महामृत्युंजय यंत्र एवं मंत्र

महामृत्युंजय यंत्र एवं मंत्र  

महामृत्युंजय यंत्र एवं मंत्र शारीरिक एवं मानसिक पीड़ा को नष्ट करने का सबसे बड़ा रामबाण उपाय नवीन राहुजा मानव की प्रकृति पांच प्रकार की है, जिससे पंचभूतात्मक सृष्टि का निरूपण होता है। यद्यपि प्राणियों की मनोवृत्ति प्रकृति के वशीभूत होने से भिन्न-भिन्न है फिर भी पंचतत्वों का अनुपात बिगड़ने से विभिन्न रोगों का जन्म होता है। वेदों से आरंभ होकर आधुनिक साहित्य तक के विशाल भंडार में विभिन्न रोगों से निवृत्ति के लिये कई विद्यायें जैसे, मंत्र, तंत्र, यंत्र, अभिषेक, भस्म, औषधि, जप-तप आदि के विधान दिये गये हैं। इनसे मानसिक एवं शारीरिक दोनों प्रकार के रोगों का निदान होता है। मानसिक रोगों में काम, क्रोध, मोह, मद, मात्सर्य, ईष्र्या, राग-द्वेष, अनुराग, छल, कपट, प्रताड़ना, प्रमाद, दुराग्रह और आलस्य आदि आते हैं। रजोगुण और तमोगुण ये दो प्रकार के मन के दोष हैं। बुद्धि, धैर्य और आत्मज्ञान ये तीन, मन के रोगों की सर्वोत्तम दवा है। लंबी आयु एवं स्थायी आरोग्य प्रत्येक मनुष्य के लिये परम आवश्यक है। इसके लिये प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन प्रतिक्षण चिंतित रहता है, और इस समस्या का सीधा सा समाधान है- ‘‘महामृत्युंजय’’।। कैंसर हो या हृदय रोग अथवा हार्ट अटैक, हर बीमारी को दूर करने का सबसे बड़ा रामबाण उपाय केवल ‘‘महामृत्युंजय’’ है। मृत्यु परम सत्य है, परंतु कभी परिस्थितिवश या दुर्भाग्यवश अकाल मृत्यु होना भी संभव है। एकाएक घोर संकट से घिर जाने पर, भयंकर रोगों से पीड़ित हो जाने पर, मृत्यु तुल्य कष्ट की स्थिति में रामबाण उपाय है ‘‘महामृत्युंजय’’।। भगवान शिव के इस अद्भुत चमत्कारी महामृत्युंजय यंत्र एवं मंत्र को लेकर हमारे शास्त्रों में भी एक सत्य कथा का वर्णन है, जिसका उल्लेख पद्म पुराण उ. 237/75/90 में है, जो कि इस प्रकार है - मुकुंद मुनि संतानहीन थे। पति-पत्नी का चिंतातुर होना सहज स्वाभाविक था। वे सदैव चिंतातुर रहते थे। पति-पत्नी दोनों ने अर्थात मुकुंद मुनि व उनकी वामांगी ने भगवान शिव की पूरे भक्ति भाव से पूजा-अर्चना की। देवाधिदेव महादेव पति-पत्नी दोनो की भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए व पुत्र प्राप्ति का वरदान देने के साथ ही एक शर्त यहभी रखी कि यदि तेजस्वी, अति बुद्धिमान, ज्ञानी और सद्चरित्र पुत्र चाहते हैं तो वह मात्र 16 वर्ष तक की अल्पायु तक ही जीवित रहेगा। अज्ञानी, दुर्बुद्धि, चरित्रहीन पुत्र होने पर वह पूर्णायु को प्राप्त हो सकेगा। पति-पत्नी ने गुणवान, सच्चरित्र पुत्र की इच्छा प्रकट की। भगवान शिव ने ‘‘तथास्तु’’ कहा। ठीक समय पर मुकुंद मुनि के घर एक सुंदर पुत्र ने जन्म लिया। भगवान की दया का यह फल पुत्र रूप में था अतः वह सर्वगुणसंपन्न था, सुंदर था। आयु के साथ-साथ शिक्षा दीक्षा भी चलने लगी। पुत्र ज्ञान-गरिमा का प्रकाश फैलाने लगा। समय जाते वक्त नहीं लगता अतः वह समय भी आ गया जिस समय के लिए देवाधिदेव महादेव ने बालक की आयु निश्चित की थी। मुनि की चिंता सहज स्वाभााविक थी। पुत्र ने पिता से चिंता का कारण पूछा। मुनि ने डरते-डरते समस्त जानकारी पुत्र को दे दी। इधर पुत्र को भी अपनी भक्ति एवं साधना शक्ति पर पूर्ण विश्वास था। पुत्र ने पिता से कहा - ‘‘देवाधिदेव महादेव का दूसरा नाम मृत्युंजय भी है, अतः मैं भगवान शिव को अपनी भक्ति से प्रसन्न करके पूर्णायु को अवश्य प्राप्त करूंगा।’’ माता-पिता की आज्ञा प्राप्त कर मार्कंडेयजी विधिपूर्वक साधना करने लगे। शिवलिंग की उपासना के बाद वह ब्रह्म-शक्ति से मृत्युंजय स्तोत्र का पाठ करने लगे। भगवान शिव, उनकी भक्ति एवं साधना से बहुत प्रसन्न हुए। 16वें वर्ष का अंतिम दिन आया। स्वाभाविक रूप से कालदूत उनके प्राणों को लेने आ पहुंचा। मार्कंडेय ने स्तोत्र को पूर्ण करने का आग्रह किया। काल के गर्व ने ऐसी आज्ञा न दी और वह उनके प्राणों का हरण करने के लिए उद्यत हुए। इतने में भक्त की रक्षा करने के लिए भगवान शिव शंकर स्वयं लिंग में से प्रकट हुए और काल पर प्रहार किया। मार्कंडेय स्तोत्र पाठ करते रहे। काल भगवान शंकर से डरकर चला गया। भगवान शिव शंकर ने स्तोत्र की समाप्ति होने पर मार्केंडेय की भक्ति एवं साधना से प्रसन्न होकर उसे अमरता का वरदान दिया। हमारे पूर्वजों एवं ऋषियों ने इस महामृत्युंजय यंत्र एवं मंत्र के प्रयोग से मरणासन्न व्यक्तियों को बचाया है और वे सर्वत्र सफल भी हुए हैं। आसन्न दुर्घटना से पूर्व यदि इसका प्रयोग किया जाए तो व्यक्ति दुर्घटना से बाल-बाल बच जाता है और यदि प्राणघातक जैसा योग हो तो भी वह घटना स्वल्पमात्रा में होकर प्राणी को बचा लेती है। महामृत्युंजय यंत्र को सम्मुख रखकर रूद्र सूक्त का पाठ एवं महामृत्युंजय मंत्र का जप करने से अनोखा लाभ होता है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी रुद्रसूक्त के मंत्रों में रश्मि-विज्ञान के आधार पर गूढ़ रहस्य छुपे हैं, जिसे खोजने के लिए शुद्ध वैज्ञानिक मस्तिष्क चाहिए। महामृत्युंजय यंत्र उच्चकोटि का दार्शनिक यंत्र है जिसमें जीवन एवं मृत्यु का रहस्य छिपा हुआ है। महामृत्युंजय यंत्र चल-अचल दोनों ही तरह से प्राण-प्रतिष्ठित किया जा सकता है। सबसे बड़ी और मुख्य बात, यह है कि महामृत्युंजय यंत्र एवं मंत्र का प्रयोग, एक सात्त्विक प्रयोग है, अतः इससे केवल लाभ ही लाभ होता है। शरीर रक्षा के साथ बुद्धि, विद्या, यश और लक्ष्मी भी बढ़ती है। महामृत्युंजय यंत्र भगवान मृत्युंजय से संबंधित है जिसका शाब्दिक अर्थ स्पष्ट है कि मृत्यु पर विजय। इस देवता की आकृति देदीप्यमान है तथा यह नाना प्रकार के रूप धारण करने वाला है। यह सब औषधि का स्वामी है तथा वैद्यों में सबसे बड़ा वैद्य है। यह अपने उपासकों के पुत्र-पौत्रादि (बच्चों) तक को आरोग्य व दीर्घायु प्रदान करता है। यंत्र के मध्य में स्थापित महामृत्युंजय यंत्र के चारो ओर अन्य यंत्र स्थापित कर इसकी शक्ति में और अधिक वृद्धि की गई हैं। इसकी साधना से साधक को रोग से मुक्ति तो मिलती ही है, साथ ही स्वास्थ्य भी हमेशा उत्तम रहता है। इसमें स्थापित अन्य यंत्रों की अपनी-अपनी अद्भुत महिमा है। महामृत्युंजय यंत्र का प्रयोग उपासना और मंत्र-जप के अतिरिक्त इसे कवच के रूप में भी धारण किया जा सकता है। ‘‘क्रियोड्डीश तंत्र’’ में एक अन्य कवच का भी उल्लेख प्राप्त होता है। इस कवच के बारे में भगवती ने भगवान शिव से कहा कि ‘‘हे देव ! आप मुझे मृत्यु से रक्षा करने वाला तथा सब प्रकार के अशुभों का नाश करने वाला कोई ‘कवच’ बतलाईये? तब भगवान शिव ने इस महामृत्युंजय कवच को ही बतलाया था। वस्तुतः महामृत्युंजय मंत्र एवं यंत्र, मंत्रों एवं यंत्रों में श्रेष्ठ है, अत्यंत फलदायी है, क्योंकि इसका संबंध सीधा देवाधिदेव भगवान शिव से है और भगवान शिव अपने आप में सिद्ध हैं। महामृत्युंजय यंत्र मानव जीवन के लिए अभेद्य कवच है, बीमारी की अवस्था में एवं दुर्घटना इत्यादि से मृत्यु के भय को नष्ट करता है। डाॅक्टर, वैद्य से सफलता न मिलने पर यह महामृत्युंजय यंत्र एवं मंत्र मनुष्य को मृत्यु से बचाता है और शारीरिक पीड़ा को ही नहीं बल्कि मानसिक पीड़ा को भी नष्ट करता है। महामृत्युंजय यंत्र उच्चकोटि का दार्शनिक यंत्र है जिसमें जीवन एवं मृत्यु का रहस्य छिपा हुआ है। महामृत्युंजय यंत्र चल-अचल दोनों ही तरह से प्राण-प्रतिष्ठित किया जा सकता है। सबसे बड़ी और मुख्य बात, यह है कि महामृत्युंजय यंत्र एवं मंत्र का प्रयोग, एक सात्त्विक प्रयोग है, अतः इससे केवल लाभ ही लाभ होता है। शरीर रक्षा के साथ बुद्धि, विद्या, यश और लक्ष्मी भी बढ़ती है।



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