तारा डूबना

तारा डूबना  

तारा डूबना प्रश्न: तारा डूबने से क्या तात्पर्य है? इसकी गणना कैसे की जाती है? शुक्र और गुरु के अस्त होने को ही तारा डूबना क्यों माना जाता है? इसके शुभाशुभ फल क्या हैं तथा इसमें कौन-कौन से शुभ कार्य वर्जित हैं? तारा डूबने का तात्पर्य तारा के अस्त हो जाने से है। जैसे सूर्य का उदय और अस्त होना। खगोल के मुताबिक सूर्य पृथ्वी के सबसे नजदीक का तारा है जो अपने ही प्रकाश से चमकता है। अन्य ग्रह सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाशित होते हैं। भारतीय ज्योतिष में गुरु एवं शुक्र ग्रह को तारा माना गया है। इनके अस्त हो जाने पर भारतीय ज्योतिष शास्त्र किसी भी नर-नारी के विवाह की अनुमति नहीं देता। ज्योतिष के ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि ऋग्वेद के अनेक मंत्र यह संकेत देते हैं कि हर बीस महीनों की अवधि के दौरान शुक्र नौ महीने प्रभात काल में अर्थात प्रातः काल पूर्व दिशा में चमकता हुआ दृष्टिगोचर होता था जिसके आधार पर ऋषि महर्षि आदि स्नान ध्यान का समय ज्ञात कर अपना दैनंदिन कार्य समय पर सुचारु रूप से संपादित कर लेते थे। गुरु एवं शुक्र के उदयास्त के संबंध में वैदिक साहित्य से भी यह ज्ञात होता है कि गुरु दो से तीन माह तक शुक्र के आसपास ही घूमा करता था। इस अवधि में गुरु कुछ दिनों तक शुक्र के अत्यधिक निकट रहता है लेकिन शुक्र की अपनी स्वाभाविक तेज गति के कारण गुरु पीछे रह जाता है और शुक्र पूर्व दिशा की ओर बढ़ते हुए आगे निकल जाता है जिसका परिणाम यह होता है कि शुक्र ग्रह का पूर्व दिशा की ओर उदय होता है। इस अस्तोदय की कार्य प्रणाली के पूर्व इतना जरूर निश्चित रहता है कि कुछ समय तक ये दोनों ग्रह साथ-साथ रहते हैं। शुक्र ग्रह पृथ्वी से सोलह करोड़ एवं सूर्य से सात करोड़ मील की ऊंचाई पर है। इसमें जल का भाग अत्यध् िाक होने के कारण यह श्वेत वर्णीय है। शुक्र का अर्थ सींचने वाला है। इसके बलाबल के अनुरूप ही पुरुष वीर्यशाली या बलवीर्यहीन होता है। यही कभी शाम के समय और कभी सुबह आसमान में चमकने के कारण सांझ का और भोर का तारा कहलाता है। जब शुक्र ग्रह पृथ्वी के दूसरी ओर चला जाता है तब इसे शुक्र का अस्त होना या डूबना कहते हैं। शुक्र के डूबने पर शुभ कार्य वर्जित हैं। तारागण का समुदाय ग्रहों के साथ साथ पश्चिम की ओर परिभ्रमण करते हुए प्रतीत होते हैं, किंतु शीघ्रगामी नक्षत्रों की तेज चाल के कारण ग्रह पीछे हो जाते हैं एवं वे पूर्व की ओर जाते हुए दिखाई देते हैं। इनकी पूर्व की ओर आगे बढ़ने की गति समान ही रहती है लेकिन ग्रहों की कक्षाओं का अलग-अलग विस्तार होने के कारण इनकी गति भिन्न-भिन्न दिखलाई देती है। शुक्रोदय-गुरोदय काल  शुक्र ग्रह या शुक्र तारा पूरब में 8) माह उदित रहता है। 2) माह सूर्य मंडल में और इसके पश्चात 9 माह पश्चिम में उदित होता है। पुनः 10 दिन सूर्य मंडल फिर पूर्व में उदय होते हैं। शुक्रोदय काल में यदा कदा, अतिचार होने की वजह से 1 दिन, 2 दिन अथवा 7 दिनों से अध् िाक का फर्क पड़ जाता है।  गुरु तारे का सूर्य से 12 अंश के अंतर पर अस्त होता है। 12 अंश के अंतर की पूर्ति पर अगले 12 अंश का त्याग कर आगे बढ़ने पर उदित होता है। इसकी अवधि 32 दिन की है। गुरु शुक्र का बाल वृद्धत्व काल एवं दोष  शुक्र का उदय पूर्व में होने पर वह 5 दिन व पश्चिम में होने पर 7 दिन तक बाल्यावस्था में रहता है। बाल अवस्था में रहने पर कार्य का नाश करता है।  शुक्र पूर्व में अस्त हो तो 5 दिन होने से पूर्व और पश्चिम में अस्त हो तो 5 दिन अस्त होने के पूर्व वृद्धावस्था में रहता है। यह भी कार्यनाशक माना गया है।  गुरु का भी बालवृद्धत्व दोष शुक्र के सदृश्य ही होता है। उसकी बाल व वृद्धावस्थाएं शुक्र के समान ही रहती हैं। गुरु शुक्र का अस्त काल  गुरु तारा अस्त होने के 30 दिन और उदित होने के 129 दिनोपरांत वक्री होता है। फिर वक्री होने के 120 दिनोपरांत मार्गी और मार्गी होने के 129 दिनोपरांत अस्त होता है।  शुक्र के पूर्व में अस्त होने के 75 दिनोपरांत उदय होता है। उदित होने के 240 दिनोपरांत वह वक्री और वक्री होने के 23 दिनोपरांत पश्चिम में अस्त हो जाता है। पश्चिम में अस्त होने के 6 दिनों बाद पूर्व में उसका उदय होता है। पूर्व में उदय के 23 दिनोपरांत वह मार्गी तथा मार्गी होने के 240 दिनोपरांत फिर से पूर्व में अस्त हो जाता है। पूर्व दिशा में शुक्र जब उदित होता है तब वह साढ़े आठ महीनों तक पूर्व में उदित रहता है। फिर ढाई महीनों के लिए अस्त और पुनः नौ महीने के लिए पश्चिम में उदित होता है। उसके बाद फिर दस दिन अस्त रहता है, और फिर पूर्व में उसका उदय होता है। शुक्र ग्रह क्रमशः एक-एक वर्ष वक्री एवं मार्गी स्थिति में रहता है। वक्रत्व वाली दशा में इसका पूर्व में उदय और पश्चिम में अस्त होता है। मार्गी वाली स्थिति में यह सूर्य से नौ अंशों पर और वक्री स्थिति में आठ अंशों पर अस्त रहता है। वक्री अवस्था को प्राप्त होने के समय से दो दिन पूर्व या पश्चात यह स्थिर सा नजर आता है। गुरु व शुक्र के अस्त के शुभाशुभत्व एवं शुभ कार्य वर्जना  गुरु व शुक्र के अस्त के समय विवाह आदि शुभ मांगलिक कार्य करना पूर्णतः वर्जित है। इसी तरह स्वयंवर के लिए भी गुरु व शुक्र के अस्त का समय त्याज्य माना गया है।  फलदीपिकाकार के अनुसार जातक की जिस ग्रह की महादशा चल रही हो वही ग्रह जब गोचरवशात अस्त होता है या अनिष्ट राशि में रहता है तब शुभ फल देता है। इस तरह कहा जा सकता है कि गुरु और शुक्र की महादशा के दौरान जब जब गोचर में आने पर ये ग्रह अस्त अवस्था को प्राप्त होंगे तब तब जातक को कष्टकारक फल प्राप्त होंगे।  अस्तकाल में गुरु में गुरु की अंतर्दशा, शुक्र में शुक्र की अंतर्दशा, गुरु में शुक्र की अंतर्दशा, शुक्र में गुरु की अंतर्दशा, शुक्र में शनि की और शनि में शुक्र की अंतर्दशा और शेष ग्रहों में गुरु एवं शुक्र की अंतर्दशाएं कष्टप्रद होती हैं।  कोई विधवा स्त्री या परित्यक्ता नारी किसी अन्य पुरुष से पुनर्विवाह करे तो गुरु व शुक्र के अस्त, वेध, लग्न शुद्धि, विवाह विहित मास आदि का कोई दोष नहीं लगता। तात्पर्य यह है कि पुनर्विवाह के लिए गुरु व शुक्र का अस्त काल वर्जित नहीं है।  वर्णशंकर, चांगल, हीन जातियों के विवाह आदि शुभ कार्यों के लिए सभी समय अनुकूल हैं।  संक्रामक/गंभीर रोगों की स्थिति में रोगी की जीवन रक्षा हेतु औषधि निर्माण, औषधियों का क्रय आदि एवं औषधि सेवन के लिए गुरु और शुक्र के अस्तकाल का विचार नहीं किया जाता है।  पुराने या मरम्मत किए गए मकान में गृह प्रवेश हेतु गुरु एवं शुक्र के अस्त काल का विचार नहीं किया जाता अर्थात जीर्णोद्धार वाले मकान म ंे बसन े क े लिए गुरु व शुक्र क े अस्त काल में प्रवेश कर सकते हैं।  ऐसा माना जाता है कि शुक्र के अस्त होने पर यात्रा करने से प्रबल शत्रु भी जातक के वशीभूत हो जाता है। शत्रु से सुलह या संधि हो जाती है। शुक्रास्त काल में वशीकरण के प्रयोग शीघ्र सिद्धि देने वाले साबित हो सकते हैं।  गुरु व शुक्र के उदय काल में ही वास्तु शांति कर्म करना शुभ माना जाता है, अस्त काल में नहीं।  नारायण बलि कर्म गुरु व शुक्र के अस्त काल में करना त्याज्य माना गया है।  वृक्षारोपण का कार्य गुरु और शुक्र के अस्त काल में करने से अशुभ लेकिन उदय काल में करने से शुभ फल देता है।  शपथ ग्रहण मुहूर्त का विचार करते समय गुरु व शुक्र की शुद्धि आवश्यक होती है, अतएव इन दोनों के अस्त काल में शपथ ग्रहण करना वर्जित है।  बच्चों का मुंडन संस्कार इन दोनों ग्रहों के अस्त काल में करना वर्जित है।  देव प्रतिष्ठा गुरु और शुक्र के अस्त काल में करनी चाहिए।  एक मत यह भी है कि भृगु, कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, अंगिरा, भारद्व ाज एवं वत्स गोत्र वालों को यात्रा संबंधी शुक्र का दोष नहीं लगता। सामान्य रूप में यात्रा हेतु शुक्र का सामने और दाहिने होना त्याज्य है।  वधू का द्विरागमन गुरु व शुक्र के अस्त काल में वर्जित है। यदि आवश्यक हो तो दीपावली के दिन ऋतुवती वधू का द्विरागमन इस काल में कर सकते हैं। राष्ट्र विप्लव, राजपीड़ावस्था, नगर प्रवेश, देव प्रतिष्ठा, एवं तीर्थयात्रा के समय नववधू को द्विरागमन के लिए शुक्र दोष नहीं लगता। रेवती नक्षत्र से छह नक्षत्र पर्यंत चंद्रमा के रहने पर शुक्र अंधा रहता है। अंधे शुक्र में द्वि रागमन उत्तम होता है।  वृद्ध व बाल्य अवस्था रहित शुक्रोदय में मंत्र दीक्षा लेना शुभ माना जाता है।  यदि कोई राजपुरुष के निमित्त शुभ मुहूर्त में निकल पड़े और यदि यात्रा के दौरान मार्ग में रहते हुए शुक्रास्त हो जाए तो उसे मार्ग में ही उस पूरे काल तक रुककर शेष यात्रा शुक्रोदय होने पर ही पूर्ण करनी चाहिए।  यदि सात दिनों के अंदर शुक्र का उदय और अस्त दोनों हो जाएं तो उस मास में उपद्रव आदि होते हैं और जनता दुखी एवं अशांत रहती है।  प्रसूति स्नान तथा नवरात्रि होम के अलावा अन्य शुभ कार्यों में भी इन दोनों ग्रहों का अस्त काल वर्जित है। इस काल में सभी प्रकार के पर्व त्याज्य माने गए हैं।



वास्तु विशेषांक   दिसम्बर 2007

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