चुंबकीय जल एवं लाभ

चुंबकीय जल एवं लाभ  

चुंबक का नाम आते ही प्रायः आंखों के सामने एक लोहे का टुकड़ा आकार लेता है जोकि लोहे को अपने में चिपका लेता है। यह अहसास पुराना है। आधुनिक समाज में इससे अनेक काम यथा इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्राॅनिक, कंप्यूटर आदि सामान चलाने के साथ-साथ रोगों के उपचार में सफल प्रयोग किया जा रहा है। इलाज हेतु चुंबक कई प्रकार के होते हैं। इसके एक सिरे को दक्षिण धु्रव एवं दूसरे सिरे को उत्तरी ध्रुव कहते हैं। प्रायः यह लोहे के या विभिन्न धातुओं के मिश्रण के साथ-साथ-चीनी मिट्टी से भी निर्मित होते हैं। चुंबकों के प्रकार: छड़ चुंबक, बेलनाकर ठोस एवं छेद युक्त, अंगूठी की भांति, चैकोर छेद वाले, बिना छेद वाले, अर्द्धचन्द्राकार, घोड़े की नाल या अंग्रेजी के यू आकार के, वर्गाकार छेद वाले, बिना छेद वाले, प्याले के आकार के। चुम्बकीय जल - रोगों की चिकित्सा में चुंबकों को रोगग्रस्त स्थानों पर स्पर्श कराकर चिकित्सा करने के साथ ही साथ चुंबकीय जल पिलाने का भी विधान है, इससे शीघ्र लाभ होता है। चुंबकीय जल बनाने की विभिन्न विधियां इस प्रकार हैं: Û एक चुंबक लें जो 250-300 ग्राम लोहे को उठा सकता हो। इसे खूब अच्छी तरह साफ करके पानी से भरे कांच के ऐसे पात्र में डालें जिससे वह पूरा डूब जाये, अब इसे किसी कांच के ढक्कन से ही ढंक दें। यह क्रिया सायंकाल की जानी चाहिए और इसे रातभर ऐसा ही पड़े रहने दें। सुबह इस पानी को छानकर किसी कांच के बर्तन में रख लें और आवश्यकतानुसार रोगी को पिलायें। Û कभी-कभी चुंबक के पानी में पड़े रहने पर जंग लग जाती है। इसके निदान हेतु चुंबक को पानी में न डालकर पानी के पात्र के नीचे वर्गाकार या गोलाकार जैसा पात्र हो उस अनुसार चुंबक रख दें। 24 घंटे में चुंबक की तरंगों को ग्रहण कर पानी चुंबकीय जल बन जायेगा। इस विधि की यह विशेषता है कि पानी में किसी भी प्रकार की गंदगी। जंग आदि आने की संभावना नहीं रहती है। यह पानी बनाने के लिये दो कांच के पात्र लेने चाहिये। एक पात्र के नीचे एक चुंबक तथा दूसरे पात्र के नीचे दूसरा चुंबक 24 घंटे के लिए रखें, इसके बाद एक तीसरे कांच के बर्तन में इन दोनों कांच पात्र के जल को मिलाकर उपयोग में लायें। यहां यह ध्यान रखें कि पानी को पहले उबालकर या फिल्टर आदि करके शुद्ध अवश्य कर लें तथा कांच के पात्र को ढंकना न भूलें। Û इस प्रकार का पानी बनाने के लिए ‘यू’ आकार का चुंबक लें और पानी के पात्र में नीचे की ओर दो छोटा छेद करें जिससे उसमें भरा पानी बूंद-बंूद कर गिरायें। अब इस बोतल या पात्र को ऊंचे में टांग दें और इसके नीचे किसी कांच के पात्र में ‘यू’ आकार का चुंबक इस प्रकार रखें कि उस पर पात्र का पानी दोनों सिरों पर गिरे। चुंबक रखे पात्र में भी छेद करें जिससे उसमें बना चंुबकीय जल इस पात्र में एकत्र हो सके। यह एकत्रित जल चुंबकीय जल बना है। Û 20 लीटर पानी का प्लास्टिक का या कांच का भरा हुआ पात्र लें और इस पात्र के पास 1 हजार गास शक्ति का बेलनाकार चुंबक का उत्तरी ध्रुव रख दें। 25 से 30 मितक पात्र में रखें तो जल में चुंबकीय गुण आ जाते हैं। इस पात्र के पास ऐसा ही एक दूसरा चंुबक भी रख दें और पात्र से पानी निकालते रहें और उतना ही दूसरा पानी मिलाते रहें। इस प्रकार से पानी की उपलब्धता बराबर बनी रहेगी। चुंबकीय जल की खुराक: वयस्क लोगों को 50 मि.ली. जल नाश्ते से पहले और दिन तथा रात में खाना खाने के बाद दिया सकता है। बच्चों को मात्र एक दो चम्मच ही चुंबकीय जल देना चाहिये। इस पानी को पानी की भांति नहीं पीना चाहिये क्योंकि यह चुंबकत्व युक्त होता है और अधिक पीने से शारीरिक हानि भी हो सकती है। चुंबकीय जल पीने के लाभ 1. कब्ज नहीं रहता है। (2) पाचन तंत्र क्रिया और स्नायुतंत्र विकार दूर होते हैं। (3) मासिक धर्म चक्र ठीक होता है। (4) रक्त संचार ठीक होता हैं (5) पथरी निकल जाती है। (6) गुर्दे एवं पेशाब संबंधी विकार दूर होते हैं। 7. शारीरिक विकार दूर होकर शरीर में स्फूर्ति आती है।

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रेकी एवं प्राणिक हीलिंग  मई 2016

मई माह के फ्यूचर समाचार वैकल्पिक एवं अध्यात्मिक चिकित्सा पद्धति का समर्पित एक विशेषांक है। ये चिकित्सा पद्धतियां शरीर के पीड़ित अंग को ठीक करने में आश्चर्यजनक रूप से काम करती हैं। इन चिकित्सा पद्धतियों का शरीर पर कोई नकारात्मक प्रभाव भी नहीं पड़ता अथवा इनका कोई साईड इफैक्ट नहीं होता। इस विशेषांक के महत्वपूर्ण आलेखों में सम्मिलित हैंः प्राणिक हीलिंगः अर्थ, चिकित्सा एवं इतिहास, रेकी उपचार:अनोखी अनुभूति है, रेकी: एक अद्भुत दिव्य चिकित्सा, चुंबकीय जल एवं लाभ, मंत्रोच्चार द्वारा - गोली, इंजेक्शन और दवा के बिना इलाज, संगीत से उपचार, एक्यूपंक्चर व एक्यूप्रेशर पद्धति आदि। इनके अतिरिक्त स्थायी स्तम्भों में बहुत से लाभदायक व रोचक आलेख भी पूर्व की भांति सम्मिलित किए गये हैं।

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