रमल भविष्य कथन कि पुरातन पद्वति

रमल भविष्य कथन कि पुरातन पद्वति  

‘रमल’ भविष्य कथन की पुरातन पद्धति आचार्य अविनाश सिंह भविष्य कथन की विभिन्न पद्धतियों में से ‘रमल’ एक बहुत पुरातन पद्धति है जिसका कभी बहुत चलन था लेकिन वर्तमान काल में यह पद्धति लुप्त सी हो रही है। फिर भी कुछ लोग हैं जो इस ‘रमल’ पद्धति के रहस्यों को भलीं भांति समझते हैं और उसे प्रयोग में लाते हैं। ऐसे लोगों की संख्या गिनी-चुनी है। ‘रमल’ पद्धति पर बहुत कम पुस्तकें उपलब्ध हैं और जो है वह अधिकांश उर्दू और फारसी भाषा में है। इसी कारण से इस पद्धति के जानकार कम मिलते हैं। ‘रमल’ शास्त्र (पद्धति) प्रश्नों के उत्तर देने में और भविष्य कथन करने में पूर्णरूप से सक्षम है। प्रश्न: ‘रमल’ पद्धति क्या है? उत्तर: ‘रमल’ अरबी भाषा में बालू अर्थात रेत को कहते हैं। लेकिन व्याकरण अनुसार ‘रमल’ उस विद्या का नाम है जिससे भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञान हो सकता है। इसलिए ‘रमल शास्त्र’ भविष्य कथन करने वाला शास्त्र या पद्धति है। प्रश्न: रमल पद्धति से कुंडली बनाने का आधार क्या ज्योतिष पद्धति से भिन्न है? उत्तर: रमल पद्धति से कुंडली बनाना ज्योतिष कुंडली से बहुत ही भिन्न है। रमल पद्धति का मूल आधार सोलह रूप अर्थात् शक्लें और सोलह ही स्थान है। यह रूप (शक्लें) चार बिंदू ( Û) और रेखा (-) के अनेक क्रम परिवर्तन से उत्पन्न होते हैं। जबकि ज्योतिष पद्धति में नौ ग्रह, बारह राशि बारह भाव पर आधारित है। रमल कुंडली में भी सोलह स्थान और रूप ज्योतिष शास्त्र की कुंडली के भावों और ग्रहों के समान ही है। प्रश्न: रमल पद्धति में यह सोलह रूप कैसे होते हैं और इनके नाम क्या है। उत्तर: रमल पद्धति में सोलह रूप और उनके नाम इस प्रकार है। 1. लह्यान, 2. कब्ज़ुल दाखि़ल , 3 कब्जु़ल ख़ारिज 4. जमात 5. फ़रहा, 6. उक़ला, 7 अंकीस 8. हुमरा, 9 बयाज, 10. नस्त्रुतुल ख़ारिज, 11. नस्त्रुतुल दाखि़ल , 12. अतबतुल ख़ारिज 13. नकी 14. अतबतुल दाखि़ल, 15. इज्जतमा, 16. तारीक । जिस क्रम में यह सोलह रूप रखे गये हैं इसे सकन पंक्ति कहते हैं। यह मूल पंक्ति है। और रमल कुंडली के स्थिर स्थानों के रूप भी यही है। प्रश्न: इन रूपों का संबंध किस से है? उत्तर: हर रूपों का संबंध चार तत्वों से है अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी। यह तत्व रूप के ऊपर से नीचे के क्रम में रहते हैं। सबसे ऊपर ‘बिंदू’ या ’रेखा’ अग्नि तत्व उसके बाद वायु, जल और पृथ्वी तत्व होता है। उदाहरण: अग्नि वायु जल पृथ्वी प्रश्न: रमल पद्धति में तत्वों का क्या महत्व है? उत्तर: रमल पद्धति में तत्वों का ही बहुत महत्व हैं क्योंकि इसके आधार पर ही रूपों की शुभता और अशुभता का अंदाजा लगाया जाता है जो फल कथन में लाभकारी होता है। रूपके जिस तत्व पर ‘बिन्दू’ आता है वह तत्व खुला कहलाता है और जिस तत्व के स्थान पर ‘रेखा’ आती है वह तत्व बंद कहलाता है। इसी तरह जिस रूप में अग्नि तत्व खुला है और पृथ्वी तत्व बंद है खारिज रूप कहलाता है। यह रूप है। जिस रूप में अग्नि तत्व बंद हो और पृथ्वी तत्व खुला हो वह रूप दाखिल कहलाता है यह रूप होते हैं। जिस रूप में अग्नि और पृथ्वी तत्व खुले हों मुन्कलिव कहलाते हैं। यह रूप होते हैं। जिस रूप में अग्नि और पृथ्वी तत्व बंद होते हैं वो साबित कहलाते हैं। यह रूप होते हैं। प्रश्न: तत्वों के अनुसार शुभ-अशुभ रूप (शक्ल) कौन से हैं? उत्तर: तत्वों के अनुसार शुभ अशुभ रूप इस प्रकार है। 1. शुभ रूप (शक्लें) 2. अशुभ रूप 3. सम रूप प्रश्न: सोलह रूपों को तत्वों के आधार पर कैसे बांटा गया है? उत्तर: सोलह रूपों को तत्वों के आधार पर इस प्रकार बांटा गया है। अग्नि रूप वायु रूप जल रूप पृथ्वी रूप प्रश्न: रमल पद्धति अनुसार कुं. डली बनाने की क्या विधि है? उत्तर: रमल पद्धति के अनुसार बनने वाली कुंडली को ‘रमल.प्रस्तार’, रमल.जंत्री भी कहा जाता है। रमल कुंडली बनाने की अनेक विधियां हैं जिनमें रमल कुंडली बनाने के लिए मातृ पंक्ति बनाई जाती है। मातृ पंक्ति बनाने के लिए पांसों, अंकों, ताश के पत्तों और अन्य सरल विधियों से भी बनाई जाती है। लेकिन सर्वश्रेष्ठ विधि पासा द्वारा बनाना ही मानी गई है। प्रश्न: रमल पद्धति में यह ‘पासा’ क्या है? उत्तर: रमल पद्धति में रमल कुंडली बनाने की सर्वश्रेष्ठ विधि पांसा द्वारा ही मानी गई है। यह पांसा सप्त धातु का बनाया जाता है यह 12 तोले से कम नहीं होना चाहिए। जिस दिन, दिन और रात बराबर हों अर्थात सायन मेष की संक्रांति हो उस दिन सोना, चांदी, लोहा, तांबा, जस्ता, सीसा और पारा को एक साथ गला कर चैपहले 8 पांसे बनाए जाते हैं। चार-चार पांसो के मध्य में आर-पार छेद कर एक कील या मोटी तार पर चारों को इस प्रकार पहना देते हैं कि वह कील के चारों ओर आसानी से घूम सके, इसी प्रकार शेष चार पांसों को भी कील पर पहना देते हैं। इस प्रकार 8 पांसे दो कीलों पर अलगअलग चार के ग्रुप में बन जाते हैं। हर चैपहले गुटिका पर निम्नलिखित रूप में खुदवाये जाते है प्रथम पटल पर ‘रू’ , प्रथम पटल के ठीक नीचे वाले पटल पर ‘रूरू’, दूसरा पटल पर ‘∴’, और दूसरे पटल के ठीक सामने ‘’ खुदवाये या उकेरे जाते हैं। प्रश्न: रमल कुंडली बनाने में पांसो का प्रयोग कैसे किया जाता है? उत्तर: जब प्रश्नकत्र्ता प्रश्न करता है तो उस समय पांसे डालकर उस पर अंकित रूपों को ध्यान से देखें। पांसो के प्रयोग में रूप (शक्ल) की गिनती दाहिने से बांये की होती है। हर रूप में चार तत्व अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी होते हैं। मान लें पांसे डालकर पांसे इस प्रकार पड़ें। इन पांसो पर अंकित बिंदूओं को रूपों (शक्लो) में बदलें। दो खड़े बिंदुओं ‘रू’ के स्थान पर रू और दो आड़े पड़े बिंदुओं Û Û के स्थान पर एक रेखा (लकीर) (-) और एक बिंदू (॰) के स्थान पर बिंदू ही रहेगा। इस प्रकार पांसो पर अंकित बिंदुओं से रूप इस प्रकार हो गये यह मातृ पंक्ति के चार रूप है। पांचवें रूप के लिए रूप 1 से 4 के अग्नि तत्व को लेकर ऊपर से नीचे के क्रम में रखते हैं। अब रूप 1 से 4 के अग्नि तत्व क्रमशः ॰, -, ॰, - है। इन्हें ऊपर से नीचे के क्रम में रखा तो प्राप्त हुआ। इसी क्रिया के अनुसार रूप 1 से 4 के वायु तत्व को लिया गया जो उदाहरण में ॰, -, ॰, - है। जब इन्हें ऊपर से नीचे के क्रम में रखा गया तो प्राप्त हुआ यह छठा रूप हुआ। अब 1 से 4 के जल तत्व को लिया गया तो ॰ - - ॰ मिला जिसे ऊपर से नीचे रखने पर प्राप्त हुआ यह सातवां रूप है। इसी प्रकार 1 से 4 के पृथ्वी तत्व को लिया तो ॰, ॰, ॰, - प्राप्त हुआ इसे ऊपर से नीचे लिखा तो प्राप्त हुआ यह आठवे स्थान का रूप हुआ। इस प्रकार मातृ पंक्ति के चार रूप से चार रूप और बन गये अर्थात आठ स्थानों के रूप प्राप्त हो गये। इसी प्रकार शेष आठ स्थानों के रूप प्राप्त आठ स्थानों के रूपों को आपस में गुणा करके प्राप्त हो जाते हैं। जैसे 9वें स्थान के रूप के लिए रूप 1 को 2 से गुणा करें, 10वें के लिए रूप 3 को रूप चार से गुणा करें। 11 वें के लिए रूप 5 और रूप 6 को गुणा करें। 12वें के लिए रूप 7 और 8 को गुणा करे। 13वें के लिए रूप 9 और 10 को गुणा करें। 14वें के लिए रूप 11 और रूप 12 को गुणा करें और 16वें के लिए रूप 15 और रूप 1 को गुणा करें। गुणनफल का नियम यह है कि रेखा ग रेखा = रेखा। बिंदु ग बिंदु = रेखा। बिंदु ग रेखा = बिंदु। इस प्रकार सभी सोलह स्थानों के रूप प्राप्त होने पर रमल कुंडली में इन रूपों को इस प्रकार रखें। रमल कुंडली प्रश्न: ताश के पत्तों से रमल कुं. डली का निर्माण कैसे होता है ? उत्तर: इस विधि में ताश के सोलह पत्ते लें और सोलहो पत्तो पर 1 से 16 अंक लिखें ताश के इन सोलह पत्तों को अच्छी तरह मिलाकर और प्रश्नकत्र्ता के सन्मुख उल्टे रखें। प्रश्नकत्र्ता को एक ताश का पत्ता चुनने को कहें चुने हुए पत्ते के अंक अनुसार रमल कुंडली का प्रथम स्थान और रूप निश्चित करें पुनः उस ताश के सोलह पत्तों को मिलाकर प्रश्नकत्र्ता को दूसरा पत्ता चुनने को कहें दूसरे पत्ते के अंक अनुसार रमल कुंडली के अगले स्थान एवं रूप को निश्चित करें। इसी तरह तीसरे और चाथे स्थान को निश्चित करें चारों स्थानों की संख्या अनुसार संख्याक्रम पर जो रूप सकन पंक्ति में है उसे ग्रहण करने पर मातृ पंक्ति तैयार होगी जिससे रमल कुंडली तैयार की जाएंगी। प्रश्न: रमल कुंडली से फलादेश कैसे किया जाता है ? उत्तर: रमल कुंडली बनाने के बाद फलादेश करने के लिए प्रश्नकत्र्ता के प्रश्न पर ध्यान दें कि प्रश्न रमल कुंडली के किस स्थान से संबंधित है। प्रश्न का संबंध जिस स्थान से होता है उस स्थान पर आए ‘रूप’ और प्रथम स्थान पर आए ‘रूप’ को आपस में गुणा या जोड़ कर जो ‘रूप’ प्राप्त हो प्रश्न का उत्तर उसी तरह कहा जाएगा। यदि रूप शुभ है तो उत्तर सुखद और अशुभ है तो दुखद। प्रश्न: कौन सा ‘रूप’ कार्य सिद्धि के लिए शुभ या अशुभ है यह कैसे जानें ? उत्तर: रमल पद्धति में रूपों को चार भागों में बांटा गया है। यह है दाखिल, खारिज, साबित तथा मुनकलीब। यह चारो ‘रूप’ तत्वों पर निर्भर करता है। दाखिल और साबित हर प्रकार से कार्य सिद्धि को बताता है। खारिज और मुनकलीव कार्य के न होने को दर्शाता है। यह चारों शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के हो सकते हैं जैसे शुभ दाखिल और अशुभ दाखिल। शुभ दाखिल हर प्रकार की कार्य सिद्धि को दर्शाता है। अशुभ दाखिल कार्य होने में रूकावट और मुश्किलों को दर्शाता है लेकिन कार्य.सिद्धि अवश्य होगी। इसी तरह खारिज अथवा मुनकलीब कार्य सिद्धि न होने को दर्शाता है चाहे वह शुभ हो या अशुभ। मान लो प्रश्नकत्र्ता का प्रश्न मकान बनाने या खरीदने से संबंधित है। रमल कुंडली में मकान का स्थान चतुर्थ है अब चतुर्थ स्थान और प्रथम स्थान पर जो ‘रूप’ आते हैं उन्हें आपस में जोड़ लें यदि रूप शुभ दाखिल या साबित है तो मकान अवश्य बनेगा इसी तरह यदि ‘रूप’ अशुभ दाखिल हो तो मकान बनने में रूकावटों या मुश्किलों से मकान बनेगा। यदि ‘रूप’ खारिज या मुनकलीब है तो मकान नहीं बनने के संकेत हैं। प्रश्न: क्या रमल कुंडली से कार्य सिद्धि का समय निर्धारण किया जा सकता है ? उत्तर: रमल कुंडली से समय निर्धारण किया जा सकता है। रमल पद्धति में समय निर्धारण के लिए ‘हर्फा’ कोष्ठकों का उपयोग किया जाता है जो रमल शास्त्र में उपलब्ध होती है। ‘हर्फा’ कोष्ठ सोलह मुख्य ‘रूप’ पर और सोलह स्थानों पर आधारित है जिसमें सोलह ‘रूप’ के अनुसार ‘सोलह’ कोष्ठक हैं और हर कोष्टक में सोलह पंक्तियां है जो कुंडली के सोलह स्थानों को दर्शाती है इन सोलह पंक्तियों में कार्य सिद्धि होने का समय वर्ष माह और दिनों में लिखा हुआ है। इन्हीं की सहायता से समय निर्धारण किया जाता है। प्रश्न: समय निर्धारण कैसे करते हैं? उत्तर: रमल कुंडली बनाकर प्रश्न के आधार पर जो प्रश्न के उत्तर का ‘रूप’ प्राप्त हो उस रूप का ‘हर्फा’ कोष्ठक की सहायता लेनी होगी। अब प्राप्त ‘रूप’ कुंडली के जिस जिस स्थान पर आता है ‘हर्फा’ कोष्ठक में उसी स्थानों की पंक्ति में लिखी अवधि को जोड़ कर जो अवधि प्राप्त हो वही कार्य सिद्धि की अवधि होगी। प्रश्न: क्या एक ही रमल कुंडली से सभी प्रश्नों का उत्तर प्राप्त हो सकता है ? उत्तर: नहीं! एक कुंडली से सभी प्रश्नों का उत्तर नहीं प्राप्त होता।



तंत्र, मंत्र एवं महालक्ष्मी विशेषांक   नवेम्बर 2007

तंत्र मंत्र का आपसी सम्बन्ध, महालक्ष्मी जी की उपासना एवं दीपावली पूजन, तंत्र मंत्र द्वारा धन प्राप्ति, श्री प्राप्ति में सहायक श्री यंत्र, दीपावली पर की जाने वाली तांत्रिक सिद्धियां, श्री सूक्त, लक्ष्मी सूक्त आदि मन्त्रों का महत्व

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