एक्यूप्रेशर चिकित्सा का व्यवहारिक विवरण

एक्यूप्रेशर चिकित्सा का व्यवहारिक विवरण  

व्यूस : 7171 | फ़रवरी 2012
डाॅ. टीपू सुल्तान एक्यूप्रेशर का शब्दिक अर्थ है शंकुनुमा नुकीली वस्तु से शरीर पर दबाव डालने की क्रिया। व्यवहारिक तौर पर इस पद्धति के सिद्धांत में हमारा शरीर एलैक्ट्रोनिक-क्रियात्मकताओं का एक बहुआयामी स्वरूप है, जिस के अंतरंग में सर्वदा विद्युत-ऊर्जा का प्रवाह बना रहता है व इस प्रवाह या सक्रियता के संचार का नियंत्रण,भिन्न-भिन्न चैनलों अर्थात शरीर के भिन्न-भिन्न भाग के कुछ खास-खास बिंदुओं में निहित होता है तथा इन्हीं बिंदुओं में किसी कारणवश शिथिलता या कमजोरी आ जाने के कारण इन बिंदुओं के प्रतिनिधित्व-विशेष के अंतर्गत वाले भागों में धीरे-धीरे निष्क्रियता आने लगती है, जिससे शरीर का प्राकृतिक स्वरूप बिगड़़ने लगता है व रोग उत्पन्न होने लगते हैं। एक्यूप्रेशर चिकित्सा विशेष की तकनीक चीन, जापान आदि देशों में अधिक विकसित हुई, परंतु इस मर्म-ज्ञान की ऐतिहासिकता पर दृष्टि डालें तो यह चिकित्सा भारत में लगभग 5000 वर्ष पूर्व से ही विकसित थी, जिसके उदाहरण यहां के ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा स्वरूप रोग को दूर करने हेतु शरीर के किसी स्थान विशेष को अंगूठे से दबाने, अंग विशेष पर हाथ फेरने या घर्षण देने की प्रचलित परंपराओं व योग साधनाओं में अंगूठे व उंगलियों को साथ जोड़कर या दबाकर ध्यान आदि मुद्राओं की क्रियाओं में देखे जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त 2300 ईसा पूर्व की मिस्र देश की चित्रकलाओं से भी ऐसा ज्ञात होता है कि यह चिकित्सा वहां भी अति प्राचीन काल से प्रचलित थी। Û डाॅ. टीपू सुल्तान एक्यूप्रेशर के सिद्धांत में रोग उत्पत्ति के कारण किसी बीमारी या किसी निष्क्रियता के कारण अंग विशेष से संबंधित स्नायु तंत्र के ढीले या सिकुड़ने व शून्य हो जाने की स्थिति में शरीर की रक्त नलियों में नकारात्मक तत्वों के जमाव या हाथों व पावों के अंतिम छोर या सतहों पर कुछ खराब तत्व-कणों के इकट्ठे हो जाने के परिणामस्वरूप शरीर के नाड़ी-तंत्र का संचार असंतुलित हो जाता है और शरीर अस्वस्थ रहने लगता है। चीन व जापान देशों के चिकित्सक रोग व उसकी उत्पत्ति की अवस्थाओं के लिए शरीर के आलस्य व क्रियाशीलताओं में कमी जैसी स्थिति को मुख्य कारणों के रूप में स्वीकारते हैं जिससे विभिन्न केंद्रों में शून्यता या शुष्कता के परिणामस्वरूप शरीर रोग ग्रस्त रहने लगता है। परंतु भारतीय पद्धति में मानव शरीर में पंच तत्व के संचार व उसकी सक्रियता को प्रधान माना गया है। इसके लिए हाथ की तर्जनी उंगली को वायु, मध्यमा को आकाश, अनामिका को जल, कनिष्ठिका को पृथ्वी व अंगूठे को अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व दिया गया है। यही सामान्य नियमावली पैरों की उंगलियों के लिए भी लागू होती हैं। एक्यूप्रेशर पद्धति की विशेषता इस चिकित्सा की तकनीक द्वारा शरीर की प्राकृतिक व्यवस्थाओं में तीव्रता अर्थात मांसपेशियों के तंतुओं में लोच या सक्रियता उत्पन्न करा के ग्रंथियों में ऊर्जा का संचार किया जाता है जिसके फलस्वरूप मिटे हुए या शिथिल पड़े शरीर के आवश्यक तत्व पुनः जीवित हो उठते हैं तथा रोगी पुनः स्वस्थ होने लगता है। इसीलिए स्नायु तंत्र से संबंधित रोगों के लिए यह पद्धति अत्यंत ही प्रभावकारी मानी गई है तथा मिर्गी, अनिंद्रा, पक्षाघात, चक्कर, हृदय पीड़ा या दिल के दौरे आदि की स्थिति में इस चिकित्सा के अत्यंत लाभप्रद व चमत्कारी फल देखे गए हैं। वस्तुतः यह औषधि रहित चिकित्सा पद्धति है, परंतु इस चिकित्सा के व्यवहारिक प्रयोग की अवधि में अन्य पद्धतियों की चिकित्सा व उनकी औषधियों के प्रयोग को वाजिब नहीं बताया गया है, बल्कि आजीवन औषधियों के प्रयोग के लिए निर्देशित मधुमेह, थायराइड, बी. पी., कोलेस्ट्राॅल आदि के रोगी भी आशा से अधिक लाभ की प्राप्ति के लिए अपनी औषधियों के साथ-साथ इस पद्धति का भी भलीभांति प्रयोग कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त इस सरल व वैकल्पिक पद्धति को व्यायाम के रूप में स्वस्थ व्यक्ति भी व्यवहार में ला सकते हैं। पद्धति के प्रयोग हेतु निर्देश यदि किसी प्रकार की आपातकाल की स्थिति हो तो इस अवस्था में इस पद्धति की कार्य विधियों को शीघ्र ही प्रारंभ कर देने के निर्देश दिए गए हैं, परंतु चिकित्सा का क्रम लंबा हो तथा अधिक दिनों तक इस पद्धति को प्रयोग में लाना हो तो इस कार्य विधि हेतु खाली पेट अर्थात सुबह, दोपहर व रात के भोजन के पूर्व की अवस्था को अत्यंत उपयुक्त माना गया है। ऐसे इस चिकित्सा को एक दिन में दो या तीन बार अवश्य व्यवहार में लाना चाहिए। दो से पांच मिनट तक की इस कार्य-अवधि में रोग के प्रतिनिधित्व वाले बिंदुओं को शंकुनुमा प्रैशर वाले उपकरणों से दस-पंद्रह सेकेंडों तक दबाकर दो-तीन सेकेंड के अंतराल या विश्राम के बाद फिर पुनः इस क्रिया को दोहराया जाना चाहिए। इस के साथ-साथ चिकित्सा के दौरान रोगी की आयु व रोग की तीव्रता को भी ध्यान में रखने की परम आवश्यकता है। यदि कोई महिला गर्भवती है तो उसके प्रजनन अंगों के प्रतिनिधित्व वाले बिंदुओं को न दबाए जाने का निर्देश दिया गया है। ऐसा करने से गर्भाशय की सक्रियता बढ़ जाने के कारण गर्भपात की अवस्थाएं उत्पन्न हो सकती हैं। हड्डी टूटने, मोच, शरीर के जलने आदि की अवस्थाओं में भी यह चिकित्सा वर्जित बताई गई है। इस सिद्धांत के अनुसार हमारा शरीर दाएं व बाएं अर्थात दो भागों में विभक्त हैं तथा जो अंग शरीर के दोनों भागों में स्थित होते हैं, जैसे आंख, नाक, कान, फेफड़े, गुर्दे आदि, तो ऐसे अंगों के रोग-प्रतिनिधित्व वाले बिंदु उसी दिशा के एक ओर वाले हाथ व पैरों के उंगलियों व तलवों में विद्यमान होते हैं। अतः विस्तृत जानकारी हेतु, दोनों हाथ व पांवों में स्थित चिकित्सा-केंद्र-बिंदुओं की व्यवहारिक सूची प्रस्तुत की जा रही है। इस पद्धति में प्रयुक्त किए जाने वाले कुछ महत्वपूर्ण उपकरण इस पद्धति की सार्थक चिकित्सा हेतु उपयुक्त उपकरणों का होना अत्यंत आवश्यक है। अतः इस बात को ध्यान में रखते हुए इस पद्धति से जुड़े शोधकर्ताओं ने धातु, लकड़ी व प्लास्टिक से निर्मित अनेको सरल व सुविधाजनक उपकरणों का आविष्कार किया है, जिन में कुछ महत्वपूर्ण उपकरण इस प्रकार हैं। जिम्मी इस उपकरण का सिरा पूर्ण शंकुनुमा नुकीला, मध्य का बेलनाकार भाग दानेदार या लघु पिरामिड के समान काफी सहायता मिलती है। स्पाइनल रोलर इस उपकरण का प्रयोग रोगी के पीठ व गर्दन तक के पूरे वस्त्रों को उतारने खुरदरा तथा निचला भाग दाने के समान लघु व गोलाकार होता है। यह एक्यूप्रेशर चिकित्सा का अत्यंत महत्वपूर्ण उपकरण है, जिससे रोग-बिंदुओं को दबाने व उसकी क्रियाशीलता को अधिक करने में के बाद व उसे पेट के बल उल्टा लिटा कर किया जाता है। रीढ़ से संबंधित रोगों या कम दर्द आदि के रोगियों के लिए इसे अत्यंत प्रभावकारी उपकरण की संज्ञा दी जाती है। एनर्जी रोलर यह छोटे-छोटे शंकुनुमा पिरामिडों से निर्मित बेलनाकार या गोलाकार जैसा उपकरण है जिससे कम समय में हाथों व पावों के तमाम बिंदुओं को क्रियाशील करने में सहायता मिलती है। पिरामिड पावर मैट प्लास्टिक अथवा लकड़ी आदि से निर्मित यह वर्गाकार मैट अनेक छोटे-छोटे शंकुनुमा पिरामिडो से युक्त होता है। वस्तुतः इस पद्धति में तत्काल लाभ हेतु यह अति आधुनिक व उपयोगी उपकरण है, जिसका प्रयोग पैरों के तलवों के समस्त बिंदुओं की क्रियाशीलता को बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसमें किसी चिकित्सक के मदद लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती बल्कि रोगी स्वयं ही अपना उपचार कर सकता है।

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