लोक आस्था का युगयुगीन केंद्र मां योगिनी स्थान

लोक आस्था का युगयुगीन केंद्र मां योगिनी स्थान  

शक्तिपीठ अथवा दैवी तीर्थ ब्रह्मांड के असीम रहस्यमयी शक्ति और ऊर्जा के जागृत स्थल हैं जहां पूजा, साधना व तप करने का विशेष महत्व है। आदि अनादि काल से दैवी तत्व से प्रभावित भारत भूमि में कितने ही सिद्धपीठ हैं पर इन सबों के मध्य मां योगिनी स्थान का अपना विशिष्ट महत्व है जो प्रकृति के सुरम्य क्षेत्र में मां योगिनी पर्वत पर विराजमान है। झारखंड राज्य के गोड्डा जिलान्तर्गत मुख्यालय से करीब 15 किमी. उत्तर पश्चिम दिशा में अवस्थित योगिनी स्थान आद्याशक्ति महामाया की प्राच्य लीला स्थली है। संथाल-परगना प्रमंडल में बसे गोड्डा की दूरी जसीडीह से 85 कि. मी., देवघर से 66 किमीऔर भागलपुर से 69 किमी. दूरी पर हैं। गोड्डा नगर के कारगिल चैक अथवा बस स्टैंड से छोटे-बड़े वाहन द्वारा यहां जाना संभव है। स्थान दर्शन, प्राच्य विवरण व साक्ष्यों के अध्ययन अनुशीलन के साथ यहां के ख्यातिनाम पुजारी ओशो बाबू से किए गए वार्तालाप से स्पष्ट होता है कि यह स्थान प्राचीन काल में नट राजाओं (आदिम जनजाति) की कुल देवी के रूप में ख्यात रही। किसी भी पर्व त्योहार में आदिवासियों का यह वर्ग यहां भैंसे की बलि के साथ देवी पूजन किया करता था बाद में वारकोप स्टेट के खत्री वंशीय (खतौरी वंश) लोगों ने उन सबों पर विजय प्राप्त की और तभी से खत्री वंशीय लोगों ने देवी तीर्थ का नव उद्धार कर जन पूजन का मार्ग प्रशस्त किया। यहां के लोगों का विश्वास है कि देवी का घुटना यहीं गिरा था जबकि तंत्र चूड़ामणि में उल्लेख है कि देवी के दोनों घुटने नेपाल में बागमती तट पर गिरा जहां गुह्येश्वरी देवी विराजमान है। गोड्डा नगर से काझिया नदी और उसके बाद हरना नदी पार कर गोड्डा-महागामा पथ पर विशाल सिंह द्वार व उसके आगे विराजमान योगिनी पर्वत के दर्शन से ही नस-नस में भक्ति रस का संचार होता है। विवरण है कि सावरियां, माल और कुमारभाग आदि तीनों आदिम जनजाति की आराध्य स्थली के रूप में मां का यह स्थान आदिम युग से पूजित है। वारकोप स्टेट के राजाओं ने भी इस मंदिर के विकास में अपना अमूल्य योगदान दिया इनमें राजा भीम सिंह और राजा विश्वनाथ सिंह का नाम प्रमुख है। एक विशाल पर्वत के ठीक बगल में आयताकार भूमि के मध्य में मां का स्थान है जहां मंदिर के गर्भ गृह में पंचशूल लाल चुनरी से हमेशा ढंका रहता है। इस मंदिर के पिछले दीवार पर प्रायः सभी देवियों की तस्वीर लगी है। योगिनी मंदिर के अंदर मध्य भाग में पक्का का एक पुराना व छोटा वर्गाकार चबूतरा है जिसके चारांे कोनांे पर अर्द्धव्यास निर्मित है। चबूतरे पर मातृ खड्ग और चढ़ाए गए उड़हुल, अपराजिता, मौलसरी, केवड़ा व कमल के फूल का दर्शन मातृशक्ति तत्व में और वृद्धि करता है। बाबा बताते हैं कि जिस स्त्री को पुत्र अथवा जिस पुत्रवती को दूध नहीं उतरता उसे वहां का नीर देने पर त्वरित फायदा होता है। गर्भ गृह में मां की कोई विग्रह नहीं वरन् प्रत्येक अंग ही शोभित है। मातृगृह के ठीक बाहर दोनां कोने पर देवी वाहन सिंह की मनोहारी मूर्ति बनी है। मां के मंदिर के दाहिने ऊंचे पर्वत पर पंचमुखी गणेश और दूसरे तरफ पंचमुखी हनुमान जी की मूर्ति बनी है। मातृ मंदिर के पीछे चरणोदक स्थान के पास ही मां शीतला व भैरव जी की स्थिति है। मां के मंदिर के सामने एक पुरातन मौलश्री का वृक्ष है जिसे मनसा वृक्ष (कल्प द्रुम) भी कहा जाता है। मंदिर के पीछे पुजारी निवास कक्ष है। मां के मंदिर के पहले पंचमुखी शिव व दोनों तरफ नन्दी वाहन विराजमान हैं। यहीं से 69 सीढ़ी चढ़कर योगिनी माता गुफा तक आया जा सकता है जिसे ‘गर्भ जून’ भी कहा जाता है। इसके प्रवेश खंड के ठीक पहले सेमल का पुरातन वृक्ष है जिसे मनोकामना वृक्ष कहा जाता है। यहां लोग अपनी मन मुराद पूर्ण होने के लिए ईंट का टुकड़ा धागे से बांधते हैं। मां का यह गुफा तीन विशाल पाषाण खंड से ऐसे बना है कि इसका बाहरी आकार भी योनिद्वार के समान है। अंदर में कुल आठ पाषाण खंड का ऐसा संयोग है जो सभी मिलकर मातृ गर्भाशय का रूप बनाते हैं। एकांतिक तंत्र साधना स्थली के रूप में मान्य यह गुफा देखने में आगे से संकरा है पर मातृ कृपा कहें कि मोटे-मोटे लोग भी सकुशल पार हो जाते हैं। अंदर में एक शिला खंड पर चुनरी लपेटा है जिसे मातृ रूप माना जाता है। दोनांे समय मातृपूजन में चढ़ने वाले भोग में शाकाहार व मांस मदिरा दोनों का प्रयोग नित्य किया जाता है। इसमें बलि भी आवश्यक है जो छाग बलि या कबूतर बलि के रूप में ज्यादा मान्य है। मंदिर के साधक पुजारी बताते हैं कि वर्ष 1976 ई. से इस स्थान का विशेष प्रचार-प्रसार हुआ है और इसी वर्ष से मां की पूजा सनातन पूजन पद्धति से तीनां पहर में हो रही है। वर्ष 1984 में गोड्डा जिला बनने के बाद यहां का विकास रथ और आगे बढ़ा और 15 नवंबर सन् 2000 को झारखंड राज्य निर्माण हो जाने पर यहां विकास के कई कार्य किए गए। पेयजल व बिजली के साथ-साथ मां के सहायतार्थ यहां भक्त गृह बनाए गए हैं। योगिनी देवी मातृ-कार्य में सदैव तत्पर व भक्तों के मार्ग को सरल करने वाली हैं। जिस प्रकार शिव शक्ति के पोषक शिव गण हैं ठीक उसी प्रकार देवी कार्य को पूर्ण करने के लिए योगिनियों का जगत प्रादुर्भाव हुआ। योगिनी की मूल संख्या आठ है यथा मंगला, पिंगला, धान्या, भ्रामरी, भद्रिका, उल्का, सिद्धा और संकटा। ऐसे भक्ति के चैसठ सोपान और 64 भैरवों की भांति योगिनी की कुल संख्या चैसठ है जिसका उल्लेख ‘प्रतिष्ठा महोदधि’ में है। देवी मां की आरती में भी इस बात का उल्लेख है यथा ‘चैसठ योगिनी गावत नृत्य करत भैरू............ इस मंदिर के दो तरफ पर्वतीय खंड, पंच पल्लव वृक्ष तथा चातुर्दिक हनुमान व बंदरों का उछल-कूद आने वाले भक्तों के बालवृन्दों को उत्साहित व रोमांचित करता है। प्रसिद्ध चिकित्सक डाॅ. पारिजात कुमार दराधियार बताते हैं कि योगिनी मां की कृपा से कितने ही लोगों का उद्धार हुआ है इसका कोई लेखा-जोखा नहीं और आज भी मातृ कृपा का यह भाव जीवन्त है। मां योगिनी जी का पूजन स्थान पूरे देश में है पर इनमें हीरापुर (सूरदा, उड़ीसा), रानीपुर ( झांरिया, उड़ीसा) भेड़ाघाट (जबलपुर, मध्यप्रदेश), खजुराहो (रायसेन, मध्यप्रदेश), कालीमठ (गढ़वाल क्षेत्र) और प्राग्ज्योतिषपुर (गोवाहाटी, असम) के योगिनी स्थान का विशेष महत्व है। इस मंदिर की एक अलग कथा यह भी है कि यहां रात्रि में कभी भी ताला नहीं लगाया जाता। साल के दोनों नवरात्र के साथ हरेक शनिवार व मंगलवार को यहां दूर-दूर से भक्त आते हैं और श्रावण माह के अंतिम-मंगलवार को यहां के वार्षिक पूजनोत्सव में तो दूर-देश के भक्तों व साधकों का आगमन होता है। यहां मातृसेवा में बाबा जी के साथ और कितने ही नर-नारी निवास करते हैं जिसमें मीरू टुड्डू का नाम साधिका के रूप में ख्यात है। न सिर्फ लोक आस्था- वरन् धर्म केंद्र और आरोग्य स्थली के रूप में योगिनी स्थान की चर्चा दूर-दूर तक है। ऐसे तो यहां का नीर और भष्म ही मूल दवा है पर यहां बामर, फूलास, चढ़ौना जैसे कुछ तांत्रिक क्रिया कर्म भी किए जाते हैं जिसके फलस्वरूप रोगी चंगा होकर घर लौट जाता है। यहीं कोई दस वर्ष पूर्व पहाड़ी पर शिखर भाग में एक शिव मंदिर बनाया गया है और सीढ़ी व जल का प्रबंध किया गया है। इसका नाम मनोकामना महादेव है। ऐसे यहीं से थोड़ी दूरी पर खत्री वंश का दुर्गा मंदिर भी प्रसिद्ध है। कुल मिलाकर धर्म आस्था और जन संस्कृति का यह केंद्र झारखंड राज्य के पुरातन देवी तीर्थ के रूप में दूर-दूर तक ख्यात है। झारखंड में मां छिन्नमस्तिका (राजरप्पा), नगर देवी (नगर ऊँटारी), चैपारण की माता भद्रकाली (इर्टखोरी), संथाल परगना का बिंदूधाम, कतरासगढ़ की मां लिलोरी, बोकारो की मां चंचली भवानी, हंटरगंज की कुलेश्वरी, देवघर की मनसा मां, रामगढ़ की माता वैष्णो व मानभूम की गढ़ देवी के मध्य मां योगिनी का विशेष मान है। जो यहां जिस भाव से आता है माताश्री उसे प्रदान कर अपना भक्त अवश्य बना लेती हैं।



दुगर्तिनाशिनी मां दुर्गा विशेषांक  अकतूबर 2013

फ्यूचर समाचार पत्रिका के दुगर्तिनाशिनी मां दुर्गा विशेषांक में भगवती दुर्गा के प्राकट्य की कथा, महापर्व नवरात्र पूजन विधि, नवरात्र में कुमारी पूजन, नवरात्र और विजय दशमी, मां के नौ स्वरूप, मां के विभिन्न रूपों की पूजा से ग्रह शांति, नवरात्रि की अधिष्ठात्री देवी भगवती दुर्गा, काली भी ही दुर्गा का रूप तथा देवी के 51 शक्तिपीठों का परिचय आदि ज्ञानवर्धक आलेख सम्मिलित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त गोत्र का रहस्य एवं महत्व, लोकसभा चुनाव 2014, संस्कृत कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग हेतु सर्वश्रेष्ठ भाषा, अंक ज्योतिष के रहस्य, कुंडली मिलान एवं वैवाहिक सुख, विभिन्न राशियों में बृहस्पति का फल व गंगा की उत्पत्ति की पौराणिक कथा आदि आलेख भी ज्ञानवर्धक व अत्यंत रोचक हैं।

सब्सक्राइब

अपने विचार व्यक्त करें

blog comments powered by Disqus
.