मेलापक विचार

मेलापक विचार  

व्यूस : 4069 | अकतूबर 2014

”आश्रम चतुष्ट्य की द्वितीय इकाई ‘गृहस्थाश्रम’ सम्पूर्ण सामाजिक गत्यात्मकता की केन्द्रीय सत्ता है। गृहस्थाश्रम में रह कर व्यक्ति पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति करता हुआ अपने सामाजिक ऋणों और कर्तव्यों का निर्वाह करता है। शेष तीनों आश्रमों में अवस्थित नागरिकों का उत्तरदायित्व भी गृहस्थाश्रम पर होता है। इस बृहत्आयामी दायित्व-संभार का परिपालन तभी सम्भव है जब दाम्पत्य जीवन अकुंठित, अद्वेषित, अनाहत और अनुकूल हो। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रख कर परिणय से पूर्व जातक और जातिका के जन्मांगों का तुलनात्मक विष्लेषण किया जाता है

इस प्रक्रिया को ज्योतिष की भाषा में ‘मेलापक’ कहा जाता है।

“1 ”अन्य देषों में स्त्री सम्बन्ध लौकिक स्वार्थ के लिए किया जाता है, परन्तु भारत में सबसे बड़ा संस्कार और धार्मिक कृत्य लौकिक और पारलौकिक दोनों के लिए है, क्योंकि ‘अपुत्रस्य गृहं शून्यम्’ तथा ‘अपुत्रस्य गतिर्नास्ति’ दोनों बातें शास्त्र में मिलती हैं। विवाह से ही त्रिवर्ग अर्थात् धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति कही गई है। यथा - ‘भार्या त्रिवर्ग करणं षुभषीलयुक्ता।’ जब इन तीन पदार्थों की सिद्धि हो जाती है तब उस पुरूष को मोक्ष भी हस्तगत ही जानना चाहिए।

“2 ”भारतवर्ष में कोई भी प्रदेष ऐसा नहीं है जहां मेलापक न देखा जाता हो - विषेषता यही है कि किसी प्रदेष में किसी वस्तु की प्रधानता दूसरे स्थान में दूसरी वस्तु की प्रधानता हो गई है। मेलापक को देष भेद से - मेलापक, गणना, घटित, गुणविचार, जोटक, जोड़ावा तथा आनुकूल्य आदि कहते हैं।“

3 मेलापक का अर्थ: डाॅ. सुरेष चन्द्र मिश्र के अनुसार ”मेल कराने की चीज का नाम मेलापक है। इससे यह बात जानी जाती है कि स्त्री-पुरूष अथवा स्वामी-भृत्य इनमें मैत्री किस प्रकार की होगी - तथा गृह बनाने का सुख कैसा होगा।

“4 डाॅ. शुकदेव चतुर्वेदी ने इसे और स्पष्ट करते हुए कहा है कि, ”दो युगलों की कुण्डली की ग्रह स्थिति और जन्म नक्षत्र के आधार पर उनकी प्रकृति एवं अभिरुचि में साम्यता तथा पूरकत्व का विचार मेलापक कहा जाता है। जो लोग एक दूसरे के पूरक होते हैं अथवा यह कहिए कि जो लोग एक-दूसरे पर आश्रित रहते हैं उनका साथ लम्बे समय तक चलता है। मेलापक में इसी समानता एवं पूरकता का विचार किया जाता है। अतः हम कह सकते हैं कि मेलापक ज्योतिष-शास्त्र की वह रीति है, जिसके द्वारा किसी अपरिचित युगल की प्रकृति एवं अभिरुचि की समानता तथा जीवन के विविध पहलुओं में उनकी परस्पर पूरकता का विचार किया जाता है।

“5 डाॅ. चतुर्वेदी ने मिलान से पूर्व कुछ अन्य तथ्यों पर भी विचार करने पर बल दिया है। उन्होंने याज्ञवल्क्य-स्मृति में जो सुखद दाम्पत्य जीवन के मेलापक से पहले के जो अन्य तथ्य हैं। वे इस प्रकार बताए हैं कि वर और कन्या के ज्योतिषीय मिलान से पूर्व उनके व्यक्तित्व, स्वास्थ्य, षिक्षा, आर्थिक निर्भरता, कुल और परम्परा की समानता है। डाॅ. चतुर्वेदीजी के अनुसार ”दाम्पत्य जीवन सुखमय रहेगा या दुःखमय? और इसे सुखमय कैसे बनाया जा सकता है? - इस प्रष्न का शास्त्रीय रीति से समाधान ज्योतिष शास्त्र के मनीषी आचार्यों ने सुदूर प्राचीन काल में ही कर लिया था। उन्होंने सुखमय दाम्पत्य जीवन के लिए उपयुक्त वर-वधू का चुनाव, उनके गुण-दोषों का विचार, उनकी प्रकृति एवं अभिरूचि में समानता, परस्पर पूरकत्व भाव आदि का विचार करने के लिए शास्त्रीय नियमों का प्रतिपादन किया और फिर इनके परिणाम स्वरूप दाम्पत्य जीवन में घटित होने वाली शुभ या अषुभ घटनाओं का विवेचन किया।

“1 ”विवाह से पूर्व वर एवं वधू की भली भांति तथा सावधानी पूर्वक परीक्षा कर लेनी चाहिए। यह परीक्षा उनमें विद्यमान गुण एवं दोषों के आधार पर होती है। इस प्रकार गुण एवं दोषों का विचार करने के बाद जो वर-वधू योग्य एवं उपयुक्त लगें उनका मेलापक मिलाना चाहिए।

“2 अयोग्य या अनुपयुक्त लड़की-लड़के का विवाह करने से उनका दाम्पत्य जीवन क्लेषमय बन सकता है। उन्होंने वर के विचारणीय गुण एवं दोष का वर्णन इस प्रकार किया,


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”1. अच्छा स्वास्थ्य, 2. समुचित षिक्षा, 3. उत्तम चरित्र, 4. अच्छा भाग्य, 5. दीर्घ आयु एवं 6. सन्तानोत्पादन की क्षमता। तथा दोष इस प्रकार बताए हैं - 1. अल्पायु, 2. रोगी, 3. नपुंसक, 4. व्यभिचारी, 5. दरिद्री, 6. संन्यासी, 7. सन्तानहीन, 8. विधुर एवं बहु विवाह करने वाला होना।“3 उन्होंने कन्या के गुण-दोषों का वर्णन इस प्रकार किया है - कन्या के गुण ”1. अच्छा स्वास्थ्य, 2. शालीन स्वभाव, 3. अच्छा भाग्य, 4. समुचित षिक्षा, 5. पतिव्रता होना और 6. सन्तान सुख का योग। कन्या के प्रमुख दोष - 1. असामयिक मृत्यु का योग, 2. रोगिणी होना, 3. व्यभिचारिणी, 4. दरिद्रा, 5. विधवा योग, 6. वन्ध्या, 7. काक वन्ध्या, 8. मृतवत्सा एवं 9. विषकन्या होना।“4 डाॅ. सुरेष चन्द्र मिश्र ने वर तथा कन्या का चुनाव उनके लक्षणों द्वारा करने का निर्णय करते हुए इस प्रकार कहा - ”शास्त्र की आज्ञा है कि वृद्ध, गुणहीन, मूर्ख, दरिद्री, रोगी, बदनाम, घृणित, अति क्रोधी, अपभाषक, विकलांग, नपुंसक आदि वर से कन्या का विवाह न करें। मु

कुल, स्वास्थ्य व रोजगार इन तीनों बातों को वर के विषय में अच्छी प्रकार से देख लेना चाहिए तथा निर्लज्ज, रोगी, कर्कष, विकलांग, अत्यधिक भूरे रंग वाल (कबरी), भयंकर नाम वाली, जिसे देख कर मन में प्रेम न उपजे व आकर्षण न हो अर्थात् अव्यवस्थित रहने वाली कन्या से विवाह न करें। अत्यन्त चैड ़े माथे वली अत्यन्त छोटे माथे वाली, सारे शरीर पर रोम वाली कन्या को भी त्याज्य कहा है। मेलापक से पूर्व कुछ बातों का ध्यान रखने पर विषेष बल देते हुए श्रीमती गायत्री वासुदेव कहती है कि - ß

When a prospective groom or bride is found unsuitable at the very fi rst instance, there is no point in commending the match on astrological grounds. For example, such unsuitability may arise out of a wide difference in academic qualifi cation, physical appearance, cultural or economic background in which case there would be no point in studying the charts since common sense would warn against such a match. Sooner or later, in most cases, such differences may surface bringing in an everwidening gap between the two, making marital life meaningless.

5 विवाह हेतु सर्वप्रथम वर-वधु के माता-पिता के कुल की परीक्षा आवष्यक है। मनु ने कुलोत्कर्ष हेतु उत्तम कुल से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापन का निर्देष दिया है। यथा - ”उत्तमैरूत्तमैर्नित्यं सम्बन्धाना चरेत्सह। निनिषुः कुलमुत्कर्षमधमानधर्मांस्त्यजेत्।।

“6 मेलापक के भेद: विवाह हेतु उपस्थित जन्मांगों का मेलापक करते हुए सर्वप्रथम वर-वधू की आयु, स्वभाव, प्रकृति, प्रवृŸिा, मानसिक-षारीरिक गठन, चरित्र व महत्त्वाकांक्षा आदि बिन्दुओं पर ध्यान करना आवष्यक है। इस सन्दर्भ में मृदुला त्रिवेदी मेलापक में ”नक्षत्र-मेलापक’, ‘ग्रह-मेलापक’ तथा ‘भाव-मेलापक’ तीन भेद स्वीकार करती है

“7 जबकि डाॅ. शुकदेव चतुर्वेदी ”मेलापक के दो भेद ”नक्षत्र-मेलापक’ तथा ‘ग्रह-मेलापक’ स्वीकार करते हैं।

“1 डाॅ. कुरसीजा, एस.सी. भी ”जन्म कुण्डली मेलापक के दो भेद मानते हैं - ‘ग्रह मिलान’ तथा नक्षत्र मिलान।

“2 डाॅ. राधेष्याम मिश्र ने जन्म कुण्डलियों का मिलान जन्म-नक्षत्र, जन्म-राषि, ग्रह-स्थिति तथा भावों के माध्यम से जानने की आवष्यकता पर बल दिया है।


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“3 डाॅ. नेमी चन्द्र शास्त्री ने सफल दाम्पत्य-जीवन के लिए नक्षत्र, ग्रह, राषियों के अतिरिक्त जन्म कुण्डलियों के शुभ और अषुभ योगों द्वारा वर और कन्य के स्वभाव और गुण का निर्णय करने की बात कही है।

“4 श्री राम यतन ओझा ने चन्द्र राषि व चन्द्र नक्षत्र से मेलापक पर बल दिया है। उनके अनुसार - ”ज्योतिष के फलित शास्त्र में दो ही वस्तुओं की प्रधानता है - लग्न व चन्द्रमा। लग्न को शरीर तथा चन्द्रमा को मन कहते हैं। इसलिए प्रेम सम्बन्ध में तथा विवाह में आपसी प्रेम सम्बन्ध बना रहे इसलिए चन्द्र राषि से तथा चन्द्र नक्षत्र से मेलापक का विचार किया जाता है।

“5 ग्रह मेलापक तथा भाव मेलापक: कूट विचार को सभी ज्योतिष के आचार्यों ने स्वीकार किया है, किन्तु ग्रह-मेलापक व भाव मेलापक मेलापक में मतभेद है। प्रियव्रत शर्मा के अनुसार ”वशिष्ठ, नारद आदि संहिता ग्रन्थों में वर-कन्या के विवाह सम्बन्ध के निर्णय के लिए केवल वर्ण गण, नाड़ी आदि कूटों के विचार की ही बात लिखी है। इन ग्रन्थों के मिलान प्रकरणों में इन कूटों के कुफल एवं इनके परिहार आदि की सुविस्तृत विवेचना मिलती है और इन्हीं कूटों के आधार पर ही वर कन्या के विवाह सम्बन्ध की शक्याषक्यता का वहां निर्णय किया गया है। लेकिन वहां कहीं भी कुण्डली मिलान की चर्चा तक नहीं है। 16वीं शती के मुहूत्र्तचिन्तामणि, मुहूत्र्त मात्र्तण्ड आदि मुहूत्र्त ग्रन्थों में भी मिलान के प्रसंग में अष्टकूटों को ही विचार्य लिखा गया है। जन्म कालिक मंगल आदि की स्थिति आदि से मिलान का कोई सम्बन्ध इन मौहूत्र्तिकों ने कदापि नहीं माना।

17वीं शती के प्रष्नमार्ग का आनुकूल्य (मिलान) प्रकरण सुविस्तृत है। वहां भी वर्ण आदि कूटों को ही विवाह सम्बन्ध के लिए एकमात्र आधार लिखा गया है। ज्योतिर्विदाभरण आदि समस्त प्राचीन मुहूत्र्त-ग्रन्थों में भी कूटों को ही वर कन्या के सम्बन्ध के लिए विचारणीय विषय बतलाया गया है।“6 ”विवाह वृन्दावन’ जिसका एकमात्र विषय वर-कन्या के सफल विवाह सम्बन्ध के ज्योतिष शास्त्रीय आधार का सांगोपांग विवेचन ही है, केवल अष्टकूटों का ही विवेचन करता है। इसके रचयिता केषवार्क ने भी मिलान के प्रसंग में अष्टकूटों के अलावा अन्य किसी विषय को नहीं माना। ‘वृहज्जातक’ (5-6 ठी शती) आदि के सभी प्राचीन जातक ग्रन्थकारों ने दाम्पत्य जीवन को दौर्भाग्य-सौभाग्यषाली बनाने वाली ग्रह स्थिति, युति आदि का सुविस्तृत फलित शास्त्रीय विवरण अवष्य दिया है, लेकिन वर-कन्या की ग्रह स्थिति के मिलान से उसका कोई सम्बन्ध उन्होंने कहीं भी प्रदर्षित नहीं किया।

अत्यन्त परवर्ती (षायद 16वीं शताब्दी के) दैवज्ञ वैद्यनाथ की कृति ‘जातक पारिजात’ में वर-वधू की ग्रह-स्थितियों के मिलान से दाम्पत्य सुखहारी कुयोग के कुफल की निवृत्ति की बात केवल इस ष्लोक में अवष्य मिलती है - ‘द्यून-कुटुम्गतौ यदि पायौ दार वियोगज-दुःख करौ तौ। तदृषयोगज-दारयुतष्चेत् जीवती-पुत्र धनादियुतष्च।।’7 ‘मुहूत्र्त चिन्तामणी’, ‘धर्म सिन्धु’ तथा ‘भावकौतुहल’ आदि के कत्र्ताओं ने वर-कन्या की जन्म कालिक ग्रहस्थिति से उत्पन्न वैधुर्य एवं वैधव्य योग के दोषों की निवृत्ति के लिए प्राजापत्य, चान्द्रायण व्रत तथा कुम्भ-प्रतिमा विवाह को ही बतलाया है।

‘मार्कण्डेय पुराण’ में भी वैधव्य योग की शान्ति के लिए कन्या के कुम्भ-द्रुम-प्रतिमादि के साथ विवाह की प्रक्रिया का निर्देष है। इसके प्रतिकार के रूप में कुण्डली मिलान का इन शास्त्रकारों ने संकेतमात्र भी वर्णन नहीं किया है।


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ज्योतिष विशेषांक  अकतूबर 2014

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