विवाह के लिए उचित दशा-अंतर्दशा

विवाह के लिए उचित दशा-अंतर्दशा  

भारतीय संस्कृति में विवाह को एक ऐसा पवित्र संस्कार माना गया है जो कि समाज में नैतिकता और मानव जीवन में निरंतरता बनाये रखने के लिए आवश्यक है। प्राचीन काल में विवाह की प्राथमिकताएं कुछ हट कर थी। उपरोक्त के अतिरिक्त कन्याओं का अल्प आयु में विवाह विलासी और कामुक राजाओं, सामंतों तथा अंग्रेज शासकों की कुदृष्टि से बचाने के लिए किये जाते थे, परंतु आधुनिक समय में ये समस्याएं नहीं हैं। अतः वर्तमान परिस्थितियों में विवाह की आयु को तीन खंडों में 1. शीघ्र विवाह (18 से 23 वर्ष तक), 2. उचित सामान्य विवाह (24 से 28 वर्ष तक), 3. देरी से विवाह (29 वर्ष के पश्चात) विभाजित करके विचार करेंगे। प्राचीन ग्रंथों में जैसे बृहत् पाराशर होराशास्त्र के अध्याय 19, श्लोक 22 में जो सूत्र दिया है उसके अनुसार विवाह 5वें या 9वें वर्ष में होगा तो इसे आधुनिक समय की परिस्थितियों में परिवर्तित करके शीघ्र विवाह की आयु (18 से 23 वर्ष तक) वाले फलकथन के साथ ही अध्याय में 22 से 34वें सूत्र तक जो भी वर्णित किया गया है उसमें सप्तम भाव, सप्तमेश तथा कारक ग्रह शुक्र आदि के ऊपर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के कारण विवाह में देरी आदि को नहीं लिया गया है। उसको भी ध्यान में रखेंगे तो फलकथन सत्य एवं विश्वासपूण्र् ा होगा। बृहत्पाराशर होराशास्त्र के अध्याय 19 जमाभाव फलाअध्याय के श्लोक या सूत्र संख्या 22 से 34 में विवाह के समग्र ज्ञान के लिए सूत्र/योग दिये गये हैं जो कि निम्न हैं: ƒ सप्तमेश शुभग्रह की राशि में बैठा हो और शुक्र अपने उच्च राशि का या स्वक्षेत्र में स्थित हो तो उस जातक का प्रायः 5वें या 9वें वर्ष में विवाह योग आता है (श्लोक 22)। ƒ सप्तम भाव में सूर्य हो और सप्तमेश शुक्र से युत हो तो प्रायः 7 या 11वें वर्ष में विवाह योग होता है (श्लोक 23)। ƒ द्वितीय भाव में शुक्र हो और सप्तमेश एकादश स्थान में हो तो 10 या 16वें वर्ष में प्रायः जातक का विवाह योग आता है (श्लोक 24)। ƒ लग्न या केंद्र में शुक्र हो और लग्नेश शनि की राशि में स्थित हो तो 11वें वर्ष में जातक का विवाह योग होता है (श्लोक 25)। ƒ लग्न से केंद्र में शुक्र हो और शुक्र से सप्तम भाव में शनि हो तो प्रायः 19 या 22वें वर्ष में उस जातक का विवाह योग होता है। (श्लोक 26)। ƒ चंद्रमा से सप्तम में शुक्र हो और शुक्र से सप्तम में शनि हो तो 18वें वर्ष में विवाह योग होता है (श्लोक 27)। ƒ धनेश लाभ स्थान में हो और लग्नेश दशम भाव में स्थित हो तो 15वें वर्ष में जातक का विवाह योग होता है (श्लोक 28)। ƒ धनेश लाभ स्थान में और लाभेश धन स्थान (राशि) में स्थित हो तो जातक का 13वें वर्ष में विवाह योग होता है (श्लोक 29)। ƒ अष्टम भाव के सप्तम भाव में शुक्र हो और अष्टमेश मंगल के साथ हो तो जातक 22 या 27वें वर्ष में विवाह योग प्राप्त करता है (श्लोक 30)। ƒ लग्नाधिपति सप्तमेश के नवमांश में हो और सप्तमेश द्वादश भाव में स्थित हो तो उस जातक का विवाह 23 या 26वें वर्ष में होता है (श्लोक 31)। ƒ अष्टमेश लग्न के नवमांश में होकर सप्तम भाव में शुक्र के साथ बैठा हो तो 25 या 33वें वर्ष में उस जातक का विवाह योग होता है (श्लोक 32)। ƒ भाग्य भाव से नवम में शुक्र हो या उन दोनों स्थानों में से किसी एक स्थान में राहु बैठा हो तो 31 या 33वें वर्ष में स्त्री लाभ होता है (श्लोक 33)। ƒ नवम भाव से सप्तम भाव में शुक्र हो और शुक्र से सप्तम में सप्तमेश स्थित हो तो जातक 27 या 30वें वर्ष में विवाह योग प्राप्त करता है (श्लोक 34)। उपरोक्त श्लोकों का यदि काल पुरुष की नैसर्गिक कुंडली को ध्यान में रखकर विश्लेषण किया जाये तो संक्षेप में निम्न तथ्य ज्ञात होंगे कि: ƒ सप्तम भाव, सप्तमेश, द्वितीय भाव, द्वितीयेश एवं कारक ग्रह शुक्र/गुरु का संबंध शुभ ग्रहों, राशियों एवं भावों से हो तो विवाह शीघ्र ही कम आयु में संभव हो पाता है। ƒ जब सप्तम भाव, सप्तमेश, द्वितीय भाव, द्वितीयेश तथा कारक ग्रह शुक्र/गुरु पर शनि की दृष्टि, युति या शनि की राशियों (मकर/कुंभ) का प्रभाव हो तो विवाह में देरी होती है। ƒ जब सप्तम भाव, सप्तमेश, द्वितीय भाव, द्वितीयेश एवं कारक ग्रह शुक्र/गुरु पर अशुभ भावों के स्वामियों या क्रूर या वक्री ग्रहों या राहु/केतु का प्रभाव हो तो विवाह में ज्यादा देरी होती है या विवाह ही नहीं हो पाता। विवाह के योगों का अध्ययन करने के पश्चात यह देखना होगा कि जातक के विवाह के लिए उचित दशा-अंतर्दशा कौन सी होगी साथ ही विवाह समय गोचर भी स्वीकृति दे रहा है अथवा नहीं क्योंकि, योग दशा तथा गोचर तीनों की सम्मिलित स्वीकृति ही विवाह के संस्कार करायेगी। इसके लिए आचार्य मंत्रेश्वरकृत फलदीपिका (व्याख्याकार डाॅ. सुरेश चंद्र मिश्रा) के अध्याय 10 स्त्री भाव अध्याय के श्लोक संख्या 12 से 14 का अध्ययन करने पर निम्न तथ्य प्राप्त होंगे: विवाह के लिए उचित दशा-अंतर्दशा ƒ सप्तम भाव में स्थित ग्रह, सप्तमेश, सप्तम भाव पर दृष्टि डालने वाले ग्रहों तथा सप्तमेश या सप्तम से संबंधित ग्रहों की दशा-अंतर्दशा में तथा कारक ग्रह शुक्र की दशा अंतर्दशा में विवाह संपन्न होने की संभावना होती है। ƒ सप्तमेश जिस राशि व नवांश में हो उनके स्वामी ग्रहों की दशा में या शुक्र या चंद्रमा में जो बली हो उस बली ग्रह की दशा-अंतर्दशा में विवाह होता है। ƒ उपरोक्त पर लग्न के साथ-साथ चंद्र लग्न से भी विचार करना चाहिए। विवाह के समय गोचर ƒ सप्तमेश या शुक्र जब लग्नेश की नवांश राशि के त्रिकोण में गोचर करे तब विवाह होगा। ƒ शनि एवं बृहस्पति गोचर में सप्तम भाव, लग्न तथा सप्तमेश एवं लग्नेश से लग्न तथा चंद्र लग्न से संबंध बनाये तो विवाह होगा। उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर निम्न कुछ कुंडलियों का अध्ययन करते हैं: कुंडली 1 जन्म तिथि: 27.9.1984, जन्म समय: 11.45, जन्म स्थान ः मोदीनगर जातिका का विवाह 2.7.2006 में 22 वर्ष की आयु में शनि-बुध-बुध की दशा में हुआ। उपरोक्त कुंडली में बृहत्पाराशर होराशास्त्र के अध्याय 19 श्लोक 22 के सूत्र को लगाने पर देखेंगे कि सप्तमेश गुरु स्वराशि में (नैसर्गिक शुभ ग्रह की राशि है) स्थित है और शुक्र स्वराशि में स्थित है। अतः शास्त्रोक्ति के अनुसार विवाह 5वें या 9वें वर्ष में होना चाहिए था परंतु विवाह 22 वर्ष की आयु में हुआ जिसे वर्तमान में शीघ्र विवाह की श्रेणी में रख सकते हैं। अब विवाह समय दशा-अंतर्दशा की बात को देखें तो शनि की महादशा है। महादशानाथ शनि विवाह कारक शुक्र के साथ युत होकर पंचम भाव से सप्तम भाव और सप्तमेश को दृष्ट कर रहे है। यही शनि नवांश कुंडली में लग्न के द्वितीय भाव में स्थित होकर सप्तमेश और अंतर तथा प्रत्यंतर दशा स्वामी बुध को दृष्ट कर रहे हैं। यही बुध लग्न कुंडली के लग्नेश हैं। विवाह समय गोचर में शनि कर्क राशि में गोचर करते हुए लग्न कुंडली के द्वितीय भाव में गोचर करते हुए लग्नेश बुध को दृष्ट करते हुए चंद्र लग्न से सप्तम भाव को दृष्ट कर रहे थे एवं गुरु (वक्री) होकर तुला राशि में गोचर करते हुए लग्न से पंचम भाव में गोचर करते हुए चंद्र लग्न पर तथा विवाह कारक शुक्र पर गोचर करते हुए लग्न को दृष्ट करके विवाह की स्वीकृति दे रहे हैं। आचार्य मंत्रेश्वर के अनुसार (फलदीपिका अध्याय 5 श्लोक के अनुसार) शुक्र, लग्नेश की नवांश राशि मकर के त्रिकोण में भी गोचर कर रहा था अर्थात शुक्र वृषभ राशि में गोचर कर रहा था। यहां लग्न, लग्नेश, सप्तम, सप्तमेश तथा चंद्र लग्न एवं चंद्र लग्न के सप्तमेश सभी शुभ प्रभाव में है अतः विवाह शीघ्र विवाह की श्रेणी वाली आयु में हुआ। कुंडली 2 जन्म तिथि: 24.4.1978, जन्म समय: 1.37, जन्म स्थान ः मेरठ। जातिका का विवाह 15.2.2000 को 22वें वर्ष की आयु में शनि-बुध-शुक्र की दशा में हुआ। उपरोक्त कुंडली में बृहत्पाराशर होराशास्त्र के अध्याय 19 श्लोक 22 के सूत्र को लगाने पर देखेंगे कि सप्तमेश चंद्र नैसर्गिक शुभ ग्रह शुक्र की तुला राशि में स्थित है और शुक्र स्वराशि में स्थित है अतः विवाह 5वें या 9वें वर्ष में होना चाहिए था परंतु विवाह 22 वर्ष की आयु में हुआ जिसे वर्तमान में शीघ्र विवाह की श्रेणी में रख सकते हैं। विवाह के समय शनि-बुध-शुक्र की दशा, अंतर तथा प्रत्यंतर चल रहा था। महादशानाथ शनि लग्न कुंडली का लग्नेश है एवं नवांश कुंडली में द्वादश भाव में स्थित होकर सप्तमेश मंगल तथा नवांश लग्नेश शुक्र को दृष्ट कर रहा है। अंतर्दशा स्वामी बुध चंद्र लग्न से षष्ठम भाव में स्थित होकर विवाह कारक राहु के साथ-साथ शयन सुख के भाव द्वादश को दृष्ट कर रहा है एवं नवांश कुंडली में विवाह के कारक शुक्र से युत होकर सप्तमेश मंगल से दृष्ट है। प्रत्यंतर्दशा स्वामी शुक्र लग्नेश शनि से दृष्ट है और नवांश कुंडली में सप्तमेश मंगल से दृष्ट होकर स्थित है। विवाह समय गोचर में शनि मेष राशि में, गुरु भी मेष राशि में तथा शुक्र मकर राशि में गोचर कर रहे थे। शनि मेष राशि में गोचर करते हुए जन्म लग्न को दशम दृष्टि से तथा चंद्र लग्न को सप्तम दृष्टि से दृष्ट कर रहे थे। बृहस्पति मेष राशि में गोचर करते हुए लग्नेश शनि(व) को तथा चंद्र लग्न को दृष्ट कर रहे थे एवं चंद्रमा सप्तमेश भी है। शुक्र लग्नेश की नवांश राशि मेष से दशम भाव अर्थात केंद्र में गोचर कर रहे थे। यहां लग्न के सप्तम में मंगल का नीच भंग हो रहा है साथ ही लग्नेश शनि(व) उच्च राशि में सूर्य की राशि में स्थित है। सूर्य चंद्र लग्न से सप्तम भाव में उच्च राशि में है तथा चंद्र लग्नेश शुक्र स्वराशि में है। अतः यहां पर लग्न तथा चंद्र लग्न एवं इनसे सप्तम भाव एवं इनके स्वामी सभी शुभ प्रभाव में हैं अतः विवाह शीघ्र विवाह की श्रेणी में आता है। कुंडली 3 जन्म तिथि: 24.1.1963, जन्म समय: 8.46, जन्म स्थान ः मेरठ। जातिका का विवाह 27.4.1990 को 28वें वर्ष की आयु में मंगल-मंगल-शुक्र की दशा में हुआ। उपरोक्त कुंडली में बृहत्पाराशर होराशास्त्र के अध्याय 19 के श्लोक 25 का सूत्र लग रहा है कि लग्न के केंद्र में शुक्र स्थित है और लग्नेश शनि की राशि में स्थित है तो 11वें वर्ष में विवाह योग होता है परंतु जातक का विवाह 28वें वर्ष में हुआ। चूंकि लग्नेश शनि तथा सप्तमेश सूर्य राहु-केतु अक्ष में स्थित है और वह भी त्रिक भाव में साथ ही वक्री बुध से युत है एवं वक्री मंगल से दृष्ट है अतः इतने दुष्प्रभावों के कारण सूत्र में निर्धारित आयु में विवाह न होकर 28वें वर्ष में हुआ। विवाह समय मंगल-मंगल-शुक्र की दशा चल रही थी। मंगल महादशा तथा अंतर्दशा स्वामी होकर लग्नेश, लग्न, सप्तमेश शनि तथा सूर्य एवं लग्नस्थ गुरु को दृष्ट कर रहा है जोकि चंद्र लग्नेश है। नवांश कुंडली में लग्नेश शुक्र मंगल की मेष राशि में स्थित है। प्रत्यंतर्दशानाथ शुक्र स्वयं विवाह का नैसर्गिक कारक है एवं कुंडली में योगकारक होकर दूसरे विवाह कारक राहु से दृष्ट है एवं नवांश कुंडली में सप्तमेश बुध से युत होकर द्वितीय भाव में स्थित है। गोचर में शुक्र लग्नेश शनि की नवांश राशि मिथुन के नवम भाव अर्थात त्रिकोण में गोचर कर रहा था साथ ही विवाह की तिथि पर शनि मकर राशि में लग्नेश शनि तथा सप्तमेश सूर्य पर गोचर करते हुए लग्न से द्वादश भाव में शयन सुख के स्थान पर एवं बृहस्पति मिथुन राशि में गोचर करते हुए लग्न से पंचम भाव से चंद्र लग्न को तथा जन्म लग्न को दृष्ट करके विवाह की आज्ञा दे रहा था। कुंडली 4 जन्म तिथि: 28.6.1971, जन्म समय: 20.30, जन्म स्थान ः मेरठ। जातिका का विवाह 4.12.1998 को मंगल-राहु-गुरु की दशा में हुआ। यहां लग्न में मंगल-राहु अंगारक योग का निर्माण कर रहे हैं जो कि अशुभ योग है। सप्तम भाव पर दो पृथकताकारक ग्रह शनि तथा राहु का अशुभ प्रभाव रहा तथा सप्तमेश चंद्र अष्टम भाव में जो कि त्रिक या दुःवस्था में चला गया। नवांश कुंडली में भी लग्न तथा सप्तम भाव राहु-केतु अक्ष में है। अतः इन अशुभ प्रभावों के कारण जातिका का विवाह 28वें वर्ष में हुआ जो कि शीघ्र विवाह की श्रेणी में नहीं आता परंतु विवाह कारक ग्रहों शुक्र तथा राहु की अच्छी स्थिति एवं दृष्टि के कारण विवाह हुआ। विवाह के समय मंगल-राहु-गुरु की दशा चल रही थी। महादशानाथ मंगल लग्न में उच्च राशि में स्थित होकर सप्तम भाव तथा सप्तमेश चंद्र को दृष्ट कर रहे हैं एवं नवांश कुंडली में मंगल सप्तमेश चंद्र से युत होकर लग्नेश (नवांश में) को दृष्ट कर रहे हैं। अन्तरदशा नाथ राहु लग्न कुंडली में लग्नस्थ होकर लग्नेश शनि तथा विवाह कारक शुक्र को एवं सप्तम भाव को दृष्ट कर रहे हैं एवं नवांश कुंडली में सप्तम भाव में स्थित होकर नवांश लग्न को दृष्ट कर रहे हैं। प्रत्यंतरदशा नाथ गुरु लग्न कुंडली में एकादश भाव को, लग्नेश शनि विवाह कारक शुक्र को दृष्ट करते हुए सप्तम भाव को दृष्ट कर रहे हैं एवं नवांश में नवांश लग्न से द्वादश भाव जो कि शयन सुख/भोग का भाव है को दृष्ट करते हुए विवाह कारक शुक्र से युत है। विवाह समय गोचर में शुक्र लग्नेश की नवांश राशि मीन के त्रिकोण में गोचर कर रहा था। शनि(व) मेष राशि में गोचर करते हुए दशम दृष्टि से लग्न को दृष्ट कर रहा था जबकि बृहस्पति कुंभ राशि में गोचर करते हुए चंद्र लग्न तथा चंद्र लग्नेश सूर्य को दृष्ट कर रहा था। कुंडली 5 जन्म तिथि: 5.7.1985, जन्म समय: 4.30, जन्म स्थान: मेरठ। जातिका का विवाह 2.5.2014 को गुरु-गुरु-राहु की दशा में 29वें वर्ष में हुआ। लग्न कुंडली में सप्तमेश गुरु वक्री होकर अष्टम भाव जो कि दुःस्थान है में स्थित होकर लग्नेश बुध को दृष्ट करते हैं। चंद्र लग्नेश शनि(वक्री) लग्न से पंचम भाव में स्थित होकर सप्तम भाव को तृतीय से तथा लग्नेश बुध को दशम दृष्टि से देख रहे हैं। चंद्र लग्न से सप्तम भाव पर वक्री गुरु की दृष्टि के प्रभाव के कारण जातक के विवाह में देरी हुई अतः लग्नेश सप्तमेश पर वक्री ग्रहों का प्रभाव विवाह में देरी करा रहा है। विवाह समय गुरु-गुरु-राहु की दशा चल रही थी महादशा तथा अंतरदशा स्वामी गुरु-सप्तमेश होकर अष्टम भाव से लग्नेश बुध को दृष्ट कर रहा है एवं नवांश कुंडली में लग्न को पंचम दृष्टि से दृष्ट कर रहा है। प्रत्यंतरदशा स्वामी राहु विवाह का नैसर्गिक कारक है और सप्तम भाव को नवम दृष्टि से दृष्ट कर रहा है एवं नवांश कुंडली में उसके सप्तमेश शुक्र को पंचम दृष्टि से दृष्ट कर रहा है। गोचर में शुक्र लग्नेश बुध की नवांश राशि वृश्चिक के पंचम भाव में मीन राशि में त्रिकोण में गोचर कर रहा था। विवाह के समय शनि तुला राशि में वक्री होकर तथा बृहस्पति मिथुन राशि में गोचर कर रहे थे। शनि गोचर में तुला राशि में पंचम भाव से सप्तम भाव को तृतीय दृष्टि से तथा लग्नेश बुध को दशम दृष्टि से दृष्ट कर रहे थे जबकि गुरु मिथुन राशि में गोचर करते हुए लग्न में स्थित होकर सप्तम भाव को दृष्ट करते हुए विवाह का आशीर्वाद दे रहे हैं। कुंडली 6 जन्म तिथि: 14.2.1984, जन्म समय: 12.44, जन्म स्थान ः मेरठ। जातिका का विवाह 25.12.2013 को शनि-गुरु-शुक्र की दशा में 30वें वर्ष में हुआ। लग्न तथा सप्तम भाव राहु-केतु अक्ष में है। सप्तमेश मंगल षष्ठम भाव में अपनी राशि के द्वादश भाव में अशुभ स्थिति में है। लग्नेश शुक्र, सूर्य अधिष्ठित राशि स्वामी शनि की राशि में होने के कारण अशुभ प्रभाव में तो हैं ही साथ ही षष्ठम भावस्थ मंगल से भी दृष्ट होकर स्थित है। यहां लग्नेश शुक्र तथा सप्तमेश मंगल शनि तथा शनि की राशियों से संबंधित है एवं शनि वृष लग्न के लिए योगकारक है और उच्च राशि में स्थित है अतः देरी से ही सही विवाह करा दिया। विवाह समय जातक पर शनि-गुरु-शुक्र की दशा थी। महादशानाथ शनि सप्तमेश मंगल से युत होकर चंद्र लग्न से सप्तम भाव और सप्तमेश को दृष्ट कर रहा है। तृतीय दृष्टि से एवं नवांश कुंडली में शनि सप्तमेश होकर दशम भाव में लग्नेश चंद्र से युत होकर सप्तम भाव को दृष्ट कर रहे हैं। अंतर्दशानाथ गुरु लग्न कुंडली में चंद्र लग्न से सप्तमेश होकर सप्तम भाव में स्थित है एवं नवांश कुंडली में नवांश लग्न में स्थित होकर सप्तमस्थ शुक्र से दृष्ट है। प्रत्यंतर्दशा स्वामी शुक्र लग्न कुंडली का लग्नेश है और सप्तमेश मंगल से दृष्ट है और नवांश कुंडली में सप्तमस्थ होकर लग्न को दृष्ट कर रहा है। गोचर में शुक्र लग्नेश की नवांश राशि मकर में ही गोचर कर रहा था एवं शनि तुला राशि में गोचर करते हुए चंद्र लग्न से सप्तम भाव तथा सप्तमेश को दृष्ट कर रहा था एवं लग्न से सप्तमेश मंगल पर गोचर कर रहा था। बृहस्पति गोचर में वक्री होकर मिथुन राशि में गोचर करते हुए चंद्र लग्न में स्थित था और लग्न से सप्तमेश मंगल को और चंद्र लग्न से सप्तम भाव एवं सप्तमेश गुरु को दृष्ट कर रहा था। उपरोक्त कुंडलियों के विश्लेषण के अतिरिक्त लगभग 20 कुंडलियों पर भी उपरोक्त तथ्यों को लागू करके देखने पर निर्णयस्वरूप कह सकते हैं कि प्राचीन समय में निर्मित शास्त्र और उनमें लिखित सूत्र आज भी लागू होते हैं परंतु फलकथन करते समय वर्तमान सामाजिक व्यवस्थाओं एवं परंपराओं का ध्यान रखते समय उनमें थोड़े नये दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है जैसे चैपाये का आशय पहले जानवरों तथा बैलगाड़ी आदि से लगाया जाता था तो आज के संदर्भ में उसे मोटर या गाड़ी या कार के रूप में समझा जाये। उसी प्रकार आयु को भी आज के संदर्भ में 5.9.11 वर्ष को शीघ्र विवाह 13.15.22 वर्ष तक को उचित आयु में विवाह जबकि इसके बाद की आयु को देरी में विवाह की श्रेणी में रखते हुए विवाह का फलकथन मिल जाये तो वह भ्रामक नहीं होगा।


विवाह एवं मेलापक विशेषांक  अप्रैल 2015

रिसर्च जर्नल आॅफ एस्ट्रोलाॅजी के इस विवाह एवं मेलापक विषेषांक में जिन लेखों को शामिल किया गया है उनमें से एस्ट्रोलाॅजी एण्ड मैरिज, सप्तमेष के शुभाषुभ परिणाम, दषविध मेलापक के अतिरिक्त अन्य विषयों जैसे बर्थ टाइम रैक्टीफिकेषन (के.पी.), कॅरियर में उन्नति के लिए एस्ट्राॅवास्तु का महत्व, द्वादष भाव से यष और समृद्धि का विचार, शकुन और प्रष्न ज्योतिष, राहु केतु का कारकत्व, कैप्टेन कूल धोनी का अंकषास्त्र से विष्लेषण तथा जन्मकुण्डली से जन्मसमय, दिनांक, मास व वर्ष ज्ञात करने की विधि को शामिल किया गया है। साइंटिफिक फाॅरमेषन आॅफ हैण्ड नाम से शोधपरक सम्पादकीय रोचक व विषेष ज्ञानवर्धक है।

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