स्वप्न और उनके फल

स्वप्न और उनके फल  

स्वप्न और उनके फल प्रश्न: ज्योतिष के अनुसार स्वप्न किस ग्रह स्थिति में आते हैं? किन योगों में अच्छे स्वप्न आते हैं और किन में बुरे? कौन सी दशा या गोचर में परिवर्तन से अच्छे या बुरे स्वप्न आते हैं? एक ही व्यक्ति को कभी अच्छे तो कभी बुरे स्वप्न क्यों आते हैं? वहीं किसी को बहुत स्वप्न आते हैं तो किसी को कम या फिर स्वप्न याद नहीं रहते- ऐसा क्यों? विस्तार से अपने विचार दें। जायथार्थ में नहीं है, अवास्तविक है उसे सच की भांति साकार रूप में देखने का नाम स्वप्न है अर्थात जो अपना नहीं है, उसे निद्रा में आंखों के सामने देखना सपना है। नहीं को सही में देखना ही तो स्वप्न कहलाता है। आधुनिक विज्ञानियों ने स्वप्न विषयक जिन तथ्यों का पता लगाया, उनमें से अधिकांश ऋषियों के निष्कर्षों से मेल खाते पाए गए हैं। बृहदारण्यक में जाग्रत एवं सुषुप्त अवस्था के समान मानव के मन की तीसरी अवस्था स्वप्न अवस्था मानी गई हैं। जिस प्रकार मनुष्य के संस्कार उसे जाग्रतावस्था में आत्मिक संतोष और प्रसन्नता प्रदान करते हैं, उसी प्रकार जो भी स्वप्न आएंगे वे उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं के प्रतिबिंब ही होंगे। शिकागो विश्वविद्यालय के दो छात्रों नेपोलियन क्लीरमां तथा सूजोन ऐसेटिस्की जब इस संबंध में शोध करने बैठे तो उन दोनों का शोध कार्य तो पूर्ण नहीं हो सका पर स्वप्न से संबंधित कई नये तथ्य सामने आए। उन्होंने पाया, कि जब कोई स्वप्न देखता है, तो उसकी आंखों की पुतलियां ठीक उसी प्रकार घूमती हैं जिस प्रकार जाग्रतावस्था में कोई भी दृश्य आदि देखते समय घूमती हैं। अर्थात आंखंे उस समय बंद रहते हुए भी देखती हैं। जागते हुए जो दिवा स्वप्न हम देखते हैं वे मात्र कल्पनाएं ही होती हैं पर सुषुप्तावस्था में जो कल्पनाएं की जाती हैं उन्हें स्वप्न कहते हैं। निरर्थक, असंगत स्वप्न उथली नींद में ही आते हैं जो उद्विग्न करने वाले होते हैं। वस्तुतः मनुष्य निरंतर जागता नहीं रह सकता। यदि किसी को सोने ही न दिया जाए तो वह मर जाएगा। मनुष्य अपने जीवन का एक तिहाई भाग निद्रा में व्यतीत करता है और निद्रा का अधिकांश भाग स्वप्नों से आच्छादित रहता है। भारतीय शास्त्रादि स्वप्न को दृश्य और अदृश्य के बीच का द्वार अर्थात संधि द्वार मानते हैं। मनुष्य इस संधि स्थल से इस लोक को भी देख सकता है और उस परलोक को भी। इस लोक को संधि स्थान व स्वप्न स्थान कहते हैं। स्वप्नों का संबंध मन व आत्मा से होता है तो इनका संबंध चंद्र और सूर्य की युति से लगाते हैं। गोविंद राज विरचित रामायण भूषण के स्वप्नाध्याय का वचन है कि जो स्त्री या पुरुष स्वप्न में अपने दोनों हाथों से सूर्यमंडल अथवा चंद्र मंडल को छू लेता है, उसे विशाल राज्य की प्राप्ति होती है। अतः स्पष्टतया किसी भी व्यक्ति को शुभ समय की सूचना देने वाले स्वप्नों से यह पूर्वानुमान किया जा सकता है। चंद्र की स्थिति व दशाएं शुभ होने पर एवं सूर्य की स्थिति व दशाएं आदि कारक होने पर शुभ स्वप्न दिखाई पड़ेंगे अन्यथा अशुभ। प्रत्यक्ष रूप में देखा जाए तो स्वप्न का आने या न आने का कारण सूर्य व चंद्र ग्रह ही होते हैं क्योंकि सूर्य का संबंध आत्मा से और चंद्र का संबंध मनुष्य के मन से होता है। दुःखद या दुःस्वप्नों के आने का कारण हमारा मोह और पापी मन ही है। यही बात अथर्ववेद में भी आती है। ‘यस्त्वा स्वप्नेन तमसा मोहयित्वा निपद्यते’ अर्थात मनुष्य को अपने अज्ञान और पापी मन के कारण ही विपत्तिसूचक दुःस्वप्न आते रहते हैं। इनके निराकरण का उपाय बतलाते हुए ऋषि पिप्लाद कहते हैं कि यदि स्वप्नावस्था में हमें बुरे भाव आते हों तो ऐसे दुःस्वप्नों को पाप-ताप, मोह-अज्ञान एवं विपत्ति जन्य जानकर उनके निराकरण के लिए ब्रह्म की उपासना शुरू कर देनी चाहिए ताकि हमारी दुर्भावनाएं, दुर्जनाएं, दुष्प्रवृत्तियां शांत हो जाएं जिससे मन में सद्प्रवृत्तियों, सदाचरणों, सद्गुणों की अभिवृद्धि हो और शुभ स्वप्न दिखाई देने लगे और आत्मा की अनुभूति होने लगे। वाल्मीकि रामायण के प्रसंगों से स्पष्ट है कि पापी ग्रह मंगल, शनि, राहु तथा केतु की दशा अंतर्दशा तथा गोचर से अशुभ स्थानों में होने पर बुरे स्वप्न दिखाई देते हैं जो जीवन में आने वाली दुरवस्था का मनुष्य को बोध कराते हैं। साथ ही शुभ ग्रहों की दशा अंतर्दशा में शुभ ग्रहों के शुभ स्थान पर गोचर में अच्छे स्वप्न दिखाई देते हैं। आकाश में ऊपर उठना उन्नति तथा अभ्युदय का द्योतक है जबकि ऊपर से नीचे गिरना अवनति व कष्ट का परिचायक है। बुरे स्वप्न आना तभी संभव है जब लग्न को, चतुर्थ एवं पंचम भाव को प्रभावित करता हुआ ग्रहण योग (राहु$चंद्र, केतु$सूर्य, राहु$सूर्य, केतु$चंद्र) और चांडाल योग (गुरु व राहु की युति) वाली ग्रह स्थिति निर्मित हो या इसी के समकक्ष दशाओं गोचरीय ग्रहों का दुर्योग बन जाए। इसके विपरीत लग्न, चतुर्थ/पंचम भाव को प्रभावित करते हुए शुभ ग्रहों के संयोग के समय अच्छे स्वप्न आने की कल्पना की जा सकती है। जब हमें कोई अच्छे सुखद स्वप्न दिखाई देते हैं, तो हमारा मन पुलकित हो जाता है, हमें सुख की अनुभूति होने लगती और हम प्रसन्न हो जाते हैं। परंतु जब हमें बुरे स्वप्न दिखते हैं तो मन घबरा जाता है, हमें एक अदृश्य भय सताने लगता है और हम दुखी हो जाते हैं। विद्वानों के अनुभवों से हमें यह बात ज्ञात होती है कि इस तरह के बुरे, डरावने स्वप्न दिखाई देने पर यदि नींद खुल जाए तो हमें पुनः सो जाना चाहिए। स्वप्नों के स्वरूप फलित ज्योतिष में स्वप्नों को विश्लेषण् ाों के आधार पर सात भागों में बांटा जाता है- दृष्ट स्वप्न, शृत स्वप्न, अनुभूत स्वप्न, प्रार्थित स्वप्न, सुम्मोहन या हिप्नेगोगिया स्वप्न, भाविक स्वप्न और काल्पनिक स्वप्न। दृष्ट स्वप्न दिन प्रतिदिन के क्रिया कलापों को सोते समय स्वप्न रूप में देखे जाने वाले सपनों को दृष्ट स्वप्न कहा जाता है। ये सपने कार्य क्षेत्र में अत्यधिक दबाव और किसी वस्तु या कार्य में अत्यधिक लिप्तता के कारण या मन के चिंताग्रस्त होने पर दिखाई देते हैं। इसलिए इनका कोई फल नहीं होता। कभी सोने से पूर्व किसी प्रकरण पर विचार विमर्श किया गया हो और किसी बात ने मन को प्रभावित या उद्व ेलित किया हो, तो भी मनुष्य सपनों के संसार में विचरण करता है। शृत स्वप्न भयावह फिल्म देखकर या उपन्यास पढ़कर सपनों में भयभीत होने वालों की संख्या कम नहीं है। इन सपनों को शृत स्वप्न कहा जाता है। ये सपने भी वाह्य कारणों से दिखाई देने के कारण निष्फल होते हैं। अनुभूत स्वप्न जाग्रत अवस्था में कोई बात कभी मन को छू जाए या किसी विशेष घटना का मन पर प्रभाव पड़ा हो और उस घटना की स्वप्न रूप में पुनरावृत्ति हो जाए, तो ऐसा स्वप्न अनुभूत सपनों की श्रेणी में आता है। इनका भी कोई फल नहीं होता। प्रार्थित स्वप्न जाग्रत अवस्था में देवी देवता से की गई प्रार्थना, उनके सम्मुख की गई पूजा-अर्चना या इच्छा सपने में दिखाई दे, तो ऐसा स्वप्न प्रार्थित स्वप्न कहा जाता है। इन सपनों का भी कोई फल नहीं होता। काल्पनिक स्वप्न जाग्रत अवस्था में की गई कल्पना सपने में साकार हो सकती है किंतु यथार्थ जीवन में नहीं और इस प्रकार के सपनों की गणना भी फलहीन सपनों में की जाती है। सम्मोहन या हिप्नेगोगिया स्वप्न मनुष्य रोगों से पीड़ित होने पर, वात, पित्त या कफ बिगड़ने पर जो स्वप्न देखता है, वे भी निष्फल ही होते हैं। नींद की वह अवस्था, जिसे मेडिकल साइंस की भाषा में हिप्नेगोगिया और भारतीय भाषा में सम्मोहन कहा जाता है। इसमें व्यक्ति न तो पूरी तरह से सोया रहता है और न पूरी तरह से जागा। इसमें देखे गए सपने भी निष्फल होते हैं। इस तरह ऊपर वर्णित सभी छः प्रकार के सपने निष्फल होते हैं। ये सभी असंयमित जीवन जीने वालों के सपने हैं। विश्व में 99.9 प्रतिशत लोग असंयमित जीवन ही अधिक जीते हैं। यही कारण है कि ये लोग स्वप्न की भाषा नहीं समझकर स्वप्न विज्ञान की, स्वप्न ज्योतिष की खिल्लियां उड़ाते रहते हैं। स्वप्न के बारे में इनकी धारणाएं नकारात्मक सोच वाली ही होती हैं। भाविक स्वप्न जो स्वप्न कभी देखे न गए हों, कभी सुने न गए हों, अजीबोगरीब हों, जो भविष्य की घटनाओं का पूर्वाभास कराएं, वे भाविक स्वप्न ही फलदायी होते हैं। पाप रहित मंत्र साधना द्व ारा देखे गए स्वप्न भी घटनाओं का पूर्वाभास कराते हैं। मानव का प्रयोजन इसी प्रकार के स्वप्नों से है। जन्मकालीन या गोचरीय कालसर्प योग वाली ग्रह स्थिति अर्थात राहु-केतु के मुख में सभी ग्रहों के समा जाने वाली स्थिति के निर्मित हो जाने पर भगवान शंकर के कंठहार पंचमी तिथि के देवता स्वप्न में आकर मनुष्यों के दिल को दहला देते हैं। ऐसा सपना देखकर मनुष्य का मन मस्तिष्क विचलित हो उठता है। अरिष्टप्रद सूर्य, चंद्र, राहु और केतु के मंत्र जप व स्तोत्र पाठ से तथा, दान, शांति कर्म के उपायों को अपनाकर व्यक्ति दुखद स्वप्नों के अनिष्टों से बचने में समर्थ हो सकता है। नौ ग्रहों की दशा अंतर्दशा में देखे जाने वाले स्वप्न स्वप्न के आधार पर फल कथन करने में ज्योतिषियों को आसानी होती है। अगर जातक की राहु, केतु या शनि की महादशा या अंतर्दशा चल रही हो और जन्मकुंडली में वे नीच स्थिति में हों, तो उसे हमेशा डरावने स्वप्न आते हैं जैसे बार-बार सर्प दिखाई देना राहु केतु से बनने वाले कालसर्प योग के द्योतक होते हैं। यदि राहु, केतु व शनि की महादशा या अंतर्दशा हो और वे जन्मकुंडली में स्वराशि या उच्च की राशि में बैठे हों, तो जातक को शुभ स्वप्न आते हैं जैसे जर्मनी के फ्रेडरिक कैक्यूल को राहु से संबंधित सांप का वर्तुल आकार में घूमकर स्वर्ण की अंगूठी जैसे आकार का बनकर अपने-आपको काटते हुए दिखाई देना। इसी भांति सिलाई मशीन के आविष्कारक इलिहास होव को शनि की महादशा अंतर्दशा व कुंडली में उनकी उच्च स्थिति होने के कारण उसके सिर में राक्षस के दूतों द्वारा भाला भोंकने की स्वप्न की घटना जिसके फलस्वरूप उसने सिलाई मशीन का आविष्कार किया। उसी प्रकार यदि सूर्य या मंगल की महादशा या अंतर्दशा चल रही हो और वे नीचस्थ हों, तो आग एवं चोट लगने के स्वप्न दिखाई देते हैं। यदि उपर्युक्त महादशा व अंतर्दशा चल रही हो और जातक की जन्मकुंडली में सूर्य और मंगल उच्च या स्वराशि में हो, तो अशुभ स्वप्न नहीं बल्कि शुभ स्वप्न दिखाई देंगे जैसे राजकार्य में जय, मांगलिक कार्य संपन्न होना आदि। यदि चंद्र और गुरु की महादशा अंतर्दशा हो और वे नीचस्थ हों तो कफ, पेट आदि से संबंधित रोग होते हैं। इसके विपरीत यदि चंद और गुरु उच्चस्थ हों, तो महादशा अंतर्दशा में राजगद्दी प्राप्त होने के स्वप्न दिखाई देंगे। वहीं यदि शुक्र की उच्च स्थिति हो, तो सुख, ऐशो आराम, धन लक्ष्मी आदि से संबंधित और नीचस्थ हो, तो अनेक बीमारियों के स्वप्न दिखाई देते हैं। नीचस्थ सूर्य की दशा/परिस्थिति या गोचरीय दशा आने पर रेतीले मरुस्थलों की सैर, मरुस्थलों का जहाज ऊंट, गर्म हवाओं के थपेड़े खाता हुआ बेतहासा मजनूं की तरह भागता मनुष्य, सूर्य का सारथी, उष्ण कटिबंधों के दृश्य, सूखा, फटती हुई जमीन, घर-मकान की दीवारों की दरारें, भूख प्यास से व्याकुल पागलों की तरह भटकते लोग, खौलता हुआ झरना, तपेदिक के मरीज, मृगतृष्णा का जल, मौत का सन्नाटा, तपे हुए लोहे के सिक्के लुटाती हुई अलक्ष्मी, सिर पर सेहरे की जगह कफन, ओले की जगह टपकते अंगारे, चांदनी बिखराता सूर्य, तपता हुआ चंद्रमा, हंसता हुआ सियार, चूहे की भांति दुबका हुआ शेर, आकाश में पक्षियों की तरह उड़ता हुआ प्राणी, रोता हुआ मुर्दा आदि दिखाई देने की संभावना रहती है। इसी तरह के स्वप्न गोचर में वृष राशि में प्रवेश करते हुए सूर्य की दशा में अथवा उसकी दशांतर्दशा में आ सकते हंै। काला बाबा की राशि मकर या कंुभ में सूर्य के प्रवेश की दशा में पर्वतारोहण करते मगरमच्छ, दिन में देखते उल्लू, चलने हुए गरुड़, दीपावली की रात्रि में चमकता हुआ शरद पूर्णिमा के चंद्रमा, निशीथ काल में खिलती हुई कुमुदिनी, चंद्रोदय होते ही खिलते हुए कमल से निकलते हुए भौंरे, पर्वत से पानी निकालती हुई पनिहारिन, दिन में उदित होते चंद्रमा, रात्रि में धूप, बीहड़ घने काले अंधियारे जंगल में नाचते सफेद मोर, काले हंस, गुलाबी रंग की भैंस आदि के समान स्वप्न आ सकते है जिनका फल सदैव अशुभ ही होता है। चंद्र के दशा परिवर्तन से स्वप्नावस्था में शरीर में नाड़ी की गति मध्यम पड़ जाती है, खून का प्रवाह शिथिल हो जाता है, इंद्रियों की गति मंद हो जाती है और कफ का प्रकोप बढ़ जाता है। मंगल की दशा अथवा गोचर में परिवर्तन होने से मनुष्य को चोट-चपेट, दुर्घटना, अग्नि-कांड, शव-दाह, खून-खराबे, मृत्यु-दंड, यान-दुर्घटना, युद्ध के तांडव, उल्कापात, गर्भपात, पक्की इमारतों का भरभराकर गिर जाना, ज्वालामुखी पर्वत और उनके खौलते हुए एवं छलछलाने लावे के दृश्य स्वप्न में दिखलाई देते हैं। मित्र लड़ने को उद्यत दिखाई देता है। बुध की अंतर्दशा में सुंदर उपवन, हरे-भरे खेत, खंजन पक्षी, तोता विद्या प्राप्त करते बटुक, वृक्षों की ठंडी शीतल छांव में विश्राम करते बटोही, परीक्षा के डर से भयभीत होते बच्चे, छड़ी दिखाता शिक्षार्थी, परीक्षा में पास हो जाने पर हंसते मुस्कराते विद्यार्थी, सुंदरियों को वस्त्र लुटाता बजाज, बंध्या और पुत्र, मुनीमी करता सेठ, गीत सुनता बधिर, वक्ता बना गूंगा, बगुला भगत, सज्जन बना बातुल, बादशाही करता फकीर, शिष्ट तथा सुसंस्कृत बना गंवार, सुंदर हरे भरे ताजे फलों की डलिया, आदि नाना प्रकार के स्वप्न आते हैं। बुध की दशा में पोथी प्रदान करती हुई सरस्वती जी यदि स्वप्न में दर्शन दें, तो जातक वाणी की अधिष्ठात्री देवी वागीश्वरी की अनुपम कृपा का पात्र जातक बन जाता है। गुरु की दशाओं में भी जलीय दृश्य कफ प्रकृति जातकों को स्वप्न में दिखलाई दे सकते हैं। गुरु की एक राशि मीन है जो जल तत्व वाली राशि है। उदर शूल, उदर व्रण, पाचन संस्थान संबंधी रोग, कफ जनित व्याधियों, वेदाध्ययन, वेद-पाठ, वेद-पुराण- उपनिषदों आदि के दर्शन, धर्म प्रवचन, संत-समागम, तीर्थ -यात्रा, गंगा-स्नान आदि से संबंधित विविध शुभाशुभ स्वप्न गुरु की अंतर्दशा में दिखाई दे सकते हैं। राज्याभिषेक संबंधी आनंदातिरेक देने वाल े स्वप्न भी गरुु की दशा म ंे दिखाई दे सकते हैं। राहु, केतु या शनि की महादशा, अंतर्दशा या गोचर में इनकी अरिष्टकारक दशा चल रही हो, तो जातकों को बेहद भयानक स्वप्न दिखाई दे सकते हैं। राहु के अत्यधिक अशुभ होने पर स्वप्न ही नहीं, यथार्थ में भी बिजली का करंट लग जाया करता है। डरावने स्वप्नों का वेग गहरी निद्रा में डूबे हुए व्यक्ति को एकदम चैंका देता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि डरावने स्वप्न देखता हुआ व्यक्ति उससे त्राण पा लेने को उठकर भाग जाना चाहता है परंतु स्वप्न के भारी दबाव के कारण वह बिस्तर से उठ भी नहीं पाता। आयुर्वेद के मुताबिक वात, पित्त, कफ ये शरीर के तीन दोष हैं। वात प्रधान लोगों को स्वप्न में पर लग जाते हैं। वे नील गगन में स्वप्न में उड़ने का आनंद प्राप्त करते हैं। पित्त प्रकृति के लोग स्वप्न में सारे जगत को जगमग ज्योति के रूप में निहारने लगते हैं। वे चांद, सितारे, उल्का और सूरज की रज को प्राप्त कर लेना चाहते हैं। उन्हें चांद-सूरज, तारा गण सप्तर्षि आदि अपना बना लेना चाहते हैं। वे गगन को देखकर मगन हो जाते हैं। कफ प्रकृति वाले कूप, तड़ाग, बावलियांे, नहरों, नदियों नालों झरनों, फव्वारों जलस्रोतों को स्वप्न में देखकर स्वयं जल का देवता वरुण बन जाना चाहते हैं। वे चांदनी रात में नौका-विहार करने लग जाते हैं। कोई स्वप्न में स्वयं को जलतरंग बजाता हुआ देखता है, कोई जलधर ही बन जाता है, कोई जल प्रपात देखता है तो कोई जल प्रलय। उन्हें जल से जन्म लेने वाला जलज स्वप्न में दिखाई देने लगता है। जल में कभी वे जलपरी का जलवा देखते हैं, कभी जलजहाज को जल डमरूमध्य में, तो कभी अपने को गोता लगाता हुआ देखते हैं। इस प्रकार उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि शुभाशुभ स्वप्न विभिन्न ग्रह स्थितियों में तब आते हैं जब ग्रहों की महादशाओं की अंतर्दशाओं में नीच, उच्च, स्वगृही, मित्र गृही, शत्रुगृही होते हैं। कोई भी ग्रह नीच, व शत्रुग्रही हो, तो जातक का बुरे व अशुभ स्वप्न आते हैं और यदि वह उच्च, स्वगृही व मित्र राशि में हो, तो अच्छे व शुभ, उसके मनोनुकूल, स्वप्न आते हैं। परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाने पर उस परिवार के सदस्यों को दुःस्वप्न दिखाई देते हैं। याद भी रहते हैं जिससे वे विचलित दिखाई देते है।ं धन लाभ कराने वाले स्वप्न कुछ स्वप्न व्यक्ति को धन लाभ कराने वाले होते हैं। हाथी, घोड़े, बैल, सिंह की सवारी, शत्रुओं के विनाश, वृक्ष तथा किसी दूसरे के घर पर चढे़ होने दही, छत्र, फूल, चंवर, अन्न, वस्त्र, दीपक, तांबूल, सूर्य, चंद्रमा, देवपूजा, वीणा, अस्त आदि के सपने धन लाभ कराने वाले होते हैं। कमल और कनेर के फूल देखना, कनेर के नीचे स्वयं को पुस्तक पढ़ते हुए देखना, नाखून एवं रोमरहित शरीर देखना, चिड़ियों के पैर पकड़कर उड़ते हुए देखना, आदि धन लक्ष्मी की प्राप्ति व जमीन में गड़े हुए धन मिलने के सूचक हैं। मृत्यु सूचक स्वप्न कुछ स्वप्न स्वयं के लिए अनिष्ट फलदायक होते हैं। स्वप्न में झूला झूलना, गीत गाना, खेलना, हंसना, नदी में पानी के अंदर चले जाना, सूर्य, चंद्र आदि ग्रहों व नक्षत्रों को गिरते हुए देखना, विवाह, गृह प्रवेश आदि उत्सव देखना, भूमि लाभ, दाढ़ी, मूंछ, बाल बनवाना, घी, लाख देखना, मुर्गा, बिलाव, गीदड़, नेवला, बिच्छू, मक्खी, शरीर पर तेल मलकर नंगे बदन भैंसे, गधे, ऊंट, काले बैल या काले घोड़े पर सवार होकर दक्षिण दिशा की यात्रादि करना आदि मृत्यु सूचक हैं। कुछ अनुभूत स्वप्न एक महिला का पुत्र बहुत बुरी स्थिति में दिल्ली के एक अस्पताल में दाखिल था। महिला स्वयं बीमारी के कारण बिस्तर से लगी थीं। उसे एक रात स्वप्न में दिखाई दिया कि उसके गले की मोती की माला टूट गई है। मोती बिखर गए हैं। नींद खुली तो उसने देखा कि माला टूटी हुई थी। बहुत ढूंढने पर भी मोती पूरे नहीं मिले। ठीक उसी समय अस्पताल में उसके युवा पुत्र ने अपने प्राण त्याग दिए थे। जालंधर के एक व्यक्ति की पत्नी की छाती के कैंसर का आॅपरेशन हो रहा था। उसे स्वप्न में दिखाई दिया कि कुछ लोग उन्हें मारने को दौडे़ चले आ रहे हैं। वह भाग रहा और लोग पीछा कर रहे हैं। अचानक वह अस्पताल के निकट फ्लाई-ओवर पर चढ़ जाता है। स्वयं फिर वह अपने घर (जालंधर) के पास पहुंचा हुआ पाता है। वे लोग अब भी उसका पीछा कर रहे हैं। आस-पास के लोग उन्हें बचाने की कोशिश करते हैं और वह खुद भाग कर घर में छुपने की कोशिश करता है और नींद टूट जाती है। फिर उसने एक अच्छे दैवज्ञ से सलाह ली। स्वप्न का फल यही समझा गया कि उसकी पत्नी स्वस्थ हो जाएगी। यह बात अप्रैल 1980 की है। उसकी पत्नी आज भी जीवित और स्वस्थ है। लेकिन उस व्यक्ति का अचानक हृदय गति रुक जाने से जनवरी 1989 में देहांत हो गया। इस तरह स्पष्ट है कि मनुष्य के जीवन में आने वाली दुर्घटनाओं, उन्नति और शुभ समय के आगमन से संबंधित स्वप्न कई बार सच्चे साबित हो जाते हैं। स्वप्न फल विचार जब भी किसी व्यक्ति के जीवन में कोई असाधारण परिस्थिति होती है, स्वप्न आते हैं। कुछ विशिष्ट स्वप्न याद भी रहत े ह।ंै बा्र ह्म मुहूर्त के स्वप्न अक्सर सच भी होते हैं। रात के प्रथम, द्वि तीय अथवा तृतीय प्रहर में दिखने वाले स्वप्न लंबे समय के बाद सच होते हुए पाए जाते हैं। स्वप्नों के विषय में कुछ प्रतीकों को हमारी लोक संस्कृति में मान्यता प्राप्त है, जो इस प्रकार हैं।  किसी की मृत्यु देखना -उसकी लंबी आयु होना।  सीढ़ी चढ़ना - उन्नति  आकाश में उड़ना - उन्नति  सर्प अथवा जल देखना - धन की प्राप्ति  बीमार व्यक्ति द्वारा काला सर्प देखना - मृत्यु  सिर मुंडा देखना - मृत्यु  स्वप्न में भोजन करना - बीमारी  दायां बाजू कटा देखना - बड़े भाई की मृत्यु  बायां बाजू कटा देखना - छोटे भाई की मृत्यु  पहाड़ से नीचे गिरना - अवनति स्वयं को पर्वतों पर चढ़ता देखना- सफलता, विद्यार्थी का स्वयं को फेल होते देखना - सफलता, कमल के पत्तों पर खीर खाते हुए देखना - राजा के समान सुख, अतिथि आता दिखाई देना - अचानक विपत्ति, अंधेरा ही अंधेरा दिखाई देना - कष्ट या मानहानि, स्वयं को मृत देखना - आयु वृद्धि, आत्म हत्या करना - दीर्धायु, उल्लू दिखाई देना रोग व शोक, आग जलाकर उसे पकड़ता हुआ देखना - अनावश्यक व्यय, आॅपरेशन होता दिखाई देना - किसी बीमारी का सूचक, इमारत बनती दिखाई देना - धन लाभ व तरक्की, खुद को कैंची चलाता देखना। व्यर्थ के वाद विवाद व लड़ाई झगड़ा, कौआ बोलता दिखाई देना - किसी बीमारी या बुरे समाचार का सूचक, इमारत बनती दिखाई देना - धन लाभ व तरक्की, कबूतर दिखाई देना - शुभ समाचार का सूचक, काला नाग दिखाई देना - राजकीय सम्मान, कोढ़ी दिखाई देना- रोग सूचक, कोयला देखना- झगड़ा, श्मशान या कब्रिस्तान देखना - प्रतिष्ठा में वृद्धि, गोबर देखना- पशुधन लाभ, ग्रहण देखना - रोग व चिंता, गोली चलता देखना- मनोकामना पूर्ति, गरीबी देखना -सुख समृद्धि, गर्भपात देखना - गंभीर रोग, शुक्र तारा देखना - शीध्र विवाह, स्वयं रोटी बनाना - रोग, स्वयं को नंगा देखना - मान प्रतिष्ठा की हानि, कष्ट, देव दर्शन या देव स्थान दर्शन- लाभदायी, राजदरबार देखना - मृत्यु सूचक, दवाइयां देखना - उत्तम स्वास्थ्य, किसी दम्पति का तलाक - गृह कलह, ताज महल देखना पति - पत्नी के संबंध विच्छेद, नाई से हजामत बनवाना - अशुभ, पति पत्नी का मिलन - दाम्पत्य सुख, सूखी लकड़ियां देखना - मृत्यु सूचक, किसी कैदी या अपराधी को देखना - अशुभ प्यार, भंडारा कराते देखना - धन लाभ, सगाई देखना - अशुभ, सख्ू ाा वक्ष्ृ ा/ठठंू दिर्खाइ दने ा - अशभ्ु ा प्यार, तोता या तितली दिखाई देना - लाभप्रद। इसी प्रकार स्वप्न में दांत टूटना - दुख, झंझट, दरवाजा देखना - बड़े व्यक्ति से मित्रता, दरवाजा बंद देखना - परेशानियां, दलदल देखना - व्यर्थ की चिंता में वृद्धि, सुपारी देखना - रोग मुक्ति, धुआं देखना - हानि एवं विवाद, रस्सी देखना - यात्रा, रूई देखना - स्वस्थ होना, खेती देखना - लापरवाह या संतान प्राप्ति, भूकंप देखना - संतान कष्ट, दुख, सीढ़ी देखना - सुख संपत्ति में वृद्धि, सुराही देखना - बुरी संगत, चश्मा लगाना - विद्वत्ता में वृद्धि, खाई देखना - धन एवं प्रसिद्धि की प्राप्ति, कैंची देखना - गृह कलह, कुत्ता देखना - उत्तम मित्र की प्राप्ति कलम देखना - महान पुरुष के दर्शन, टोपी देखना - दुख से मुक्ति, उन्नति, धनुष खींचना - लाभप्रद यात्रा, कीचड़ में फंसना - कष्ट, व्यय, गाय या बैल देखना- मोटे से लाभ, दुबले से प्रसिद्धि, घास का मैदान देखना - धन की वृद्धि, घोड़ा देखना - संकट से बचाव, घोड़े पर सवार होना - पदोन्नति, लोहा देखना - किसी धनी से लाभ, लोमड़ी देखना - किसी संबंधी से धोखा, मोती देखना - कन्या की प्राप्ति, मुर्दे का पुकारना - विपत्ति एवं दुख, मुर्दे से बात करना - मुराद पूरी होने का संकेत, बाजार देखना - दरिद्रता से मुक्ति, बड़ी दीवार देखना - सम्मान की प्राप्ति, दीवार में कील ठोकना - किसी वृद्ध से लाभ, दातुन करना - पाप का प्रायश्चित व सुख की प्राप्ति, खूंटा देखना - धर्म में रुचि, धरती पर बिस्तर लगाना - दीर्घायु की प्राप्ति, सुख में वृद्धि, उंचे स्थान पर चढ़ना - पदोन्नति व प्रसिद्धि, बिल्ली देखना -चोर या शत्रु भय, बिल्ली या बंदर का काटना - रोग व अर्थ संकट, नदी का जल पीना - राज्य लाभ व परिश्रम, सफेद पुष्प देखना - दुख से मुक्ति, लाल फूल देखना - पुत्र सुख, भाग्योदय, पत्थर देखना - विपत्ति, मित्र का शत्रुवत व्यवहार, तलवार देखना - युद्ध में विजय, तालाब या पोखरे में स्नान करना - संन्यास की प्राप्ति, सिंहासन देखना - अतीव सुख की प्राप्ति, जंगल देखना - दुख से मुक्ति व विजय की प्राप्ति, अर्थी देखना - रोग से मुक्ति व आयु में वृद्धि, जहाज देखना - परेशानी दूर होना या व्यय होना, चांदी देखना - धन व अहंकार में वृद्धि, झरना देखना
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svapn aur unke falaprashna: jyotish ke anusar svapn kis grah sthiti men ate hain? kin yogon men achche svapn ate hain aur kinmen bure? kaun si dasha ya gochar men parivartan se achche ya bure svapn ate hain? ek hi vyakti ko kabhi achche tokbhi bure svapn kyon ate hain? vahin kisi ko bahut svapn ate hain to kisi ko kam ya fir svapn yad nahinrhte- aisa kyon? vistar se apne vichar den.jaytharth men nahin hai,avastavik hai use sach kibhanti sakar rup men dekhne ka namasvapn hai arthat jo apna nahin hai,use nidra men ankhon ke samne dekhnaspna hai. nahin ko sahi men dekhnahi to svapn kahlata hai.adhunik vigyaniyon ne svapn vishykjin tathyon ka pata lagaya, unmense adhikansh rishiyon ke nishkarshon semel khate pae gae hain. brihdaranyakmen jagrat evan sushupt avastha kesman manav ke man ki tisriavastha svapn avastha mani gai hain.jis prakar manushya ke sanskar usejagratavastha men atmik santosh auraprasannata pradan karte hain, usi prakarjo bhi svapn aenge ve ujjvalbhvishya ki sanbhavnaon ke pratibinbhi honge.shikago vishvavidyalay ke do chatronnepoliyan klirman tatha sujon aisetiskijab is sanbandh men shodh karnebaithe to un donon ka shodh karya topurn nahin ho saka par svapn se sanbandhitkai naye tathya samne ae. unhonnepaya, ki jab koi svapn dekhta hai,to uski ankhon ki putliyan thikausi prakar ghumti hain jis prakarjagratavastha men koi bhi drishya adidekhte samay ghumti hain. arthat ankhaneus samay band rahte hue bhi dekhti hain.jagte hue jo diva svapn hamdekhte hain ve matra kalpanaen hi hotihain par sushuptavastha men jo kalpanaenki jati hain unhen svapn kahte hain.nirarthak, asangat svapn uthli nindmen hi ate hain jo udvign karne valehote hain. vastutah manushya nirantar jagtanhin rah sakta. yadi kisi ko sonehi n diya jae to vah mar jaega.mnushya apne jivan ka ek tihaibhag nidra men vyatit karta hai aurnidra ka adhikansh bhag svapnon seachchadit rahta hai.bhartiya shastradi svapn ko drishyaaur adrishya ke bich ka dvar arthatsandhi dvar mante hain. manushya issandhi sthal se is lok ko bhi dekhskta hai aur us parlok ko bhi.is lok ko sandhi sthan v svapnasthan kahte hain.svapnon ka sanbandh man v atma sehota hai to inka sanbandh chandra aursurya ki yuti se lagate hain. govindraj virchit ramayan bhushan kesvapnadhyay ka vachan hai ki jo striya purush svapn men apne donon hathonse suryamandal athva chandra mandal kochu leta hai, use vishal rajya kiprapti hoti hai. atah spashtataya kisibhi vyakti ko shubh samay ki suchnadene vale svapnon se yah purvanumankiya ja sakta hai. chandra ki sthitiv dashaen shubh hone par evan surya kisthiti v dashaen adi karak honepar shubh svapn dikhai parenge anyathaashubh. pratyaksh rup men dekha jae tosvapn ka ane ya n ane ka karnsurya v chandra grah hi hote hain kyonkisurya ka sanbandh atma se aur chandraka sanbandh manushya ke man se hota hai.duahkhad ya duahsvapnon ke ane kakaran hamara moh aur papi man hihai. yahi bat atharvaved men bhi ati hai.‘yastva svapnen tamsa mohyitvanipadyate’arthat manushya ko apne agyan aurpapi man ke karan hi vipattisuchkduahsvapn ate rahte hain. inkenirakaran ka upay batlate huerishi piplad kahte hain ki yadi svapnavasthamen hamen bure bhav ate hon to aiseduahsvapnon ko pap-tap, moh-agyanaevan vipatti janya janakar unkenirakaran ke lie brahm ki upasnashuru kar deni chahie taki hamaridurbhavnaen, durjanaen, dushpravrittiyan shantho jaen jisse man men sadpravrittiyon,sadachrnon, sadgunon ki abhivriddhiho aur shubh svapn dikhai dene lageaur atma ki anubhuti hone lage.valmiki ramayan ke prasangon se spashtahai ki papi grah mangal, shani, rahu tathaketu ki dasha antardasha tatha gochar seashubh sthanon men hone par bure svapnadikhai dete hain jo jivan men anevali duravastha ka manushya ko bodhkrate hain. sath hi shubh grahon ki dashaantardasha men shubh grahon ke shubh sthanapar gochar men achche svapn dikhai detehain. akash men upar uthna unnatittha abhyuday ka dyotak hai jabkiupar se niche girna avnti v kashtaka parichayak hai.bure svapn ana tabhi sanbhav hai jabalagn ko, chaturth evan pancham bhav koprabhavit karta hua grahan yog(rahu$chandra, ketu$surya, rahu$surya,ketu$chandra) aur chandal yog (guruv rahu ki yuti) vali grah sthitinirmit ho ya isi ke samakaksh dashaongochriya grahon ka duryog ban jae.iske viprit lagn, chaturtha/panchmbhav ko prabhavit karte hue shubh grahonke sanyog ke samay achche svapn aneki kalpana ki ja sakti hai.jab hamen koi achche sukhad svapnadikhai dete hain, to hamara man pulkitho jata hai, hamen sukh ki anubhutihone lagti aur ham prasann ho jatehain. parantu jab hamen bure svapn dikhtehain to man ghabra jata hai, hamen ekadrishya bhay satane lagta hai aur hamdukhi ho jate hain. vidvanon ke anubhvonse hamen yah bat gyat hoti hai ki isatarah ke bure, daravne svapn dikhaidene par yadi nind khul jae to hamenpunah so jana chahie.svapnon ke svarupflit jyotish men svapnon ko vishleshanaon ke adhar par sat bhagon men bantajata hai- drisht svapn, shrit svapn,anubhut svapn, prarthit svapn, summohnya hipnegogiya svapn, bhavik svapnaaur kalpanik svapn.drisht svapnadin pratidin ke kriya kalapon kosote samay svapn rup men dekhe janevale sapnon ko drisht svapn kaha jatahai. ye sapne karya kshetra men atyadhikdbav aur kisi vastu ya karya menatyadhik liptata ke karan ya manke chintagrast hone par dikhai dete hain.islie inka koi fal nahin hota.kbhi sone se purva kisi prakaran parvichar vimarsh kiya gaya ho aurkisi bat ne man ko prabhavit ya udvelit kiya ho, to bhi manushya sapnonke sansar men vicharan karta hai.shrit svapnabhayavah film dekhakar ya upanyasaparhakar sapnon men bhaybhit hone valonki sankhya kam nahin hai. in sapnonko shrit svapn kaha jata hai. ye sapnebhi vahya karnon se dikhai dene kekaran nishfal hote hain.anubhut svapnajagrat avastha men koi bat kabhi manko chu jae ya kisi vishesh ghatnaka man par prabhav para ho aur usghtna ki svapn rup men punravritti hojae, to aisa svapn anubhut sapnonki shreni men ata hai. inka bhi koifal nahin hota.prarthit svapnajagrat avastha men devi devta seki gai prarthana, unke sammukh kigai puja-archana ya ichcha sapne mendikhai de, to aisa svapn prarthitasvapn kaha jata hai. in sapnon kabhi koi fal nahin hota.kalpanik svapnajagrat avastha men ki gai kalpanaspne men sakar ho sakti hai kintuyatharth jivan men nahinaur is prakar kespnon ki ganna bhiflhin sapnon men kijati hai.sammohan yahipnegogiya svapnamanushya rogon se pirithone par, vat, pitt yakaf bigrne par josvapn dekhta hai, ve bhinishfal hi hote hain.nind ki vah avastha,jise medikal sainski bhasha men hipnegogiyaaur bhartiya bhasha mensammohan kaha jatahai. ismen vyakti n topuri tarah se soya rahtahai aur n puri tarhse jaga. ismen dekhe gae sapne bhinishfal hote hain.is tarah upar varnit sabhi chahprakar ke sapne nishfal hote hain. yesbhi asanymit jivan jine valon kespne hain. vishva men 99.9 pratishat logasanymit jivan hi adhik jite hain.yhi karan hai ki ye log svapn kibhasha nahin samajhakar svapn vigyan ki,svapn jyotish ki khilliyan uraterhte hain. svapn ke bare men inkidharnaen nakaratmak soch vali hihoti hain.bhavik svapnajo svapn kabhi dekhe n gae hon, kabhisune n gae hon, ajibogrib hon, jobhvishya ki ghatnaon ka purvabhaskraen, ve bhavik svapn hi faldayihote hain. pap rahit mantra sadhna dvara dekhe gae svapn bhi ghatnaon kapurvabhas karate hain. manav ka prayojnaisi prakar ke svapnon se hai.janmakalin ya gochriya kalasarpayog vali grah sthiti arthatrahu-ketu ke mukh men sabhi grahon kesma jane vali sthiti ke nirmit hojane par bhagvan shankar ke kanthharpanchmi tithi ke devta svapn men akrmnushyon ke dil ko dahla dete hain.aisa sapna dekhakar manushya ka manamastishk vichlit ho uthta hai.arishtaprad surya, chandra, rahu aur ketu kemantra jap v stotra path se tatha, dan,shanti karm ke upayon ko apnakaravyakti dukhad svapnon ke anishton sebchne men samarth ho sakta hai.nau grahon ki dasha antardasha men dekhejane vale svapnasvapn ke adhar par fal kathan karnemen jyotishiyon ko asani hoti hai.agar jatak ki rahu, ketu ya shaniki mahadsha ya antardasha chal rahiho aur janmakundli men ve nich sthitimen hon, to use hamesha daravne svapnaate hain jaise bar-bar sarp dikhaidena rahu ketu se banne vale kalasarpayog ke dyotak hote hain. yadi rahu,ketu v shani ki mahadsha ya antardashaho aur ve janmakundli men svarashiya uchch ki rashi men baithe hon, tojatak ko shubh svapn ate hain jaisejarmani ke fredrik kaikyul ko rahuse sanbandhit sanp ka vartul akar menghumakar svarn ki anguthi jaise akarka banakar apne-apko katte huedikhai dena. isi bhanti silaimshin ke avishkarak ilihas hovko shani ki mahadsha antardasha vakundli men unki uchch sthiti honeke karan uske sir men rakshas keduton dvara bhala bhonkne ki svapnaki ghatna jiske falasvarup usnesilai mashin ka avishkar kiya.usi prakar yadi surya ya mangal kimhadsha ya antardasha chal rahi hoaur ve nichasth hon, to ag evan chotlgne ke svapn dikhai dete hain. yadiuparyukt mahadsha v antardasha chalrhi ho aur jatak ki janmakundlimen surya aur mangal uchch ya svarashimen ho, to ashubh svapn nahin balkishubh svapn dikhai denge jaise rajkaryamen jay, manglik karya sanpann honaadi. yadi chandra aur guru kimhadsha antardasha ho aur ve nichasthahon to kaf, pet adi se sanbandhitrog hote hain. iske viprit yadi chandaur guru uchchasth hon, to mahadshaantardasha men rajagaddi prapt hone kesvapn dikhai denge. vahin yadi shukraki uchch sthiti ho, to sukh, aishoaram, dhan lakshmi adi se sanbandhitaur nichasth ho, to anek bimariyonke svapn dikhai dete hain.nichasth surya ki dasha/pristhitiya gochriya dasha ane par retilemrusthalon ki sair, marusthalon kajhaj unt, garm havaon ke thaperekhata hua bethasa majnun ki tarhbhagta manushya, surya ka sarthi, ushnakatibandhon ke drishya, sukha, fatti huijmin, ghar-makan ki divaron kidraren, bhukh pyas se vyakul paglonki tarah bhatkte log, khaulta huajhrna, tapedik ke marij, mrigtrishnaka jal, maut ka sannata, tape huelohe ke sikke lutati hui alakshmi,sir par sehre ki jagah kafan, oleki jagah tapkte angare, chandnibikhrata surya, tapta hua chandrama,hansta hua siyar, chuhe ki bhantidubka hua sher, akash men pakshiyonki tarah urta hua prani, rota huamurda adi dikhai dene ki sanbhavnarhti hai.isi tarah ke svapn gochar men vrishrashi men pravesh karte hue surya kidsha men athva uski dashantardasha mena sakte hanai. kala baba ki rashimakar ya kanubh men surya ke pravesh kidsha men parvatarohan karte magaramachch,din men dekhte ullu, chalne hue garur,dipavli ki ratri men chamkta huasharad purnima ke chandrama, nishith kalmen khilti hui kumudini, chandroday hotehi khilte hue kamal se nikltehue bhaunre, parvat se pani nikaltihui paniharin, din men udit hotechandrama, ratri men dhup, bihar ghane kaleandhiyare jangal men nachte safed mor,kale hans, gulabi rang ki bhains adike saman svapn a sakte hai jinkafal sadaiv ashubh hi hota hai.chandra ke dasha parivartan se svapnavasthamen sharir men nari ki gati madhyam parjati hai, khun ka pravah shithil hojata hai, indriyon ki gati mand hojati hai aur kaf ka prakop barhjata hai.mangal ki dasha athva gochrmen parivartan hone se manushya kochot-chapet, durghatana, agni-kand,shava-dah, khun-kharabe, mrityu-dand,yan-durghatana, yuddh ke tandav,ulkapat, garbhapat, pakki imartonka bharbhrakar gir jana, jvalamukhiparvat aur unke khaulte hue evanchlchlane lave ke drishya svapn mendikhlai dete hain. mitra larne koudyat dikhai deta hai.budh ki antardasha men sundar upavan,hare-bhare khet, khanjan pakshi, totavidya prapt karte batuk, vrikshon kithandi shital chanv men vishram kartebtohi, pariksha ke dar se bhaybhithote bachche, chari dikhata shiksharthi,pariksha men pas ho jane par hanstemuskarate vidyarthi, sundriyon ko vastralutata bajaj, bandhya aur putra, munimikrta seth, git sunta badhir, vaktabna gunga, bagula bhagat, sajjan banabatul, badshahi karta fakir, shishtatatha susanskrit bana ganvar, sundar harebhre taje falon ki daliya, adinana prakar ke svapn ate hain. budhki dasha men pothi pradan karti huisarasvati ji yadi svapn men darshan den,to jatak vani ki adhishthatri devivagishvari ki anupam kripa ka patrajatak ban jata hai.guru ki dashaon men bhi jaliya drishyakaf prakriti jatkon ko svapn mendikhlai de sakte hain. guru ki ekrashi min hai jo jal tatva valirashi hai. udar shul, udar vran,pachan sansthan sanbandhi rog, kafjnit vyadhiyon, vedadhyayan, ved-path,ved-puran- upnishdon adi kedarshan, dharm pravachan, sant-samagam,tirth -yatra, ganga-snan adi sesanbandhit vividh shubhashubh svapn guruki antardasha men dikhai de sakte hain.rajyabhishek sanbandhi anandatirek deneval e svapn bhi garuu ki dasha m ne dikhaide sakte hain.rahu, ketu ya shani ki mahadsha, antardashaya gochar men inki arishtakarak dashachal rahi ho, to jatkon ko behdbhyanak svapn dikhai de saktehain. rahu ke atyadhik ashubh hone parasvapn hi nahin, yatharth men bhi bijlika karant lag jaya karta hai. daravnesvapnon ka veg gahri nidra men dubehue vyakti ko ekadam chainka detahai. kabhi-kabhi aisa bhi hota hai kidravne svapn dekhta hua vyaktiusse tran pa lene ko uthakar bhagjana chahta hai parantu svapn ke bharidbav ke karan vah bistar se uth bhinhin pata. ayurved ke mutabik vat,pitt, kaf ye sharir ke tin dosh hain.vat pradhan logon ko svapn men paralag jate hain. ve nil gagan men svapnamen urne ka anand prapt karte hain.pitt prakriti ke log svapn men sarejagat ko jagamag jyoti ke rup menniharne lagte hain. ve chand, sitare,ulka aur suraj ki raj ko praptakar lena chahte hain. unhen chand-suraj,tara gan saptarshi adi apna banalena chahte hain. ve gagan ko dekhakaramagan ho jate hain.kaf prakriti vale kup, tarag,bavliyane, nahron, nadiyon nalonjhrnon, favvaron jalasroton ko svapnamen dekhakar svayan jal ka devta varunaban jana chahte hain. ve chandni ratmen nauka-vihar karne lag jate hain.koi svapn men svayan ko jaltrangbjata hua dekhta hai, koi jaldhrhi ban jata hai, koi jal prapatdekhta hai to koi jal pralay. unhenjal se janm lene vala jalaj svapnamen dikhai dene lagta hai. jal menkbhi ve jalpri ka jalva dekhte hain,kabhi jaljhaj ko jal damrumadhyamen, to kabhi apne ko gota lagatahua dekhte hain.is prakar uparyukt vishleshan sespasht hai ki shubhashubh svapn vibhinnagrah sthitiyon men tab ate hain jabagrahon ki mahadshaon ki antardashaonmen nich, uchch, svagrihi, mitra grihi,shatrugrihi hote hain. koi bhi grah nich,v shatrugrahi ho, to jatak ka bure vaashubh svapn ate hain aur yadi vahauchch, svagrihi v mitra rashi men ho,to achche v shubh, uske manonukul,svapn ate hain.privar ke kisi sadasya ki mrityu hojane par us parivar ke sadasyon koduahsvapn dikhai dete hain. yad bhi rahtehain jisse ve vichlit dikhai dete hai.ndhan labh karane vale svapnakuch svapn vyakti ko dhan labh karanevale hote hain. hathi, ghore, bail, sinhki savari, shatruon ke vinash, vriksh tathakisi dusre ke ghar par chadhe hone dahi,chatra, ful, chanvar, ann, vastra, dipak,tanbul, surya, chandrama, devpuja, vina,ast adi ke sapne dhan labh karanevale hote hain. kamal aur kaner keful dekhna, kaner ke niche svayan kopustak parhte hue dekhna, nakhun evanromrhit sharir dekhna, chiriyon ke pairapakarakar urte hue dekhna, adi dhanalakshmi ki prapti v jamin men gare huedhan milne ke suchak hain.mrityu suchak svapnakuch svapn svayan ke lie anishtafaladayak hote hain. svapn men jhulajhulna, git gana, khelna, hansna,nadi men pani ke andar chale jana, surya,chandra adi grahon v nakshatron ko girtehue dekhna, vivah, grih pravesh adiutsav dekhna, bhumi labh, darhi, munch,bal banvana, ghi, lakh dekhna, murga,bilav, gidar, nevla, bichchu, makkhi,sharir par tel malakar nange badan bhainse,gadhe, unt, kale bail ya kale ghore parsvar hokar dakshin disha ki yatradikrna adi mrityu suchak hain.kuch anubhut svapnaek mahila ka putra bahut buri sthitimen dilli ke ek aspatal men dakhiltha. mahila svayan bimari ke karnbistar se lagi thin. use ek ratasvapn men dikhai diya ki uske galeki moti ki mala tut gai hai. motibikhar gae hain. nind khuli to usnedekha ki mala tuti hui thi. bahutdhundhne par bhi moti pure nahin mile.thik usi samay aspatal men uskeyuva putra ne apne pran tyag die the.jalandhar ke ek vyakti ki patni kichati ke kainsar ka aepreshan ho rahatha. use svapn men dikhai diya kikuch log unhen marne ko daude chalea rahe hain. vah bhag raha aur logpicha kar rahe hain.achanak vah aspatal ke nikataflai-ovar par charh jata hai. svayanfir vah apne ghar (jalandhr) ke pasphuncha hua pata hai. ve log ab bhiuska picha kar rahe hain. as-paske log unhen bachane ki koshish kartehain aur vah khud bhag kar ghar men chupneki koshish karta hai aur nind tutjati hai. fir usne ek achche daivagyase salah li. svapn ka fal yahismjha gaya ki uski patni svasthaho jaegi. yah bat aprail 1980 kihai. uski patni aj bhi jivitaur svasth hai. lekin us vyaktika achanak hriday gati ruk janese janvri 1989 men dehant ho gaya.is tarah spasht hai ki manushya kejivan men ane vali durghatanaon,unnati aur shubh samay ke agaman sesanbandhit svapn kai bar sachche sabitho jate hain.svapn fal vicharajab bhi kisi vyakti ke jivan men koiasadharan paristhiti hoti hai, svapnaate hain. kuch vishisht svapn yad bhirahat e h.nai bara hm muhurt ke svapn aksarasach bhi hote hain. rat ke pratham, dvitiya athva tritiya prahar men dikhnevale svapn lanbe samay ke bad sachhote hue pae jate hain.svapnon ke vishay men kuch pratikon kohmari lok sanskriti men manyata praptahai, jo is prakar hain. kisi ki mrityu dekhna -uskilanbi ayu hona. sirhi charhna - unnati akash men urna - unnati sarp athva jal dekhna - dhanki prapti bimar vyakti dvara kala sarpadekhna - mrityu sir munda dekhna - mrityu svapn men bhojan karna - bimari dayan baju kata dekhna - barebhai ki mrityu bayan baju kata dekhna - chotebhai ki mrityu pahar se niche girna - avntisvayan ko parvaton par charhta dekhna-saflta, vidyarthi ka svayan ko felhote dekhna - saflta, kamal kepatton par khir khate hue dekhna -raja ke saman sukh, atithi atadikhai dena - achanak vipatti,andhera hi andhera dikhai dena -kasht ya manhani, svayan ko mritdekhna - ayu vriddhi, atm hatyakrna - dirdhayu, ullu dikhai denarog v shok, ag jalakar usepkrta hua dekhna - anavashyakavyay, aepreshan hota dikhai dena- kisi bimari ka suchak, imartbnti dikhai dena - dhan labhav tarakki, khud ko kainchi chalatadekhna. vyarth ke vad vivad v laraijhgra, kaua bolta dikhai dena- kisi bimari ya bure samacharka suchak, imarat banti dikhaidena - dhan labh v tarakki, kabutrdikhai dena - shubh samachar kasuchak, kala nag dikhai dena- rajkiya samman, korhi dikhaidena- rog suchak, koyla dekhna-jhagra, shmashan ya kabristan dekhna- pratishtha men vriddhi, gobar dekhna-pashudhan labh, grahan dekhna - rogav chinta, goli chalta dekhna- manokamnapurti, garibi dekhna -sukhsmriddhi, garbhapat dekhna - ganbhirrog, shukra tara dekhna - shidhra vivah,svayan roti banana - rog, svayan konanga dekhna - man pratishtha ki hani,kasht, dev darshan ya dev sthan darshana-labhdayi, rajdrbar dekhna - mrityusuchak, davaiyan dekhna - uttamasvasthya, kisi dampati ka talak -grih kalah, taj mahal dekhna pati- patni ke sanbandh vichched, nai sehjamat banvana - ashubh, pati patnika milan - dampatya sukh, sukhilkriyan dekhna - mrityu suchak,kisi kaidi ya apradhi ko dekhna- ashubh pyar, bhandara karate dekhna- dhan labh, sagai dekhna - ashubh,sakhu aa vakshri a/ththanu dirkhai dane a - ashabhu apyar, tota ya titli dikhai dena- labhaprad.isi prakar svapn men dant tutna -dukh, jhanjhat, darvaja dekhna - barevyakti se mitrata, darvaja band dekhna- pareshaniyan, daladal dekhna - vyarthaki chinta men vriddhi, supari dekhna -rog mukti, dhuan dekhna - hani evanvivad, rassi dekhna - yatra, ruidekhna - svasth hona, kheti dekhna- laprvah ya santan prapti, bhukanpdekhna - santan kasht, dukh, sirhidekhna - sukh sanpatti men vriddhi, surahidekhna - buri sangat, chashma lagana -vidvatta men vriddhi, khai dekhna - dhanaevan prasiddhi ki prapti, kainchi dekhna- grih kalah, kutta dekhna - uttamamitra ki prapti kalam dekhna - mahanpurush ke darshan, topi dekhna - dukhse mukti, unnati, dhanush khinchna -labhaprad yatra, kichar men fansna -kasht, vyay, gay ya bail dekhna-mote se labh, duble se prasiddhi, ghaska maidan dekhna - dhan ki vriddhi,ghora dekhna - sankat se bachav, ghorepar savar hona - padonnati, lohadekhna - kisi dhani se labh, lomridekhna - kisi sanbandhi se dhokha,moti dekhna - kanya ki prapti, murdeka pukarna - vipatti evan dukh, murdese bat karna - murad puri hone kasanket, bajar dekhna - daridrata semukti, bari divar dekhna - sammanki prapti, divar men kil thokna -kisi vriddh se labh, datun karna -pap ka prayashchit v sukh ki prapti,khunta dekhna - dharm men ruchi, dhartipar bistar lagana - dirghayu kiprapti, sukh men vriddhi, unche sthan parchrhna - padonnati v prasiddhi, billidekhna -chor ya shatru bhay, billiya bandar ka katna - rog v arthasankat, nadi ka jal pina - rajyalabh v parishram, safed pushp dekhna- dukh se mukti, lal ful dekhna- putra sukh, bhagyoday, patthar dekhna- vipatti, mitra ka shatruvat vyavhar,talavar dekhna - yuddh men vijay,talab ya pokhre men snan karna -sannyas ki prapti, sinhasan dekhna -ativ sukh ki prapti, jangal dekhna- dukh se mukti v vijay ki prapti,arthi dekhna - rog se mukti v ayumen vriddhi, jahaj dekhna - pareshani durhona ya vyay hona, chandi dekhna -dhan v ahankar men vriddhi, jharna dekhna
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मंगल विशेषांक   आगस्त 2007

विवाह बाधा एवं मंगल दोष निवारण, वास्तु ने बनाया ताज को सरताज, राष्ट्रपति चुनाव: गद्दी किसके हाथ, दाम्पत्य सुख में मंगल ही नहीं बाधक्, मंगलकारी मंगल से भयभीत, लाल किताब के अनुसार मंगल दोष, मंगल दोष का परिहार, मंगल के अनेक रंग रूप

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