मंगलकारी मंगल ग्रह

मंगलकारी मंगल ग्रह  

मंगल की ग्रीष्म ऋतु मानी गयी है। पुराणों के मतानुसार मंगल देवताओं के सेनापति थे। इन्होंने तारकासुर का वध किया था। ऋषि श्री पराशर के मतानुसार मंगल के वस्त्र लाल रंग के, श्री कल्याण वर्मा के अनुसार मंगल के वस्त्र मोटे और बहुत दिन तक चलने वाले हैं। मंगल वेदों में साम वेद का अधिकारी है। कुछ विद्वानों के अनुसार मंगल अथर्ववेद के कारक हैं। इसका भ्रमण स्थान घने जंगल हैं, जहां पर भयानक जानवर रहते हैं। Û मंगल की बुद्धि बड़ी तीक्ष्ण होती है; साथ ही हिंसक भी। धैर्य, साहस पराक्रम के स्वामी हंै मंगल। Û अनाजों में मसूर की दाल पर मंगल का अधिकार है। नव ग्रह पूजा में मसूर की दाल मंगल के लिए स्थापित की जाती है। Û मंगल अग्नि तत्व के मालिक हैं, पीत प्रकृति, रक्त वर्ण, पुरुष जाति, दक्षिण दिशा के स्वामी हैं। मंगल की उध्र्व दृष्टि मानी गयी है। मंगल शरीर में पित्त का स्वाभाविक नियंत्रण करता है। यह साहस को न छोड़ने वाला और डट कर मुकाबला करने वाला ग्रह है। पराक्रम स्थान का मालिक म ंगल ह ै। म ंगल रक्त आ ैर अस्थि-मज्जा का स्वामी ह ै। हड्डी में जो मज्जा होती है उसका स्वामी मंगल है। शरीर के पित्त, मूच्र्छा, रक्त, बवासीर, फोड़े- फुंसी, दुर्घटना, वाहन, अपघात, दुर्घटना का कारक मंगल है। यह भ्रातृ और भगिनी का कारक भी है। मंगल का अंक 9 है। सेना, पुलिस, तकनीकी विषयों में निपुणता, बंदूक, ता ेप, भ ूमि, तलवार, स ैनिक व ृत्ति, सोनार, लोहार, बढ़ई, खटीक के पेशे, वकील, कानून न्याय से संबंधित कार्य, औषधि निर्माण, कारखाने, भाई, बंधु, मार-काट, चोट-चपेट, हथियारों के विषय में, चोरी, धोखा, मित्र या शत्रु और भाई, ताया, साहस, शूरवीरता आदि। शुभ मंगल सेना में अधिकारी शुक्र, अशुभ मंगल वाले व्यक्ति बदमाश होते हैं। मंगल के मित्र ग्रह सूर्य, चंद्रमा, गुरु और शत्रु केतु, बुध तथा सम शुक्र शनि हैं। मंगल मेष और वृश्चिक राशि का स्वामी है। मंगल वृश्चिक राशि पर बली माना जाता है। मंगल मकर राशि में उच्च का और कर्क राशि में नीच का होता है। तीसरे भाव, छठे भाव और दशम भाव में वह दिग्बली है। चंद्रमा के साथ चेष्टाबली होता है। द्वितीय भाव में मंगल निष्फल होता है। मंगल की सप्तम, चैथे, और अष्टम भावों पर पूर्ण दृष्टि होती है। मंगल से जातक के भाई-बहन, शक्ति तथा धैर्य का विचार किया जाता है। मंगल के मृगशिरा, धनिष्ठा, चित्रा नक्षत्र हैं। धनिष्ठा नक्षत्र 23 नक्षत्र नैसर्गिक नेष्ट नक्षत्र संख्या में होता है। मंगल का विशेष अधिकार मस्तिष्क पर रहता है, क्योंकि काल पुरुष के लग्न के प्रथम भाव पर मेष राशि का प्रभुत्व है। स ंक्ष ेप म े ं म ंगल मस्तिष्क, रक्त, अस्थि-मज्जा का मालिक ह ै आ ैर पराक्रम, साहस, पित्त, अग्नि तत्व, ऊध्र्व दृष्टि का स्वामी है। जातक की कुंडली में प्रथम भाव, चतुर्थ भाव, सप्तम, अष्टम और द्वादश भावों में मंगल स्थित हो तो जातक मंगली होता है। अगर लग्न से मंगल प्रथम, द्वितीय, चतर्थ , सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भाव में हो, चंद्र से प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भाव में हो, शुक्र से प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भाव में हो, किसी भी शुभ दृष्टि से हीन हो, तो जातक मंगली होता है। - लग्न में मंगल होने से वह सुख भाव, दांपत्य जीवन और जीवन साथी को स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रभावित करेगा। इससे जातक माता के सुख से वंचित, वाहन से दुःखी, 29 वर्ष तक शारीरिक कष्ट सहने वाला होगा। सप्तम पर पूर्ण दृष्टि के कारण भावुक, परस्त्रीगामी, प्रथम भार्या से वियोगी, दुःखी होता है। अष्टम भाव पर मंगल की दृष्टि जातक को ऋणग्रस्त, दुःखी और भाग्यहीन बनाती है, क्योंकि सप्त से द्वितीय भाग्य स्थान से द्वादश भाव होता है। अष्टम भाव कन्या के पति और वर की पत्नी का आयु का भाव है। यदि अष्टम में पापी ग्रह या अष्टम भाव और अष्टमेश पर मंगल पापी ग्रह की दृष्टि हो, तो जातक की अल्पायु होती है। दूसरे भाव में मंगल मारकेश स्थान पर हुआ जिसको पत्नी की आयु का स्थान भी कहते हैं, तो दूसरा भावस्थ मंगल पंचम, अष्टम और नवम भाव को पूर्ण दृष्टि से देखेगा, पंचम भावस्थ मंगल से विलंब, या गर्भपात होगा, अगर शनि की दृष्टि भी पंचम पर है, तो संतानहीनता का योग है। अष्टम भाव पर मंगल पति की आयु को कम करता है। वैधव्य अनिष्टकारी हो सकता है। नवम भाव पर मंगल होने से भाग्योदय देर से होता है। चतुर्थ भाव में सुख स्थान का मंगल सप्तम भाव, दशम कर्म भाव आ ैर एकादश भाव पर दृष्टि योग करेगा ही जिसके निम्न फल होंगे: - मातृ सुख, गृह सुख में कमी। पति/ पत्नी की अकाल मृत्यु। - ग ृहस्थ जीवन कष्टप ूर्ण । 4, 8, 12 राशियों में मंगल से स्त्री वंध्या होती है। - परस्त्रीरत, कामातुर, प्रथम पत्नी विया ेग व्यभिचारी, ज ेल यात्रा, कर्महीनता और पिता को कष्टदायक होगा। सप्तम भाव, द्वितीय भाव, ग ृहस्थ जीवन का सुख, दुःख, भय, विवाह आदि के सूचक हैं। अकेला मंगल इतना घातक नहीं होता, जब किसी पापी ग्रह का मंगल तनु भाव पर न हो। कुटुंब भाव पर हो, तो जातक रोगी, अल्पायु, परिवार से दूर रहने वाला, दुःखी होता है। पत्नी की आयु कम होती है। 1-8-10 राशि का मंगल हो, तो विवाह सुख एक बार नष्ट हो जाए, तो पुनः विवाह करना कठिन हो जाता है। अष्टम भाव मृत्यु स्थान है और सहचारी का प्रथम मारकेश होता है। अष्टमस्थ अशुभ मंगल की जातक के द्वितीय भाव पर दृष्टि, आखों का रोग, स्त्री की अल्पायु, आठ वर्ष में जातक को कष्ट परस्त्रीरत, भाई-बहन से कम सुख। यदि स्त्री की कुंडली में कर्क राशि का मंगल हो तो विधवा, कुटुंब में आपत्ति, गर्भपात, प्रसूति की मृत्यु की संभावना होती है। इसलिए अष्टम अशुभ मंगल की स्थिति भयावह होती है। द्वादश भाव जातक का व्यय और स्त्री से सहवास करने का स्थान है। अशुभ मंगल के कारण जीवन साथी का रोगी होना जातक को व्यापार में हानि, जेल यात्रा का भय, झगड़ने की प्रवृत्ति, चोट का भय तथा कृतघ्न होना दर्शाता है। परिवार में अग्रणी व्यक्ति ऐश्वर्यवान तथा निर्धनों की सहायता करने वाला होता है। द्वादश मंगल गृहस्थ जीवन में अस्थिरता करता है। मंगल दक्षिण दिशा का मालिक है। मंगल का अंक - 9 शुभ संख्या- 9, 18, 27, 36 आदि शुभ रंग- लाल, गहरा गुलाबी रत्न- मूंगा व्रत उपवास: मंगलवार को व्रत करें। हनुमान चालीसा पढ़ें। हनुमान जी को पीला सिंदूर, तिल, या चमेली का तेल मिश्रित सिंदूर चढावें, लड्डू चढ़ावंे, पीला लाल प ुष्प चढ ़ाव े ं, श्रीहन ुमत स्रवन पढ़ें। भाई-बहन-मित्र में प्रेम बनावें। सेवा करें। सम्मान करें। मंगलमय कर्म में सेवक बनें। यथा शक्ति दान करें। म ंगल श ुभ हा ेगा। म ंगल य ंत्र की प्रेम-श्रद्धा से पूजा करें कार्यसिद्धि मंगलमय होगा। दान: मंगलवार को मसूर की दाल, गुड़, लाल रंग के फूल, मूंगा दान करें। म ंगलवार अपराह्न 3 स े 4ः30 तक विशेष शुभ और महत्वपूर्ण कार्य करें। (राहु काल में यात्रा, या शुभ कार्य नहीं करें)। मंगलवार के दिन क्या करें क्या न करें: यात्रा: दक्षिण, पूर्व, नैर्ऋत्य (दक्षिण पश्चिम) शुभ विद्या एवं शिक्षा: बिजली (इलेक्ट्राॅनिक) शल्य क्रिया की शिक्षा, भूगर्भ विज्ञान, दंत चिकित्सा शास्त्र विद्या सीखना शुभ। व्यापार: अग्नि एवं बिजली संबंधी कार्य, बेकरी, खेल-कूद कृषि, सेना, ता ंबा, म ू ंगा, पीत आदि का क्रय, भूमि, शल्य क्रिया, रक्षा सामग्री, संधि विच्छेद आदि कार्य शुभ। कर्ज: कर्ज, ऋण चुकाना (लेना नहीं) नवीन वस्त्र धारण करना अशुभ नवीन आभूषण धारण करना अशुभ तेल लगाना अशुभ हजामत करना अशुभ नया जूता पहनना अशुभ मुकद्दमा करना शुभ


वक्री ग्रह विशेषांक  अप्रैल 2015

फ्यूचर समाचार के वक्री ग्रह विषेषांक में वक्री, अस्त व नीच ग्रहों के शुभाषुभ प्रभाव के बारे में चर्चा की गई है। बहुत समय से पाठकों को ऐसे विशेषांक का इंतजार था जो उन्हें ज्योतिष के इन जटिल रहस्यों को उद्घाटित करे। ज्ञानवर्धक और रोचक लेखों के समावेष से यह अंक पाठकों में अत्यन्त लोकप्रिय हुआ। इस अंक के सम्पादकीय लेख में वक्री ग्रहों के प्रभाव की सोदाहरण व्याख्या की गई है। इस अंक में वक्र ग्रहों का शुभाषुभ प्रभाव, अस्त ग्रहों का प्रभाव एवं उनका फल, वक्री ग्रहों का प्रभाव, नीच ग्रह भी देते हैं शुभफल, क्या और कैसे होते हैं उच्च-नीच, वक्री एवं अस्तग्रह, कैसे बनाया नीच ग्रहों ने अकबर को महान आदि महत्वपूर्ण लेखों को शामिल किया गया है। इसके अतिरिक्त बी. चन्द्रकला की जीवनी, पंचपक्षी के रहस्य, लाल किताब, फलित विचार, टैरो कार्ड, वास्तु, भागवत कथा, संस्कार, हैल्थ कैप्सूल, विचार गोष्ठी, वास्तु परामर्ष, ज्योतिष और महिलाएं, व्रत पर्व, क्या आप जानते हैं? आदि लेखों व स्तम्भों के अन्तर्गत बेहतर जानकारी को साझा किया गया है।

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