रेकी उपचार में ध्यान रखने योग्य मुखय सावधानियां

रेकी उपचार में ध्यान रखने योग्य मुखय सावधानियां  

व्यूस : 8774 | फ़रवरी 2012
रेकी उपचार में ध्यान रखने योग्य मुख्य सावधानियां डाॅ. निर्मल कोठारी रेकी (प्राकृतिक उपचार की (शुई पद्धति) यह उपचार पद्धति निम्न बातों के लिए प्रयोग की जाती है। तनाव मुक्त और संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए। समक्ष व परीक्षा उपचार के लिए। व्यवसायिक अभ्यास के लिए। तन, मन और आत्मा के उत्थान के लिए। पुरातन भारतीय संस्कृति में मन के साथ शरीर के स्वास्थ्य को भी काफी महत्व दिया गया है। मन का स्वास्थ्य उŸाम रखने एवं मनोशांति प्राप्त करने के लिए शरीर का व्याधिमुक्त होना अनिवार्य है। रेकी मनुष्य के मन एवं शरीर का संतुलन प्रस्थापित करने और मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्ति का एक नैसर्गिक एवं सरल उपाय है। रेकी का अर्थ रेकी एक जापानी शब्द है। इसमें ‘रे’ का अर्थ है विश्व व्यापी यानी संपूर्ण विश्व में व्याप्त रहने वाली तथा ‘की’ अर्थ है ‘‘प्राण अथवा जीवन शक्ति’’ अर्थात रेकी का अर्थ ‘‘संपूर्ण विश्व में व्याप्त रहने वाली प्राण अथवा जीवन शक्ति’’। यह एक निसर्ग शक्ति है। जो सभी प्राणी मात्र में निवास करती है तथा मनुष्य, प्राणी, पेड़, जलचर आदि सभी को गतिमान करती है। मनुष्य में यह शक्ति जन्मतः विद्यमान है। शरीर में इसकी मात्रा कम होने से शरीर में रोगों का निर्माण होता है। इस कम हुई शक्ति को रेकी के माध्यम से पुनः जागृत करके हम अपने रोगों का इलाज स्वयं कर सकते हैं। रेकी न तो कोई धर्म है और न ही कोई पंथ है। रेकी का तंत्र, मंत्र आदि के साथ कोई संबंध नहीं है। रेकी हिप्नोटिज्म (सम्मोहन) या पारसम्मोहन न होकर केवल एक योग उपचार विधि है। रेकी उपचार में ध्यान रखने योग्य प्रमुख सावधानियां प्रत्येक बिंदु पर कम से कम 3 मिनट रेकी देना चाहिए। रेकी कभी सहस्रार चक्र और नाभि चक्र पर न दें। ये ऊर्जा के आगमन के द्वार हंै। रेकी देते समय अंगूठे को अंगुलियों से अलग न रखें। अंगूठा और अंगुलियां मिली हुई हों। हाथों को कप की शेप में बनाए रखें, ताकि ऊर्जा का प्रवाह अधिक गतिमान हो सके। स्त्रियों को हृदय चक्र पर रेकी देते समय हाथों को 2-3 इंच दूर की स्थिति में रखना चाहिए। रोगी और चिकित्सक दोनों के पैर क्राॅस की स्थिति में नहीं होने चाहिए। उपचार देने से पहले हाथों को धो लेना आवश्यक है। पूरे शरीर में रेकी देते समय शरीर के अंगों का क्रम नहीं बदलना चाहिए। दूसरों को रेकी देते समय लेटने के लिए रोगी से कहें, जो अपेक्षाकृत ज्यादा लाभप्रद है, किंतु बैठाकर, खड़ा करके, सिर अथवा मुंह झुकाकर भी रेकी दी जा सकती है। यह आवश्यक नहीं है कि स्पर्श करके ही रेकी की जाए। स्त्री के बायीं ओर पुरुष के दायीं ओर बैठकर रेकी दंे। आप हाथों को 1 से 4 इंच दूर रखकर भी रेकी दे सकते हैं। हृदय चक्र को ऊर्जा देते समय ध्यान रहे कि दाहिना हाथ बायें हाथ के नीचे रहे तथा दाहिना हाथ शरीर को स्पर्श करे। अन्य स्थितियों में जैसा चाहे रखंे। छोटे बच्चे को गोद में लेकर रेकी देना अच्छा होता है। रेकी देते समय आगे सिर झुकाकर न बैठें अन्यथा ऊर्जा खोने लगेगी। रेकी देने से पूर्व इनर्जी बाॅडी को स्वीप कर लें। इससे शरीर में ऊर्जा की ग्रहणशीलता बढ़ जाएगी। रेकी देने के पश्चात् दाहिना हाथ सामने हृदय-चक्र पर रखकर लेट जाएं। बायां हाथ सामने ‘हारा’ पर रखें। इससे आप की नेगेटिव एनर्जी बायें हाथ के माध्यम से ‘पेडू’ से निष्क्रमित होगी तथा दायें हाथ से आप हृदय को ऊर्जा दे सकेंगे। रेकी सिद्धहस्त व्यक्ति की हथेलियों में यह प्राण ऊर्जा वायुमंडल में सब जगह व्याप्त भंडार से प्राप्त होती है। यह प्राण ऊर्जा व्यक्ति के ऊपरी चार चक्रों के माध्यम से होकर पहंुचती है। अतः व्यक्ति के लिए स्वीकार भाव और ग्रहण शीलता दोनों बहुत जरूरी है। एक बार रेकी शक्ति प्राप्त कर लेने के बाद व्यक्ति में यह आजीवन बनी रहती है। यह आवश्यक नहीं कि केवल रोग ग्रस्त व्यक्ति ही रेकी उपचार प्राप्त करे। स्वस्थ व्यक्ति भी रेकी की ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं। किसी भी वैकल्पिक उपचार के साथ-साथ रेकी की भूमिका सहायक रूप में व्याधि दूर करने में दु्रत गति से सहायक होती है। रेकी स्टेज 1 में 20 प्रतिशत रेकी शक्ति प्राप्त होती है। तत्पश्चात किसी भी व्यक्ति का उपचार किया जा सकता है। रेकी स्टेज 1 प्राप्त करने के करीब तीन माह के उपरांत रेकी 2 का प्रशिक्षण लिया जा सकता हैे। रेकी स्टेज 2 में रेकी स्टेज 1 से 4 गुनी शक्ति अधिक बढ़ जाती है क्योंकि स्टेज 2 में तीन सिंबल के साथ शक्ति प्रदान की जाती है। रेकी अत्यंत सुरक्षित उपचार पद्धति है। इससे किसी भी प्रकार की क्षति होने की संभावना नहीं रहती है। रेकी का उपचार व्यक्ति, पशु, कुŸो, पेड़-पौधों, बीज, फूल आदि सभी पर समान रूप से किया जा सकता है। रेकी चिकित्सा पद्धति में किसी दूरस्थ व्यक्ति का भी उपचार सफलता पूर्वक किया जा सकता है, किंतु इस प्रकार का उपचार स्टेज 2 रेकी के सिद्धहस्त व्यक्ति ही अपने स्थान पर रहकर कर सकते हैं। रेकी की शक्ति रेकी मास्टर द्वारा ही किसी भी व्यक्ति को प्रदान की जा सकती है। ध्यान रहे कि रेकी केवल उस अंग तक ही सीमित नहीं रहती जिस पर आप हाथ रखते हैं। यह शरीर के अन्य भागों तक भी स्वयं भी जा पहुंचती है। उदाहरणार्थ- यदि आप सिर पर हाथ रखेंगे, तो उसकी ऊर्जा पेट तक भी पहुंचेगी। रेकी की ऊर्जा ब्रह्मांडीय ऊर्जा है, अतः रेकी चिकित्सक को अपनी ऊर्जा में कोई कमी नहीं होने पाती है। वस्तुतः तथ्य यह है कि ऊर्जा देने से घटती नहीं वरन् बढ़ती है। रेकी उपचारकर्Ÿाा मात्र एक माध्यम होता है। वस्तुतः वह स्वयं अपने को कर्Ÿाा भाव से पृथक रखता है। रेकी देने के समय यह नियम याद रखें कि रेकी तभी दी जाए जब कोई इसे मांगे। इसे किसी को जबरदस्ती देने का प्रयास न करें। रेकी चिकित्सक को अधिक परिणामोन्मुखी नहीं होना चाहिए। परिणाम को परमात्मा के हाथों में ही मानना चाहिए। रेकी प्राप्त करने वाले व्यक्ति को गर्मी, ठंडक, दबाव, कंपकंपी आदि की अनुभूतियां हो सकती है, अतः इससे घबराएं नहीं। रेकी किसी भी धर्म या देवी-देवता से संबंधित नहीं है। किसी भी धर्म को मानने वाला व्यक्ति रेकी शक्ति प्राप्त कर सकता है। रेकी के लिए पूजा-पाठ भी आवश्यक नहीं है। रेकी निर्जीव पदार्थांे पर भी प्रभाव डालती है। रेकी कहीं भी तथा किसी भी परिस्थिति में दी जा सकती है। वस, ट्रेन अथवा वायुयान में यात्रा करते समय भी रेकी दे सकते हैं। रेकी देने वालों को लहसुन, प्याज, तंबाकू, मदिरा तथा तेज किस्म की सुगंधियों से बचना चाहिए। रेकी देते समय धूम्रपान कदापि न करें। रेकी देने वाले व्यक्ति को शांतचित होना चाहिए तथा रेकी देने के पूर्व और पश्चात मैत्री भाव भरे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। रेकी देते समय मध्यम स्वर का संगीत बजाया जाय, तो परिणाम और भी अच्छे आयेंगे। क्लासिकल संगीत भी उपयोगी है। स्थान की स्वच्छता का ध्यान भी रखना आवश्यक है। कमरे का तापमान 210 से अधिक न हो। अधिक ठंडे तापमान का कमरा भी उपयुक्त नहीं होता है। रेकी प्रेम का ही दूसरा नाम है। अतः रेकी देते समय हमारा व्यवहार प्रेमपूर्ण एवं करुणामय होना चाहिए। रेकी लेने वाले और देने वाले दोनों को ही ढीले एवं आरामदायक वस्त्र पहनने चाहिए। उपचार के समय घड़ी, चश्मा, बैल्ट, जूते, टाई आदि उतार दें। साधारण व्याधियों के लिए तीन दिन का रेकी उपचार करना चाहिए, जबकि पुरानी बीमारियों में इसका उपचार कम से कम 21 दिन तक अनिवार्य है। शरीर के सभी अंगों पर कम से कम 3 मिनट तक हथेलियां रखें। पहले संपूर्ण शरीर का उपचार करंे। तत्पश्चात् जिस अंग में तकलीफ हो, वहां पर 20 से 30 मिनट तक उपचार करें। अगर समय के अभाव के कारण पूर्ण रेकी उपचार संभव न हो, तो मात्र तलवों व पैरों पर रेकी का उपचार करें। अन्य चिकित्सा प्रणालियों के साथ रेकी का उपचार सफलतापूर्वक किया जा सकता है जैसे मालिश, प्राकृतिक चिकित्सा, आयुर्वेदिक होम्योपैथिक आदि के साथ भी कर सकते हैं। प्रत्येक उपचार में यह काफी सहायक हो सकती है। इसे आप्रेशन, हड्डी के प्लास्टर, चोट आदि में भी प्रयोग कर सकते हैं। एलोपैथिक दवाओं के साथ रेकी का उपचार उसकी गुणवŸाा को और बढ़ा देगा। रेकी में अब क्रिस्टल, डाउसिंग, पेंडुलम और स्केनिंग का प्रयोग भी किया जाने लगा है। तथापि रेकी कोई जादुई करिश्मा नहीं है। रेकी से मनुष्य अमर नहीं होता। रेकी जन्म एवं मृत्यु को नहीं रोकती। यह तो जीवन-काल को केवल आसान बनाने में मदद करती है।

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