मारकेश निर्णय के अपवाद

मारकेश निर्णय के अपवाद  

मारकेश निर्णय के अपवाद प्रो. शुकदेव चतुर्वेदी मारकेश-निर्णय के प्रसंग में यह सदैव ध्यान रखना चाहिए कि पापी शनि का मारक ग्रहों के साथ संबंध हो तो वह सभी मारक ग्रहों का अतिक्रमण कर स्वयं मारक हो जाता है। इसमें संदेह नहीं है। (1) पापी या पापकृत का अर्थ है पापफलदायक। कोई भी ग्रह तृतीय, षष्ठ, एकादश या अष्टम का स्वामी हो तो वह पापफलदायक होता है। ऐसे ग्रह को लघुपाराशरी में पापी कहा जाता है। मिथुन एवं कर्क लग्न में शनि अष्टमेश, मीन एवं मेष लग्न में वह एकादशेश, सिंह एवं कन्या लग्न में वह षष्ठेश तथा वृश्चिक एवं धनु लग्न में शनि तृतीयेश होता है। इस प्रकार मेष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, वृश्चिक, धनु एवं मीन इन आठ लग्नों में उत्पन्न व्यक्ति की कुंडली में शनि पापी होता है। इस पापी शनि का अनुच्छेद 45 में बतलाये गये मारक ग्रहों से संबंध हो तो वह मुख्य मारक बन जाता है। तात्पर्य यह है कि शनि मुख्य मारक बन कर अन्य मारक ग्रहों को अमारक बना देता है और अपनी दशा में मृत्यु देता है। कारण यह है कि ज्योतिष शास्त्र में शनि को मृत्यु एवं यम का सूचक माना गया है। उसके त्रिषडायाधीय या अष्टमेश होने से उसमें पापत्व तथा मारक ग्रहों से संबंध होने से उसकी मारक शक्ति चरम बिंदु पर पहुंच जाती है। तात्पर्य यह है कि शनि स्वभावतः मृत्यु का सूचक है। फिर उसका पापी होना और मारक ग्रहों से संबंध होना- वह परिस्थिति है जो उसके मारक प्रभाव को अधिकतम कर देती है।(2) इसीलिए मारक ग्रहों के संबंध से पापी शनि अन्य मारक ग्रहों को हटाकर स्वयं मुख्य मारक हो जाता है। इस स्थिति में उसकी दशा-अंतर्दशा मारक ग्रहों से पहले आती हो तो पहले और बाद में आती हो तो बाद में मृत्यु होती है। इस प्रकार पापी शनि अन्य मारक ग्रहों से संबंध होने पर उन मारक ग्रहों को अपना मारकफल देने का अवसर नहीं देता और जब भी उन मारक ग्रहों से आगे या पहले उसकी दशा आती है उस समय में जातक को काल के गाल में पहुंचा देता है। Û इन सब रीतियों से परिणाम में एकरूपता होने पर निर्धारित मृत्यु-काल असंदिग्ध होता है। Û किंतु एकरूपता न होने पर प्रथम तीन रीतियों से आयु खंड का निर्धारण करना चाहिए क्योंकि पराशर, जैमिनी आदि सभी का मत है कि जातक की मृत्यु निर्धारित आयु खंड में ही होगी। आयु खंड निर्धारित कर उस समय में जिस मारक ग्रह की दशा उपलब्ध हो वह ग्रह मारकेश होता है। Û आयु निर्णय की रीतियों से किसी व्यक्ति की आयु अल्पायुखंड में हो और उस समय किसी मारक ग्रह की दशा न मिलती हो तो ऐसी स्थिति में कभी-कभी शुभ ग्रह या अष्टमेश की दशा में मृत्यु हो जाती है। Û यदि किसी मनुष्य की आयु मध्यमायु खंड में हो और मारक ग्रहों की दशा अल्पायु खंड में हो तो इन ग्रहों की दशा-अंतर्दशा में कष्ट एवं अरिष्ट मिलता है, मृत्यु नहीं होती। उसकी मृत्यु मध्यमायु के कालखंड में आने वाली मारक ग्रह की दशा में होती है। यदि वहां भी मारक ग्रह की दशा उपलब्ध न हो तो केवल पापी ग्रह, अष्टमेश या शुभ ग्रह की दशा में मृत्यु होती है। (3) Û यदि उक्त रीतियों से मनुष्य की आयु दीर्घायु खंड में हो तो अल्प एवं मध्य आयु खंड में आने वाली मारक ग्रहों की दशा अरिष्ट मात्र देती है। उस समय में व्यक्ति को मृत्यु तुल्य कष्ट या संकट हो सकता है किंतु मृत्यु नहीं होती। उसकी मृत्यु दीर्घायु खंड में आने वाली मारक ग्रह की दशा में होती है। ऐसा लघुपाराशरी का मत है। किंतु इस मत को लघुपाराशरीकार ने नियामक नहीं माना। इस विषय में उनका कहना है कि ऐसा बहुधा होता है क्योंकि इसके अपवाद भी हैं। Û इस नियम का एक अपवाद यह है कि यदि शनि त्रिषडायाधीश या अष्टमेश हो और उसका मारक ग्रहों से संबंध हो तो उस शनि की जब भी दशा आती है तभी जातक की मृत्यु होती है। अर्थात ऐसा होने पर अन्य मारक ग्रहों की दशा या निश्चित आयु खंड में मृत्यु होना निश्चित नहीं है। इस विषय में महत्वपूर्ण बिंदु पापी शनि जिस मारक ग्रह से संबंध करता है वह अमारक हो जाता है। अतः मारक ग्रह की दशा में मृत्यु नहीं होती और शनि की दशा में मृत्यु होती है। किंतु ऐसा अमारक ग्रह राहु से ग्रस्त हो तो वह पुनः मारक बन जाता है। शनि शुभ होते हुए भी मारक ग्रहों से संबंध होने पर मारक हो जाता है। मुख्य मारक शनि की दशा में शुक्र या अन्य मारक ग्रहों की अंतर्दशा मृत्युदायक होती है। अमारक शनि स्वयं नहीं मारता। किंतु मारक शुक्र की दशा में अपनी भुक्ति में मृत्यु देता है। शनि एवं शुक्र दोनों मारक हों और उनमें संबंध हो तो शुक्र अमारक हो जाता है तथा शनि की दशा में शुक्र की अंतर्दशा में मृत्यु होती है। मारक या अमारक शनि का मारक शुक्र से संबंध हो तो शनि ही मारक होता है। मारक शनि के साथ राहु या केतु बैठा हो तो राहु या केतु मारक हो जाता है। शनि का जिस पाप ग्रह से संबंध हो उसका शुक्र के साथ संबंध हो तो शुक्र मारक हो जाता है। मारक शनि से मारक शुक्र का संबंध न हो तो शुक्र ही मारक रहता है। शनि-शुक्र, शुक्र-बुध, गुरु-मंगल, सूर्य-चंद्र, गुरु-सूर्य एवं सूर्य-मंगल परस्पर मित्र होते हैं। इनमें शनि एवं शुक्र अभिन्न मित्र हैं। अतः ये दोनों मारक या कारक होने पर अपना फल एक-दूसरे की दशा-अंतर्दशा में देते हैं। इसी प्रकार अन्य मित्र भी मारक होने पर एक-दूसरे की दशा-अंतर्दशा में मृत्युदायक हो जाते हैं। आयुनिर्णय के प्रसंग में स्मरणीय बिंदु Û आयुनिर्णय सचमुच में एक जटिल कार्य है क्योंकि जन्म-मृत्यु का रहस्य गूढ़ है तथा उसको जानने का मार्ग भी गहन है। अतः फलित ज्योतिष में किसी एक नियम या मत से बंधकर आयु का निर्णय नहीं किया गया है। Û आयु का निर्णय करने के लिए चार रीतियां प्रमुख हैं- (अ) अल्पायु, मध्यमायु एवं दीर्घायु योग, (आ) लग्नेश-अष्टमेश आदि की चर आदि राशियों में स्थिति (इ) अंशायु आदि स्पष्टीकरण एवं (ई) मारकेश ग्रहों की दशा-अंतर्दशा। Û मारक प्रकरण में मारक ग्रहों का परस्पर संबंध होना या पापी ग्रहों से संबंध होना मारक फल को असंदिग्ध बनाता है जबकि द्वितीयेश, अष्टमेश एवं द्वादशेश का लग्नेश या नवमेश होना उसकी मारकता को संदिग्ध बनाता है। Û मृत्यु निश्चित भी है और अपरिहार्य भी। अतः प्रत्येक जातक की मृत्यु अवश्य होगी। पर वह कब होगी? इस प्रश्न का विचार सभी रीतियों से करना चाहिए और उन रीतियों के परिणामों का गंभीरतापूर्वक मनन कर सर्वसम्मत या बहुसम्मत पक्ष के आधार पर मृत्यु का पूर्वानुमान करना चाहिए। Û राहु या केतु लग्न, सप्तम, अष्टम या द्वादश में हो अथवा मारकेश से सप्तम में हो या मारकेश के साथ हो या पापी ग्रहों से युत, दृष्ट हो तो उसकी दशा में मृत्यु होती है। Û सूर्य एवं चंद्रमा संदिग्ध मारक और शनि, राहु एवं मंगल असंदिग्ध मारक होते हैं। षष्ठ एवं अष्टम भाव में त्रिषडायाधीश के साथ स्थित राहु असंदिग्ध मारक होता है। Û मारकेश अपने से संबंध होने पर भी त्रिकोणेश या लग्नेश की अंतर्दशा में नहीं मारता जबकि वह संबंध न होने पर भी त्रिषडायाधीश या अष्टमेश की दशा में मृत्यु देता है। कुंडली संख्या 1 एक प्रसिद्ध राजनेता की है जिन्होंने दो बार भारत के कार्यवाहक प्रधानमंत्री का दायित्व निभाया और अच्छी आयु भोगकर बुध की दशा में मंगल की अंतर्दशा में महाप्रयाण किया। इनकी मृत्यु के समय सप्तमेश (मारक) बुध की दशा में द्वितीयेश (मारक) मंगल की अंतर्दशा चल रही थी। कुंडली संख्या 2 भारत के उस प्रधानमंत्री की है जिनके अंगरक्षकों ने उनके निवास में उनकी हत्या कर दी। मृत्यु के समय उन्हंे शनि की दशा में राहु की अंतर्दशा चल रही थी। इस कुंडली में शनि सप्तमेश एवं अष्टमेश (मारकेश) है तथा षष्ठ स्थान में एकादशेश शुक्र के साथ स्थित राहु भी मारक है। कुंडली संख्या 3 ब्रिटेन की प्रसिद्ध युवराज्ञी की है जिनकी आकस्मिक दुर्घटना पर पूरा देश स्तब्ध हो गया था। इनकी मृत्यु गुरु की दशा में राहु की अंतर्दशा में हुई। इनकी कुंडली में गुरु केवल पापी है तथा राहु मारकेश मंगल के साथ पाप स्थान (एकादश में) होने से मारक है। संदर्भ: 1. ‘‘मारकैः सह सम्बन्धान्निहन्ता पापकृच्छनिः। अतिक्रम्येतरान् सर्वान् भवत्येव न संशयः।।’’ 2. ‘‘शनि यम एवातो विख्ख्यातो मारकः पुनः । अन्यमारकसम्बन्धात् प्राबल्यं तस्य, ? च्ह...57 रत्न पहनाएं, दोष भगाएं प्रो. बी.एल.गोयल रत्न अपना प्रभाव अवश्य दिखाते हैं। उनकी इस शक्ति का प्रयोग अपनी ग्रह स्थितियों के अनुसार किया जाए तो वे जीवन में कई सकारात्मक उपलब्धियां प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होते हैं। बिना सोचे समझे रत्न धारण करने के दुष्परिणाम भी कम नहीं होते। इस आलेख में कौन सा रत्न किसे और कितने वजन का पहनना चाहिए इसकी विस्तृत जानकारी दी जा रही है... पने जीवन से संबंधित किसी अल्प सामथ्र्यवान ग्रह की शक्ति को बढ़ाने के लिए यदि कोई मनुष्य उससे संबंधित रत्न को धारण करता है तो वह रत्न अवश्य ही उसके लिए लाभकारी सिद्ध होता है। इन रत्नों को सही ढंग से नियमपूर्वक धारण करने से लाभ मिलता है और गलत ढंग से धारण करने से परेशानियांे का सामना करना पड़ता है, अतः सोच समझ कर नियमपूर्वक ही रत्न धारण करना चाहिए। माणिक्य: असली माणिक्य धारण करने वाले की वंश वृद्धि और ऐश्वर्यों तथा सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। वह हर कष्ट और व्याधि से मुक्त रहता है। माणिक्य किसे धारण करना चाहिए: जिनकी जन्मकुंडली में सूर्य की स्थिति खराब हो, उन्हें माणिक्य धारण करने से असीम सफलता मिलती है। सूर्य की स्थिति निम्नलिखित परिस्थितियों में दोषपूर्ण होती है। Û यदि जन्मकुंडली में सूर्य लाभेश, अष्टमेश तथा दशमेश होकर त्रिक स्थान में बैठा हो। Û यदि सूर्य जीव नक्षत्र का स्वामी हो। यदि सूर्य अपने भाव से अष्टम स्थान में स्थित हो। Û यदि सूर्य लग्न में हो। Û यदि सूर्य तृतीय स्थान में हो कितने वजन का माणिक्य पहनें: माण् िाक्य कम से कम 3 रत्ती का पहनना चाहिए और इसके लिए सोना कम से कम 5 रत्ती उपयोग में लाएं। मोती: मोती धारण करने से ज्ञान एवं बुद्धि में वृद्धि होती है, निर्बलता दूर होती है और शारीरिक तेज, रूप, बल एवं कांति में वृद्धि होती है। इतना ही नहीं, इससे यश, धन, सम्मान एवं प्रभ्¬ाुता की प्राप्ति तथा सभी अभिलाषाओं की पूर्ति भी हो जाती है। मोती किसे को धारण करना चाहिएः जिस जातक की जन्मकुंडली में चंद्रमा की स्थिति अच्छी न हो, उसे मोती धारण करना चाहिए। जातक की जन्मकुंडली में चंद्रमा की निम्नलिखित स्थितियां दोषपूर्ण मानी जाती हंै। Û यदि चंद्रमा केंद्र में हो तो हल्के प्रभाव का माना जाता है। Û यदि चंद्रमा सूर्य के साथ हो तो चंद्रमा का प्रभाव क्षीण हो जाता है। Û यदि विंशोत्तरी के अनुसार चंद्रमा की महादशा बुरी चल रही हो तो मोती धारण करें। Û यदि चंद्रमा राहु के साथ बैठा हो Û यदि चंद्रमा नीच, वक्री तथा अस्तंगत हो। Û यदि चंद्रमा वृश्चिक राशि का होकर किसी भी भाव में स्थित हो। Û यदि चंद्रमा पर मंगल, शनि, राहु अथवा केतु की दृष्टि हो। कितने वजन का मोती पहनें: अंगूठी में जड़वाने के लिए कम से कम 4 रत्ती वजन का मोती शुभ माना जाता है। यदि इससे भी अधिक वजन का मोती धारण कर सकें तो अधिक फलदायक होगा। मूंगा: मंगल रत्न मूंगे की माला धारण करने से हृदय रोग, मिरगी तथा दृष्टि दोष से मुक्ति मिलती है। इसकी माला बालकों को धारण कराने से उन्हें सूखा रोग, पेट दर्द आदि से मुक्ति मिलती है। इतना ही नहीं जिस व्यक्ति के पास मूंगा हो उसे भूत-प्रेत आदि नहीं सताते तथा आंधी-तूफान, बिजली, छल, माया से भी उसकी रक्षा होती है। मूंगा किसे धारण करना चाहिए: जिस जातक की जन्मकुंडली में मंगल की दशा खराब हो उसे मूंगा धारण करना लाभप्रद होता है। मंगल की निम्नलिखित स्थितियां दोषपूर्ण मानी गई हैं। Û जातक की जन्मकुंडली में मंगल वक्री या अस्त हो अथवा शत्रु ग्रहों के बीच विराजमान हो। Û यदि मंगल लग्न में बैठा हो। Û यदि मंगल चंद्रमा के साथ हो। Û यदि मंगल तृतीय अथवा चतुर्थ भाव में बैठा हो। Û यदि मंगल राहु अथवा शनि के साथ किसी भी स्थान में बैठा हो। Û यदि मंगल सप्तम या द्वादश भाव में विराजित हो। Û यदि मंगल अष्टमेश या षष्ठेश के साथ हो अथवा इन ग्रहों की उस पर पूर्ण दृष्टि पड़ रही हो। कितने वजन का मूंगा धारण करें: मुद्रिका में जड़वाने हेतु मूंगे का वजन कम से कम 6 रत्ती से 8 रत्ती का होना चाहिए। इसे कम से कम 6 रत्ती सोने में जड़वाकर पहनें। पन्ना: यदि जातक की जन्मकुंडली में बुध की स्थिति खराब हो तो उसे पन्ना धारण करने से लाभ होता है। बुध की निम्नलिखित स्थितियों में पन्ना धारण करने का विधान है: Û अगर विंशोत्तरी में बुध की महादशा या अंतर्दशा चल रही हो। Û यदि जातक की जन्मकुंडली में बुध दूसरे, तीसरे, चैथे, पांचवें, सातवें, नौवें, दसवें अथवा ग्यारहवंे भाव का स्वामी होकर अपने छठे भाव में बैठा हो। Û यदि जन्म कुंडली में बुध मंगल, शनि, राहु अथवा केतु के साथ हो। Û यदि बुध छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो। Û यदि बुध पर शत्रु ग्रहों की दिव्य दृष्टि हो। Û अगर बुध मीन राशि में हो। Û यदि जातक का लग्न मिथुन या पुखराज: जो जातक पुखराज धारण करता है उसकी धन-संपत्ति, बल-बुद्धि, आयु तथा यश में वृद्धि होती है। इतना ही नहीं, यह भूत-प्रेत बाधाओं का नाशक भी है। यदि लड़की की शादी में विलंब हो रहा हो तो पुखराज धारण कराएं, शीघ्र प्रणय बंधन में बंध जाएगी। इसके प्रभाव से मानव आध्यात्मिक विचारों में भी लीन हो जाता है। पुखराज किसे धारण करना चाहिएः निम्नलिखित स्थितियों में पुखराज धारण करना शुभ होगा। जिनकी जन्मकुंडली में धनु, कर्क अथवा मीन लग्न हो। यदि जन्मकुंडली में प्रधान ग्रह बृहस्पति हो। विंशोत्तरी के अनुसार जब किसी भी ग्रह की महादशा में गुरु का अंतर चल रहा हो। यदि गुरु के साथ बुध, चंद्र, मंगल या सूर्य बैठा हो। अगर जातक की जन्मकुंडली में पुर्वोक्त नक्षत्रों में बृहस्पति हो। यदि जन्म के दिन गुरुवार के साथ पुष्य नक्षत्र भी हो। यदि जन्म का नक्षत्र पुनर्वसु, विशाखा अथवा पूर्वाभाद्रपद हो। कितने वजन का पुखराज धारण करना चाहिए: कम से कम 7 कैरट का पीला पुखराज सोने की मुद्रिका में जड़वाकर धारण करना चाहिए। हीरा: यदि जातक की जन्मकुंडली में शुक्र की महादशा खराब हो तो हीरा धारण करना शुभ होता है। खास कर निम्नलिखित परिस्थितियों में हीरा धारण करना चाहिए। यदि जातक का जन्म तुला अथवा वृष लग्न में हुआ हो। अगर जातक की जन्मकुंडली में शुक्र वक्री, अस्तंगत अथवा पाप ग्रहों के साथ बैठा हो। अगर जातक की जन्मकुंडली में शुक्र शुभ भावों का स्वामी होकर अपने भाव से आठवें अथवा छठे स्थान में विराजमान हो। यदि किसी भी ग्रह की महादशा में शुक्र का अंतर चल रहा हो। कितने वजन का हीरा धारण करना चाहिए: हीरे का वजन कम से कम एक रत्ती का होना चाहिए। नीलम: नीलम एक ऐसा रत्न है जो धारण कर्ता पर कुछ ही घंटों में अपना प्रभाव प्रकट करने लगता है। धारण करने वाले दिन की रात्रि में यदि धारणकर्ता को बुरे स्वप्न दिखाई दें या भय अथवा कोई आकस्मिक दुर्घटना आदि हो जाए तो समझना चाहिए कि उसके लिए नीलम उपयोगी नहीं है, अतः तुरंत मुद्रिका उतार लेनी चाहिए। यदि नीलम अनुकूल हो तो सुख संपत्ति, यश, मान, सम्मान, आयु, बुद्धि और वंश की वृद्धि करता है। यह रोग और दरिद्रता को दूर करता है, मुख की कांति और नेत्र की रोशनी बढ़ाता है तथा इससे अनेक मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। नीलम किसे धारण करना चाहिए: यदि जातक की जन्मकुंडली में शनि की महादशा विपरीत हो तो उसे नीलम धारण करना चाहिए। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित परिस्थितियों में नीलम धारण करना लाभप्रद माना गया है। यदि जातक शनि की साढ़ेसाती से प्रभावित हो। यदि जन्मकुंडली में शनि प्रधान ग्रह हो। अगर सूर्य के साथ शनि बैठा हो। जिन्हें क्रोध आता हो। अगर जन्मकुंडली में शनि मेष अगर शनि अपने भाव से छठे या आठवें स्थान में स्थित हो। अगर जातक का जन्म मेष, वृष, तुला अथवा वृश्चिक लग्न में हुआ हो। गोमेद: इस रत्न को शत्रु नाशक, युद्ध में विजय दिलाने वाला, अनेक बीमारियों को दूर करने वाला तथा धन-संपत्ति व पुत्रपौत्रादि देने वाला एवं समस्त मनोकामनाओं को पूरा करने वाला कहा गया है। गोमेद किसे धारण करना चाहिए: जिनकी जन्मकुंडली में राहु की महादशा खराब हो उन्हें गोमेद धारण करना शुभ होता है। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित स्थितियों में गोमेद धारण करना चाहिए। यदि जातक की जन्म राशि अथवा लग्न कुंभ, वृष, मिथुन अथवा तुला हो। यदि शुक्र और बुध के साथ राहु बैठा हो। यदि जन्म लग्न मकर हो। अगर जन्मकुंडली में राहु नीच राशि का हो। यदि जन्म कुंडली में राहु श्रेष्ठ भाव का स्वामी होकर सूर्य के साथ बैठा हो। तस्करों, नेताओं, चोरों और जुआरियों के लिए यह रत्न शुभ है। वकील, डाॅक्टर, इंजीनियर, कवि, लेखक आदि के लिए भी यह रत्न शुभ है। लहसुनिया: लहसुनिया धारण करने से दुख-दारिद््रय, व्याधि, भूत-प्रेत बाधा और विपत्तियों का नाश होता है तथा धन-संपत्ति, पुत्र पौत्रादि, तेज, बल एवं शत्रुओं पर विजय की प्राप्ति होती है। लहसुनिया किसे धारण करना चाहिएः अगर जातक की जन्मकुंडली में केतु की स्थिति खराब हो तो लहसुनिया धारण करना शुभ होता है। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित स्थितियों में यह रत्न धारण करना शुभ होता है। यदि जातक की जन्मकुंडली में धनेश, राज्येश, आयेश, भाग्येश अथवा सुखेश का केतु के साथ दृष्टि संबंध हो। यदि केतु जन्मकुंडली में मंगल, गुरु अथवा शुक्र के साथ स्थित हो। यदि जन्मकुंडली में केतु सूर्य के ुंडली में केतु सूर्य क



पराविद्याओं को समर्पित सर्वश्रेष्ठ मासिक ज्योतिष पत्रिका  जुलाई 2006

पारिवारिक कलह : कारण एवं निवारण | आरक्षण पर प्रभावी है शनि |सोने-चांदी में तेजी ला रहे है गुरु और शुक्र |कलह क्यों होती है

सब्सक्राइब

अपने विचार व्यक्त करें

blog comments powered by Disqus
.