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भवन में जलीय व्यवस्था

भवन में जलीय व्यवस्था  

येक ग्रह या भवन में जल भंडारण का साधन अत्यंत आवश्यक होता है। जीवन यापन के लिए ही नहीं अपितु भवन निर्माण के लिए भी जल की आवश्यकता होती है। इसलिए निर्माण कार्य प्रारंभ करने से पूर्व जल के भंडारण के लिए कुआं, बोरिंग (नलकूप) खुदवा लेना चाहिए। यदि सार्वजनिक जल वितरण प्रणाली से पानी लेना हो तो भूमिगत टंकी बनवा लेनी चाहिए। जीवन में जल की महत्ता स्वयं सिद्ध है। जल प्राकृतिक ऊर्जा का स्रोत है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मनुष्य का शारीरिक एवं मानसिक प्रक्षालन करता है जिससे मनुष्य का तन एवं मन दोनों स्वस्थ रहते हैं। वास्तु शास्त्र में जलीय व्यवस्था के लिए ईशान कोण का क्षेत्र श्रेष्ठ माना गया है। इसका कारण यह है कि इस स्थान पर प्रातःकालीन सूर्य की किरणें जब जल से संपर्क करती हैं तब जल की प्राकृतिक शुद्धि होती है तथा जल के संपर्क के प्रभाववश इन किरणों की ऊर्जा कई गुणा अधिक हो जाती है। इसका शुभ प्रभाव जीवन पर पड़ता है। शुद्ध जल का उपयोग व्यक्ति एवं भवन दोनों के लिए लाभकारी है। कुआं, बोरिंग, भूमिगत टंकी, वास्तुसम्मत कहां बनाया जा सकता है? इस विषय में वास्तुशास्त्र में शुभ एवं उपयुक्त स्थान बतलाए गए हैं जो इस प्रकार हैं। 1. भूमिगत टंकी बनाने के लिए श्रेष्ठ एवं शुभ स्थान भूखंड का ईशान कोण है। यहां जल स्रोत होने से परिवार को समृद्धि प्राप्त होती है। 2. भूखंड के पूर्वी भाग में जलस्रोत होने से परिवार को सुख-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है। 3. आग्नेय कोण में बोरिंग होने से पुत्र को कष्ट प्राप्त होता है। 4. भूखंड की दक्षिण दिशा में बोरिंग करने से स्त्री को कष्ट होता है। 5. भूखंड के नैऋत्य कोण में जलस्रोत होने से भूस्वामी के लिए मृत्युकारक होता है। 6. भूखंड के वायव्य कोण में बोरिंग बनाने से शत्रु पीड़ा होती है। 7. पश्चिम में बोरिंग करने से सुख की प्राप्ति होती है। 8. भूखंड के उत्तरी भाग में जलाशय बनाना शुभ होता है। 9. भूखंड के मध्य भाग में बोरिंग होने से धन का नाश होता है। अतः भूखंड के ईशान कोण में अथवा पूर्व में, उत्तर या पश्चिम में जलाशय, बोरिंग, भूमिगत टंकी का निर्माण करना चाहिए। वास्तु के सिद्धांत के अनुसार दक्षिण-पश्चिम भाग सदा ऊंचा तथा पूर्वोत्तर भाग सदा नीचा रहना चाहिए। तभी भवन में रहने वालों को सुख एवं समृद्धि की प्राप्ति होती है। ऐसा तभी संभव है जब बोरिंग उत्तर या ईशान में की जाए। बोरिंग, जलाशय इत्यादि पर यदि दिन के दूसरे एवं तीसरे प्रहर में भवन की छाया पड़े तो ऐसा भवन और उसमें बने जलसंसाधन अशुभ होते हैं। इस कारण भी बोरिंग उत्तर एवं पूर्व दिशा अथवा ईशान कोण में ही करनी चाहिए। बहुमंजिले भवनों में जल संसाधन की व्यवस्था इस प्रकार करनी चाहिए कि वह सबके लिए वास्तु अनुसार हितकारी हो। यह कठिन कार्य है परंतु ऐसी स्थिति में बोरिंग प्लाॅट के ईशान क्षेत्र में करने से सुखद फल की प्राप्ति होती है। सही स्थिति के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि इनका निर्माण शुभ मुहूर्त में कराया जाए जिससे अनिष्ट प्रभाव से बचा जा सकता है और गृहस्वामी को शुभ फलदायक हो सकता है। बोरिंग या कुआं खुदवाने के लिए रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, मघा, तीनों उत्तरा, हस्त, अनुराधा, पूर्वाषाढ़, धनिष्ठा, शतभिषा नक्षत्र शुभ होते हैं। चंद्रमा मकर, मीन एवं कर्क राशि में हो, गुरु-बुध लग्न में एवं शुक्र दशम स्थान में हो तब कूप खनन कार्य करना शुभ होता है। सोम, बुध, गुरु और शुक्रवार हो, योग आदि पंचांग के अनुसार शुद्ध हो ऐसे में जलाशय आदि के लिए खुदाई का कार्य करना चाहिए। बोरिंग करते हुए इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि यह मुख्य द्वार के मध्य न हो। बोरिंग के ऊपर पार्किंग नहीं होनी चाहिए। बोरिंग के कारण मुख्य द्वार पर वेध भी नहीं होना चाहिए। इस प्रकार भवन बनाने से पूर्व जल संसाधन के बारे में वास्तुसम्मत निर्णय लेने से भवन रहने वालों के लिए शुभ फलदायक सिद्ध होता है।

रत्न विशेषांक  फ़रवरी 2006

हमारे ऋषि महर्षियों ने मुख्यतया तीन प्रकार के उपायों की अनुशंसा की है यथा तन्त्र, मन्त्र एवं यन्त्र। इन तीनों में से तीसरा उपाय सर्वाधिक उल्लेखनीय एवं करने में सहज है। इसी में से एक उपाय है रत्न धारण करना। ऐसा माना जाता है कि कोई न कोई रत्न हर ग्रह से सम्बन्धित है तथा यदि कोई व्यक्ति वह रत्न धारण करता है तो उस ग्रह के द्वारा सृजित अशुभत्व में काफी कमी आती है। फ्यूचर समाचार के इस विशेषांक में अनेक महत्वपूर्ण आलेखों को समाविष्ट किया गया है जिसमें से प्रमुख हैं- चैरासी रत्न एवं उनका प्रभाव, विभिन्न लग्नों में रत्न चयन, ज्योतिष के छः महादोष एवं रत्न चयन, रोग भगाएं रत्न, रत्नों का शुद्धिकरण एवं प्राण-प्रतिष्ठा, कितने दिन में असर दिखाते हैं रत्न, लाजवर्त मणि-एक नाम अनेक काम इत्यादि। इसके अतिरिक्त स्थायी स्तम्भों के भी महत्वपूर्ण आलेख विद्यमान हैं।

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