कैंसर ज्योतिष के आईने से

कैंसर ज्योतिष के आईने से  

हमारे शरीर में कई अंग हैं जो अवयवों व नाड़ी जाल से मिलकर बने हैं। इन सबके समुचित ढंग से कार्य करते रहने से यह शरीर सुचारु रूप से कार्य करता रहता है। हमारे शरीर में असंख्य सूक्ष्म कोशिकाएं हैं जिनसे अंग-प्रत्यंग बने हैं। ये कोशिकाएं बनती, संख्या में बढ़ती, मिटती तथा घटती रहती हैं। हमारे शरीर की गतिविधि इन कोशिकाओं का निर्माण करने वाले जीनों पर निर्भर करता है। यदि इन जीनों में किसी भी कारण से कोई असामान्यता आ जाए तो इसका प्रभाव कोशिकाओं के जनन, संख्या में वृद्धि, वर्धन और उनके प्रकार पर पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप शरीर में विभिन्न रोगों का जन्म होता है। ऐसा ही एक रोग है कैंसर। कैंसर शब्द सुनते ही मन में भय का संचार हो जाता है। यह एक भयंकर तथा मृत्युकारक रोग माना जाता है, परंतु सब प्रकार के कैंसर ऐसे नहीं होते। निरंतर शोध प्रयासों के पश्चात भी आज के चिकित्सा वैज्ञानिक इसका कोई उचित उपचार नहीं खोज पाए हैं। भिन्न-भिन्न प्रकार के कैंसरों के लिए कोई एक उपचार या उपाय संभव नहीं है। कैंसर मूल रूप से तंतु वृद्धि या कोशिका वृद्धि के नियमन का रोग है। एक सामान्य कोशिका को कैंसर कोशिका में परिवर्तित होने के लिए कोशिका की वृद्धि करने वाले जीन में परिवर्तन करना होगा। कैंसर एक ऐसा रोग है जिसमें शरीर की कोशिकाएं आक्रामक (कोशिकाएं सामान्य कोशिकाओं की परवाह किए बिना बढ़ती और विभाजित होती रहती हैं), विनाशी आक्रमणकारक (कोशिकाएं पास की सामान्य कोशिकाओं पर अधिकार कर उन्हें नष्ट कर देती हैं), और विस्तारक (कोशिकाएं शरीर के अन्य स्थानों में फैल जाती हैं) बन जाते हैं। लगभग सभी प्रकार के कैंसर परिवर्तित कोशिकाओं के जीन पदार्थों में असामान्यता के कारण होते हैं। यह असामान्यताएं कैंसर कारक पदार्थ जैसे तंबाकू का धुआं, विकीरण, रसायन पदार्थ, प्रदूषक अथवा वंशानुगत आदि के कारणण से हो सकती हैं। जीन में असामान्यता उत्पन्न होने पर कैंसर बढ़ाने वाले आॅन्कोजन्स क्रियाशील हो जाते हैं। कोशिकाएं तीव्रता से बढ़ने और विभाजित होने लगती हैं। इन कोशिकाओं का नाश से बचाव होता है अर्थात यह नष्ट नहीं हो पातीं। इसके विपरीत कैंसर कोशिकाओं में ट्यूमर को दबाने वाले जीन प्रायः निष्क्रिय हो जाते हैं जिससे इन कोशिकाओं में सामान्य कार्य का ह्रास हो जाता है। अतः असामान्य कैंसर कोशिकाओं में असामान्य रूप से वृद्धि इनके योगज जीन में असामान्यता आने से होती है। भिन्न-भिन्न प्रकार के सब कैंसरों में एक समानता है कैंसर कोशिकाओं तथा उनकी वंशज कोशिकाओं के जीन पदार्थों में असामान्यता का उत्पन्न होना। कैंसर के प्रकारों में भिन्नता उनमें उपस्थित संख्या में बढ़ी हुई विभाजित होनेवाली कोशिकाओं, उनकी बनावट, कोशिका केंद्र के आकार, कोशिकाओं के रूप और आकार में भिन्नता, कोशिकाओं की विशेषताओं के घटने, कोशिकाओं के सामान्य संगठन में ह्रास आदि से की जाती है। तात्पर्य यह कि कोशिकाओं के जीन पदार्थों में असामान्यता उत्पन्न होने से उनकी संख्या में अति वृद्धि होने लगती है और वे प्राण घातक हो जाती हैं। ज्योतिष की दृष्टि से कोशिकाओं और जीन का कारक सूर्य होना चाहिए क्योंकि सब सूक्ष्म पदार्थों का कारक सूर्य को माना गया है। कोशिकाओं की वृद्धि को एकादश भाव से जोड़ना चाहिए। रोग को षष्ठ भाव से देखते हैं। यहां कुछ रोगियों की कुंडली प्रस्तुत है। कुंडली 1: जातक की जिह्ना में कैंसर था। जातक की कुंडली में छठे भाव में मंगल तथा शनि की युति क्षीण चंद्र से धनु (बृहस्पति) में है। लग्न से द्वितीय भाव सिंह राशि है जो केतु तथा सूर्य से दृष्ट है। इसका स्वामी सूर्य अष्टम भाव में शनि की राशि में शनि से दृष्ट है। चंद्र से द्वितीय भाव शनि का है जो पापकत्र्तरी योग में है। शनि इससे द्वादश में मंगल तथा क्षीण चंद्र के साथ षष्ठ भाव में है। सूर्य से द्वितीय भाव भाग्य भाव है जो पापकत्र्तरी योग में है। इसका स्वामी बृहस्पति चतुर्थ भाव में शुक्र की राशि में राहु से पीड़ित है। तीनों लग्नों से जिह्ना को व्यक्त करने वाली दूसरी राशि व राशीश पीड़ित है। दूसरी राशि वृष (एकादश भाव) का स्वामी शुक्र सप्तम भाव में पापकत्र्तरी योग में है। अतः जिह्ना में रोग की पुष्टि होती है। Û चंद्र लग्न से दूसरे भाव में बुध व शुक्र का योग है। Û तीनों लग्नों से दूसरा भाव (जिह्ना का कारक) राहु, केतु अथवा शनि के प्रभाव में है। Û 22वां द्रेष्काण, तुला राशि में, दशम भाव से केतु की दृष्टि, तुला राशि का स्वामी शुक्र। Û चंद्र से दूसरे भाव में शुक्र। कुंडली 2: जातका के स्तन में कैंसर था। कुंडली के षष्ठ भाव में कर्क राशि है जो वक्षस्थल का प्रतिनिधित्व करती है। इस पर तृतीय भाव से स्वराशीश मंगल की दृष्टि है। इसका स्वामी चंद्र शनि की राशि में द्वादश भाव है और इस पर वक्री शनि की दृष्टि है। शनि राहु से दृष्ट है। यह योग वक्ष रोग का सूचक है। लग्न से चतुर्थ भाव में शुक्र अपनी ही राशि में सूर्य से ग्रस्त है। चतुर्थ भाव तथा चतुर्थेश शुक्र पर राहु व केतु का केंद्रीय प्रभाव तथा वक्री शनि की दृष्टि है। चंद्र से चतुर्थ भाव तृतीय भाव है जो चतुर्थ भाव का द्वादश भाव है। यह स्वराशीश मंगल से ग्रस्त है और इस पर सिंह राशि स्थित राहु की दृष्टि भी है। सूर्य से चतुर्थ भाव में उसकी अपनी राशि सिंह है जहां राहु स्थित है। सिंह राशि का स्वामी सूर्य लग्न से चतुर्थ भाव को पीड़ित कर रहा है। कालपुरुष की चतुर्थ राशि कर्क षष्ठ भाव में है और इस पर मंगल की दृष्टि है। इसका स्वामी चंद्र बारहवें भाव में है। Û लग्न से चतुर्थ भाव में शुक्र स्वराशि में है। Û कर्क राशि बुध और राहु के मध्य है। Û 22 वां द्रेष्काण द्वादश भाव में शनि की राशि में और इसकी दृष्टि षष्ठ भाव पर है। यह केतु व शनि के पाप मध्यत्व में है और केतु से 22 वां द्रेष्काण चतुर्थ भाव में शुक्र और सूर्य के साथ है। कुंडली 3: जातक की मृत्यु फेफड़ों के कैंसर से हुई। उसका लग्न राहु व केतु के अक्ष पर है। कुंडली के षष्ठ भाव में वृश्चिक राशि है जो सूर्य और चंद्र लग्न भी है। षष्ठेश मंगल षष्ठ भाव से द्वादश (पंचम भाव) में लग्नेश बुध तथा द्वादशेश शुक्र की युति में है। षष्ठ भाव में क्षीण तथा नीच चंद्र (द्वितीयेश) तथा तृतीयेश सूर्य की युति है। लग्न से चतुर्थ भाव में कन्या राशि है जिस पर नीचाभिलाषी शनि की दृष्टि है और राहु व केतु का केंद्रीय प्रभाव भी है। इसका स्वामी बुध पंचम भाव में पंचमेश शुक्र के साथ तुला राशि में मंगल से पीड़ित होकर मारकेश के रूप में स्थित है। यह योग वक्ष रोग का सूचक है। चंद्र और सूर्य लग्न स्वयं षष्ठ भाव में हैं। इनसे चतुर्थ राशि कुंभ है जिस पर लग्न से राहु की दृष्टि है। इसका राशीश शनि है जो इससे दूसरे भाव (दशम) में स्थित है। कर्क राशि द्वितीय भाव में है, इसका स्वामी चंद्र नीच व क्षीण होकर सूर्य के साथ षष्ठ भाव में हैं। काल पुरुष का चतुर्थ अंग राहु शनि, मंगल आदि से पीड़ित है - तीनों लग्नों के लिए तथा कर्क राशि के लिए। यह योग फेफड़ों के कैंसर का सूचक है। Û लग्न से चतुर्थ राशि का स्वामी बुध चतुर्थ से दूसरे (मारक स्थान) भाव (पंचम) में शुक्र की राशि में शुक्र से युत होकर मंगल से पीड़ित है। Û चंद्र व सूर्य लग्न से चतुर्थ भाव पर राहु और शनि का प्रभाव है। Û तीनों लग्न व लग्नेश पीड़ित हैं। Û केतु से 22वां द्रेष्काण दूसरे भाव में है जिस पर शुक्र का स्वराशि से केंद्रीय प्रभाव है। कुंडली 4: जातक को निचले पाचन तंत्र में कैंसर था। उसके लग्न पर मंगल की राशि मेष में स्थित केतु की दृष्टि है। लग्नेश बृहस्पति पीड़ित बुध की राशि कन्या में स्थित है। कुंडली के षष्ठ भाव (स्वामी शुक्र) पर मंगल की वृश्चिक राशि स्थित 12वें भाव से शनि की दृष्टि है। इस भाव पर राहु, सूर्य व बुध से युत तुला राशि (एकादश भाव, स्वामी शुक्र) से मंगल की दृष्टि है। मंगल पंचम (पूर्वकर्म) तथा द्वादश (व्यय) भाव का स्वामी है। चंद्र लग्न से षष्ठ भाव कुंडली का नवम भाव है जिस पर पंचम भाव से मेष राशि स्थित केतु की तथा द्वादश भाव से शनि की दृष्टि है। द्वादश तथा पंचम भाव का स्वामी मंगल है। नवम भाव का स्वामी सूर्य है जो राहु, मंगल और बुध के साथ एकादश भाव में शुक्र की तुला राशि में स्थित है। सूर्य लग्न से षष्ठ भाव कुंडली का चतुर्थ भाव है जो केतु स्थित मेष राशि का द्वादश भाव है। इसमें स्थित चंद्र अष्टमेश है। इसका स्वामी बुध अपने से दूसरे भाव (एकादश) में सूर्य, मंगल तथा राहु से पीड़ित है। काल पुरुष की छठी राशि कन्या का स्वामी बुध ही है। इस तरह तीनों लग्न तथा काल पुरुष के छठे अंग पर राहु, केतु, सूर्य, मंगल और शनि का दुष्प्रभाव है जो निचले पाचन तंत्र के घातक रोग से ग्रस्त होने का संकेत देता है। Û षष्ठ तथा एकादश भावों का स्वामी शुक्र लग्न में बृहस्पति की धनु राशि में है। Û शुक्र पर केतु का प्रभाव तथा बुध से उसका संबंध है। Û बृहस्पति, शुक्र तथा बुध परस्पर एक दूसरे के प्रभाव में हैं। Û 22वां द्रेष्काण चतुर्थ भाव में बृहस्पति की मीन राशि में है जो केतु स्थित राशि का 12वां भाव है और इस पर शुक्र का केंद्रीय प्रभाव है। कुंडली 5: जातक को जिगर का कैंसर था। जातक का लग्नेश मंगल द्वादश भाव में राहु के साथ स्थित है। द्वादशेश शुक्र लग्न में स्थित है। शुक्र और मंगल में परिवर्तन योग है। कुंडली के षष्ठ भाव में मंगल की राशि मेष में रोग कारक केतु स्थित है जिस पर द्वादश भाव से मंगल तथा राहु की दृष्टि है। षष्ठेश मंगल द्वादश भाव में शुक्र की राशि में राहु के साथ युति में है। जिगर काल पुरुष के छठे अंग में आता है। जन्म लग्न तथा चंद्र लग्न से षष्ठ भाव देख चुके हैं। सूर्य लग्न से षष्ट भाव कुंडली का अष्टम भाव है जिस पर द्वादश भाव से मंगल से युत राहु की दृष्टि है, शनि का (राशीश बृहस्पति) केंद्रीय प्रभाव है, शनि राशि स्थित बृहस्पति की भी दृष्टि है। अष्टमेश बुध है जिसकी दूसरी राशि कन्या एकादश भाव है। बुध पाप मध्यस्थ (सूर्य तथा क्षीण चंद्र) है, इस पर पंचम भाव से शनि की पूर्ण दृष्टि तथा षष्ठ भाव से मेष राशि स्थित केतु की दृष्टि है। काल पुरुष की छठी राशि कन्या एकादश भाव में है जिस पर पंचम भाव से शनि तथा षष्ठ भाव से केतु की दृष्टि है। इसका स्वामी बुध मारक स्थान द्वितीय भाव में बैठा है। जिगर का कारक बृहस्पति द्वितीय और पंचम भाव का स्वामी है और चतुर्थ भाव में (पंचम से द्वादश) शनि की राशि कुंभ में स्थित है। बृहस्पति पर द्वादश भाव (द्वादशेश शुक्र) से मंगल से युत राहु की दृष्टि है। बृहस्पति की दोनों राशियां शनि से प्रभावित हैं। बृहस्पति और शनि परिवर्तन योग में हैं। यह योग जिगर के रोग का सूचक है। Û रोग कारक केतु का प्रभाव बृहस्पति और शुक्र राशियों पर है। Û बृहस्पति व उसकी राशियां शनि के प्रभाव में हैं। Û शुक्र व उसकी राशियां मंगल, राहु और शनि के प्रभाव में हैं। Û 22 वां द्रेष्काण अष्टम भाव में है जिस पर शनि का केंद्रीय प्रभाव, मंगल से युत राहु की दृष्टि और अशुभ बुध की दृष्टि है। अष्टमेश बुध पापी है, केतु से 22वां द्रेष्काण नवम भाव में है जिस पर केतु का केंद्रीय प्रभाव तथा मंगल और राहु का द्वादश भाव से केंद्रीय प्रभाव है। नवमेश चंद्र मंगल की राशि में शुक्र से युत होकर पाप मध्यस्थ है। केतु से 22वें द्रेष्काण का राशीश शुक्र के साथ लग्न में है। कुंडली 6: जातका के गुप्तांग में कैंसर था। इनका लग्नेश शुक्र षष्ठ भाव का स्वामी होकर सप्तम भाव में और सप्तमेश मंगल अष्टम भाव में राहु से युत है। इस योग ने जातका को पुरुषप्रिय बनाया और साथ ही गुप्तांग में रोग का कारण बना। पंचमेश बुध, सूर्य अधिष्ठित राशि का स्वामी, षष्ठ भाव में रोग का कारक बना। कुंडली के षष्ठ भाव में शुक्र की तुला राशि है जो शनि और बुध से पीड़ित है और इस पर केतु की भी दृष्टि है। षष्ठेश शुक्र सप्तम भाव में पाप मध्यस्थ है। सप्तम भाव काल पुरुष के गुप्तांग को व्यक्त करता है। जन्म लग्न से सप्तम भाव पाप मध्यस्थ है। इस पर तृतीय भाव से उच्च बृहस्पति की दृष्टि है, परंतु बृहस्पति षष्ठ भाव में स्थित उच्च शनि से दृष्ट है। सप्तमेश मंगल राहु से युत होकर अष्टम भाव में बृहस्पति की राशि धनु में बैठा है और इस पर षष्ठ भाव से शनि की दृष्टि है। चंद्र लग्न से सप्तम भाव कुंडली का चतुर्थ भाव है। इस पर मंगल से युत राहु की अष्टम भाव से दृष्टि है। सप्तमेश सूर्य चंद्र लग्न से अष्टम भाव में स्थित है। सूर्य लग्न से सप्तम भाव पर अष्टम भावस्थ राहु से युत मंगल की दृष्टि है। इसके सप्तमेश बृहस्पति पर भी राहु से युत मंगल की दृष्टि है। चंद्र लग्नेश शनि है और सूर्य लग्नेश बुध है, शनि और बुध दोनों षष्ठ भाव में शुक्र की राशि तुला में स्थित हैं। सातवीं राशि तुला षष्ठ भाव में है। Û सप्तमेश मंगल अष्टम भाव में राहु से युत है। Û लग्नेश तथा षष्ठेश शुक्र पाप मध्यस्थ है और सप्तम भाव में है। Û केतु से 22वां द्रेष्काण लग्न में है जिसका स्वामी शुक्र है। Û शुक्र गुप्तांग का कारक है। कुंडली 7: जातक के मस्तिष्क में कैंसर था। कुंडली का षष्ठ भाव पाप दृष्टि मध्यस्थ है। पांचवें भाव पर मंगल व शनि की और सप्तम भाव पर नीच सूर्य की दृष्टि है। षष्ठ भाव पर मंगल से दृष्ट, मंगल राशि में स्थित राहु की दृष्टि है। षष्ठेश बृहस्पति दशम भाव में उच्च होकर स्थित है, परंतु यह भी राहु से दृष्ट है, अतः रोग की वृद्धि कर रहा है। लग्न या प्रथम भाव काल पुरुष के मस्तिष्क का कारक है। जातक का जन्म लग्न तथा सूर्य लग्न एक ही है। इस लग्न में नीच का सूर्य स्थित है। यह पाप मध्यस्थ है। एक ओर राहु तथा दूसरी ओर नीच शुक्र स्थित है। इस लग्न पर सूर्य राशि स्थित और मंगल से युत शनि की दृष्टि है। उच्च बृहस्पति का केंद्रीय प्रभाव है। इस लग्न का लग्नेश शुक्र बारहवें भाव में नीच होकर स्थित है जिस पर अष्टम भाव से केतु (रोगकारक) की दृष्टि है। चंद्र लग्न सूर्य लग्न से समसप्तक है और इस पर नीच सूर्य की दृष्टि है और उच्च बृहस्पति का केंद्रीय प्रभाव है। चंद्र मन और विचार का कारक होने से मस्तिष्क से जुड़ा है। इसके दोनों ओर बृहस्पति और शुक्र की शत्रु राशियां हंै। सूर्य की राशि सिंह मंगल और शनि से पीड़ित है और चंद्र की राशि मंगल की राशि में स्थित राहु से दृष्ट है। चंद्र केंद्राधिपति दोष से भी ग्रस्त है जिसके कारण उसका शुभत्व क्षीण है। Û सूर्य नीच होकर शुक्र की राशि में है और शुक्र नीच होकर अपनी राशि से द्वादश राशि कन्या में है। Û सूर्य, चंद्र दोनों पाप ग्रस्त हैं, Û बुद्धि तथा रोग देने वाला बुध मारक स्थान (द्वितीय भाव) में वृश्चिक राशि में है और राहु से युत है, Û केतु से 22वां द्रेष्काण भी मारक स्थान (द्वितीय भाव) में बुध और राहु से युत है। इसका स्वामी मंगल एकादश भाव में सिंह राशि में शनि से युत है। इस पर शुक्र की राशि से केतु की दृष्टि है। Û केतु शुक्र की राशि वृषभ में है। कुंडली 8: जातक को रक्त कैंसर था। उसकी कुंडली में षष्ठ भाव पाप दृष्टि मध्यस्थ है। एक ओर सूर्य और राहु हैं तो दूसरी ओर शनि, मंगल और केतु से दृष्ट सप्तम भाव है। सप्तमेश बुध षष्ठ भाव में षष्ठेश तथा एकादशेश शुक्र के साथ स्थित है। लग्न में पाप ग्रह शनि स्थित है और लग्नेश बृहस्पति षष्ठ भाव में शुक्र तथा बुध के साथ युति में है। रक्त का कारक ग्रह चंद्र है। लग्न से चंद्र एकादश भाव में केतु से पीड़ित होकर शुक्र की तुला राशि में स्थित है। इस पर सूर्य से युत राहु की तथा मंगल की दृष्टि है। चंद्र राशीश शुक्र षष्ठ भाव में है। सूर्य लग्न से चंद्र सप्तम भाव में है, सूर्य राहु से पीड़ित है। सूर्य की राशि सिंह पर भी राहु की दृष्टि है। चंद्र लग्न में चंद्र तो पाप ग्रस्त है ही चंद्र लग्नेश शुक्र की स्थिति भी अशुभ है। चंद्र की राशि कर्क अष्टम भाव में है और इस पर सूर्य, राहु, चंद्र तथा केतु का केंद्रीय प्रभाव है। Û चंद्र एकादश भाव में शुक्र की राशि में राहु, केतु और उच्च सूर्य से पीड़ित है। Û चंद्र की राशि कर्क सूर्य, राहु और केतु के केंद्रीय प्रभाव में है। Û षष्ठ भाव की राशि शुक्र और शुक्र वहां स्थित भी है। Û केतु से 22वां द्रेष्काण एकादश भाव में, शुक्र की राशि में है। इन कुंडलियों के अध्ययन से जो कुछ भी तथ्य सामने आए हैं उनका आधार पुरातन ज्योतिर्विदों द्वारा प्रतिपादित मान्यताएं हैं। इनके अनुसार कुंडली का षष्ठ भाव रोग का कारक स्थान है। प्रत्येक अंग के रोग की जानकारी एक भाव विशेष एवं राशि विशेष के अध्ययन से मिल सकती है। अतः इस शोध में प्रत्येक कुंडली का षष्ठ भाव, काल पुरुष के उस रोगी अंग वाली राशि तथा जन्म, चंद्र और सूर्य तीनों लग्नों से रोग कारक भाव तथा भावेश का ज्योतिषीय अध्ययन किया गया। इस अध्ययन में कुछ अवलोकन किए गए हैं जो पुरातन मान्यताओं का प्रतिपादन करने के अतिरिक्त और भी कुछ कहते हैं। ये अवलोकन हैं: प्रत्येक कुंडली में प्रायः Û षष्ठ भाव व षष्ठेश पीड़ित है, षष्ठ भाव का संबंध शुक्र से है। Û जन्म लग्न, चंद्र लग्न तथा सूर्य लग्न से और कैंसर से प्रभावित अंग को व्यक्त करने वाला भाव और राशि दूषित है। मुख्य प्रदूषक मंगल, राहु, शनि, सूर्य तथा केतु हैं। Û तीसरे, छठे तथा विशेष रूप से एकादश उपचय भावों में बृहस्पति या शुक्र की राशि है। Û कैंसर प्रभावित भाव, भावेश और षष्ठ भाव का संबंध शुक्र और केतु से है। Û मंगल राहु की या तो युति है, या दृष्टि है या वे तृतीय और एकादश भाव में हैं। Û सूर्य नीच है या शनि से प्रभावित है। चंद्र और बुध भी पाप प्रभाव में हैं। Û शनि मुख्यतः बृहस्पति की राशि में अथवा शुक्र या सूर्य की राशि में है। Û जिह्ना के कैंसर के उदाहरणों में चंद्र लग्न से दूसरे स्थान पर बुध, शुक्र व शनि का प्रभाव है। Û स्तन कैंसर के उदाहरण में चंद्र लग्न से दूसरी राशि वृष (स्वामी शुक्र) है जो सूर्य या मंगल से पीड़ित है। Û फेफड़ों के कैंसर के उदाहरण में चतुर्थ भाव पर शनि का प्रभाव है तथा चंद्र दूषित है। Û जिगर के कैंसर के उदाहरण में बृहस्पति पापी ग्रहों से पीड़ित है। Û गुप्तांग में कैंसर के उदाहरण में सप्तम भाव में शुक्र या शुक्र की राशि है। बृहस्पति और शुक्र में संबंध है और बृहस्पति तृतीय, षष्ठ या एकादश भाव में है। Û मस्तिष्क के कैंसर में सूर्य नीच या पाप मध्यस्थ है। शुक्र नीच होकर द्वितीय या द्वादश भाव में है। Û रक्त कैंसर के उदाहरण में चंद्र मंगल से पीड़ित है। Û 22वें द्रेष्काण और केतु से 22वें द्रेष्काण का संबंध बृहस्पति और शुक्र से है। इन अवलोकनों को ज्योतिष के पुरातन सिद्धांतों द्वारा समझाया जा सकता है। जैसे सूर्य का तीव्र एवं पापी प्रभाव तथा चंद्र का पाप प्रभाव, रक्त, मस्तिष्क, वक्ष तथा रोग का सारे शरीर पर प्रभाव दर्शाता है। मंगल का दुष्प्रभाव अस्थि मज्जा पर है जो रोगों को जन्म देने और बढ़ाने में सहायक होता है। बुध को भी रोग का कारक कहा गया है। बृहस्पति पर पाप प्रभाव तथा तृतीय, षष्ठ और एकादश भाव का प्रभाव कैंसर में वृद्धि दर्शाता है। शनि तथा राहु का दुष्प्रभाव लंबे एवं कष्टदायक रोगों का कारक है। दक्षिण भारत के दैवज्ञों के मतानुसार केतु रोग का कारक है - विशेष रूप से लंबे, दुखदायी और अर्बुद जैसे रोगों का। केतु से 22वां द्रेष्काण केतु से अष्टम भाव से जुड़ा है। इसी तरह से लग्न से 22वां द्रेष्काण भी लग्न से अष्टम भाव से जुड़ा है और अष्टम भाव दीर्घकालिक, दुखदायी रोगों का सूचक है। अब प्रश्न उठता है शुक्र को कैंसर से किस प्रकार जोड़ा जाए? कैंसर कोशिकाओं तथा उनकी वंशज कोशिकाओं के जीन पदार्थों में असामान्यता का उत्पन्न होने अर्थात कोशिकाओं का निर्माण करने वाले जीन में असामान्यता उत्पन्न होने से कैंसर कोशिकाएं बनती और बढ़ती हैं। अब जीन का कारक कौन सा ग्रह है? ये जीन कहां से आते हैं ? प्रत्येक प्राणी का जन्म पिता के वीर्य तथा माता की रज के संयोग से होता है। माता के रज और पिता के वीर्य में उपस्थित जीन ही संतान में आती है जिसके फलस्वरूप संतान में वंशानुगत गुण आते हैं। यदि संतान में ये जीन दोषयुक्त हो जाएं तो कैंसर होने की संभावना रहती है। रज और वीर्य का कारक शुक्र है। माता-पिता के शुक्र तथा बृहस्पति के संयोग से संतान में जीन आता है। यदि संतान का शुक्र पाप प्रभाव में है तो उसके कोषों के जीन में असामान्यता आ सकती है और कैंसर का खतरा हो सकता है। यदि माता अेर पिता द्वारा प्रदत्त जीन में ही असामान्यता है तो पुत्र जातक को वंशानुगत कैंसर जन्मजात होगा। विषय बहुत गहन है, शोध की आवश्यकता है। अन्य कारक भी खोजे जा सकते हैं।


वर्ग कुंडलियाँ विशेषांक  अप्रैल 2008

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