चेतना का विकास ही ध्यान

चेतना का विकास ही ध्यान  

व्यूस : 5037 | मई 2007
चेतना का विकास ही ध्यान स्वामी ट्टतजानंद मेडिटेशन शब्द को भारत में ठीक उस अर्थ में नहीं समझा जाता, जैसा पाश्चात्य देशों में समझा जाता है। वेदांत में एक अन्य समाना. र्थक शब्द का प्रयोग किया जाता है, जो उसके वास्तविक अर्थ के अत्यंत निकट आता है। वह है ‘ध्यान’ अथवा ‘निदिध्यासन’ या संभवतः ‘उपासना’। मेडिटेशन में सामान्यतः केवल एक ही आध्यात्मिक लक्ष्य, इष्ट अथवा तत्संबंधी किसी भाव का चिंतन किया जाता है। ध्यान में किसी अन्य विषय का चिंतन किए बिना मन को तीव्रतापूर्वक आध्यात्मिक लक्ष्य में निविष्ट किया जाता है। इस साधना पद्धति को पातंजलि योग सूत्रों से अच्छी तरह समझा जा सकता है। इसका उद्देश्य एक मनातीत आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त करना है। अतः बुद्धि से ऊपर के स्तर तक पहुंचने की संभावना में यदि विश्वास न किया जाए तो कम से कम वेदांत में ध्यान की कोई उपयोगिता नहीं है। एक वेदांती की यह मान्यता होती है कि ध्यान परमात्मा के साथ सीधा संपर्क कराने में समर्थ है। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु समस्त सांसारिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति का त्याग आवश्यक है। यही नहीं विक्षेपकारी विचारों के प्रति झुकाव का त्याग भी आवश्यक है। ध्यान के इच्छुक व्यक्ति को स्वयं पर पूर्ण स्वामित्व अर्जित करना चाहिए। तथा उसमें आध्यात्मिक लक्ष्य के प्रति तीव्र लालसा होनी चाहिए। निर्धारित लक्ष्य इष्ट कहलाता है। ध्यान करना आवश्यक क्यों है? इसका उत्तर है, परमात्मा को पाने के लिए। ध्यान करने वाले परमात्मा को पाना चाहते हैं। इन लोगों का यह विश्वास होता है कि वही उनके लिए सर्वोत्तम वस्तु है, वही जीवन का चरमलक्ष्य है। भारत में यह मुक्ति कहलाता है। यह भी उल्लेख करना आवश्यक है कि ध्यान में मन को अत्यंत एकाग्र, सूक्ष्म तथा यथासंभव कुशाग्र होना चाहिए। ऐसा होने पर वह तीक्ष्ण अन्तर्दृष्टि का रूप ले लेता है। एक ओर तीव्र एकाग्रता होती है और दूसरी ओर गहनतम ध्यान का सार-सर्वस्व, तीक्ष्ण, परिमार्जित अन्तर्दृष्टि। ऐसा होने पर व्यक्ति सामान्य जीवन से पूरी तरह पृथक हो जाता है। प्रारंभ में जप ध्यान की साधना अत्यंत कठिन होती है, क्योंकि हमारा मन नाना प्रकार की भावनाओं और विचारों का अभ्यस्त होता है। इसके साथ अतीत के अनुभवों की ही नहीं, अपितु निकट जीवन के अनुभवों की भी स्मृतियां जुड़ जाती हैं। इन सारी बातों से आध्यात्मिक विषय पर मन को एकाग्र करना कठिन हो जाता है। आध्यात्मिक आदर्श का इष्ट के ध्यान में निमग्न होने के लिए बहुत कम लोग अपने मानसिक क्रियाकलापों से स्वयं को अलग करने के इच्छुक होते हैं। लेकिन इष्ट प्राप्ति के इच्छुक निष्ठावान लोगों के लिए विभिन्न विचारों से मन को शुद्ध करने का एक प्रभावशाली उपाय है। यह है आत्मनिरीक्षण और आत्मविश्लेषण् ा। गहन आत्मनिरीक्षण तथा सावध् ाानीपूर्वक आत्मविश्लेषण करने से मनोजगत की समस्त बुराइयों को दूर किया जा सकता है। प्रारंभ में यह कठिन होता है क्योंकि हम स्वयं का निष्पक्ष निरीक्षण नहीं कर पाते तथा अपने दोषों को आसानी से स्वीकार नहीं करते। कई बार लोग अपने दोषों को खोजने के प्रयास की समस्याओं को नहीं समझ पाते। वे अपनी कमजोरियों को छुपाने की मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति को नहीं पकड़ पाते। ऐसे लोग वस्तुओं का निरीक्षण करने वाली अपनी ही दृष्टि को स्वयं आवरित कर देते हैं। वे यह नहीं जानते कि वे वस्तुओं का सही आकलन नहीं करते हैं, बुरा व्यवहार करते हैं और यह कि उनका अपने ही मानसिक उद्देश्यों और भावों का आकलन न तो स्पष्ट है और न ही सटीक है। इसी कारण ऐसे साधक अपने दोषों की आलोचना सहन नहीं कर पाते। अगर उन्हें इस तरह की भत्र्सना सुननी पड़े तो उनके अहंकार को चोट पहुंचती है। इससे मन को दुर्बल बनाने वाली प्रवृत्तियों के विश्लेषण की सहायता से आत्मनिरीक्षण का अभ्यास और भी कठिन हो जाता है। जब एक शिष्य अपने गुरु के निर्देशों का पालन करना स्वीकार करता है तो वह गुरु के समक्ष अत्यंत दीनता का ही नहीं अपितु गुरु में पूर्ण आस्था का भी प्रदर्शन करता है, जो उसे गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण में समर्थ बनाता है। गुरु के निकट रहते हुए शिष्य को बहुत सी कठिनाइयों को पार करना पड़ता है क्योंकि उसके अहंकार को गुरु से निरंतर ठेस लगती रहती है। इसके कारण उसे स्वाभाविक ही कष्ट होता है। लेकिन ऐसी परीक्षाओं के बाद वह अपने मन को एक द्रष्टा के रूप में निरीक्षण करना सीख जाता है। साथ ही उसे यह भी अनुभव होता है कि उसके गुरु वह व्यक्ति हैं, जिन्होंने उसे दूसरा जन्म, आत्मजगत् में नया जन्म दिया है। वह यह भी समझने लगता है कि गुरु प्रदत्त यह भेंट वस्तुतः अमूल्य है। इस बोधोदय के क्षण में प्रायः शिष्य अपने गुरु का ध्यान करता है। गुरु के अतिरिक्त कौन शिष्य में इतना आंतरिक ज्ञानालोक जाग्रत कर सकता है? स्वयं स्वतंत्ररूप से ठीक-ठीक आत्मनिरीक्षण कर पाना बेहद कठिन कार्य है। अतः अधिकांश साधक मंत्र की सहायता से एकाग्रता के उपाय अर्थात् अत्यंत शक्तिशाली माने जाने वाले कुछ पवित्र शब्दों के जप तथा उनके अर्थ-चिंतन का आश्रय लेते हैं। यहां तक कि बच्चों को भी जप करने का निर्देश दिया जाता है और वे उसकी साधना जीवन भर करते हैं। निष्ठापूर्वक मंत्र जप करने वालों को लाभ होता है और वे साधना पथ पर प्रगति करते हैं। स्वाभाविक ही बहुत कुछ साधक की लगन और एकाग्रता की क्षमता पर निर्भर करता है। भारत में सभी धर्मशास्त्र मंत्र और परमात्मा तक पहुंचने का एक प्रभावशाली उपाय मानते हैं। वेद और उपनिषद् इसका उपदेश बहुत पुरातन काल से देते आए हैं, और ऐसा कहा जाता है कि जब भक्त जप साधना करता है तब भगवान स्वयं उसकी सहायता हेतु आते हैं। अतएव इस पद्धति में चित्तशुद्धि एकमात्र जप से ही होती है। इस जप साधना की सहायता से साधक सांसारिक अनुभवों के प्रति अपने आकर्षण तक को दूर करने में समर्थ हो सकता है। मंत्र का चिंतन करते समय शब्दों के महत्व का चिंतन नहीं किया जाता क्योंकि मंत्र स्वयं इष्ट-स्वरूप हैं। मंत्र का जप करने से इष्ट के साथ सीधा संपर्क स्थापित होता है। अतः गहरी भावना के साथ तीव्र एकाग्रता का अभ्यास आवश्यक है। इष्ट को अपने संपूर्ण हृदय से प्रेम करना चाहिए। हमारा इष्ट परमात्मा का वह रूप है, जो विशेष रूप हमारे मन के अनुकूल हो। वह हमारे दृष्टिगोचर होता है। हम कहते हैं ‘दृष्टिगोचर होता है’ क्योंकि अनंत होते हुए भी वह सगुण साकार माना गया है। वस्तुतः निराकार का दर्शन हो नहीं सकता। अतः हम ऐसे एक रूप अथवा रूपों का चयन करने को बाध्य होते हैं, जो हमारे स्वभाव से सर्वाधिक मिलता हो। उदाहरणार्थ कुछ भक्त ईश्वर की शक्तिमत्ता के प्रति आकृष्ट होते हैं। कुछ प्रेम और अन्य मृदुता, ज्ञान आदि के प्रति। इष्ट का चयन करते?

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