वास्तु विद्या एवं कला की प्राचीनता एवं आधुनिक काल में उपयोगिता

वास्तु विद्या एवं कला की प्राचीनता एवं आधुनिक काल में उपयोगिता  

मानव की भवन सम्बन्धी आवष्यकता मानव सभ्यता जितनी ही प्राचीन है। वास्तु कला का विकास मानव सभ्यता के विकास का इतिहास है। वास्तु षब्द का अर्थ मात्र भवन निर्माण नहीं है इसका क्षेत्र बहुत व्यापक है। वास्तु षब्द ग्रामों, पुरों, दुर्गों, पत्तनां ,पुट भेदनों , आवास भवनों एवं निवेष्य भूमि के अर्थों में भी प्रयुक्त होता है। वास्तु विद्या के सुप्रतिष्ठित ग्रंथ मानासार के अनुसार धरा हम्र्य, भवन यान तथा पर्यंक इन चारों का ही बोध वास्तु षब्द से होता है। ‘मयमत’ के अनुसार वास्तु षब्द का अभिप्राय भूमि प्रासाद, यान एवं षयन से है। हम्र्य षब्द भी अति व्यापक अर्थयुक्त है। डाॅ. आचार्य के वास्तु विष्वकोश में कहा गया है कि हम्र्य में प्रासाद, मण्डप, सभा, षाला, प्रपा तथा रंग सभी सम्मिलित हैं। उनके षब्दों में वास्तु कला में सभी प्रकार के भवनों -धार्मिक, आवास योग्य, सेना योग्य तथा उनके उपभवन एवं उपांगों, प्रत्यंगों आदि का प्रथम स्थान है। पुरनिवेष, उद्यान रचना, पण्य(व्यापारिक )स्थानों, पोत स्थानों आदि का निर्माण, मार्ग योजना, सेतु विधान, गोपुर विधान, द्वार निवेष, तोरण विनिवेष, परिखा खनन, वप्रनिर्माण, प्रकार विधान, बल भ्रमयोजना, भित्ति रचना, सोपान निर्माण भी वास्तु षास्त्र का प्रधान अंग है। वास्तु कला में भवन, फर्नीचर, भूषण रचना एवं वस्त्र रचना भी सम्मिलित है। मूर्ति निर्माण कला वास्तु कला की सहयोगी कला है। वास्तु कला, भवन निर्माण, अथवा पुर निवेष क्रे प्रारम्भिक कृत्य जैसे कि भूमि चयन, भू परीक्षा, षंकु स्थापन, दिक्साम्मुख्य एवं आयादि निर्णय भी वास्तु षास्त्र के अंग हैं। वास्तु षब्द का अन्तर्निहित अर्थ है योजना। यही इसका मर्म है। किसी भी रचना, सृष्टि अथवा निर्माण के पूर्व योजना का होना आवष्यक है। समरांगण सूत्रधार अध्याय 2 ष्लोक 4 में कहा गया है कि जगत की सृष्टि के पूर्व ब्रह्मा ने वास्तु की सृष्टि की। वास्तु षास्त्र का प्रधान विषय भवन कला, यन्त्र कला, काष्ठ कला, भूषण कला, आसन, सिंहासन आदि का विधान तथा मूर्तिकला- चित्रकला है। भारतीय वास्तु विद्या के विषय में पर्सी ब्राउन का मत है कि भारतीय वास्तु कला की सर्वप्रमुख विषेषता उसकी अध्यात्म निष्ठा है। पत्थरों में भारतीय आत्मा का साक्षात्कार करना भारतीय वास्तु कला की प्रमुख विषेषता रही है। पूर्वी एवं पष्चिमी विद्वानों के गवेषणात्मक तथा अनुसंधानात्मक ग्रंथों तथा इन्डोलोजी में भारतीय वास्तु कला तथा प्रस्तर कला का विकास मौर्य काल से, सम्राट अषोक के राज्य काल से होना सिद्ध किया गया है। परन्तु थोड़ा सा भी विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि सम्राट अषोक द्वारा निर्मित विभिन्न लाटों, स्तूप, चैत्य, तथा षिला लेखों का एकमात्र उद्देष्य बौद्ध धर्म का प्रचार तथा संरक्षण था। वास्तव में तो अषोक के काल से पूर्व सिन्धु घाटी की सभ्यता के समय से ही देष में षिव पूजा प्रचलित थी। अषोक द्वारा निर्मित स्तम्भों पर अंकित चार पषुओं सिंह, बैल, अष्व, तथा हाथी का सम्बन्ध षिव प्रतिमा तथा षक्ति से रहा है। इसमें संदेह करने का न कोई स्थान है न कोई अवसर। उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर भारतीय वास्तु विद्या का जन्म वेदंाग षटक विषेषकर ज्योतिष एवं कल्प से हुआ होना सिद्ध होता है। भारतीय वास्तु कला को स्थापित करने में धर्म की महती भूमिका रही है। इसका मूल कारण भारतीय वास्तु कला का धर्म आश्रित होना ही है। धार्मिक संस्कारां, यज्ञों एवं पूजाओं के सम्बन्ध में भूमि चयन, भू संस्कार, भूमि के मान और नाप-जोख जिसे उन्मान कहा जाता है, एवं वेदि रचना आदि आदि आवष्यकीय अंगों के सम्बन्ध में जो निर्देष तथा विवरण बताये गये हैं वे ही कालान्तर में वास्तु विद्या के सूत्रपात में सहायक हुए। वास्तु विद्या की उन्नति तथा प्रगति किसी एक आचार्य द्वारा प्रवर्त नहीं है। यदि हम विभिन्न वास्तु ग्रंथों मंे उल्लिखित समस्त आचार्यों के नामों का अवलोकन करें तो वास्तु षास्त्र के 25 आचार्यों के नाम सम्मुख आते हैं। भृगु, अत्रि, वशिष्ठ, विष्वकर्मा, मय, नारद, नग्नजित, विषालाक्ष, पुरन्द्र अथवा षक्र, ब्रह्मा, कुमार, नंदीष अथवा षंभु, षौनक, गर्ग, वासुदेव, अनुरुद्ध, षुक्र, बृहस्पति, मनु का उल्लेख मत्स्य पुराण में मिलता है। पराषर, कष्यप, भारद्वाज- बृहत्संहिता में उल्लिखित है तथा प्रह्लाद, अगस्त्य तथा मार्कण्डेय का उल्लेख अन्यान्य ग्रंथों में उपलब्ध होता है। हमारी षास्त्र निर्माण परम्परा में प्रत्येक षास्त्र का कर्ता कोई न कोई देव, ऋषि अथवा मुनि बताया गया है, ब्रह्मा एवं षिव को विभिन्न षास्त्रों एवं विद्याओं का प्रवर्तक होने का सर्वाधिक श्रेय प्राप्त है। प्रायः ही वास्तु विद्या के मूल प्रवर्तकों में दो नाम विषेष रुप से उल्लिखित होते हैं एक विष्वकर्मा तथा दूसरे मय। विष्वकर्मा का वर्णन देवताओं के स्थपित (आर्किटेक्ट) के रुप में सनातन काल से होता आया है। इन्हं आठ वसुओं में से एक वसु कहा जाता है। वास्तु विद्या उन्हें स्वयं ब्रह्मा से प्राप्त हुई थी। विष्वकर्मा को भारत के उत्तर भाग में वास्तु कला तथा वास्तु विद्या के प्रथम प्रवर्तक तथा आचार्य के रुप में स्वीकार किया गया है। अन्य प्रवर्तकों में षम्भु, गर्ग, अत्रि, वशिष्ठ, पराषर, बृहद्रथ, तथा वासुदेव का नाम आता है। मय असुरों की वास्तु कला के मूल प्रवर्तक आचार्य माने जाते हैं। वास्तु की दक्षिण भारतीय परम्परा में 15 आचार्यों 1. ब्रह्मा 2. त्वष्ट्रा 3. मय, 4. मातंग 5. भृगु 6. कष्यप, 7. अगस्त्य 8. षुक्र 9. पराषर 10. नग्नजित् 11. नारद ,12. प्रह्लाद 13. षक्र, 14 बृहस्पति तथा 15. मानसार के नाम विषेष रुप से उल्लिखित होते हैं। भारतीय वास्तु विद्या का स्थिर रुप वेदंगों के समय में सम्पन्न हुआ। पुराणों तथा आगमों मं उनका विकास प्रारम्भ हुआ। वास्तु कला तथा वास्तु विद्या का उल्लेख अनेकानेक ग्रंथों, पुराणों, महाकाव्यों, संहिता ग्रंथों में बहुतायत से प्राप्त होता है। उदाहरण के लिये मत्स्य पुराण में वास्तु विद्या पर आठ अघ्याय हैं। इन अध्यायों में न केवल वास्तु षास्त्र के अठारह आचार्यों पर प्रकाष डाला गया है वर्न भवन योजना एवं रचना के आधारभूत निर्माण, ‘स्तम्भों ’ का विवेचन भी किया गया है। नवताल लक्षण, पीठिका लक्षण, लिंग लक्षण में प्रस्तर कला तथा प्रतिमा निर्माण का विवेचन है। प्रासाद वास्तु मण्डप लक्षण तथा प्रासाद वर्णन मंे कही गई है। स्कन्द पुराण के माहेष्वर खण्ड तथा वैष्णव खंड में वास्तु विद्या के वर्णन दिये गये हैं। इस पुराण में महानगर स्थापन, स्वर्णषाला, रथ निर्माण, स्थपित निर्देष विवाह मण्डप तथा चित्र कर्म के विवरण दिये गये हैं। गरुड़ पुराण में मानव तथा देवताओं, सभी के लिये उपयुक्त भवनों के अतिरिक्त दुर्ग निवेष, उद्यान, भवन तथा पुर निवेष पर विवेचन है। अग्नि पुराण में वर्णित वास्तु कलष का मुख्य विषय मूर्ति कला से सम्बन्धित है। इस विषय पर अग्नि पुराण में तेरह अध्याय हंै जबकि वास्तु कला पर मात्र तीन अध्याय। आगम ग्रंथों में कामिकागम वास्तु विद्या का प्रतिनिधि ग्रंथ कहा जा सकता है अन्यथा तो कर्णागम, सुप्रभेदागम, वैखानसागम में भी वास्तु सम्बन्धी पारिभाषिक विवेचन प्राप्त होता है। बृहत्संहिता, तन्त्र, हयषीर्ष पंचरात्र, विष्णु धर्मोत्तर पुराण, हरि भक्ति विलास तथा हेमाद्रि अदि आचार्यों के प्रतिष्ठा ग्रंथ उल्लेखनीय हैं। पुराणों में मत्स्य पुराण, अग्निपुराण, भविष्य पुराण के अतिरिक्त गरुड़ पुराण, स्कन्द पुराण, वायु पुराण, नारद पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, भविष्य पुराण, लिंग पुराण मं भी वास्तु विद्या के सिद्धतों का उल्ल्ख हुआ है। इन सब के अतिरिक्त बौद्ध ग्रंथों में भी वास्तु विद्या सम्बन्धी निर्देष प्राप्त होते हैं, कभी कभी तो आभास होता है कि मानो वास्तु विषयक किसी ग्रंथ का अध्ययन किया जा रहा हो। पालि पिटकों में स्वयं भगवान बुद्ध के वास्तु विद्या सम्बन्धी प्रवचन उपलब्ध होते हं। ‘चुल्ल वग, विनय पिटक, महावग्ग’ आदि पालि ग्रंथों के अध्ययन से यह तथ्य सुस्पष्ट हो जाता है। अग्नि पुराण अध्याय 39 में तन्त्र षास्त्र आधारित 25 ग्रंथों हयषीर्ष तन्त्र, त्रैलोक्य मोहन तन्त्र, वैभव तन्त्र, पौष्कर तन्त्र, प्रह्लाद तन्त्र, गाग्र्य तन्त्र, गालव तन्त्र, नारदीय तन्त्र, संप्रषन तन्त्र, षाण्डिल्य तन्त्र, वैष्वक तन्त्र, सात्य तन्त्र, सौनक तन्त्र, वासिष्ठ तन्त्र, ज्ञानसागर तन्त्र, स्वायम्भु कापिल, तीक्ष्र्य तन्त्र, नारायणिक तन्त्र, आत्रेय तन्त्र, नारसिंह तन्त्र, आनन्द तन्त्र, आरुण तन्त्र, बौद्धायन तन्त्र तथा आर्ष तन्त्र का उल्लेख हुआ है। हयषीर्ष पंचरात्र में वास्तु विद्या का प्रौढ़ विवेचन मिलता है। वस्तुतः वास्तु षास्त्र के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले भारतीय साहित्य का आकार इतना विषाल है कि सुविधा के लिये उसे दो विभागों में बंटा जा सकता है। एक आर्किटेक्चरल वक्र्स अर्थात वास्तु षास्त्रीय ग्रंथ अर्थात वह ग्रंथ जिनमं अविकल रुप से केवल वास्तु षास्त्र का विवेचन किया गया हो। धार्मिक ग्रंथों जैसे कि वेद वेदांग (कल्प तथा ज्योतिष), पुराण, आगम तथा धार्मिक संस्कार पद्धतियों, पूजा पद्धतियों, प्रतिष्ठा पद्धतियों का समावेष करने वाले ग्रंथों, नीति विषयक ग्रंथों यथा षुक्र्र नीति, कौटिल्य अर्थ षास्त्र आदि का समावेष करने वाले ग्रंथों को नान आर्किटेक्चरल वक्र्स अर्थात अवास्तु षास्त्रीय ग्रंथों की श्रेणी में रखा जा सकता है। वास्तु षास्त्रीय ग्रंथों में विष्व कर्मा प्रकाष ,समरागंण सूत्रधार, सूत्रधार मण्डन, वास्तु रत्नावली, वास्तु प्रदीप आदि ग्रंथों का समावेष होता है। इनमें भी समरागंण सूत्रधार, मयमतम्, मानसार वास्तु विद्या का बहु प्रतिष्ठित ग्रंथ है। वास्तु कला में समय समय युगधर्मानुसार परिवर्तन होते रहे हं। वास्तव में प्रत्येक काल की अपनी-अपनी प्रमुख विषेषतायें होती हैं। यही विषेषतायें परिवर्तन का आधार बनती हैं। वैदिक काल योगोपासना का काल था। तब तक मूर्ति पूजा का प्रचार नहीं हो पाया था। अतः पूजा वास्तु - वेदि निर्माण तथा यज्ञ षाला तक ही वास्तु विद्या का विकास हो सका। अरण्यकों तथा उपनिषदों में उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर स्पष्ट होता है कि कालान्तर में हिंसा समन्वित तथा बहु द्रव्य सापेक्ष यज्ञ कर्मकांड के स्थान पर षिव पूजा, विष्णु पूजा तथा त्रिदेव पूजा की परम्परा विकसित हुई। षिव पूजा तथा विष्णु पूजा की अविरल धारा उत्तर से दक्षिण तक बहने लगी। षिव भक्ति तथा विष्णु भक्ति, इन दो धार्मिक प्रगतियों के प्रसार से प्रतिमा सापेक्ष देष के कोने-कोने में षिव मन्दिरों तथा विष्णु मन्दिरों की स्थापना तथा उनका निर्माण प्रारम्भ हुआ। परिणामस्वरुप इन पौराणिक धर्मों के प्रचार ने वास्तु कला को चरम उन्नति के षिखर पर पहुंचा दिया। अतः स्पष्ट है कि भारतीय वास्तु कला तथा वास्तु विद्या का चरमोत्कर्ष धर्म आश्रित रहा है। समन्वित रुप में अर्थ-षास्त्र में वर्णित वास्तुविद्या, ब्राह्मण ग्रंथों में कही गई वास्तु विद्या, महाकाव्य कालीन वास्तु विद्या तथा बौद्ध कालीन वास्तु विद्या के उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ईसा पूर्वीय वास्तु विद्या का स्वरुप निम्न प्रकार से कहा जा सकता है। 1.वास्तु पुरुष विकल्पन 2. भूमिचयन तथा परीक्षण 3. द्वार संस्थापन 4 वृक्षारोपन 5. दारु (काष्ठ) आहरण 6. वास्तु पद 7.वास्तु विद्या तथा ज्योतिष 8. वास्तु फल 9.स्थपित 10 पाषाण कला तथा मूर्ति निर्माण 11. षाल भवन 12. षंकु स्थापन 13. हस्त के विभिन्न माप 14.स्तम्भादि माप व्यवस्था 15. गृह द्रव्य जैसे कि पत्थर आदि 16. भवन भूषा 17. प्रासाद रचना तथा 18. वास्तु विद्या की षैलियां। वास्तु विद्या के मूलभूत सिद्धांतों में कहीं कहीं पर विमत्य दिखाई पड़ता है। यद्यपि ऋग्वेद काल में गृह निर्माण के अवसर पर जो प्रतिष्ठा संस्कार या समारोह किये जाते थे वे आज भी होते हं। उस समय वास्तु पूजा को वास्तु निर्माण का आवष्यक अंग माना जाता था। आज भी वास्तु पूजा, भूमि पूजन, नींव पूजन आदि के रुप में निर्माण का आवष्यक अंग है। वास्तु पूजा, भूमि चयन, स्तम्भ पूजा, द्वार पूजा आदि वास्तु विद्या के प्रारम्भिक सिद्धान्त ऋग्वेद काल से ही प्रचलित हैं। फिर भी यदि वास्तु कला तथा वास्तु विद्या के मूलभूत नियमों में विमत्य कारणों से है। सर्वप्रथम कारण वास्तु षैलियों की भिन्नता है। वास्तु विद्या का जन्म वेदांगषटक के ज्योतिष एवं कल्प से होने के कारण आगमों एवं पुराणों की परम्पराओं से, देष एवं स्थान भेद से षैलियों के दो रुप विकसित हुए थे। कालातंर में क्षेत्रीय विषेषताओं के आधार पर अनेक षैलियां पुष्पित पल्लवित हुई तथा इन अनेक षैलियों को भी वास्तु षास्त्र में स्थान मिला। उदाहरण के लिये नागर (उत्तरी) तथा द्रविड़ (दक्षिण) षैली के अतिरिक्त बेसर नाम से तीसरी एक और षैली प्रसिद्ध है। राजा भोज की रचना ‘समरांगण सूत्रधार’ में वावाट, भूमिज, लाट आदि बहुसंख्यक षैलियों का विवेचन प्राप्त होता है परन्तु मुख्य षैलियों में नागर तथा द्रविड़ षैली की ही प्रधानता है। यही दो षैलियां भारतीय वास्तु निर्माण में प्रचलित हैं। यह तथ्य वास्तु विद्या के पुरातन ग्रंथों यथा मानसार, मयमत, समरांगण सूत्रधार, विष्वकर्मीय षिल्प, संकलाधिकार, अंषुमदभेद, बृहत्संहिता, मत्सरू, अग्नि, स्कन्द, भविष्य, विष्णुधर्मोत्तर, आगम ग्रंथों, अर्थ षास्त्र, पूजा पद्धतियों तथा नीति ग्रंथों आदि के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है। विष्वकर्माप्रकाष में उत्तरापथ की वास्तु विद्या का वर्णन हुआ है तथा विष्वकर्मीय षिल्प मं दक्षिणापथ की वास्तु विद्या का वर्णन हुआ है। इन ग्रंथों में एक ही वास्तु परम्परा न होने से द्रविड़ वास्तु विद्या के प्रतिनिधि ग्रंथों में मन्दिरों एवं भवनों के वर्ग तथा नाम भी नागर वास्तु विद्या के ग्रंथों से अलग हैं। मुख्यतः वास्तु कला तथा वास्तु षास्त्र पंच भूतांे आकाष, अग्नि, वायु, जल तथा पृथ्वी के नैसर्गिक गुणों के समुचित तथा प्रभावषाली उपयोग का षास्त्र है। वास्तु विद्या के समस्त सिद्धंत इन्हीं पंचभूतों के इर्दगिर्द घूमते हैं। बहुधा हम निष्कर्षों को सिद्धांत मानने की भ्रम भरी भूल कर बैठते हैं जो उचित नहीं है। वर्तमान समय में वास्तु कला के अधोलिखित नियम एवं सिद्धतों के अनुपयोगी प्रतीत होने की पृष्ठ भूमि में परिवेष परिवर्तन मुख्य कारण है। वास्तु विद्या के मूल सिद्धांतों में सबसे अधिक उपेक्षित सिद्धांत ज्योतिष सम्बन्धी सिद्धांत है। भवन निर्माण में आय, व्यय, अंष, तारा, राषि का विचार अब नहीं किया जाता। सम्भवतया यह इसकी पृष्ठ भूमि में विष्वकर्मा प्रकाष का वह मत है जिसमें बताया गया है कि 32 हाथ अर्थात 48 फीट (16 गज अथवा मीटर) से अधिक लम्बाई के भवनों में आय विचार आवष्यक नहीं है। जिन भवनों का जीर्णोद्धार होना हो उनमें, घास फूस से निर्मित भवनों (झोपड़ियों ) में भी आयादि विचार आवष्यक नहीं है। वर्णमाला के अक्षरों पर आधारित वर्ग विभाजन भी अप्रयोजनीय सिद्ध हो रहा है। भवन निर्माण सामग्री में, कारीगरों के औजारां में भी समय के अनुसार परिवर्तन आया है हस्त सूत्र गई -गुजरी कला है। वास्तु कला के नियमों में महत्वपूर्ण अन्तर भवन निर्माण में उपयोगी यंत्रों के अतिरिक्त भवन निर्माण सामग्री के कारण भी है। प्राचीन एवं मध्य कालीन भारत में भवन निर्माण में लकड़ी के काष्ठ का प्रयोग बहुतायत से होता था। छतों में लकड़ी की कड़ियां अथवा धन्नियां पड़ती थी। लकड़ी के नक्काषीदार स्तम्भ व दरवाजे बनाये जाते थे। वास्तव में इसकी पृष्ठभूमि में काष्ठ की सुलभ उपलब्धता के अतिरिक्त हिन्दुओं का यह विष्वास भी था कि घरों के निर्माण में पत्थरों का उपयोग नहीं किया जाना चाहिये। इस तथ्य के समर्थन में कामिकागम का वाक्य ‘षिलास्तम्भं षिलाकुडत्रयं नरावासे न कारयेत्’ उद्धृत किया जा सकता है। वर्तमान समय में काष्ठ का उपयोग न्यूनातिन्यून हो रहा है। भवन निर्माण में पत्थर का उपयोग सौंदर्य, रखरखाव में सहजता, सुलभता के कारण बढ़ चुका है। आवासीय भवनों में काष्ठ का उपयोग मुख्य द्वारों तक सीमित हो चला है। वास्तु कला के निर्देषों में उपयोग में ली जा रही काष्ठ की संख्या सम्बन्धी निषेध अब अनुपयोगी है। आधुनिक तकनीकी ज्ञान से प्लाईवुड का निर्माण हो रहा है जिसमें काष्ठ के नैसर्गिक दोषों को दूर कर संस्कारित काष्ठ का निर्माण किया जाता है। तलघर या तहखाने का निर्माण वास्तु विद्या में अनुकूल नहीं माना गया है। तलघर को एक विषाल खड्ढे का प्रतिरुप मानने के कारण यह धारणा बलवती रही है कि तलघर अधिकांष जीवन षक्ति का अवषोषन कर लेता है। परन्तु आधुनिक बहुमंजिली भवनों में तलघर एक आवष्यक निर्माण के रुप में सामने आये हैं। इन भवनों के तलघरों में वाहन पार्किंग तो सामान्य उपयोग है। इसके अतिरिक्त इनका उपयोग व्यावसायिक कार्यों के लिये भी होता है। वास्तु विद्या के प्राचीन निर्माणों में बहुमंजिली भवनों के निर्माण में प्रत्येक तल की ऊँचाई को क्रमषः न्यून करते जाने का विधान दिया गया है। भूतल से प्रत्येक खंड पर ऊंचाई को कम करने का सिद्धांत तो अब वर्तमान में पूर्णतया विलुप्त हो चुका है। अस्तु कुछ भी हो, स्थान तथा समय के अनुसार वास्तु विद्या तथा कला में कितने भी परिवर्तन क्यों न आयंे वास्तु के आधारभूत सिद्धंत षाष्वत हैं, पंच तत्वों, आकाष, पृथ्वी, जल, अग्नि तथा वायु के नैसर्गिक रुप से उपयोग पर आधारित हैं अतः उनमें परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है। इनमें पृथ्वीतत्व गुरुता से, आकाषीय तत्व ध्वनि से सम्बन्धित है। भारी वस्तुओं, भारी भरकम निर्माण में दक्षिण क्षेत्र को प्राथमिकता दी जाती है। जल तत्व हल्का है। भारत में एक के अतिरिक्त सभी नदियों का उद्गम उत्तर दिषा से है तथा जल प्रवाह भी उत्तर दिषा से ही अन्य दिषाओं में है। जल के नैसर्गिक प्रवाह के अनुरुप ही उत्तर दिषा में जल प्रबन्धन के लिये वास्तु ग्रंथों में उत्तर दिषा निर्धारित की गई है। वायु तत्व की दिषा उत्तर-पष्चिम है। वायु का समुचित प्रवाह इस दिषा में होने के कारण खाद्यान्नों का भंडारण इस दिषा में अपेक्षित बताया है। इसी प्रकार अग्नि तत्व की प्रधानता दक्षिण पूर्व में होने से इस स्थान में भोजन पकाने, अग्नि एवं आग्नेय पदार्थों के उपयोग का प्रावधान बताया गया है। मनोवैज्ञानिक उपचार के लिये, मन को प्रफुल्लित रखने के लिये, सात्विक विचारों के लिये मुख्य द्वार पर गणेष प्रतिमा लगाने, उद्यान, हंस, सारस, आदि के चित्र लगाने का विधान है। पंचतत्वों का संतुलित समन्वय ही वास्तु की आवष्यकता है।


वास्तु और फलादेश तकनीक विशेषांक  अकतूबर 2013

शोध पत्रिका के इस अंक में षष्टी हयानी दशा, वास्तु और भविष्यवाणी तकनीक जैसे विभिन्न विषयों पर शोध उन्मुख लेख हैं।

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