मंत्र-शास्त्र : विश्लेषण, सिद्धि एवं उपासना

मंत्र-शास्त्र : विश्लेषण, सिद्धि एवं उपासना  

व्यूस : 15953 | नवेम्बर 2007
मंत्र-शास्त्र: विश्लेषण, सिद्धि एवं उपासना डाॅ. भगवान सहाय श्रीवास्तव सी भी देवता के नाम अक्षरों के पहले ‘‘¬’’ और पीछे ‘‘नमः’’ लगा देने से उस देवता का मंत्र बन जाता है। जैसे ¬ गणपतये नमः, ¬ नमः शिवाय, ¬ विष्णेव नमः इत्यादि। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में विस्तारपूर्वक बताया है कि मंत्र दिखने में बहुत छोटा। किंतु प्रभाव में बड़ा होता है। वर्तमान समय में भी मंत्रों का जप करने वाले सर्प या बिच्छू के काटे हुए स्थान का विष झाड़कर दूर करते हैं। मंत्र, तीर्थ, ब्राह्मण, देवता, ज्योतिषी, औषधि और गुरु में जिसकी जैसी भावना होती है उसे वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है। ‘‘मंत्र’’ शब्द से प्रेरित शब्द अथवा शब्द समूह को कहते हैं जिसका उच्चारण एक निश्चित लय में करने पर विशेष ध्वनि कंपन वातावरण में उत्पन्न होता है। इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि मंत्र पुनर्भवति पठित सिद्ध: अर्थात जो पठन करने से सिद्ध हो वह मंत्र है। आस्तिक और भावुक वर्ग उन पर विश्वास तो अवश्य करता है किंतु तद्वियक साधारण सिद्धांतों को समझ लेने का प्रयास नहीं करता है। मंत्र शास्त्र का विषय गहन और जटिल है। उसके संबंध में यहां तक लिखा गया है कि ‘‘एतद् गोहयां महागोध्यां न देयं चस्य कस्यचिते तथापि’’। इस विषय की जो विवेचना शास्त्र में की गई हैे वह सुपष्ट व सुग्राह्य है। भारतीय वाङ्मय में मंत्र विद्या को बहुत ऊंचा स्थान दिया गया है। वैदिक साहित्य और बौद्ध साहित्य में इस विषय पर कहा गया है कि जिसका जप अथवा चिंतन करने से अपनी अर्हता के साथ अनुसंधान हो अर्थात अंतर्मन पर प्रभाव हो और उसके द्वारा आत्मा में स्फुटन होने लगे तथा जिसका अंतिम परिणाम जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त हो वही मंत्र है। मंत्र साधना किस मार्ग द्वारा करना चाहिए अर्थात मंत्र किस मार्ग द्वारा सिद्ध हो सकता है यह पहले जान लेना चाहिए। इस संबंध में मंत्र शास्त्र में तीन मार्गो का उल्लेख है, जो ‘‘दक्षिण’’ ‘‘वाम’’ और ‘‘मिश्र’’ कहलाते हैं। सात्विक देवता की सात्विक उपासना मंत्र और सात्विक सामग्री द्वारा करने का जो मार्ग है उसे दक्षिण मार्ग या सात्विक मार्ग कहते हैं। मदिरा, मांस, मीन, भारव और महिला आदि पांच वस्तुओं से युक्त भैरव, भैरवी आदि वामस प्रकृति के देवी देवताओं की साधना और उपासना जिस मार्ग द्वारा हो। जैसे जिस मार्ग में मीन, मदिरा, मांस आदि पदार्थों को प्रत्यक्ष रूप में न ग्रहण कर उनके प्रतिनिधियों से इष्ट की साधना करते हैं। उसे मिश्र मार्ग कहते हैं। पर साधना के वास्तव में दक्षिण और वाम दो ही मार्ग हैं। वाम मार्ग प्रायः तंत्र शास्त्र का विषय है। वाममार्गी प्रायः भैरव और काली आदि देवी देवों के उपासक होते हैं। नौ नाथों को गुरु मानते हैं। गुरु चरण पादुका, श्री चक्र तथा भैरवी चक्र की पूजा करते हैं। परंतु मंत्र शास्त्र के विषय में इतना कहना आवश्यक है कि वाममार्ग का प्रभाव मिश्र मार्ग पर तो पड़ा ही है, दक्षिण मार्ग पर भी इसका कुछ न कुछ प्रभाव अवश्य पड़ा है। तभी से दक्षिण मार्ग वाले भी तामस प्रकृति के देवताओं की आराधना करने लग गए। पुरुषाकृति की आत्मशक्ति ही सच्ची शक्ति है। अतः आत्म तत्व पर विश्वास रखकर उसके प्रभाव को जानकर मंत्र साधना करने वाले दक्षिण मार्ग को भी शक्ति कहा जा सकता है। वाम मार्ग का बल अधिक बढ़ जाने से ही सात्विक मंत्रों और सात्विक देवताओं का भारतीयों द्व ारा सिद्ध होना दुःसाध्य हो गया। मंत्र जप में शब्दों की ऊर्जा और भावना शक्ति के परस्पर मिलन से प्रभाव उत्पन्न होता है। शब्द अथवा ध्वनि की अनुप्रस्थ एवं अनुदैघ्र्य तरंगों का शरीर में प्रवाहित विद्युत की गतिरोध गामिनी तरंगों के साथ जब मिलन हो जाता है तो मंत्र जागृत और सिद्ध हो जाता है। मंत्र को सतत जपने से यही स्थिति आती है। जिस प्रकार संगीत में विभिन्न राग रागिनियां हैं और उनका प्रभाव मानव मस्तिष्क तथा शरीर के विभिन्न भागों पर वातावरण से होता है उसी प्रकार लयबद्ध मंत्रोच्चारण द्वारा विशिष्ट गति उत्पन्न करता है तथा उसकी आत्मशक्ति में विकास होता है। किसी मंत्र के शब्द अथवा अक्षर को बदलकर बोलने से आत्मशक्ति उत्पन्न नहीं होती एवं उस मंत्र का जप निष्फल रहता है। मंत्र के उच्चारण की शुद्धि के बिना मंत्र का जप करना निरर्थक होता है। वेदों में मंत्र को सर्वोच्च सत्ता एवं ब्रह्म के समान मानते हुए निरुक्तकार चास्क मुनि ने लिखा है ‘‘ऋषियों मंत्र द्रष्टारः’’। वेदों के अनुसार ऋषि मंत्र द्रष्टा होते हैं कर्ता नहीं। वेद मंत्रों को किसी ने बनाया नहीं है। यह प्रभु प्रेरित वाणी अविकल रूप से सृष्टि के आदिकाल में दिव्य ऋषियों के विशुद्ध अंतः करण से प्रकट हुई। श्रुत ऋषियों ने इस शृ्रति का गुरु शिष्य की मौखिक परंपरा से साक्षात्कार किया, उनको जाना, समझा और उसका प्रचार किया। प्रणव मंत्र ‘¬’ को विश्व ब्रह्मांड का सूक्ष्म प्रतिरूप कहा जाता है। मंत्रों के आदिग्रंथ ऋग्वेद में सर्वाधिक मान्यता इसी ¬ को दी गई है। महर्षि अरविंद ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि ¬ ईश्वर का प्रतीक है। ¬ की सहायता से ही ईश्वर साक्षात्कार किये जा सकते हैं।’’ इसी प्रकार पातंजलि योग सूत्र में सत्य वाचकः प्रणवः उस ईश्वर का वाचक प्रणव ओंकार है, इसलिये इसको ईश्वर मंत्र कहते हैं। विज्ञान के अनुसार प्रत्येक शब्द से वातावरण में कंपन उत्पन्न होता है तथा ये कंपन युगों-युगों तक तरंगों के रूप में बने रहते हैं। अतः मंत्र का प्रभाव पास बैठे व्यक्ति के चित्त पर ही नहीं अपितु हजारों मील दूर बैठे व्यक्ति पर भी पड़ता है। आज का रेडियो वायुमंडल में समाहित ध्वनियों को पकड़ने का एक सशक्त साधन है, अपनी यांत्रिक रचना के आधार पर वह हजारों मील दूर बोले गए शब्दों को तत्क्षण पकड़कर हमें सुना देता है। वायुमंडल में ध्वनि के अस्तित्व एवं उसकी गतिशीलता का यह प्रबल प्रमाण है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हम मंत्र की शक्ति या चमत्कार से जुड़े होते हैं। मंत्र-सिद्धिः उपासना विधि ः कई मनुष्य अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए देवताओं को वशीभूत करने का प्रयत्न करते हैं। इनमें से अधिकांश विक्षिप्त हो जाते हैं। जो लोग धन प्रतिष्ठा अथवा आगे-पीछे की बातें जानने के लिए देवताओं का अनुष्ठान करते हैं, जो सांसारिक सेवा उनसे लेने को इच्छुक होते हैं उनको देवता कठिनता से सिद्ध हो पाते हैं। वह कोई न कोई ऐसा विघ्न डालते हैं कि जिससे वह क्रिया भ्रष्ट हो जाती है। निष्काम भाव से परमार्थ के लिए जो देवताओं का भजन किया जाता है, वह अवश्य सफल होता है और ऐसा करने वालों पर देवताओं की कृपा अवश्य होती है। हिंदुओं में दुर्गा, हनुमान और भैरव ये तीनों बहुत ही उग्र माने जाते हैं मगर फिर भी सिद्धियों के इच्छुक इन्हीं के पीछे पड़ते हैं। अनेक साधक भैरव के अनुष्ठान में पथभ्रष्ट हो जाने से पागल हो जाते हैं। देखने में आया है कि पथभ्रष्ट होने के कारण हनुमान जी को सिद्ध करने वाले अनेक लोगों का दिमाग खराब हो चुका है। वहीं अनेक लोग देवी को वश में रखने की चेष्टा करने पर विक्षिप्त होते भी देखे गए हैं। आदि शक्ति भगवती जगदंबा से लेकर छोटे से छोटे देवता बिना बुलाए सच्चे साधक के सम्मुख आते हंै और उस पर कृपा करते हैं। जड़ को पकड़ें, जड़ को जल चढ़ाएं, ब्रह्मांडरूपी वृक्ष सब हरा भरा हो जाएगा और आप उसका अमृत फल खाकर अमर बन सकेंगे। मगर यह बात याद रखने की है कि मंत्रोच्चारण अपवित्र अशुद्ध स्थान में करना उचित नहीं। ऐसा करने पर साधना सफल नहीं होती। अपवित्र शरीर और वस्त्र वालों के पास और बुरे, नीच विचारों वाले, अशुद्ध हृदय रखने वालों के समीप देव आत्माएं नहीं आतीं। स्थान, शरीर वस्त्र, आसन और हृदय आदि जहां शुद्ध रहते हैं वहीं भगवती जगदंबा पधारती हैं। मंत्र भगवान के भी हैं और देवताओं के भी। जो लोग मंत्रों द्व ारा देवताओं की उपासना करते हैं और उसके द्वारा किसी लौकिक कार्य को पूरा करना चाहते हैं उन्हीं की गति खराब होती है। किंतु भगवान की ओर चलने वाले, उनके मंत्रों के अनुष्ठान करने वाले, उन्हें लाखों ही नहीं करोड़ों की तादाद में जपने वाले कभी असफल नहीं होते। भगवान तो दयालु हैं। वह तो हम सब पर पुत्रवत स्नेह रखने वाले हैं। गायत्री, ¬ नमो भगवते वासुद. ेवाय, इत्यादि भगवान के ही मंत्र हैं। इनमें से किसी का जितना चाहें, जिस अवस्था में चाहें जप करें। इससे कभी कोई हानि नहीं बल्कि लाभ ही लाभ होते हंै। मातृभाव व सखा भाव से भजने से कोई अनिष्ट नहीं होगा। सभी शक्तियां मिल जाएंगी, सभी देवता वशीभूत हो जाएंगे। सारे कार्य सिद्ध होंगे, लोक और परलोक दोनों बनेंगे। उपासना: संसार की प्रत्येक वस्तु को विश्व जननी प्रकृति माता ने दो भागों में बांटा है- एक नाम और दूसरा रूप। नाम को ही शब्द कहते हैं। मंत्र का जप, उसके शब्दों का उच्चारण चाहे बाहरी हो या आंतरिक, कर्म की ही श्रेणी में आता है। यद्यपि उच्चारण का भी एक प्रभाव होता है। वह आकाश में कंपन उत्पन्न करके बड़े-बड़े काम कर सकता है। परंतु उसमें परिश्रम और समय बहुत चाहिए। एक बात यह भी है कि जब तक मन इंद्रियों के साथ न हो तब तक कोई काम पूरा नहीं होता। जप अनुष्ठान बहुत ही कठिन है। एक घंटे तक अगर जप किया जाए तो मन भी लगातार एक घंटे उसी ओर रहे, कहीं दूसरी जगह न जाए। दूसरे विचार आते ही जप का प्रभाव नष्ट हो जाता है क्योंकि प्रत्येक कर्म के कुछ नियम होते हैं। यदि उनका पूर्ण रीति से पालन न किया जाए तो क्रिया भ्रष्ट हो जाती है। मंत्र सिद्धि का दूसरा उपाय मंत्र उपासना है। शरीर अपवित्र होने और मंत्र का अशुद्ध उच्चारण करने पर भी भावपूर्ण उपासना शीघ्र फलवती होती है क्योंकि यह केवल मन का साधन है। इसमें शरीर से नाता तोड़कर उपासना की ओर चलना पड़ता है, बाहरी जगत में कुछ भी हो रहा है उससे कोई सरोकार नहीं रहता। शरीर पवित्र और अपवित्र किसी भी दशा में पड़ा हो, मन तो अंतर्जन में विचरता है। अपनी सारी शक्तियों को एक ही केंद्र पर स्थापित कर दूसरे विचारों से, दूसरे कर्मों से अपने को अलग कर लेता है। तन्मयता से मन्मय हो जाने को ही उपासना कहते हैं। विधि: प्रातः काल, सांयकाल और रात्रि में सबके सो जाने के पश्चात एकांत में बैठें। स्थान या तो बस्ती से बाहर रमणीक नदी तट हो जहां दूसरे लोग स्नानादि न कर रहे हों, या अपने ही घर की कोई कोठरी हो जो लिपी पुती साफ हो, उसमें पूजा की सामग्री के अतिरिक्त कोई दूसरा सामन न हो, सुगंधि सुलग रही हो, उसमें न तो कोई आए न जाए और न उसमें कोई व्यावहारिक कार्य हो। आसन पर बैठकर आधे घंटे से एक घंटे तक तक रोज ऐसा ध्यान करें कि जिस मंत्र को आप सिद्ध करना चाहते हैं वह सुनहरे प्रकाश से आपके हृदय के अंदर लिखा हुआ है। जी चाहे तो मन ही मन उसका उच्चारण भी करते जाएं, अगर न चाहे, तो खाली देखते रहें। दृष्टि लक्ष्य को न छोड़ने पाए, मन उसे छोड़कर बाहर विचरने न पाए। ऐसा लागातार त्रिकाल करते जाएं। एक महीने पश्चात आपको मालूम पडे़गा कि मंत्र के अक्षर मिटते जा रहे हैं और एक दिव्य प्रकाश कभी-कभी सम्मुख आ रहा है।

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तंत्र, मंत्र एवं महालक्ष्मी विशेषांक   नवेम्बर 2007

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