एक्यूप्रेशर कितना कारगर

एक्यूप्रेशर कितना कारगर  

व्यूस : 2634 | मई 2016

रोगों तथा विकारों को दूर करने के लिये जितनी चिकित्सा पद्धतियां प्रचलित हुई हैं उनमें एक्यूप्रेशर सबसे पुरानी तथा अधिक प्रभावशाली है। यह पद्धति इसलिए भी अधिक प्रभावी है क्योंकि इसका सिद्धांत पूर्णरूप से प्राकृतिक है। इस पद्धति की एक अन्य खूबी यह है कि प्रेशर द्वारा इलाज बिल्कुल सुरक्षित होता है तथा इसमें किसी प्रकार का नुकसान नहीं होता। इसके अनुसार समस्त रोगों को दूर करने की शक्ति शरीर में हमेशा रहती है। प्राचीन काल में चीन से जो यात्री भारतवर्ष आये उनके द्वारा इस पद्धति का ज्ञान चीन पहुंचा जहां यह पद्धति काफी प्रचलित हुई। चीन के चिकित्सकों ने इस पद्धति को अपनाया और इसे काफी लोकप्रिय किया यही कारण है कि यह चीनी पद्धति के नाम से प्रसिद्ध हुई। एक्यूप्रेशर पद्धति में प्राचीन भारतीय चिकित्सकों में चरक का नाम विशेष रूप से प्रसिद्ध है।

यह पद्धति शारीरिक एवं मानसिक रोगों को दूर करने, रक्त संचार को ठीक करने, मांसपेशियों को सशक्त बनाने तथा तथा संपूर्ण शरीर विशेषकर मस्तिष्क तथा चित्त को शांत रखने के लिए प्रसिद्ध है। कहते हैं कि जुलियस सीजर जो नाड़ी रोग से पीड़ित था एक्युप्रेशर से ही ठीक हुआ। दबाव के साथ मालिश करने से रक्त का संचार ठीक हो जाता है जिस कारण शरीर की शक्ति और स्फूर्ति बढ़ जाती है जिसके कारण विभिन्न अंगों में जमा हुआ विषपूर्ण पदार्थ पसीने, मूत्र तथा मल द्वारा शरीर से बाहर चले जाते हैं जिस से शरीर निरोगी हो जाता है। एक्युप्रेशर का मतलब है- पैर, हाथ चेहरे तथा शरीर के कुछ खास केंद्रों पर दबाव डालना। इन केंद्रों को रिस्पोंस सेंटर या रिफ्लैक्स सेंटर कहते हैं। रोग की अवस्था में इन केंद्रों पर प्रेशर देने से काफी दर्द होता है क्योंकि ये काफी नाजुक होते हैं। प्रत्येक रिस्पोन्स केंद्र का पैरांे, हाथों तथा चेहरों पर लगभग मटर के दाने जितना आकार होता है।

प्रत्येक रिस्पोन्स केंद्र को दबाने से शरीर में रोग की प्रतिक्रिया शक्ति जागृत होती है। यही शक्ति वास्तव में रोग दूर करती है। ऐसा अनुमान है कि छठी शताब्दी में इस पद्धति का ज्ञान सम्भवतः बौद्ध भिक्षुओं द्वारा चीन से जापान पहुंचा। जापान में इस पद्धति को शिआतसु कहते हैं। शिआतसु जापानी शब्द है जो दो अक्षरों - शि-अर्थात अंगुली तथा आतसु अर्थात दबाव से बना है। इस पद्धति से हाथों के अंगूठे तथा अंगुलियों के साथ पीड़ित केंद्रों पर प्रेशर दिया जाता है। अनेक रोगों में एक्यूप्रेशर बिना दवाई तथा बिना आॅपरेशन के रोग निवारण की प्रभावशाली विधि है। हाथ, पैर, चेहरा, कान, पीठ तथा शरीर के कुछ भागों पर प्रमुख केंद्रों पर प्रेशर डालने से ही सारे रोगों को दूर किया जा सकता है। ठीक जांच हो जाने और ठीक प्रेशर देने के कारण सारे रोग शीघ्र दूर हो जाते हैं। अच्छा तो यह है कि रोग की अवस्था में पैर, हाथ, चेहरा, कान तथा पीठ पर स्थित रोग से संबंधित एक से अधिक प्रतिबिंब केंद्रों पर प्रेशर दिया जाय।

ऐसा करने से काफी अच्छा प्रभाव पड़ता है और रोग शीघ्र दूर हो जाता है। कान तथा चेहरे पर विभिन्न एक्यूप्रेशर केंद्रांे पर प्रेशर हाथों के अंगुलियों के साथ देना चाहिये और वह भी धीरे-धीरे और हल्का देना चाहिए। इस प्रकार इन केंद्रों पर किसी प्रकार के किसी उपकरण का प्रयोग नहीं करना चाहिये। एक्यूप्रेशर पद्धति के अनुसार मनुष्य को शारीरिक तथा भावनात्मक रूप से दो पृथक नहीं अपितु एक अभिन्न इकाई माना गया है। इसी सिद्धांत के अनुसार रोग का इलाज किया जाता है। इस पद्धति का दूसरा प्रमुख सिद्धांत वैज्ञानिक आधार है। उसके अनुसार रक्तवाहिकाओं तथा स्नायुसंस्थान की समस्त छोटी-बड़ी नाड़ियों के आखिरी हिस्से हाथों तथा पैरों में होते हैं जिसका संबंध शरीर के सारे अंगों से होता है। इसे आसानी से समझने के लिये सारे शरीर को सिर से लेकर पैर तक 10 भागों मंे बांटें। सिर के मध्य भाग से दाहिनी तरफ 5 भाग में बांटा गया है।

इस पद्ध ति के सिद्धांत के अनुसार रोगों को दूर करने की शक्ति शरीर में सदा रहती है। यह बताना उपयुक्त है कि पैरों से पीड़ित केंद्रों की जांच शीघ्र हो जाती है। पैरों में दिया प्रेशर हाथों में दिये प्रेशर से शीघ्र एवं अधिक असर करता है। इस पद्धति द्वारा विभिन्न प्रतिबिंब केंद्रों की जांच करने से आसानी से पता लगाया जा सकता है कि शरीर के कौन-कौन से अंग अपना कार्य ठीक से नहीं कर रहे या शरीर के किस भाग में कोई रूकावट है। प्रतिबिंब केंद्रों के परीक्षण से केवल कुछ मिनटों में यह पता लग जाता है कि किस अंग में कोई विकार है या रोग का असली कारण क्या है, इसलिये प्रतिबिंब केंद्रों को रोग का दर्पण कहा जाता है। एक्यूप्रेशर रोग दूर करने की आश्चर्यजनक पद्धति है। अनेक पुराने और पेचीदा रोग जो किसी अन्य पद्धति से दूर नहीं होते इस पद्धति द्वारा थोड़े समय में दूर हो जाते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि ईलाज से पहले पैरों तथा हाथों में रोग संबंधी प्रतिबिंब केंद्रों की जांच भली-भांति कर लेनी चाहिए और ठीक तरह से प्रेशर दिया जाना चाहिए। यह पद्धति रोगों को दूर करने की पद्धति नहीं है बल्कि रोगों को दूर रखने की भी पद्धति है। अतः स्वस्थ व्यक्तियों को भी प्रतिदिन हाथों तथा पैरों में सब केंद्रों पर प्रेशर देना चाहिए। इससे व्यक्ति वर्षों तक स्वस्थ रहता है।

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रेकी एवं प्राणिक हीलिंग  मई 2016

मई माह के फ्यूचर समाचार वैकल्पिक एवं अध्यात्मिक चिकित्सा पद्धति का समर्पित एक विशेषांक है। ये चिकित्सा पद्धतियां शरीर के पीड़ित अंग को ठीक करने में आश्चर्यजनक रूप से काम करती हैं। इन चिकित्सा पद्धतियों का शरीर पर कोई नकारात्मक प्रभाव भी नहीं पड़ता अथवा इनका कोई साईड इफैक्ट नहीं होता। इस विशेषांक के महत्वपूर्ण आलेखों में सम्मिलित हैंः प्राणिक हीलिंगः अर्थ, चिकित्सा एवं इतिहास, रेकी उपचार:अनोखी अनुभूति है, रेकी: एक अद्भुत दिव्य चिकित्सा, चुंबकीय जल एवं लाभ, मंत्रोच्चार द्वारा - गोली, इंजेक्शन और दवा के बिना इलाज, संगीत से उपचार, एक्यूपंक्चर व एक्यूप्रेशर पद्धति आदि। इनके अतिरिक्त स्थायी स्तम्भों में बहुत से लाभदायक व रोचक आलेख भी पूर्व की भांति सम्मिलित किए गये हैं।

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