ईशान में पूजाघर क्यों

ईशान में पूजाघर क्यों  

भारतीय संस्कृति में नियमित पूजा करने का विधान है। पूजा करने से व्यक्ति के मन एवं मस्तिष्क दोनों ही एकाग्र होते हैं। जीवन में रचनात्मक विकास के लिए मानसिक संतुलन अत्यावश्यक है। व्यक्ति के मस्तिष्क में विचारों का प्रवाह लगातार चलता रहता है। इस प्रवाह में अच्छे एवं बुरे दोनों प्रकार के विचार आते हैं, व्यक्ति को इन दोनों के मध्य ऐसे विचारों का चयन करना होता है जो शुभ हों। शुभ विचार ही मनुष्य को शुभ कार्य करने के लिए प्रेरित करते हैं। वास्तुशास्त्र में प्रत्येक कार्य करने का स्थान निश्चित किया गया है। भवन के अंदर पूजाघर ईशान कोण में बनाने का विधान है। ईशान कोण में वास्तु पुरुष का सिर स्थित है। इस कारण इस स्थान पर मानसिक कार्य करने की ऊर्जा प्राप्त होती है। ईशान कोण पूर्व एवं उत्तर से प्राप्त होने वाली ऊर्जा का क्षेत्र है। इस कोण के अधिपति देवता शिव हैं। शिव व्यक्ति को द्वंद्व में समरूप से रहने की शक्ति प्रदान करते हैं। मनुष्य के जीवन में लाभ, हानि, जय-पराजय, सुख-दुःख आते रहते हैं जिनमें व्यक्ति को संयम की आवश्यकता होती है। ईशान कोण में स्थित शिव व्यक्ति के मानस को शक्ति प्रदान करते हैं। इस स्थान पर पूजा करने से मनुष्य मानसिक तौर पर पुष्ट बनता है। भगवान की आराधना व्यक्ति के अंदर विश्वास उत्पन्न करती है जिससे व्यक्ति शुभ संकल्प से युक्त होता है। ईशान कोण भवन का वह स्थान है जहां प्रातःकालीन सूर्य की किरणें सर्वप्रथम पड़ती हैं। इन किरणों में निहित अल्ट्रावायलेट किरणों में इतनी शक्ति होती है कि वे स्थान को कीटाणु मुक्त कर पवित्र बनाती हैं। पवित्र स्थान पर पूजा करने से व्यक्ति का ईश्वर के साथ तादात्म्य स्थापित होता है जिससे शरीर में स्फूर्ति और शक्ति का संचार होता है। ईशानकोण में स्थित पूजाघर में प्रातःकालीन सूर्य की किरणें अपना प्रभाव छोड़ती हैं। इस दिशा में पूजा करने से पूजा के साथ-साथ शरीर को विटामिन भी मिलते हैं जो मनुष्य के शरीर को स्वस्थ बनाते हैं। इस प्रकार देखा जाए तो इस दिशा में व्यक्ति के तन एवं मन दोनों ही ऊर्जावान बनते हैं। जीवन में यदि हमारे पास स्वस्थ शरीर एवं स्वस्थ मन हों तो हम अपने लक्ष्य को सरलता से प्राप्त कर सकते हैं। अतः इस कोण से प्राप्त होने वाली ऊर्जा के सकारात्मक प्रभाव के कारण ही वास्तुशास्त्र में इस क्षेत्र में पूजाघर बनाना श्रेष्ठ माना गया है। वर्तमान समय में हमारे पास समय का अभाव है। ऐसे में यदि सही दिशा में घर में पूजाघर बनाया जाए तो उससे प्राप्त होने वाले लाभों से जीवन को सुख एवं समृद्धि से युक्त किया जा सकता है।

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रुद्राक्ष एवं सन्तान गोपाल विशेषांक  मई 2006

ऐसा माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के अश्रु कणों से हुई है। ज्योतिष में प्रचलित अनेक उपायों में से रुद्राक्ष का उपयोग ग्रहों की नकारात्मकता एवं इनके दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है ताकि पीड़ा को कमतर किया जा सके। अनेक प्रकार के रुद्राक्षों को या तो गले में या बांह में धारण किया जाता है। रुद्राक्ष अनेक प्रकार के होते हैं। इनमें से अधिकांश रुद्राक्षों का नामकरण उनके मुख के आधार पर किया गया है जैसे एक मुखी, दो मुखी, तीन मुखी इत्यादि। इस विशेषांक में रुद्राक्ष के अतिरिक्त सन्तान पर भी चर्चा की गई है। इस विशेषांक के विषय दोनों है। इसमें रुद्राक्ष एवं संतान दोनों के ऊपर अनेक महत्वपूर्ण आलेखों को सम्मिलित किया गया है जैसे: रुद्राक्ष की उत्पत्ति एवं महत्व, अनेक रोगों में कारगर है रुद्राक्ष, सन्तान प्राप्ति के योग, कैसे जानें कि सन्तान कितनी होंगी, लड़का होगा या लड़की जानिए स्वर साधना से, सन्तान बाधा निवारण के ज्योतिषीय उपाय, इच्छित सन्तान प्राप्ति के सुगम उपाय, सन्तान प्राप्ति के तान्त्रिक उपाय आदि। इन आलेखों के अतिरिक्त दूसरे भी अनेक महत्वपूर्ण आलेख अन्य विषयों से सम्बन्धित हैं। इसके अतिरिक्त पूर्व की भांति स्थायी स्तम्भ भी संलग्न हैं।

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