रक्षा बंधन : भाई –बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक

रक्षा बंधन : भाई –बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक  

रक्षा बंधन: भाई बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक भाई बहन के पावन प्रेम का प्रतीक रक्षा बंधन दोनों के आपसी प्रेम की दृढ़ता को प्रकट करता है। भाई-बहन का प्रेम एक दूसरे को ऐसी शक्ति प्रदान करता है जिससे मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियां भी अनुकूल हो जाती हैं। यह पर्व श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन बहन-भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं तथा पुरोहित यजमान को रक्षा बांधते हैं। इसके अतिरिक्त इस दिन गुरु शिष्य परंपरा के अनुसार नवीन विद्यार्थियों का यज्ञोपवीत संस्कार तथा ऋषि तर्पण आदि की भी परंपरा है। राखी का आरंभ कब और कैसे हुआ, यह कहना कठिन है, परंतु इससे संबंधित कई ऐतिहासिक घटनाएं प्रचलित हैं। एक बार देवताओं और दानवों में घोर युद्ध हुआ। देवता हार गए और दानव स्वर्ग पर अधिकार करने लगे। तब देवगुरु बृहस्पति की सलाह से देवताओं के राजा इंद्र की पत्नी शचि ने श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन अपने पति की कलाई पर ऋषियों द्व ारा अभिमंत्रित रक्षा सूत्र बांधा था। परिणामस्वरूप देवताओं की विजय हुई। एक ऐतिहासिक घटना यह भी है कि सोलहवीं शताब्दी के मध्य में मेवाड़ के राजपूत राणा सांगा के निधन के उपरांत जब उनकी महारानी कर्णावती ने राजकाज संभाला ही था कि गुजरात के सम्राट बहादुरशाह ने मेवाड़ पर चढ़ाई कर दी। राजपूतों की कम संख्या देखकर मेवाड़ की रानी कर्णावती ने दिल्ली के सम्राट हुमायूं को अपना भाई मानकर उसके पास राखी भेजी। राखी के धागों में एक राजपूत वीरांगना के हृदय की जो वेदना छिपी थी, वह जाति और धर्म से कहीं ऊंची थी। इस भावना ने हुमायूं के हृदय को छू लिया और वह अपनी राखीबंध बहन की रक्षा के लिए फौज के साथ मेवाड़ की ओर चल पड़ा और मेवाड़ की रक्षा की। इस तरह एक भाई ने अपनी बहन के रक्षासूत्र की मर्यादा रखी। विशेष: इस वर्ष रक्षा बंधन का शुभ मुहूर्त पूरे दिन भर है।



मंगल विशेषांक   आगस्त 2007

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