नव संवत्सर 2065 - पदाधिकारी ग्रह एवं फल

नव संवत्सर 2065 - पदाधिकारी ग्रह एवं फल  

संवत्सर 2065 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तदनुसार 7 अप्रैल 2008, सोमवार को प्रारंभ हो रहा है। प्लव नामक यह संवत्सर अधिक वर्षा एवं रोगों का कारक है। इसका स्वामी बुध है जो चैत्र मास में धान्य के सम भाव को दर्शाता है। यह संवत्सर वैशाख मास में अधिक उपद्रवों, ज्येष्ठ में अनाजों में मंदे, आषाढ़ में वायु वेग और रोगों, श्रावण में अधिक वर्षा, भाद्रपद में बाढ़ व सस्ते धान्य, अश्विन में गेहूं में महंगाई, कार्तिक और मार्गशीर्ष में अनाजों में मंदे और पौष, माघ तथा फाल्गुन में भावों में गिरावट का सूचक है। संवत्सर का विस्तृत फलादेश करने के लिए 10 आकाशीय पदाधिकारियों के काउंसिल गठन किया जाता है। राजा, मंत्री, सस्येश, धान्येश, मेघेश, रसेश, नीरसेश, धनेश, दुर्गेश और फलेश दस पद हैं जो सूर्यादि सात ग्रहों कोे प्राप्त होते हैं। हर विक्रमी संवत् का ग्रह काउंसिल दूसरे से भिन्न होता है जिसका शुभाशुभ प्रभाव पदाधिकारियों के गुण धर्मों के अनुसार समग्र रूप से पड़ता है। पदाधिकारियों के चयन की विधि इस प्रकार है। राजा- विक्रमी संवत् का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को होता है। जिस दिन विक्रमी संवत् आरंभ होता है, उस दिन के स्वामी अर्थात् वारेश को राजा चुना जाता है। मंत्री- सूर्य द्वादश राशियों में भ्रमण करता हुआ जिस दिन मेष राशि में प्रवेश करता है अर्थात् मेष संक्रांति जिस दिन (वार) होती है, उस दिन के स्वामी को संवत् का मंत्री माना जाता है। (मेष संक्रांति मध्य अप्रैल में आती है) मेघेश- सूर्य जिस दिन आद्र्रा नक्षत्र में प्रवेश करता है, उस दिन (वार) के स्वामी को मेघेश नियुक्त किया जाता है। (सूर्य आद्र्रा नक्षत्र में 22 जून के लगभग प्रवेश करता है) सस्येश- जिस दिन सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करता है अर्थात् जिस दिन कर्क संक्रांति होती है, उस दिन के स्वामी को सस्येश नियुक्त किया जाता है। (कर्क संक्रांति मध्य जुलाई में आती है) दुर्गेश- सूर्य सिंह राशि में जिस दिन प्रवेश करता है अर्थात् सिंह संक्रांति जिस दिन होती है उस दिन के स्वामी को दुर्गेश कहते हैं। (सिंह संक्रांति मध्य जुलाई में होती है) धनेश- सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश के दिन अर्थात् कन्या संक्रांति के दिन के स्वामी को धनेश कहते हंै। (कन्या संक्रांति मध्य सितंबर में होती है) रसेश- सूर्य जिस दिन तुला राशि में प्रवेश करता है अर्थात् तुला संक्रांति जिस दिन (वार) होती है उस दिन के स्वामी को रसेश नियुक्त किया जाता है। (तुला संक्रांति मध्य अक्तूबर में होती है) धान्येश- सूर्य के धनु राशि में प्रवेश अर्थात् धनु संक्रांति के दिन के स्वामी को धान्येश नियुक्त किया जाता है। (धनु संक्रांति मध्य दिसंबर में आती है) नीरसेश- मकर राशि मंे सूर्य के प्रवेश अर्थात् मकर संक्रांति के दिन (वार) के स्वामी को नीरसेश नियुक्त किया जाता है। (मकर संक्रांति मध्य जनवरी में आती है) फलेश- मीन राशि में सूर्य जिस दिन प्रवेश करता है अर्थात् मीन संक्रांति जिस दिन (वार) होती है उस दिन के स्वामी को फलेश कहते हैं। (मीन संक्रांति मध्य मार्च में आती है) पदाधिकारियों की स्थिति के आधार पर देश भर में राजनीतिक उथल-पुथल, सामाजिक एवं भौतिक प्रगति आदि का विचार किया जाता है। सस्येश से चैमासी फसलों का, धान्येश से शीतकालीन फसलों का, मेघेश से मौसम, वर्षा आदि का, रसेश से गुड़, खांड़ और नीरसेश से सभी प्रकार की धातुओं आदि के व्यापार का विचार किया जाता है। इसी प्रकार धनेश से धन-दौलत, कोष, दुर्गेश से देश की सुरक्षा, सीमा पर तनाव और फलेश से फल, फूल, सब्जी आदि का विचार किया जाता है। यदि पदाधिकारियों की स्थिति और आपसी संबंध शुभ हों, तो वर्ष भर शांति और खुशहाली रहती है। इसके विपरीत उनके बीच अशुभ संबंध कई प्रकार के विघ्नों, रुकावटों और अशांति के कारक होते हैं। विक्रमी संवत् 2065 के आकाशीय काउंसिल के पदाधिकारी इस प्रकार हैं- राजा - चंद्र; मंत्री - सूर्य; मेघेश - शनि; सस्येश - बुध; दुर्गेश - शनि; धनेश - मंगल, रसेश - शुक्र; धान्येश - चंद्र; नीरसेश - बुध; फलेश - शनि। संवत् 2065 का राजा चंद्र है। फलतः इस वर्ष मांगलिक और शुभ कार्य अधिक होंगे। वर्षा अधिक व फसलें उत्तम होंगी। जनता में परस्पर सद्भाव बना रहेगा और शासक वर्ग की प्रतिष्ठा बढ़ेगी। सूर्य के मंत्री होेने के कारण देश में कहीं भारी अग्निकांड होने की संभावना है। गुड़ और रसादि पदार्थ महंगे हांेगे। वहीं राजनीतिक पार्टियों में परस्पर वैमनस्य बढ़ेगा। मंगल के धनेश होने के फलस्वरूप महंगाई बढ़ेगी और जनता का आक्रोश भी बढ़ेगा। व्यापार में स्थिरता आएगी, जनता प्रशासन से दुखी रहेगी और गेहूं, चना, धान्य आदि की फसलें खराब होंगी। शनि के दुर्गेश होने से सीमा प्रांतों में सैन्यबल के प्रयोग की संभावना है। सीमवर्ती इलाकों में तनाव के बादल मंडराएंगे। धनेश और दुर्गेश में परस्पर शत्रुता होने से देश की पहले से चली आ रही उलझनें और बढ़ेंगी जिससे देश की आर्थिक स्थिति प्रभावित होगी। टिड्डी दल और चूहों आदि से फसलों को हानि हो सकती है। शनि के मेघेश होने के कारण देश के पूर्ववर्ती और तटवर्ती प्रांतों में भारी वर्षा से धन जन की हानि और कृषि को भारी क्षति होगी। वहीं उŸारी-दक्षिणी प्रांतों में कुछ क्षेत्रों के सूखाग्रस्त होने की संभावना है। 21 जून से 8 अगस्त तक शनि व मंगल की युति के कारण कहीं भारी वर्षा से कृषि एवं धन जन की हानि हो सकती है। बुध के सस्येश होने से वर्षा पर्याप्त मात्रा में होगी और चैमासी फसलों जैसे चावल, गन्ना आदि की खेती लाभदायी होगी। चंद्र के धान्येश होने से शीत कालीन फसलों की कृषि लाभप्रद रहेगी। दूध पर्याप्त मात्रा में होगा। किंतु जनसंख्या में वृद्धि होगी। शुक्र के रसेश होने से गुड़, चीनी, दूध, घी, पर्याप्त मात्रा में होंगे। बुध के नीरसेश होने से रेडिमेड कपड़े, हौजरी का सामान, शंख, चंदन, धातुएं एवं रत्न महंगे होंगे। शनि के फलेश होने से फल एवं पुष्पों की फसलों को शीत में हिमपात से हानि होने के योग बनते हैं। उपर्युक्त फलादेश संवत्सर के शुभाशुभ का संकेत देते हैं। पूर्ण फलादेश ग्रहों की स्थिति और गोचर पर निर्भर करता है।


श्री राम विशेषांक  अप्रैल 2008

श्री राम की जन्म तिथि, समय एवं स्थान तथा अस्तित्व से संबंधित कथा एवं साक्ष्य, श्री रामसेतु एवं श्री राम का संबंध, श्री राम द्वारा कृत –कृत्यों का विवेचन, श्री राम की जन्म पत्री का उनके जीवन से तुलनात्मक विवेचन, श्री राम की वन यात्रा स्थलों का विस्तृत वर्णन

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