कुंडली मिलान सफल गृहस्थ जीवन की कुंजी

कुंडली मिलान सफल गृहस्थ जीवन की कुंजी  

प्रश्न: कुंडली मिलान क्या है? उत्तर: वर-वधू की जन्मकुंडली में गुणधर्म के परस्पर मिलान को कुंडली मिलान कहते हैं। प्रश्न: अष्टकूट क्या है? उत्तर: अष्टकूट सूत्र में वर-वधू के आपसी गुणधर्मों को आठ भागों में बांटा गया है। यह आठ गुण जन्म राशि एवं नक्षत्र पर आधारित हैं। वर-वधू की कुंडली में जन्म समय चंद्र जिस राशि एवं नक्षत्र में रहता है उन्हें व्यक्ति की व्यक्तिगत राशि एवं नक्षत्र माना जाता है। आठ गुणों को क्रमशः 1 से 8 अंक दिये गये हैं जो कुल मिला कर 36 होते हैं। इन 36 अंकों में से 18 अंक मिल जाने पर मिलान को ठीक माना जाता है। कम अंकों में विवाह उचित नहीं मानते हैं। जितने अंक मिलान में मिलते हैं उन्हें अष्टकूट गुण कहते हैं, आम भाषा में गुण मिलान भी कहते हैं। प्रश्न: आठ गुणों के बारे में विस्तार से समझाएं। उत्तर: वर्ण: जन्मकुंडली अनुसार वर-वधू का क्या वर्ण है, अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, उसके अनुसार मिलान किया जाता है। जातक का जन्म चाहे किसी भी जाति में हुआ हो लेकिन जन्मकुंडली अनुसार जो जाति बनती है उसी का आपसी मिलान हेाता है क्योंकि मिलान में मानसिक मिलान को प्राथमिकता दी गई है। स्ववर्ण मिलान उत्तम माना गया है। वश्य: वश्य का संबंध व्यक्तित्व से है। वश्य पांच प्रकार के व्यक्तित्व दर्शाता है। चतुष्पाद, कीट, वनचर, द्विपाद और जलचर। जिस प्रकार मछली वन में नहीं रह सकती या कीट किसी वनचर के साथ मेल नहीं कर सकता उसी प्रकार अलग-अलग वश्य के वर-वधू भी आपस में मेल-जोल से नहीं रह सकते। तारा: तारा का संबंध मनुष्य के भाग्य से है। जन्म नक्षत्र से लेकर 27 नक्षत्रों को नौ भागों में बांट कर नौ तारा बनाई गई हैं, जन्म, सम्पत, विपत, क्षेम, प्रत्यरि, साधक, वध, मित्र और अतिमित्र। वर के नक्षत्र से वधू के नक्षत्र तक और वधू के नक्षत्र से वर के नक्षत्र तक तारा गिनने पर विपत, प्रत्यरि और वध नहीं होनी चाहिए, शेष तारा ठीक होती हैं। योनि: योनि का संबंध सीधे सेक्स से है। विभिन्न जीव-जंतुओं के आधार पर तेरह योनियां मानी गयी हैं जैसे अश्व, गज, मेष, सर्प, श्वान, मार्जार, मूषक, महिष, व्याघ्र, मृग, वानर, नकुल और सिंह। हर नक्षत्र को एक योनि दी गई है। इसी के अनुसार व्यक्ति का मानसिक स्तर बनता है। विवाह में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण योनि पर निर्भर करता है। शरीर संतुष्टि के लिए योनि मिलान का विशेष महत्व है। राशीश: राशि का संबंध मनुष्य के स्वभाव से है। स्वभाव मनुष्य की राशि पर निर्भर करता है। वर-वधू की जन्मकुंडली में दोनों की परस्पर राशियों के स्वामियों की मित्रता प्रेम भाव को बढ़ाती है और जीवन को सुखमय और तनावरहित बनाती है। गण: गण का संबंध व्यक्ति की सामाजिक स्थिति को दर्शाता है। ग्रह नक्षत्रों के अनुसार गण तीन प्रकार के होते हैं। देव, राक्षस, मनुष्य। देव प्रवृत्ति का मनुष्य सात्विक, धार्मिक होगा, राक्षस प्रवृत्ति का मनुष्य क्रोधी, तामसिक होगा, मनुष्य प्रवृत्ति का मनुष्य मिश्रित प्रवृत्ति का होगा। सामाजिक स्तर में मेल होना आवश्यक है, इससे आपसी प्रेम भाव बढ़ता है। भकूट: भकूट का संबंध जीवन अर्थात आयु से है। विवाह उपरांत वर-वधू की राशि के अनुसार एक दूसरे का संग कितना रहेगा, भकूट निर्णय करता है। वर, वधू की कुंडलियों में राशियों का भौतिक संबंध जीवन को लंबा करता है, इस लिए भकूट आवश्यक माना गया है। नाड़ी: नाड़ी का संबंध संतान से है। वर-वधू के शारीरिक संबंधों से उत्पत्ति कैसी होगी, नाड़ी पर निर्भर करती है। शरीर में रक्त प्रवाह और ऊर्जा का विशेष महत्व है जो विवाह उपरांत अधिक आवश्यक है। वर-वधू की ऊर्जा का मिलान नाड़ी से होता है जो तीन प्रकार की मानी गई है। आदि, मध्य, अन्त्य। यदि वर-वधू दोनों की नाड़ी एक ही है तो नाड़ी दोष माना जाता है। क्योंकि समान चुंबकीय ध्रुव एक दूसरे को धकेलते हैं वैसे ही शरीर की आंतरिक समानता गर्भ धारण में उलझन पैदा कर सकती है। इसलिए नाड़ी मिलान अति आवश्यक है। प्रश्न: अष्टकूट जातक की चंद्र राशि एवं नक्षत्र पर निर्भर करता है। क्या अन्य ग्रहों का कुंडली मिलान में कोई योगदान नहीं है? उत्तर: अन्य ग्रहों का भी कुंडली में योगदान है लेकिन चंद्र को इतना महत्व इसलिए दिया जाता है क्योंकि यह ग्रह पृथ्वी के सबसे नजदीक है। मानव पर चंद्र का प्रभाव सबसे अधिक रहता है। प्रश्न: क्या अष्टकूट मिलान वर-वधू के विवाह के लिए काफी है या कुछ और भी मिलान करना चाहिए? उत्तर: अष्टकूट मिलान ही विवाह के लिए काफी नहीं है। फिर भी अष्टकूट मिलान का विशेष महत्व है। अष्टकूट मिलान विवाह उपरांत परस्पर संबंधों को दर्शाता है जो महत्वपूर्ण हैं। इसके अतिरिक्त कुंडली में मंगली दोष एवं परस्पर अन्य ग्रहों की स्थिति भी देखी जानी चाहिए। सप्तम भाव, सप्तमेश, सप्तमभाव में बैठे ग्रह, सप्तम भाव और सप्तमेश को देख रहे ग्रह और सप्तमेश की युति आदि देखना बहुत आवश्यक है। प्रश्न: मंगली दोष से क्या अभिप्राय है? उत्तर: कुंडली में मंगल की स्थिति यदि लग्न और चंद्र से 1, 4, 7, 8, 12 भावों में हो तो कुंडली को मंगली माना जाता है। यदि वर एवं कन्या दोनों एक ही श्रेणी के मंगली न हों तो मंगली दोष होता है जो अनिष्ट की संभावना व्यक्त करता है। प्रश्न: मंगल हमेशा शुभता का चिह्न रहा है तो कुंडली में मंगल की इन स्थितियों से भय क्यों? उत्तर: मंगल वास्तव में शुभता का चिह्न है, इससे भयभीत नहीं होना चाहिए। मंगल शुभता और ऊर्जा का कारक है। उपर्युक्त स्थितियों में मंगल जातक को विशेष सफलता प्रदान करता है। ऐसे जातक का बुद्धि-विवेक भी विशेष रहता है। मंगली मिलान में वर-वधू दोनों की ऊर्जा का मिलान होता है। यदि दोनों की ऊर्जा बराबर होगी तो जीवन में परस्पर संबंध मजबूत बनेंगे और गृहस्थ जीवन सफल रहेगा। प्रश्न: क्या मंगली का विवाह मंगली से ही होना चाहिए? उत्तर: यह आवश्यक नहीं की दोनों मंगली हों। यदि कुंडली में शुभ ग्रह की दृष्टि या मंगल की स्वगृह या उच्चादि में स्थिति के कारण या दूसरी कुंडली में अन्य ग्रहों के कारण मंगली दोष भंग हो रहा हो तो भी यह विवाहार्थ मान्य होता है। प्रश्न: क्या मंगली होना मंगल का ही दोष है या किसी और ग्रह से भी कुंडली मंगली हो सकती है? उत्तर: कुंडली के मंगली होने का संबंध सप्तम भाव की अनिष्टता से है। इसका दोषी मंगल ही नहीं अन्य ग्रह भी हो सकते हैं। सप्तम भाव में अकारक ग्रह का बैठना भी कुंडली को मंगली बना सकता है अर्थात अनिष्ट कर सकता है। शनि, सूर्य भी यदि सप्तम भाव में अशुभ प्रभाव दे रहे हों तो सप्तम भाव को खराब करते हैं। प्रश्न: मंगली भंग योग क्या है? उत्तर: यदि गुरु या अन्य शुभ ग्रह सप्तम भाव पर दृष्टि रखे या बैठे तो मंगल दोष भंग हो जाता है। यदि मंगल योगकारक हो कर इन भावों में बैठे तो भी मंगल दोष भंग होता है। मंगल स्वग्रही या अपनी उच्च राशि में हो या लग्न या चंद्र कुंडली में मेष या वृश्चिक राशि हो तो भी मंगली दोष भंग हो जाता है। प्रश्न: मंगल दोष का प्रभाव किसी खास आयु तक रहता है या पूरी जिंदगी? उत्तर: मंगल की स्थिति तो कुंडली में वैसी ही रहेगी, वह नहीं बदल सकती। हां, जातक पर उसका प्रभाव कुछ कम होने लगता है। जैसे अंगारा धीरे-धीरे ठंडा होता है वैसे ही जैसे-जैसे इंसान की आयु बढ़ती है, उसकी सूझ-बूझ में भी अंतर आता है और उसका आक्रोश धीरे-धीरे कम होता चला जाता है। लेकिन मंगल की दशा जिस जीवन काल में आएगी, अपना प्रभाव दिखाएगी। प्रश्न: क्या मंगली दोष निश्चित तौर पर संबंध विच्छेद करता है? उत्तर: संबंध विच्छेद होगा या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कि मंगल दोष का प्रभाव कुंडली में कितना प्रबल है। प्रश्न: मंगल दोष का प्रभाव कितना है, यह कैसे जानें? उत्तर: मंगल दोष के प्रभाव को जानने के लिए अन्य ग्रहों की स्थितियों को भी जान लेना आवश्यक है। मंगल पर शुभ ग्रहों की दृष्टि और युति मंगल दोष को कम करती है। सप्तमेश की स्थिति, सप्तमेश पर शुभ ग्रहों की दृष्टि और युति, सप्तम भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि एवं स्थिति, यह सब मंगल दोष को कम करते हंै। यदि सप्तमेश एवं सप्तम भाव दोनों शुभ ग्रहों के प्रभाव में हैं और मंगल का दोष भी बन रहा है तो ऐसा मंगल दोष प्रभावहीन हो जाता है। प्रश्न: क्या नाड़ी दोष होने पर विवाह नहीं करना चाहिए या कुछ परिस्थितियों में किया जा सकता है? उत्तर: नाड़ी दोष का प्रभाव विशेषकर संतान पर पड़ता है। इसलिए आमतौर पर यही धारणा है कि नाड़ी दोष होने पर विवाह न करें लेकिन यदि नाड़ी दोष होने पर नक्षत्र चरण भेद हो या नक्षत्र के स्वामियों में परस्पर मित्रता हो या राशियों के स्वामियों में परस्पर मित्रता हो और कुंडली में इन स्वामियों की स्थिति शुभ भाव में हो तो नाड़ी दोष का प्रभाव समाप्त हो जाता है। इसलिए ऐसी स्थिति यदि बने तो विवाह कर लेना चाहिए। कोई हानि नहीं होगी। नाड़ी दोष होने पर वर-वधू दोनों की जन्मकुंडलियों में संतान योग अवश्य देख लें। यदि संतान योग दोनों में उत्तम है तो नाड़ी दोष का प्रहार नहीं होगा। प्रश्न: भकूट दोष होने पर विवाह कब किया जा सकता है? उत्तर: भकूट दोष का प्रहार वर-वधू के आपसी संबंधों पर पड़ता है। भकूट दोष होने पर यदि राशियों के स्वामियों में परस्पर मित्रता हो तो भकूट दोष प्रहारहीन हो जाता है जिस से विवाह उपरांत वर-वधू के जीवन पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता। प्रश्न: गण मिलान को कितना महत्व देना चहिए? उत्तर: गण मिलान का वर-वधू की सामाजिक स्थिति पर प्रभाव पड़ता है, जिसके न मिलने से आपसी तनाव बना रहता है। इसलिए गण के मिलान को पूरा महत्व देना चाहिए। यदि अन्य गुण मिलान में 18 से अधिक गुण मिल रहे हों और गण दोष भी हो तो विवाह किया जा सकता है। प्रश्न: राशीश या ग्रहमैत्री मिलान को कितना महत्व देना चाहिए? उत्तर: ग्रह मैत्री अर्थात राशि के स्वामियों में यदि आपसी मैत्री है तो वह कई दोषों को दूर कर देती है। इसलिए मिलान में किसी भी प्रकार का दोष हो और राशियों के स्वामियों में परस्पर मित्रता हो तो विवाह की अनुमति दे देनी चाहिए। प्रश्न: क्या योनि मिलान भी महत्वपूर्ण है? उत्तर: योनि मिलान का विवाह में विशेष महत्व है क्योंकि इस का सीधा संबंध सेक्स से है। कभी-कभी विवाह उपरांत वर-वधू दोनों में शारीरिक तनाव इतना बढ़ जाता है कि परिस्थितियां तलाक तक पहुंच जाती हैं। इसलिए इसका मिलान विशेषकर होना चाहिए। लेकिन यदि योनि मिलान में कम अंक या शून्य प्राप्त हो तो राशियो ंके स्वामियों की मित्रता होने पर विवाह कर देना चाहिए, कोई विशेष तनाव नहीं होगा। प्रश्न: तारा, वश्य, और वर्ण दोष होने पर क्या विवाह उपरांत कोई विशेष हानि होती है? उत्तर: तारा, वश्य और वर्ण का मिलान भी उत्तम हो तो सोने पर सुहागे वाली बात है। लेकिन यदि यह मिलान शुभ न भी हो और अन्य गुण मिलान शुभ हांे तो विवाह उपरांत कोई विशेष हानि नहीं होती है। प्रश्न: कभी-कभी देखा गया है कि गुण मिलान भी विशेष उत्तम है, मंगल दोष मिलान भी उत्तम है, फिर भी विवाह उपरांत तनाव और तलाक तक बात पहुंचती है। क्यों? उत्तर: गुण मिलान तो वर-वधू के चंद्र राशि, नक्षत्र से ही मिलाये जाते हैं और मंगल दोष भी लग्न और चंद्र के अनुरूप ही होता है। लेकिन कुंडली में अन्य ग्रह भी हैं जिन को प्रायः गुण मिलान के समय नहीं देखते हैं। ये ग्रह भी महत्वपूर्ण हैं। यदि सप्तम भाव में बैठे अन्य ग्रह, सप्तम भाव को देख रहे ग्रह, सप्तमेश के संग बैठे और सप्तमेश को देख रहे ग्रह गृहस्थ जीवन को उथल-पुथल कर रहे हैं तो गुण मिलान जितने भी मिल जाएं, गृहस्थ जीवन पर बुरा असर पड़ता है। इसलिए गुण मिलान और मंगल दोष के अतिरिक्त अन्य ग्रहों का भी भलीभांति मिलान कर लेना चाहिए ताकि किसी प्रकार की हानि न हो। यदि गुण मिलान में अंक कम भी प्राप्त हैं और कुंडलियों के अन्य ग्रहों का तालमेल उत्तम है तो विवाह उपरांत गृहस्थ जीवन आनंदमय रहेगा। प्रश्न: कुंडली मिलान में अशुभ कुंडली के लिए दूसरी भी अशुभ कुंडली ही क्यों देखते हैं? उत्तर: मंगली के लिए मंगली व अन्य ग्रहों से पीड़ित कुंडली के लिए भी वैसी ही कुंडली उत्तम मानी गयी है क्योंकि देव और राक्षस साथ नहीं रह सकते। दोनों की आदतों व विचारों में मतभेद होते हैं। कुंडली मिलान द्वारा हम यही कोशिश करते हैं कि दोनों की एक प्रकार की प्रकृति हो जिससे मतभेद संबंध टूटने की स्थिति में नहीं आएं।


पराविद्याओं को समर्पित सर्वश्रेष्ठ मासिक ज्योतिष पत्रिका  अप्रैल 2006

सभ्यता के आरम्भिक काल से ही फलकथन की विभिन्न पद्धतियां विश्व के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित रही हैं। इन पद्धतियों में से अंक ज्योतिष का अपना अलग महत्व रहा है यहां तक कि अंक ज्योतिष भी विश्व के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग रूपों में प्रचलित है तथा इन सब में आपस में ही विभिन्नता देखने को मिलती है। हालांकि सभी प्रकार के अंक ज्योतिष के उद्देश्य वही हैं तथा इनका मूल उद्देश्य मनुष्य को मार्गदर्शन देकर उनका भविष्य बेहतर करना तथा वर्तमान दशा को सुधारना है। फ्यूचर समाचार के इस विशेषांक में अंक ज्योतिष के आधार पर फलकथन को वरीयता दी गयी है। इसमें मुख्यतः कीरो की पद्धति का अनुशरण किया गया है। इसके अन्तर्गत समाविष्ट महत्वपूर्ण आलेखों में- अंक ज्योतिष का परिचय एवं महत्व, अंक फलित के त्रिकोण प्रेम, बुद्धि एवं धन, मूलांक से जानिए भाग्योदय का समय, नाम बदलकर भाग्य बदलिए, हिन्दी के नामाक्षरों द्वारा व्यवसाय का चयन, अंक ज्योतिष का महत्वपूर्ण पहलू स्तूप, अंक एवं आॅपरेशन दुर्योधन, मूलांक, रोग और उपाय, अंक विद्या द्वारा जन्मकुण्डली का विश्लेषण आदि। इन आलेखों के अतिरिक्त दूसरे भी अनेक महत्वपूर्ण आलेख अन्य विषयों से सम्बन्धित हैं। इसके अतिरिक्त पूर्व की भांति स्थायी स्तम्भ भी संलग्न हैं।

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