग्रह योगों की भूमिका अहम होती है। इसी प्रकार उपर्युक्त योगों को हाथ की रेखाओं के माध्यम से भी देखा जा सकता है। यदि मंगल व शुक्र के कारण बहु संबंध या अनैतिक संबंध बन रहे हों, तो जातक की हस्त परीक्षा से शुक्र पर्वत पर महीन जाली मिलेगी या गुरु पर्वत पर एक तारा का चिह्न अवश्य मिलेगा। यदि त्रिकोण के अंदर चंद्र की आकृति हो, तो चारित्रिक शिथिलता का बोध होता है। शुक्र पर्वत पर 2 क्राॅस अति कामी बनाकर बहु संबंध बनाते हों, तो शुक्र पर्वत के नीचे की तरफ कोई वर्ग हो तथा किसी अंगुली में 4 पर्व हांे, तो अनैतिक संबंध से कारागार प्राप्त होता है। कुंडली - 1: कुछ स्वानुभूत योग यहां प्रस्तुत हैं। कुंडली के आधार पर चतुर्थेश व भाग्येश लग्नस्थ भौम की पूर्ण दृष्टि शनि पर है राज्येश व तृतीयेश शुक्र स्वयं पराक्रमस्थ है, यह सारी स्थिति बहु संबंध की सूचक है। जातक के 2 विवाह हो चुके हैं तथा विवाह से पूर्व और पश्चात भी अनेक संबंध रहे हैं। तीसरा विवाह होने बाला है। इच्छा शक्ति व काम शक्ति अत्यंत प्रबल है। चंद्र द्वादश स्थान पर पूर्ण दृष्टि कारक है। दशम तथा पंचम भावों पर शनि की दृष्टि संबंधों में वृद्धि की सूचक है। कुंडली - 2: मंगल तथा शुक्र के संयोग के साथ नीचस्थ बुध भाग्य भाव में तथा अंक ज्योतिष के अनुसार केतु से प्रभावित पंचम भाव में नवमेश तथा भाग्यस्थ पंचमेश हैं। सप्तमेश की दृष्टि शत्रु पर है। यह सारी स्थिति विवाहेतर संबंध की सूचक है। जातक ने 18 वर्षों के बाद पत्नी को अपनाया है। कुंडली - 3: लग्नेश व षष्ठेश मंगल की पूर्ण दृष्टि नीचस्थ शुक्र पर है, जिसके साथ स्थित चंद्र ने संगीत के क्षेत्र में उन्नति दी तथा विजातीय संबंध स्थापित करने को प्रेरित किया। शनि ने मातृ द्रोही बनाकर बहु संबंध स्थापित कराए, लेकिन लग्नेश ने बहु संबंध कराकर इतना शिथिल कर डाला कि अब पत्नी से भी संबंध रखने में घबराहट हो रही है। कुंडली - 4: राज्येश व लाभेश ने तथा गजकेशरी योग और लग्नेश व अष्टमेश सप्तम भौम ने राज परिवार में जन्म देकर बिरासत के धन का अपव्यय विषय वासना पर कराया। सैकड़ों दैहिक संबंधों के पश्चात दो विवाह हुए लेकिन अनैतिक संबंधों का अंत नहीं हुआ। मंगल ने शारीरिक शक्ति प्रदान की और विवाहेतर संबंधों का सिलसिला आज भी जारी है। इस प्रकार कुंडलियों पर शोध तथा उनके विश्लेषण से बहु संबंधों एवं बहु विवाहों की जानकारी मिलती है। इनसे बचाव के लिए मंगल व शनि के उपाय विद्वान एवं जानकार ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार करने चाहिए।


प्रेम और विवाह विशेषांक  जनवरी 2007

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