संतान पक्ष को प्रभावित करता है काल सर्प योग

संतान पक्ष को प्रभावित करता है काल सर्प योग  

संतान पक्ष को प्रभावित करता है काल सर्प योग दिलीप कुमार बारह प्रकार के काल सर्प योगों में पद्म नामक काल सर्प योग कुंडली के पंचम भाव से संबंधित है। पंचम भाव संतान, शिक्षा, पूर्वजन्म के कर्म आदि का भाव है। इस योग के कारण संतान सुख में रुकावट आती है, शिक्षा में बाधा उत्पन्न होती है और निरंतर चिंता और परेशानी के कारण जातक का जीवन संघर्षमय बना रहता है। बृहत्पराशर होराशास्त्र के अनुसार निम्नलिखित योगों में सर्प के शाप से संतान हानि होती है। पुत्रस्थानगते राहौ कुजेन च निरीक्षिते। कुजक्षेत्रगते वापि सर्पशापात् सुतक्षयः।। पुत्रेशे राहुसंयुक्ते पुत्रस्थे भानुनंदने। चंद्रेण संयुते दृष्टे सर्पशापात् सुतक्षयः।। कारके राहुसंयुक्ते पुत्रेशे बलवर्जिते। लग्नेशे कुजसंयुक्ते सर्पशापात् सुतक्षयः।। कारके भौमसंयुक्ते लग्ने च राहु संयुते। पुत्रस्थानाधिपे दुःस्थे सर्पशापात् सुतक्षयः।। अर्थात (क्रमशः) Û संतान भाव में स्थित राहु को मंगल पूर्ण दृष्टि से देखे अथवा राहु मेष या वृश्चिक राशि में हो। Û संतान भाव का स्वामी राहु के साथ कहीं भी हो तथा पंचम में शनि हो और शनि को या मंगल को चंद्रमा देखे या उससे युति करे। Û संतानकारक अर्थात पंचम कारक गुरु राहु के साथ हो और पंचमेश निर्बल हो, लग्नेश व मंगल साथ-साथ हों। Û गुरु व मंगल एक साथ हों, लग्न में राहु स्थित हो, पंचमेश छठे, आठवें या 12वें घर में हो। उपर्युक्त सभी सर्प शाप के योग हैं, जिनसे जातक को संतान कष्ट होता है। भौमांशे भौमसंयुक्ते पुत्रेशे सोमनंदने। राहुमंादियुते लग्ने सर्पशापात् सुतक्षयः।। पुत्रभावे कुजक्षेत्रे पुत्रेशे राहुसंयुते। सौम्यदृष्टे युते वापि सर्पशापात् सुतक्षयः।। पुत्रस्था भानुमंदाराः स्वर्भानुशशि जोडंगिराः। निर्बलौ पुत्रलग्नेशौ सर्पशापात् सुतक्षयः।। लग्नेशे राहुसंयुक्ते पुत्रेशे भौमसंयुते। कारके राहुयुक्ते वा सर्पशापात् सुतक्षयः।। अर्थात (क्रमशः) Û संतान भाव में 3.6 राशियां हों, मंगल अपने ही नवांश में हो, लग्न में राहु व गुलिक हो। Û संतान भाव में 1.8 राशियां हों, पंचमेश मंगल राहु के साथ हो अथवा संतानेश मंगल से बुध की दृष्टि या युति संबंध हो। Û संतान भाव में सूर्य, मंगल, शनि या राहु, बुध, गुरु एकत्र हों और लग्नेश व पंचमेश निर्बल हों। Û लग्नेश व राहु एक साथ हों, संतानेश व मंगल और गुरु व राहु एक साथ हों। उपर्युक्त योगों में भी सर्प शाप से संतान नहीं होती अथवा जीवित नहीं रहती। इस कुंडली के जातक पेशे से शिक्षक हैं, लेकिन निःसंतान हैं। बहुत मन्नतें कीं पर कुछ नहीं हुआ। अब जातक सेवानिवृत होने वाले हैं। इस कुंडली में द्वादश भाव का स्वामी शनि संतान भाव में है और द्वादश भाव के स्वामी की दृष्टि संतान भाव के स्वामी चंद्रमा पर है। साथ ही इस पर मंगल की भी दृष्टि है। पुत्रकारक गुरु केतु से युत है। सभी ग्रह राहु-केतु की धुरी में फंसे हैं अर्थात काल सर्प योग है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि सर्प शाप के कारण संतति नहीं हुई। इस जातक ने सर्प शाप से मुक्ति के उपाय अनुष्ठान के रूप में नहीं किए। ओझा-गुनी के चक्कर में समय और धन दोनों बर्बाद किया और अंततः एक बच्ची को गोद लेकर संतोष कर लिया। इस जातक की कुंडली में पद्म नामक काल सर्प योग है। संतान भाव राहु-केतु की धुरी में है। संतान भाव का स्वामी द्वादश भाव में सूर्य के साथ है। राहु-चंद्र की युति काल सर्प योग की तीव्रता दिखाती है। पुत्रकारक गुरु केतु के साथ है अर्थात गुरु राहु-केतु की धुरी में है। शुक्र उच्च राशि में तो है लेकिन राहु के साथ है। चंद्रमा से पंचमेश चंद्रमा राहु के साथ तथा शुक्र से पंचमेश चंद्रमा राहु के साथ है। उपर्युक्त तथ्य से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जातक को सर्प शाप के कारण संतानहीनता है। लेकिन एक बात यह भी है कि चंद्रमा से नवम में मंगल वृश्चिक राशि में है जो वृद्धावस्था में संतान सुख प्रदर्शित करता है। सर्प शाप से मुक्त होकर इस अवस्था में भी संतति प्राप्त की जा सकती है ऐसा आचार्यों का मत है। सर्प शाप से मुक्ति का उपाय महर्षि पराशर ने भी बताया है। इस जातक की पत्नी व परिवार वालों ने ओझा-गुनी के चक्कर में समय व धन बर्बाद किया पर कोई लाभ नहीं हुआ। इस कुंडली की जातका इसलिए परेशान थी कि विवाह के तीन वर्ष बाद भी उसे गर्भ धारण नहीं हो रहा था। वह काल सर्प योग व सर्प शाप से पीड़ित थी। गत वर्ष अगस्त में उसने दोष निवारण के उपाय किए और उसे गर्भ धारण हुआ। इस कुंडली में संतान भाव के स्वामी और संतान के कारक गुरु, जो द्वि तीय भाव में स्थित है, के कारण काल सर्प योग निर्मित हो रहा है। शनि के साथ चंद्रमा युति कर रहा है। जातका नवांश और सप्तमांश कुंडली में बुध से पीड़ित है जो पति में भी दोष साबित करता है। इस कुंडली की जातका को विवाह के आठ वर्ष बाद तक गर्भ धारण में परेशानी हुई, लेकिन अब वह एक पुत्री एवं एक पुत्र के साथ सुखी है। इसकी कुंडली में पंचम व पंचमेश राहु-केतु की धुरी में हैं। शनि नीच राशिस्थ लग्न में है। संतान कारक गुरु पर नीच राशिस्थ शनि की दृष्टि है। पंचम भाव में केतु के साथ क्रूर ग्रह सूर्य, मंगल और नपुंसक ग्रह बुध विद्यमान हैं। विभिन्न चिकित्सकीय उपाय के साथ जब उसने काल सर्प संबंधी उपाय भी किए तो गर्भ धारण हुआ। इस कुंडली में भी पंचम अर्थात संतान भाव में राहु है। संतानकारक गुरु पंचम भाव में राहु के साथ है, साथ ही मंगल भी है। ‘‘कारके राहुसंयुक्ते पुत्रेशे बलवर्जिते। लग्नेशे कुज संयुक्ते सर्पशापात सुतक्षयः।।’’ संतान कारक गुरु राहु के साथ है, पंचमेश सूर्य केतु के साथ राहु-केतु की धुरी में निर्बल है, लग्नेश स्वयं मंगल है जो राहु के साथ है। तात्पर्य यह कि कुंडली सर्प शापित है। कुंडली में बुध की स्थिति ठीक न होने से पति में भी दोष दिखता है। यह स्थिति संतति सुख में बाधक साबित हो रही है।



पराविद्याओं को समर्पित सर्वश्रेष्ठ मासिक ज्योतिष पत्रिका  मार्च 2006

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