केदारनाथ : पर्वत शिला के रुप में पूजे जाते हैं शिव यहां

केदारनाथ : पर्वत शिला के रुप में पूजे जाते हैं शिव यहां  

केदारनाथ: पर्वत शिला के रूप में पूजे जाते हैं शिव यहां चित्रा फुलोरिया पेड़, पहाड़, पानी! चारों ओर हरियाली, प्राकृतिक सौंदर्य का अप्रतिम नजारा। जहां भी देखें आंखें वहीं ठहर जाएं। प्राकृतिक सौंदर्य के इसी रूप का नाम है, उत्तरांचल। परंतु इन दुर्गम पहाड़ियों पर पहुंचना भी कोई आसान काम नहीं। ऐसे ही स्थल केदारनाथ में रमण करते ह ंैदवे ा ंेक े दे व महादेव शिव। प्रस्तुत है उसी केदारनाथ स्थली का चित्र उकेरता आलेख... प र्व त ी य प ्र द े श् ा द े व भ् ा . ूमि उत्तरांचल के क्रोड़ में बसे बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक प्रमुख ज्योतिर्लिंग केदारनाथ का भव्य सौंदर्य देखते ही बनता है। चारों ओर हिमाच्छादित पहाड़ियां, शीतल मंद बहती बयार और उदित होते सूर्य की सुनहरी रश्मियां पूरे वातावरण को नैसर्गिक आनंद से भर देती हैं। प्रकृति के इस अप्रतिम नजारे को जो देखे वही अपना अस्तित्व विस्मृत कर दे। यह मनोहर पावन स्थल देश-विदेश के यात्रियों के लिए मुख्य आकर्षण का कंेद्र है। यहां आने वाले लोग बदरीनाथ यमुनोत्री, गंगोत्री व गोमुख की यात्रा करने का लोभ भी संवरण नहीं कर पाते। केदारनाथ गढ़वाल के उत्तरकाशी जिले में समुद्र तल से 3783 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जो चीन की सीमा से लगा हुआ है। केदारनाथ का मंदिर लगभग 1000 साल पुराना बताया जाता है। मंदिर का निर्माण विशाल शिलाओं से किया गया है, जिन्हें देखकर हैरानी होती है कि इतनी बड़ी-बड़ी शिलाओं को कैसे उठाया गया होगा। मंदिर में एक गर्भगृह निर्मित है, जहां श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं। गर्भगृह के भीतर वृषभ के पृष्ठ भाग के आकार के रूप में भगवान शिव विराजमान हैं। यह स्वयंभू ज्योतिर्लिंग है जिसे किसी मानव ने नहीं बनाया बल्कि यह प्राकृतिक रूप से बना हुआ है। पर्वत के त्रिकोणाकार रूप में शिव की पूजा संभवतया अन्य कहीं नहीं होती होगी। मंदिर के प्रांगण में खड़ी एक विशालकाय नंदी बैल की प्रतिमूर्ति शिव मंदिर की पहरेदारी करती प्रतीत होती है। शिव की चमत्कारिक शक्तियां हर जगह अपना प्रभाव छोड़ती हैं। केदारनाथ के उद्भव के बारे में भी कुछ ऐसी ही कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि जब पांडव कुरुक्षेत्र के युद्ध में अपने संबंधियों के अपने हाथों मारे जाने का पश्चताप करने यहां आए तो शिव के मन में पांडवों से छल करने की सूझी, वे केदारनाथ में बैल के रूप में रहने लगे। लेकिन भीम ने पशुओं के झंुड के बीच शिव को पहचान लिया। शक्तिशाली भीम ने शिव को पकड़ना चाहा लेकिन बैल रूपी शिव धरती में धंस गए, भीम के हाथ में केवल वृषभ की पूंछ ही आ पाई। यह स्थान ‘मुख्य केदार’ के रूप में प्रसिद्ध है। वृषभ रूपी शिव के शरीर के बाकी भाग गढ़वाल में तुंगनाथ, मध्यमहेश्वर, कल्पेश्वर और रुद्रनाथ में अवस्थित हंै। इन पांचों स्थलों की पूजा पंच केदार के रूप में होती है। यहां पांचों पांडवों, शिव-पार्वती, विष्ण् ाु लक्ष्मी एवं नारद के मंदिर भी हैं। सर्दियों में केदारनाथ में बहुत बर्फ गिरने के कारण केदारनाथ की चल मूर्ति को ऊखीमठ में लाया जाता है। पूरे शीतकाल में उनकी पूजा-अर्चना यहीं होती है। कहा जाता है कि केदारनाथ के मंदिर का जीर्णोद्धार आदि गुरु शंकराचार्य ने कराया। वर्तमान मंदिर शंकराचार्य का बनाया हुआ है। अन्य दर्शनीय स्थल: शंकराचार्य सम.ाधि मंदिर के पृष्ठ भाग में मंदाकिनी नदी के तट पर ही आदि गुरु ने समाधि ली थी। यहां शंकराचार्य का छोटा सा मंदिर और उनके द्वारा पूजित शिवलिंग अवस्थित है। यह स्थान नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर है। चोराबाड़ी ताल: केदारनाथ से 2 किमी की दूरी पर यह एक छोटा सा खूबसूरत सरोवर है। सरोवर के ऊपर नाव की तरह तैरती बर्फ देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देती है। कहा जाता है कि युधिष्ठिर ने इसी स्थान से स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया था। वासुकि ताल: केदारनाथ से लगभग 8 किमी की दूरी पर यह एक अत्यंत रमणीक स्थल है। इसकी ऊंचाई समुद्र तल से 4,135 मीटर है। यहां जाने का मार्ग बहुत कठिन है, रास्ते में कोई विश्राम स्थल भी नहीं है। गौरी कुंड: यहां दो कुंड हैं - एक गर्म पानी का दूसरा ठंडे पानी का। शीतल कुंड को अमृत कुंड कहा जाता है। कहते हैं, माता पार्वती ने इसी में प्रथम स्नान किया था। गौरी कुंड का जल पर्याप्त उष्ण है। माता पार्वती का जन्म यहीं हुआ था। यहां पार्वती का मंदिर है, यहां से केदारनाथ लगभग 14 किमी. है। सोमप्रयाग: यहां सोम नदी मंदाकिनी में मिलती है। यहां से पुल पार छिन्नमस्तक गणपति हंै। त्रियुगी नारायण: सोम प्रयाग से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस पर्वत शिखर पर नारायण भगवान का मंदिर है। यहां भगवान नारायण भूदेवी तथा लक्ष्मी देवी के साथ विराजमान हैं। यहां एक सरस्वती गंगा की धारा भी है जिससे चार कुंड बनाए गए हैं- ब्रह्म कुंड, रुद्रकुंड, विष्णु कुंड और सरस्वती कुंड। रुद्रकुंड में स्नान, विष्ण् ाु कुंड में मार्जन, ब्रह्मकुंड में आचमन और सरस्वती कुंड में तर्पण होता है। कहते हैं कि इसी स्थल पर शिव पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। उनके विवाह की साक्षी अग्नि आज भी अखंड धूनी के रूप में मंदिर के प्रांगण में प्रज्वलित रहती है। त्रियुगी नारायण का मार्ग कठिन चढ़ाई का है। यहां जहरीली मक्खियों के उपद्रव का भी सामना करना पड़ता है। शाकंभरी देवी: ज ा े ल ा े ग त्रियुगीनारायण जाते हैं, उन्हें लगभग दो मील की चढ़ाई के बाद शाकंभरी देवी का मंदिर मिलता है। इन्हें मनसा देवी भी कहते हैं। देवी को चीर चढ़ाया जाता है। गुप्त काशी: यहां अर्धनारीश्वर शिव की नंदी पर आरूढ़ सुंदर मूर्ति है और काशी विश्वनाथ की लिंग मूर्ति भी है। यहां एक कुंड में दो धाराएं मिलती हैं जिन्हें गंगा-यमुना कहते हैं। प्राचीन काल में ऋषियों ने भगवान शंकर की प्राप्ति के लिए यहीं तप किया था। यहां यात्री स्नान करके गुप्त दान करते हैं। यहां डाकबंगला व क्षेत्र की धर्मशाला भी है। आवश्यक बातें: पहाड़ी क्षेत्र में यात्रा करने के लिए आवश्यक जूते, सूती-ऊनी कपड़े, बरसाती कोट, इमली, औषधियां, टार्च, लालटेन, मोमबत्ती, सुई धागा, वैसलिन आदि साथ रखें। Û चलते-चलते झरने का जल सीधे न पीकर बर्तन में थोड़ी देर रख कर पीएं, ताकि उसमें स्थित रेत या अन्य पदार्थ नीचे बैठ जाएं। Û ऋषिकेश से बिच्छू घास (झुनझुनिया) मिलने लगती है, उसके स्पर्श से बचना चाहिए। Û केदारनाथ मार्ग में जहरीली मक्खियां होती हैं जिनके काटने पर खुजली और खुजलाने पर फाडे े़ हो जाते हैं, इसलिए पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनने चाहिए। Û केदारनाथ मार्ग पर कई लोगों को एक पहाड़ी फूल की गंध भी लगने लगती है जिससे प्रायः चक्कर भी आ जाते हैं। खट्टा आदि खाने से इसका असर कम हो जाता है। Û बासी या गरिष्ठ भोजन नहीं करना चाहिए। Û शीतल जल में अधिक देर स्नान नहीं करना चाहिए। Û यात्रा प्रातः से 11 बजे तक और शाम को 3 बजे के बाद सूर्यास्त तक करनी चाहिए। इतना अधिक नहीं चलें कि थकान हो जाए और तबीयत खराब हो जाए। कब जाएं/कैसे जाएं: केदारनाथ जाने का सबसे उत्तम समय मई से अक्टूबर के बीच रहता है। निकटतम हवाई अड्डे जौली ग्रांट, देहरादून और रेलवे स्टेशन ऋषिकेश एवं कोटद्वार हैं। सड़क मार्ग से गौरी कुंड तक देश के प्रमुख पहाड़ी स्टेशनों से गाड़ियां जाती चहकृ73 घुटने का दर्द घुटने का दर्द पुरुष या स्त्री को अलग-अलग उम्र में कई कारणों से होता है। इसकी खास वजह खान-पान में कमी तथा व्यायाम की अनियमितता है। घुटने का दर्द क्यों हा¬ेता है, उससे कैसे बचें तथा इसका प्राथमिक उपचार कैसे करें, पढ़िए इस आलेख में... अज के मशीनी युग में जब नये-नये आने-जाने के साधन, मोटर गाड़ियां, हवाई जहाज आदि ने जीवन की रफ्तार बढ़ा दी है, वहीं बढ़ती उम्र के लोगों के चलने की रफ्तार कम होती जा रही है। कारण है देश में वयस्कों एवं प्रौढ़ों की बढ़ती जनसंख्या और उनमें चलने से मोहताज लोग। जी हां, आप ने ठीक समझा। हमारा आशय घुटने के दर्द से है जिससे शहरों में बहुत लोग पीड़ित हैं। शहरों तथा कस्बो में कम ही घर होंगे जहां कम से कम एक व्यक्ति घुटने के दर्द से पीड़ित न हो। घुटने का दर्द पुरुष या स्त्री को किसी भी उम्र में हो सकता है जैसे काॅलेज के छात्र, खिलाड़ी, उद्योगों में काम करने वाले मजदूर, दफ्तर में कार्यरत लो ग, माली, खे ता े ंम े ंमजदू र/किसान, काम करने वाली बाई या फिर घर के मालिक, मालकिन, बूढ़े लोग। कारण: घुटने में दर्द अलग-अलग उम्र तथा अलग-अलग व्यवसायों में कार्यरत व्यक्तियों को भिन्न-भिन्न कारणों से होता है, जैसे बच्चों एवं खिलाड़ियों में यह दर्द घुटने के इदर्¬गिर्द मांसपेशियो ंमें अत्यधिक खिंचवा या चोट लगने, मोच से होता ही रहता है। कम समय में घुटने का अत्यधिक इस्तेमाल घुटने के दर्द का मुख्य कारण है, खासकर जब रोजाना व्यायाम का कोई नियम न हो। सांस फुलाने वाले व्यायाम (एरोबिक्स) करना, सख्त फर्श/धरती/ सड़क पर व्यायाम करना, ऊबड़-खाब़ड़ जमीन पर दौड़ना, सीढ़ियों पर ऊपर-नीचे भागना इस दर्द के जवानो एवं खिलाड़ियों में होने के मुख्य कारण हैं। जब सीढ़ियों पर चढ़ते हैं तो घुटने पड़ता है और अगर सीढ़ी पर दौड़ते जाएं तो घुटने पर शरीर भार का आठ गुना दबाव पड़ता है। इन सभी से मांसपेशी ख्ंिाच जाना, टेनडेनाइटिस ;ज्मदकपदपजपेद्ध और बरसाईटिस ;ठनत¬ेपजपेद्ध नामक व्याधियां हो जाती हैं। गठिया ;व्ेजमवंतजीतपजपेद्ध वयस्कों एवं बूढ़ों में घुटने के दर्द का सबसे महत्वपूर्ण कारण है। इस रोग में घुटने की कार्टिलेज (उपास्थि) का क्षय हो जाता है। कभी कभी तो कार्टिलेज घिस-घिस कर लगभग खत्म हो जाती है और फीमर ;थ्मउनतद्ध हड्डी टिबिया ;ज्पइपंद्ध हड्डी से टकराती रहती है। लिगामेंट (अस्थि तंतुओं) की चोटः खिलाड़ियों के लिगामेन्ट के क्षतिग्रस्त होने पर घुटने का दर्द अक्सर हो जाता है। इन चोटों में ए. सी. एल. चोट ;।ण्ब्ण्स्ण् प्दरनतलद्धए पी. सी. एल. चोट ;च्ण्ब्ण्स्ण् प्दरनतलद्धए मीडियल क्लेट्रल चोट ;डमकपंस ब्वससंजमतंस प्दरनतल द्धए कार्टिलेज की चोट, मेनिस्कस का फट जाना, पैटेला के टेन्डेन की सूजन या फिर इन्फेक्शन प्रमुख हैं। रूमेटाइड आर्थराइटिस ;त्ीमनउं¬जवपक ।तजीतपजपेद्ध: इस रोग में घुटने के अतिरिक्त अन्य जोड़ों में भी दर्द-सूजन होती रहती है। इससे परिवार के अन्य लोग भी पीड़ित हो सकते हैं। इस रोग में सुबह -सुबह जोड़ों में सूजन और दर्द रहता है। मधुमेह रोगी ज्यादातर घुटने के दर्द से भी पीड़ित रहते हैं। बरसाइटिस ;ठनतेपजपेद्ध रोग उन लोगों में अधिक रहता है जो घुटने के बल बैठकर काम करते हैं जैसे घरों में पोछा लगाने वाले लोग, माली या गलीचा बिछाने वाले मजदूर इत्यादि। जंपर्स नी ;श्रनउचमतश्े ज्ञदममद्ध उन लोगों में होता हैं जो कि ज्यादा उछल-कूद करते हैं। उदाहरण के लिए बास्केटबाल, वाॅलीबाल के खिलाड़ी या फिर मैराथन दौड़ जैसे खेलों के खिलाड़ी। ये लोग जब कूदते हैं तभी सबसे अधिक दर्द होता है। गाउट: यह रोग यूरिक एसिड के क्रिस्टल (खे) जोड़ों में आ जाने से होता है। रक्त में यूरिक एसिड जांच द्वारा इस रोग का आसानी से पता लगाया जा सकता है। इस रोग का पता लगने पर इसकी दवा जीवनपर्यन्त खाएं अन्यथा इस रोग में उत्पन्न यूरिक एसिड के क्रिस्टल गुर्दे को क्षतिग्रस्त कर सकते हैं। संक्रमण: गोनोरिया ;ळवदवततीवमंद्ध नामक रोगाणु के इन्फेक्शन से भी घुटने में दर्द हो सकता है। इस रोग में दर्द के साथ-साथ सूजन भी हो जाती है। इस रोग की खास पहचान यह है कि बुखार सर्दी के साथ आता है। निदान: खून की जांच: मधुमेह, गाउट, रूमे¬टाइड आर्थराइटिस या इन्फेक्शन के लिए रक्त जांच द्वारा रोगों का निदान हो जाता है। घुटनों का एक्सरे: इससे जोड़ों की हड्डियों के बीच की दूरी और अन्य बातों का पता लगाया जाता है। कभी-कभी दूरबीन द्वारा जोड़ के अंदर देखकर भी बीमारी का निदान किया जाता है जिसे आर्थोस्कोपी कहते हैं। कभी-कभी सी. टी. स्केन ;ब्ण्ज्ण् ैबंदद्ध या फिर एम. आर. आई. स्केन ;डण्त्ण्प्ण् ैबंदद्ध भी करवाना पड़ सकता है। एम. आर. आई से केवल कुछ ही रोगों की स्थिति का पता लगता है जबकि एक्सरे से ज्यादा बीमारियों का पता लगाना आसान होता है। कब मिलें हड्डी विशेषज्ञ से जब आराम से चलना दूभर हो जाए। जब चोट से पैर में/घुटने मंे टेढ़ापन आ जाए। जब घुटने का दर्द आराम करते हुए भी रहे या फिर रात को दर्द हो। जब दर्द काफी दिनों से रहता हो। घुटना लाॅक हो जाए। घुटने में सूजन आ जाए या पिंडलियों में सूजन आ जाए। चोट लगने के उपरांत होने वाली क्रियाएं: जब किसी खिलाड़ी को दौड़ के उपरांत मांसपेशी खिंच जाने से दर्द होता है तो कारण होता है उस स्थान की मांसपेशियांे एवं ऊतकों का क्षतिग्रस्त होना। इस दौरान टंेडन या लिगामेंट के रेशे भी प्रभावित हो जाते हैं। नतीजतन छोटी-छोटी रक्त शिराएं टूट जाने से रक्तस्राव शुरु हो जाता है और चोट के स्थान पर सूजन हो जाती है। फिर यही सूजन पहले से लगी चोट के दर्द को और बढ़ा देती है। हड्डी में चोट लगने के पश्चात भी ठीक इसी प्रकार का क्रम रहता है। अक्सर लोग इस चोट वाले स्थान को गर्म सेंक लगाने लगते हैं। इस कारण दर्द और सूजन बढ़ते जाते हैं और फिर लोग दौड़ पड़ते हैं किसी मालिश करने वाले के पास या समझदार लोग चिकित्सक के पास जाते हैं। प्राथमिक उपचार: आराम: इससे विस्थ ा पित मांशपेशियों को आराम मिलने से रक्तस्राव कम होगा जिससे दर्द और सूजन में कमी आएगी। घुटने को आराम देने के लिए अगर बैसाखी की जरूरत पडे़ तो जरूर इस्तेमाल कर लेनी चाहिए। ठंडा सेंक करें: बर्फ को तोड़कर किसी थैली में डालकर या रबड़ की बोतल में डालकर चोट के स्थान पर गीला तौलिया रखने के बाद ऊपर बर्फ की थैली रखें। इससे क्षतिग्रस्त रक्त की शिराएं ;ब्ंचपससंतपमेद्ध बंद हो जाएंगी और सूजन तथा दर्द दोनों में आराम मिलेगा। याद रहे, केवल 20 मिनट तक एक बार सेंक करें एवं फिर 20-40 मिनट बाद दोबारा संेक करें जिससे कि चोट ग्रस्त भाग के ऊपर की त्वचा का रक्तसंचार कम न हो जाए। जितना भी रक्त या सीरम ;ैमतनउद्ध चोट वाली जगह में इकट्ठा हो जाएगा, यह उतना ही इन्फ्लेमेशन (जलन) को जन्म देगा और इसके ठीक होने में उतना ही अधिक समय लगेगा। कम्प्रेस करना ;ब्वउचतमेेद्ध: हल्के दबाव देती हुई पट्टी बांधे जिससे रक्त शिराएं बंद की जा सकें और सूजन भी कम रहे। रोगी को घुटने को ऊंचा करके रखना चार पांच दिनों के पश्चात चोट के स्थान की गर्म सिंकाई शुरु कर सकते हैं। इससे सूजन तथा दर्द को जल्दी ठीक करने में सहायता प्राप्त होती है। इसी प्रकार जिन्हें जोड़ों से अधिक काम लेना होता है वे प्रतिदिन सुबह गर्म सिंकाई करें तो उनकी मांसपेशियां खुल जाएंगी और जोड़ों की कार्यक्षमता बढ़ जाएगी। शाम को पूरे दिन की भागदौड़ एवं थकान के पश्चात जोड़ों में हल्की चोटांे के कारण जो सूजन आने का खतरा बढ़ जाता है उसे ठंडा सेंक खत्म कर देगा। इन सबके अतिरिक्त जो अन्यत्र उपाय किये जाते हैं वे निम्नलिखित हैं: फिज़ियोथेरेपी ;च्ीलेपवजीमतंचलद्ध: फिज़ियोथेरेपी के तहत कई प्रकार के व्यायाम एवं उपकरणों द्वारा रोगी की मांसपेशियों में ताकत बढ़ाने के उपाय किए जाते हैं ताकि घुटनों को बार-बार लगने वाली चोटों से बचाया जा सके और उन्हें पूरी तरह स्वस्थ बनाया जा सके। क्वाड्रीेसेप्स मांसपेशी ;फनंकतपबमचे उनेबसमद्ध की ताकत बढाने वाली कसरत कभी न भूलें। केवल दो व्यायाम, पहला कमर के बल लेटकर घुटने मोड़े बिना पैरों को उठाना और दूसरा लेटे-लेटे ही पैरों को सीधा करना, इनके द्वारा घुटने के दर्द को कम किया जा सकता है। दवाएं: एन्टी इन्फ्लेमेट्री दवाएं ;।द¬जप पदसिंउउंजवतल कतनहेद्ध एन. एस. ए. आई. डी ;छै।प्क्द्ध नामक दर्द निवारक दवाएं सबसे अधिक इस्तेमाल की जाती हैं, दर्द चाहे किसी भी कारण से होता हो। काॅर्टिसोन इन्जेक्शन: यह अति प्रभावशाली एन्टीइनफ्लेमेटरी दवा है। परंतु यह निर्णय कि काॅर्टिसोन इन्जेक्शन घुटने में लगाया जाए, हड्डी रोग विशेषज्ञ करे तो अति उत्तम होगा। कैसे बचें घुटने की चोट/दर्द से वजन को कम और काबू में रखंे। इससे आर्थराइटिस, टेन्डन ;ज्मदकवदद्ध एवं लिगामेंट ;स्पहंउमदजद्ध की चोटों से बहुत हद तक बचा जा सकता है। निरंतर चलते रहें ;ज्ञममच स्पउइमतद्ध । कई घुटने के रोग मांसपेशियों में खिंचाव या टाईट रहने से ही उत्पन्न होते हैं। इसीलिए स्ट्रेचिंग व्यायाम करते रहें। व्यायाम नियमित एवं सोच समझकर करें। तैरना या पानी में व्यायाम करना अति लाभदायक रहता है। हो सके तो बास्केटबाल, वालीबाल और दौड़ने जैसे खेल कम खेलें या फिर सप्ताह में दो दिन से ज्यादा किसी कीमत पर न खेलें। क्वाड्रीेसेप्स मांसपेशी ;फनंकतपबमचे डनेबसमद्ध की ताकत बढ़ाने वाली कसरत कभी न भूलें। घुटने को नी पैड ;ज्ञदमम च्ंकेद्ध द्वारा बचा कर रखना लाभकारी है, खासकर घरों में पोछा लगाने वाली औरत और कालीन बिछाने वाले मजदूरों के लिए। भोजन में अंकुरित अनाज एवं दालें, अंकुरित मेथी, कम से कम तीन प्रकार के फल, दो प्रकार की मेवा (सूखे फल), तीन प्रकार की हरी सब्जियां, सलाद (प्रतिदिन कम से कम 600 ग्राम) और 10 से 12 गिलास शीतल जल लें। धूम्रपान, मदिरा, मांस-मछली, अंडा कभी न खाएं। तले हुए मैदायुक्त भोजन से परहेज करें। सप्ताह में एक से दो दिन उपवास अवश्य रखें। जिन लोगों को दवाओं के कारण आमाशय में अम्ल ;।बपकद्ध उत्पन्न हो जाता है या फिर पेप्टिक अल्सर रोग से ग्रस्त हैं वे विजयसार की लकड़ी का बुरादा तथा अर्जुन की छाल की चाय का सेवन साधारण चाय के स्थान पर करें। ऐसा करने पर दर्द निवारक दवाओं की जरूरत कम होगी या पड़ेगी ही नहीं। जौ के जवारे/गेहूं के जवारे प्रतिदिन 3 से 4 औंस (100 ग्राम) अवश्य लें। जिन लोगों को गठिया ;व्ेजमवंतजीतप¬जपेद्ध की वजह से इतना दर्द रहता है कि रोजमर्रा का काम दूभर हो गया हो और हड्डी रोग विशेषज्ञ ने घुटने के जोड़ को ही बदलने ;ज्वजंस ादमम त्मचसंबमउमदजद्ध की सलाह दे दी हो तब शल्य चिकित्सा ;व्चमतंजपवदद्ध करवाने से पहले निम्न आजमाकर देखें। भोजन में बकरी का दूध, मौसम के अनुसार फल, हरी सब्जी में लौकी, तौरई, टिंडा तथा रामदाना/चैलाई का साग, सूखे मेवों में अखरोट की गिरी प्रतिदिन 30 ग्राम तक तथा 10 ग्राम तक अलसी के बीज खाएं। जौ/गेहूं के जवारे चबा कर खाएं। अगर दांत ठीक न हों तो इनका रस निकालकर पिएं। सावधानी बरतें: आलू, टमाटर, बैंगन, हरी मिर्च, लाल मिर्च, शिमला मिर्च ;ब्ंचेपबनउद्धए रसभरी कभी न खाएं। अगर मुमकिन हो सके तो अन्न का सेवन न करें। अगर करें भी तो अंकुरित अनाज का सेवन करें वह भी कम मात्रा में। किसी फिज़ियोथैरेपिस्ट की निगरानी में मांसपेशी की ताकत बढ़ाने वाली कसरत प्रतिदिन करते रहें।



पराविद्याओं को समर्पित सर्वश्रेष्ठ मासिक ज्योतिष पत्रिका  जुलाई 2006

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