अष्टम भावस्थ शनि का विवाह पर प्रभाव

अष्टम भावस्थ शनि का विवाह पर प्रभाव  

प्राचीन ज्योतिषाचार्यों ने एकमत से जातक की कुंडली के सप्तम भाव को विवाह का निर्णायक भाव माना है और इसे जाया भाव, भार्या भाव, प्रेमिका भाव, सहयोगी, साझेदारी भाव स्वीकारा है। अतः अष्टम भावस्थ शनि विवाह को क्यों और कैसे प्रभावित करता है यह विचारणीय हो जाता है क्योंकि अष्टम भाव सप्तम भाव का द्वितीय भाव है। विवाह कैसे घर में हो, जान - पहचान में या अनजाने पक्ष में हो, पति/पत्नी सुंदर, सुशील होगी या नहीं, विवाह में धन प्राप्ति होगी या नहीं आदि प्रश्न विवाह प्रसंग में प्रायः उठते हैं और यह आवश्यक भी है क्योंकि विवाह संबंध पूर्ण जीवन के लिए होते हैं। इन सब प्रश्नों का उत्तर सप्तम भाव से मिलना चाहिए। परंतु जब अष्टम भाव में शनि हो तो विवाह से जुड़े इन सब प्रश्नों पर प्रभाव पड़ता है। देखें कैसे? अष्टम भाव विवाह भाव (सप्तम) का द्वितीय भाव है तो यह विवाह का मारक स्थान होगा, जीवन साथी का धन होगा, परिवार तथा जीवन साथी की वाणी इत्यादि होगा। अतः अष्टम भावस्थ शनि इन सब बातों को प्रभावित करेगा। यदि शनि शुभ प्रभावी है तो जातक को जीवन साथी द्वारा परिवार, समाज में सम्मान, धन (दहेज या साथी द्वारा अर्जित) प्राप्ति, सुख, मधुर भाषी साथी प्राप्त हो सकता है। यदि शनि अशुभ प्रभाव में हो तो जातक के लिए मारक और उसके साथी द्वारा प्राप्त होने वाले शुभ फलों का ह्रास होगा। अष्टम भावस्थ शनि की दृष्टि दशम भाव पर होती है जो जातक का कर्म भाव है और उसके जीवन साथी का चतुर्थ भाव अर्थात परिवार, समाज, गृह सुख, विद्या आदि है; अतः जातक का यश, समाज में प्रतिष्ठा, परिवार सुख, धन समृद्धि, शिक्षा, व्यवसाय आदि प्रभावित होते हैं। अष्टम भावस्थ शनि की दूसरी दृष्टि द्वितीय भाव पर होती है तो जीवन साथी का अष्टम भाव है, अतः उसके दुःख कष्ट, आकस्मिक घटनाएं, गुप्त कृत्य आदि तथा स्वयं के संचित धन को प्रभावित करेगा। अष्टम भावस्थ शनि की तीसरी दृष्टि पंचम भाव पर होती है तो जीवन साथी का एकादश भाव है। अतः प्रभाव संतान पर, शिक्षा पर और जीवन साथी के हर लाभ पर होता है। विवाह जनित जितने भी सुख हैं वह अष्टम भावस्थ शनि से प्रभवित होते हैं जिनमें मुख्य हैं धन, संतान, शिक्षा, व्यवसाय, पैतृक संपत्ति, परिवार सुख आदि। शुभ शनि शुभ परिणाम देता है और अशुभ शनि शुभ फलों को कम कर देता है। इन धारणाओं को मन में रखते हुए कुछ कुंडलियों का अध्ययन किया गया है और पाया गया कि अष्टम भावस्थ शनि निश्चित रूप से विवाह जनित सुख-दुख को प्रभावित करता है। कुंडली सं. 1: जातक का जन्म लग्न कर्क है जिस पर पंचम भाव से केतु की तथा वक्री शनि (सप्तम भाव में मानने पर) की दृष्टि है । लग्नेश चंद्र पर भी वक्री शनि की दृष्टि है और वह चतुर्थ भाव में पाप कर्तरी योग में है। सप्तमेश भी शनि है और अष्टम भाव में वक्री होकर बैठा है। बृहस्पति राहु/केतु के अक्ष पर है। शुक्र वक्री शनि के प्रभाव में है। चंद्र लग्न भी वक्री शनि के प्रभाव में है तथा चंद्र लग्नेश शुक्र है। चंद्र लग्न से सप्तम भाव पर शनि की अष्टम भाव से दृष्टि है। इस पर तृतीय भाव से मंगल की भी दृष्टि है। भावेश मंगल पर राहु तथा बृहस्पति की दृष्टि है और यह चंद्र लग्न से द्वादश भाव में है। चंद्र लग्न से बृहस्पति अष्टम भाव में राहु से युत है। शुक्र चंद्र लग्न के द्वादशेश बुध से युत है। सूर्य लग्नेश बुध सूर्य लग्न से द्वितीय भाव में है तथा सूर्य लग्न का सप्तमेश बृहस्पति सूर्य से द्वादश भाव में राहु से युत है। शुक्र सूर्य लग्न के द्वितीय भाव में है। तीनों लग्न पीड़ित हैं तथा सप्तमेश द्वादश भाव में स्थित हैं। बृहस्पति तथा शुक्र की स्थिति तीनों लग्नों में अशुभ है। जातक का विवाह नहीं हो पाया यद्यपि बृहस्पति की दृष्टि सप्तम तथा पंचम भाव पर है। कुंडली सं. 2: जातक का जन्म मीन लग्न, शनि के नक्षत्र में हुआ था। लग्न पर पंचम भाव से बृहस्पति की दृष्टि है जो उच्च है तथा सूर्य, मंगल, बुध तथा शुक्र चार ग्रहों से युत है। लग्नेश बृहस्पति केंद्राधिपति है परंतु उच्च होने और त्रिकोण में स्थित होने के कारण इसका केन्द्राधिपति दोष नष्ट हो जाता है। पंचम भाव स्थित बृहस्पति तथा शुक्र पर अष्टम भावस्थ उच्च शनि की दृष्टि है। एक विशेषता इस कुंडली में और है - दोनों त्रिकोणाधिपतियों चंद्र और मंगल का राशि परिवर्तन योग है और दोनों नीच हैं। यह राशि परिवर्तन योग दोनों का नीचत्व समाप्त कर देता है। सप्तम भाव पर केतु का केंद्रीय प्रभाव है, सप्तमेश बुध पंचम भाव में चार ग्रहों के साथ युत है परंतु अष्टमस्थ शनि से दृष्ट है। चंद्र लग्न पर पंचम भाव से बृहस्पति की दृष्टि है और यह राहु-शनि की पापकर्तरी में है। चंद्र लग्नेश मंगल चंद्र से नवम भाव में है और उच्च बृहस्पति तथा शुक्र से युत है। चंद्र लग्न का सप्तमेश शुक्र है जो चंद्र से नवम भाव में है। सूर्य लग्न पर अष्टम भाव से शनि की दृष्टि है और इसके द्वादश भाव (चतुर्थ भाव) में केतु स्थित है। सूर्य लग्न में सूर्य चार ग्रहों से युत है। सूर्य लग्न का सप्तमेश शनि है जो सूर्य लग्न से चतुर्थ भाव में है। सूर्य लग्न के सप्तम भाव तथा सप्तमेश शनि पर मंगल की दृष्टि है। सप्तम भाव पर उच्च बृहस्पति, शुक्र, बुध तथा सूर्य की भी दृष्टि है। बृहस्पति और शुक्र सूर्य लग्न में ही स्थित है। ग्रहों की स्थिति तीनों लग्नों में यह दर्शाती है कि जातक का विवाह तो अवश्य होगा, संतान भी होंगी परंतु कुछ देर से होगा। इनका विवाह 34 वर्ष की आयु में सूर्य, शनि, बुध की दशा में हुआ। विवाह कारक शुक्र तथा सूर्य और बुध तीनों शनि के नक्षत्र में हैं और शनि बृहस्पति के नक्षत्र में है। जन्म दशा बुध तथा नक्षत्र शनि है। विवाह के समय गोचर में शनि दशम भाव पर था और बृहस्पति चतुर्थ भाव पर था। कुंडली सं. 3: जातिका का जन्म तुला लग्न में, शनि बुध की दशा में, राहु के नक्षत्र में हुआ था। लग्न पर नवम भाव से केतु की दृष्टि है जो बुध और शुक्र से युत है। लग्नेश शुक्र है। सप्तम भाव पर बृहस्पति और चंद्र का केंद्रिय प्रभाव तथा धनु राशि स्थित राहु की दृष्टि है। सप्तमेश मंगल पंचम भाव में कुंभ राशि में है और अष्टम भाव से सूर्य युत शनि से दृष्ट है तथा नवम भाव से केतु से दृष्ट है। बृहस्पति चतुर्थ भाव में है और स्वगृही चंद्र से दृष्ट है जो विवाह सुख, परिवार सुख दर्शाता है। चंद्र लग्न कर्क है जिस पर अष्टम भाव सूर्य युत शनि की दृष्टि है। चंद्र लग्न राहु मंगल की पाप दृष्टि मध्यस्थ है। चंद्र लग्न से सप्तम भाव पापकर्तरी योग में है, परंतु उसमें बृहस्पति बैठा है। चंद्र लग्न सप्तमेश शनि है जो अष्टम भाव में सूर्य के साथ स्थित है। यह ग्रहों की स्थितियां विवाह के लिए पृथककारी हैं। परंतु चंद्र लग्न से शुक्र द्वादश भावस्थ है। सूर्य लग्न अष्टम भाव, वृष राशि है। इस पर शनि राशि सित बृहसपति तथा मंगल की दृष्टि है। इसमें शनि स्वयं स्थित है। सूर्य लग्नेश शुक्र सूर्य से द्वितीय भाव में है। मार्च 2000 में बुध राहु सूर्य की दशा में जातिका का तय हुआ विवाह टल गया। बुध द्वादशेश है और राहु, केतु अक्ष पर भाग्य भाव में स्थित है। राहु, सूर्य का पृथककारी प्रभाव ने ऐसा किया, अष्टम भाव में स्थित शनि ने इसमें सहयोग दिया। राहु तृतीय भाव से सप्तम, नवम तथा एकादश भाव को प्रभावित कर रहा है। बृहस्पति से सप्तम भाव पर शनि की दृष्टि है और शुक्र से सप्तम भाव में राहु है। उस समय गोचर में शनि, बृहस्पति तथा मंगल सपतम भाव पर थे और राहु केतु 4/10 अंश पर थे। अतः विवाह स्थगित हुआ। इनका विवाह दो वर्श बाद अप्रैल 2002 में बुध, बृहस्पति चंद्र की दशा में हुआ। वास्तव में यह विवाह तो होना ही था क्योंकि इसमें प्रेम मुख्य कारण था। कुंडली से स्पष्ट है कि पंचमेश शनि और सप्तमेश मंगल में परस्पर दृष्टि संबंध है। विवाह के समय गोचर में शनि अष्टम भाव पर, बृहस्पति भाग्य भाव पर और शुक्र सप्तम भाव पर थे। कुंडली संख्या 4: जातिका का जन्म मीन लग्न, केतु, सूर्य की दशा और शनि के नक्षत्र में हुआ था। कुंडली में चार ग्रह सूर्य, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि उचच हैं। लग्न सूर्य मंगल, राहु के पाप कर्तरी योग में है। लग्न पर पंचम भाव से चंद्र राशि स्थित बृहस्पति की दृष्टि तथा बृहस्पति राशि स्थित चंद्र का केंद्रिय प्रभाव है। चंद्र और बृहस्पति दशम भाव (कर्म) तथा पंचम भाव (ज्ञान) में राशि परिवर्तन योग में है। लग्नेश बृहस्पति पर सूर्य तथा शनि का केंद्रिय प्रभाव है। यह तथ्य पति-पत्नी के धर्म को शरीरिक संबंध से उपर उठाते हैं। शुक्र लग्नस्थ है और उच्च है, इस पर पंचम भाव से उच्च बृहस्पति की दृष्टि तथा चंद्र का केंद्रिय प्रभाव है। शनि, बृहस्पति तथा केतु का संबंध लग्न, पंचम, अष्टम, नवम तथा द्वादश से होने से जातक में सन्यास भाव तथा वैराग्य उत्पन्न हुआ। सप्तम भाव केतु शनि के पाप मध्यत्व में है और इस पर उच्च शुक्र की लग्न से दृष्टि है। सप्तमेश बुध तृतीय भाव में शुक्र की राशि में है जो बुध के नक्षत्र में है। ातिका के उचच शनि से सूर्य, बृहस्पति तथा शुक्र प्रभावित हैं जो अष्टम भावस्थ शनि के आध्यात्मिक, गूढ़, गंभीर और विचारशीलता को उच्चतम स्थिति तक ले जाते हैं। शनि कर्म का पक्षधर है, चंद्र अंतःकरण है, बृहस्पति ज्ञान विचार है और शुक्र आंतरिक व्यक्तित्व है। अतः जातिका में उच्च गुणों का वार्धक्य होना चाहिए। चंद्र लग्न धनु (बृहस्पति) राशि में है जिस पर अष्टम भाव से शनि की दृष्टि तथा लग्न से शुक्र का केंद्रिय प्रभाव है। चंद्र से पंचम भाव में उच्च सूर्य तथा नवम भाव में सूर्य की राशि में केतु है। चंद्र से सप्तम भाव बुध (बुद्धि) और बृहस्पति (ज्ञान) के मध्य है। चंद्र से सप्तमेश बुध इस सप्तम भाव से द्वादश भाव में है। और इस पर राहु युत मंगल की दृष्टि है। चंद्र से शुक्र चतुर्थ भाव में (जनता) और बृहस्पति अष्टम भाव में है। सूर्य लग्न बुध (बुद्धि) और शुक्र (आंतरिक व्यक्तित्व) के मध्य है और इस पर केतु व शनि की दृष्टि है। सूर्य लग्न से पंचम भाव में सूर्य की राशि में केतु, सप्तम भाव में शुक्र की राशि में शनि और नवम भाव में बृहस्पति की राशि में चंद्र है। चंद्र लग्न में बृहस्पति चंद्र की राशि में अष्टम भाव में है और शुक्र चतुर्थ भाव में मीन राशि में है। सूर्य लग्न से बृहस्पति चतुर्थ भाव में, शनि सप्तम भाव में तथा चंद्र नवम भाव में है। इन स्थितियों से भी उक्त निष्कर्ष की पुष्टि होती है। जातिका का विवाह शुक्र, राहु, राहु की दशा में हुआ परंतु देह धर्म न निभा कर दोनों ने आध्यात्म को अपनाया। कुंडली संख्या 5: जातिका का जन्म सिंह लग्न में शुक्र के नक्षत्र में बृहस्पति चंद्र की दशा में हुआ। लग्न पर शनि राशि स्थित सूर्य की सप्तम भाव से दृष्टि है। सूर्य लग्नेश है और सप्तम भाव में है, इस पर सिंह राशि से वक्री बृहस्पति की दृष्टि है। सप्तमेश शनि अष्टम भाव में दो क्रूर ग्रहों मंगल तथा राहु से युत है। अष्टम भाव सप्तम से द्वितीय भाव है। बृहस्पति पंचमेश और अष्टमेश होकर लग्न में स्थित है। शुक्र तृतीयेश तथा दशमेश है और षष्ट भाव में बुध के साथ युत है तथा केतु से दृष्ट है। द्वितीय भाव पर अष्टम भाव से मंगल, शनि और राहु की दृष्टि है। पंचम भाव पर अष्टम भाव से मंगल, राहु से युत शनि की दृष्टि है। दशम भाव पर भी मंगल राहु से युत शनि की दृष्टि है। चंद्र लग्न पर मंगल शनि युत राहु की दृष्टि है और इस पर सूर्य तथा वक्री बृहस्पति का केंद्रिय प्रभाव है। चंद्र लग्नेश मंगल चंद्र से पंचम भाव में शनि और राहु से युत है। चंद्र से शुक्र तृतीय भाव में तथा बृहस्पति दशम भाव में है। चंद्र से द्वितीय भाव पर मंगल राहु युत शनि की दृष्टि है। चंद्र से पंचम भाव में शनि, मंगल और राहु की युति है। चंद्र से दशम भाव में वक्री बृहस्पति पर शनि राशि स्थित सूर्य की दृष्टि है। चंद्र से सप्तम भाव पर मंगल राहु युत शनि की दृष्टि है। सूर्य लग्न शनि की राशि में है जो मंगल राहु के साथ सूर्य से दूसरे भाव में है। सूर्य से बृहस्पति सप्तम भाव में और शुक्र ,ादश भाव में है। सूर्य से पंचम भाव पर शनि राहु युत मंगल की दृष्टि है। सूर्य से दशम भाव का स्वामी मंगल है जो शनि तथा राहु से युत है। तीनों लग्नों से पंचम भाव पर शनि, राहु और मंगल का प्रभाव है, अतः संतानहीनता दर्शाता हैं सप्तम भाव पर पृथककारी प्रभाव हैं परंतु बृहस्पति और शुक्र की स्थिति उन्हें कम कर रही है। धन भाव पर भी पाप प्रभाव हैं अतः व्यवसाय और धन में गड़बड़ी और कमी है। जातिका का विवाह बुध केतु शुक्र की दशा में हुआ। इनके कोई संतान नहीं है। आर्थिक परेशानियां भी हैं। विवाह के पश्चात की अंतर्दशाएं संतान प्राप्ति में सहायक नहीं रहीं। अतः विवाह सुखदायक नहीं हो पाया। कुंडली सं. 6: जातिका का जन्म कुंभ लग्न, बृहस्पति का नक्षत्र और केतु बृहस्पति की दशा में हुआ। उच्च शुक्र को छोड़कर शेष छः ग्रह वक्री हैं, यह इस कुंडली की विशेषता है। लग्न पर चंद्र, मंगल, बृहस्पति तथा राहु की दृष्टि है। लग्न में पंचमेश तािा अष्टमेश बुध तथा सप्तमेश सूर्य की केतु के साथ युति है। बृहस्पति सप्तम में तथा शुक्र उच्च होकर द्वितीय भाव में वक्री मंगल व शनि से दृष्ट है। लग्नेश शनि अष्टम भाव में है और द्वितीय भाव से उच्च शुक्र द्वारा दृष्ट है। लग्न तथा सूर्य लग्न एक ही हैं। चंद्र लग्न पर सूर्य, बुध और केतु की दृष्टि है। चंद्र लग्न में मंगल (तृतीयेश व दशमेश), बृहस्पति (लाभेश, धनेश) तथा राहु की युति चंद्र के साथ है। चंद्र लग्नेश सूर्य चंद्र से सप्तम भाव में बुध और केतु के साथ स्थित है। बृहस्पति चंद्र लग्न में है और शुक्र चंद्र से अष्टम भाव में है। लग्न तािा सूर्य लग्न से पंचम भाव पर शनि तथा सूर्य से युत केतु की दृष्टि है; चंद्र लग्न से पंचम भाव पर मंगल से युत राहु की दृष्टि है। जातिका का विवाह सूर्य, सूर्य शुक्र की दशा में हुआ, शुक्र उच्च है और सूर्य लग्न में है। परंतु शुक्र पर मंगल (राहु से युत) तथा शनि की दृष्टि है, सूर्य सप्तमेश है। विवाह कारक तत्वों पर शनि, सूर्य तथा राहु का पृथककारी प्रभाव है जिसके कारण इनका अपने पति से मेल और सामंजस्य नहीं रहता है। इनका प्रथम गर्भपात हुआ जो पंचम भाव पर पाप प्रभाव के कारण है। जीवन में आर्थिक समस्याएं भी हैं, जो सब लग्नों से द्वितीय तथा दशम भावों से पता चलता है। जातिका बी.एड. है, चतुर्थ भाव का स्वामी शुक्र उच्च होकर द्वितीय भाव में है। जातिका शिक्षिका कार्य कर रही है, दशमेश मंगल सप्तम भाव (नौकरी) में बृहस्पति, व चंद्र के साथ है। कुंडली सं. 7: जातक का जन्म मेष लग्न में, शुक्र के नक्षत्र में सूर्य राहु की दशा में हुआ था। लग्न पर सप्तम भाव से शुक्र की राशि से बृहस्पति की दृष्टि है, दशम भाव से शुक्र का केंद्रिय प्रभाव है। लग्नेश मंगल स्वराशि में अष्टम भाव में पंचमेश सूर्य तथा कर्मेश व लाभेश शनि की युति में है। सप्तम भाव तुला राशि है और इस पर कर्म भाव से शुक्र का केंद्रिय प्रभाव तथा लग्न से केतु की दृष्टि है। शुक्र द्वितीय भाव का भी स्वामी है, अतः पत्नी का पति के कर्म तथा धन से गहरा संबंध है। जातक का विवाह एक बहुत धनी एवं संपन्न परविार में हुआ तथा पर्याप्त धन प्राप्त हुआ। विवाह राहु बृहस्पति बृहस्पति की दशा में हुआ। बृहस्पति तथा राहु शुक्र की राशि में सप्तम भाव में स्थित है। लाभेश तथा कर्मेश शनि अष्टम भाव में लग्नेश तािा पंचमेश मंगल और सूर्य के साथ युत है। भाग्येश बृहस्पति सप्तम भाव में शुक्र की राशि में हैं। चंद्र लग्न कन्या राशि है और चंद्र लग्नेश बुध चंद्र से चतुर्थ भाव में धनु राशि में है। चंद्र से सप्तम राशि का स्वामी बृहस्पति है जो चंद्र से द्वितीय भाव में है। चंद्र से पंचम भाव में शुक्र है। चंद्र से दशम भाव का स्वामी बुध है तथा नवम भाव का स्वामी शुक्र है। चंद्र से एकादश भाव का सवामी स्वयं चंद्र है और इस भाव पर शुक्र की दृष्टि है। सूर्य लग्न वृश्चिक है जिसमें सूर्य मंगल तथा शनि की युति है। सूर्य से सप्तम भाव में शुक्र की राशि है। सूर्य से नवम भाव में कर्क राशि है जिसका स्वामी चंद्र सूर्य लग्न के लाभ भाव में बुध की राशि में है। सूर्य से दशम भाव का स्वामी स्वयं सूर्य है। लग्न के पंचम भाव का स्वामी सूर्य, चंद्र लग्न से पंचम भाव का स्वामी शनि है, इन दोनों भावों पर अष्टम भावस्थ शनि की दृष्टि है। सब लग्नों में जातक के नवम, दशम तथा एकादश भाव पर बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि के प्रभव है। जातक का कपड़े से संबंधित व्यवसाय है और धन की बहुलता है। जातक के एक पुत्र तथा शनि के प्रभाव है। जातक का कपड़े से संबंधित व्यवसाय है और धन की बहुलता है। जातक के एक पुत्र तथा पुत्रियां हैं। जीवन के सारे सुख साधन हैं। वर्ष में 2-3 बार विदेश यात्रा भी हो जाती है, चाहे वह व्यवसाय से जुड़ी हो। कुंडली सं. 8: जातिका का जन्म मकर लग्न में, मंगल के नक्षत्र में शुक्र राहु की दशा में हुआ था। लग्न पर मंगल की दृष्टि है, तथा भाग्य भाव से सूर्य से युत राहु की दृष्टि है। लग्नेश शनि भाग्येश बुध तथा पंचमेश और दशमेश शुक्र (योगकारक) से युत होकर अष्टम भाव में स्थित है। चतुर्थेश और लाभेश मंगल बृहस्पति से युत होकर षष्ट भाव में है। षष्टेश बुध अष्टम भाव में और द्वादशेश बृहस्पति षष्ट भाव में है (विपरीत राजयोग)। सप्तमेश चंद्र चतुर्थ भाव में है, उच्चाभिलाषी है तथा चतुर्थ ग्रह का कारक है। पंचम भाव शुक्र राशि का है जो अष्टम भाव में शनि तथा बुध के साथ है और शनि की दृष्टि पंचम भाव पर है। चंद्र लग्न मेष राशि का है और चंद्र शुक्रके नक्षत्र में है। चंद्र से सप्तम भव शुक्र राशि का है जिस पर बृहस्पति व शनि की दृष्टि है। चंद्र से पंचम भाव में शुक्र बुध और शनि हैं। चंद्र से चतुर्थेश स्वयं चंद्र हैं। चंद्र लग्न का लाभेश शनि चंद्र से पंचम भाव में है। केतु चंद्र से बारहहवें भाव में हैं ंद्र लग्नेश मंगल चंद्र से तृतीय भाव में बृहस्पति से युत हैं बृहस्पति चंद्र लग्न का नवमेश है। सूर्य लग्न कन्या राशि है जिस पर बृहस्पति से युत मंगल की दृष्टि सूर्य लग्ने के कर्म भाव से हैं सूर्य लग्न से चतुर्थेश व सप्तमेश बृहस्पति है। सूर्य लग्नेश बुध सूर्य की राशि में शुक्र और शनि के साथ हे, सूर्य बुध में राशि परिवर्तन योग हैं बुध सूर्य लग्न का दशमेश है। सूर्य लग्न से द्वितीयेश तथा नवमेश शुक्र सूर्य से द्वादश भाव में सिंह राशि में शनि और बुध के साथ हैं। सब लग्नों से द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम, दशम, एकादश भाव शुभ प्रभावों में हैं। शनि का प्रभाव द्वितीय, पंचम तथा दशम भाव पर शुभ है। जातिका का विवाह 2001 में चंद्र बुध बृहस्पति सप्तम भाव के दोनों ओर हैं। लग्न पर बृहस्पति से युत मंगल की दृष्टि है और मंगल बृहस्पति के नक्षत्र में है। बृहस्पति की दृष्टि धन भाव तथा कर्म भाव पर और शनि की दृष्टि कर्म भाव, धन भाव तथा संतान भाव पर है। यदि सप्तम भाव को पति का लग्न मानें तो यह बृहस्पति तथा शुक्र के मध्यस्थ है और लग्नेश चंद्र सूर्य की उच्च राशि में उच्चाभिलाषी होकर दशम स्थान में बैठा है। सप्तम से तृतीय स्थान सूर्य और राहु स्थित है जिन पर बृहस्पति युत मंगल की दृष्टि है। सप्तम से षष्ट भाव का स्वामी बृहस्पति है जो इस भाव को देख भी रहा है। अतः पति परिश्रम द्वारा प्रतियोगिता परीक्षा में सफलता प्राप्त कर भारतीय लोक सेवा में रत एक उच्च पदस्थ प्रशासक हैं और धनी परिवार से हैं। जातिका शिक्षित है, इसका वैवाहिक जीवन सुखमय हैं पिता से उपहार में बहुत संपत्ति तथा धन आदि मिला है, ससुराल भी प्रतिष्ठित एवं संपनन है। एक पुत्र संतान भी है। एक सुखी परिवार की परिभाषा अनुसार जातिका का जीवन पर्याप्त सुखमय है। इन उदाहरणों में अष्टम भावस्थ शनि का वैवाहिक जीवन पर निम्न प्रभाव देख गए। तीनों लग्नों से अध्ययन किया गया। Û विवाह नहीं होता, Û विवाह में अड़चने, Û विवाह होता है पर देर से, Û विवाह होता है पर संतान नहीं होती Û विवाह जनित सुख नहीं, Û व्यवसाय में कमी, Û असफल विवाह Û सफल विवाह व सुखमय जीवन। इस अध्ययन के आधार पर निम्न परिणाम निकाले गए - Û अष्टम भावस्थ शनि शुभ स्थिति में हो, शुभ दृष्ट हो तो वैवाहिक जीवन सुखमय होता है। Û शुक्र पर अशुभ शनि का प्रभाव विवाहित जीवन को दुःखमय बनाता है। Û यदि शुक्र पीड़ित हो और उसका पंचम भाव से संबद्ध हो तो विवाह नहीं होता। Û सप्तमेश की नीच राशि का स्वामी शुक्र हो तो विवाहित जीवन दुःखमय होता है। Û जन्म दशानाथ पीड़ित हो अथवा द्वादश भाव में हो तो विवाह की संभावना नहीं या विवाह देर से होता है। Û लग्नेश या सप्तमेश पर शनि का प्रभाव विवाह में देरी का कारण बनता है। Û चंद्र लग्न से सप्तमेश की अशुभ स्थिति विवाह सुख में बाधा डालती है। Û बृहस्पति या चंद्र से पंचम भाव में मंगल, राहु हों तो संतान नहीं होती। Û सप्तमेश यदि दशम अथवा चतुर्थ भाव में है तो सुखी वैवाहिक जीवन, आर्थिक संपन्नता तथा ससुराल से धन प्राप्ति होती है।


नव वर्ष विशेषांक  जनवरी 2009

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