नवरात्र में यंत्र-मंत्र पूजा द्वारा देवी साधना

नवरात्र में यंत्र-मंत्र पूजा द्वारा देवी साधना  

नवरात्र में यंत्र-मंत्र पूजा द्वारा देवी साधना आचार्य पं. रमेश शास्त्री लो क व्यवहार में वर्ष भर में आश्विन नवरात्र एवं चैत्र नवरात्र की ही अधिक मान्यता है। देवी भक्त इस पुण्य अवसर पर मां भगवती त्रिशक्ति (महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती) स्वरूप दुर्गा के यथाशक्ति के अनुसार व्रत, पूजा, पाठ, जप, ध्यान, साधना करते हैं। देवी की साधना किसी न किसी रूप में प्रत्येक व्यक्ति को अवश्य करनी चाहिए। देवी भुक्ति-मुक्ति दोनों को ही देने वाली हैं। ऐसा कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य की प्रारंभ में शक्ति की साधना के प्रति विशेष रुचि नहीं थी लेकिन जब उन्हें एक दिन भगवती शक्ति का साक्षात्कार हुआ तो उनके हृदय में देवी की भक्ति एवं शक्ति के प्रति परमश्रद्धा एवं विश्वास बने। प्रत्येक प्राणी मात्र के अंदर जो शक्ति है, जिससे व्यक्ति क्रियाशील होता है वह मां भगवती की ही शक्ति है। संसार का कोई भी कार्य बिना क्रिया शक्ति के संचालित नहीं हो सकता है। अतः हमारे जीवन में शक्ति का कितना महत्व है इसका अनुभव हम अपने जीवन में स्वयं कर सकते हैं। देवी भगवती की साधना यदि यंत्र एवं मंत्र के माध्यम से संयुक्त रूप से की जाए तो शीघ्र मनोवांछित सफलता की प्राप्ति होती है, परिवार में सुख-शांति बनती है। धन, ऐश्वर्य, संपत्ति की अभिवृद्धि होती है। शुद्ध ताम्र पत्र पर बने नवदुर्गा यंत्र को प्रथम नवरात्र के दिन अपने पूजा स्थल में स्थापित करके नवमी पर्यन्त इस यंत्र की नित्य पूजा करने से इच्छित फल में आने वाली बाधाओं का निराकरण होता है, पारिवारिक उन्नति, पद, प्रतिष्ठा एवं कार्यक्षेत्र नौकरी, व्यवसाय में लाभ की प्राप्ति होती है। नवरात्र को प्रातःकाल के समय किसी शुद्ध पात्र पर फूल एवं चावल डाल कर, उसके ऊपर इस यंत्र को स्थापित करें तथा सबसे पहले गंगाजल या शुद्ध ताजे जल से स्नान कराएं, फिर दूध, दही, घी, मधु, शक्कर से बारी-बारी अभिषेक करें। फिर शुद्ध जल से अभिषेक करके शुद्ध वस्त्र से पोंछ कर लकड़ी की चैकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उसके ऊपर यंत्र स्थापित करें। ऊँ दुं नवदुर्गायै नमः इस मंत्र से यंत्र पर 108 बार रंगे चावल एवं पुष्प चढ़ाएं, फिर रोली, अक्षत, पुष्प अर्पण करें। धूप, दीप, नैवेद्य, दक्षिणा चढ़ाएं, क्षमा प्रार्थना करके यंत्र के सम्मुख बैठकर निम्न मंत्र का लाल चंदन की माला पर नित्य नवरात्रपर्यंत 11 माला जप करें अथवा दुर्गा अष्टोत्तर शतनामावली का पाठ करें। मंत्र: ऊँ दुं नव दुर्गायै नमः



पराविद्याओं को समर्पित सर्वश्रेष्ठ मासिक ज्योतिष पत्रिका  अप्रैल 2006

सभ्यता के आरम्भिक काल से ही फलकथन की विभिन्न पद्धतियां विश्व के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित रही हैं। इन पद्धतियों में से अंक ज्योतिष का अपना अलग महत्व रहा है यहां तक कि अंक ज्योतिष भी विश्व के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग रूपों में प्रचलित है तथा इन सब में आपस में ही विभिन्नता देखने को मिलती है। हालांकि सभी प्रकार के अंक ज्योतिष के उद्देश्य वही हैं तथा इनका मूल उद्देश्य मनुष्य को मार्गदर्शन देकर उनका भविष्य बेहतर करना तथा वर्तमान दशा को सुधारना है। फ्यूचर समाचार के इस विशेषांक में अंक ज्योतिष के आधार पर फलकथन को वरीयता दी गयी है। इसमें मुख्यतः कीरो की पद्धति का अनुशरण किया गया है। इसके अन्तर्गत समाविष्ट महत्वपूर्ण आलेखों में- अंक ज्योतिष का परिचय एवं महत्व, अंक फलित के त्रिकोण प्रेम, बुद्धि एवं धन, मूलांक से जानिए भाग्योदय का समय, नाम बदलकर भाग्य बदलिए, हिन्दी के नामाक्षरों द्वारा व्यवसाय का चयन, अंक ज्योतिष का महत्वपूर्ण पहलू स्तूप, अंक एवं आॅपरेशन दुर्योधन, मूलांक, रोग और उपाय, अंक विद्या द्वारा जन्मकुण्डली का विश्लेषण आदि। इन आलेखों के अतिरिक्त दूसरे भी अनेक महत्वपूर्ण आलेख अन्य विषयों से सम्बन्धित हैं। इसके अतिरिक्त पूर्व की भांति स्थायी स्तम्भ भी संलग्न हैं।

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