सटीक फलादेश के लिए बाधक दोष का

सटीक फलादेश के लिए बाधक दोष का  

सटीक फलादेद्गा के लिए बाधक दोष का भाव आकलन जरूरी डा. अर्जुन कुमार गर्ग, पलवल अधिकांश ज्योतिषीगण प्रश्नकर्ता की लग्न-कुंडली, चंद्र-कुंडली और नवमांश कुंडली देखकर फलादेश करते हैं, लेकिन ऐसे में फलादेश में त्रुटि होने की पूरी संभावना रहती है। क्या सटीक फलादेश के लिए उस कुंडली की बाधक राशि व बाधक ग्रह का विश्लेषण विशेष लाभदायक होगा? कु डली में षष्ठ, अष्टम और द्वादश भाव को निकृष्ट स्थान की संज्ञा दी गई है। इन भावों के स्वामी और इन भावों में स्थित ग्रह अपनी दशा या अंतर्दशा में जातक के लिए कष्ट उत्पन्न करते हैं। इन भावों के अतिरिक्त द्वितीय और सप्तम भाव यश, धन, पद और संपत्ति दायक होने पर भी मारक स्थान कहलाते हैं, क्योंकि इन भावों के स्वामी और इनमें अधिष्ठित ग्रह अपनी दशा या अंतर्दशा में मृत्यु या मृत्यु तुल्य कष्ट प्रदान करते हैं। षष्ठ, अष्टम या द्वादश भाव के स्वामी जिस भाव में स्थित होते हैं, उस भाव के फल को भी नष्ट कर देते हैं। उदाहरणार्थ, सौंदर्य और यौवन का प्रतीक शुभ ग्रह शुक्र मेष लग्न की कुंडली में द्वितीय और सप्तम भाव के स्वामी तथा धनु लग्न की कुंडली में षष्ठ और एकादश भावों के स्वामी होकर धनप्रद होने पर भी रोग, ऋण, शत्रुओं के द्वारा मृत्यु जैसा दुःख देने वाला होता है। अतः क्रूर भाव षष्ठ, अष्टम या द्वादश भाव के लिए कुंडली में इनके स्वामियों का स्वगृही होना अपेक्षित है। ऐसी अवस्था में इन भावों के स्वामी अपने ही भावों की अशुभता को नष्ट करके शुभ योग बनाकर शुभफलदायक हो जाते हैं, जैसे, स्वगृही षष्ठेश से हर्ष योग, स्वगृही अष्टमेश से सरल योग और स्वगृही द्वादशेश से विमल योग योग बनता है। कुंडली अध्ययन हेतु केंद्र दोष और मारक दोष की भांति बाधक दोष के अध्ययन का विशेष प्रचलन नहीं है, किंतु इसके आकलन से सटीक फल प्राप्त होते हैं। बाधक क्या है? किसी कार्य में बाधा या रुकावट उत्पन्न करने वाला बाधक कहलाता है। कुंडली के अध्ययन के समय कोई ग्रह वैसे तो योगकारी, लाभकारी और पद-प्रतिष्ठाकारी प्रतीत होता है, परंतु वास्तव में वह अनिष्टकारी सिद्ध होता है, तब ग्रह की ऐसी अवस्था बाधक कहलाती है। जन्मलग्न चर स्वभाव की राशि (मेष, कर्क, तुला, या मकर) हो तो एकादशेश, जन्मलग्न स्थिर स्वभाव की राशि (वृष, सिंह, वृश्चिक या कुंभ) हो तो नवम स्थान, उसका स्वामी और उसमें स्थित ग्रह और जन्मलग्न द्विस्वभाव राशि (मिथुन, कन्या, धनु या मीन) हो तो सप्तम स्थान, उसके स्वामी ग्रह बाधाकारी होते हैं। बाधक दोष केवल जन्मलग्न के लिए ही नहीं है, बल्कि प्रत्येक भाव के लिए होता है। जैसे, मेष लग्न की कुंडली में चर स्वभाव की मेष लग्नराशि के लिए बाधक स्थान एकादश भाव, द्वितीय भाव (जहां स्थिर स्वभाव की वृष राशि है) के लिए बाधक स्थान दशम भाव (जो द्वितीय से नवम स्थान पर है) और तृतीय भाव (जहां द्विस्वभाव मिथुन राशि है) के बाधक स्थान नवम भाव (तृतीय से सप्तम स्थान पर) है। एक उदाहरण स्थिर सिंह लग्न राशि का देखते हैं। मान लें सिंह लग्न में बृहस्पति और पंचम भाव में मांदी हैं। स्थिर सिंह राशि के लिए नवम भाव, नवमेश मंगल और उसमे स्थित ग्रह बाधक होंगे। इसी प्रकार तृतीय भावगत चर तुला राशि के लिए तृतीय से एकादश स्थान अर्थात् लग्न भाव, लग्नेश और इसमें स्थित ग्रह बाधक होंगे। मांदी स्थित धनु राशि का स्वामी बृहस्पति जो तृतीय से एकादश स्थान पर स्थित है, तृतीय भाव के लिए बाधक होगा, जिसकी दशा या अंतर्दशा में तृतीय भाव के फल प्राप्ति में बाधा उत्पन्न होगी। धनु लग्न की कुंडली क्रमांक 1 में सप्तम भाव और सप्तमेश बुध बाधक हैं। स्वगृही और भद्रयोग होने के कारण इस बुध को हम विद्या-बुद्धि, नौकरी-व्यापार और यश-धन हेतु योगकारी और लाभकारी मानते हैं, किंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। धनु और मीन लग्न वालों के लिए स्वगृही बुध की दशा या अंतर्दशा में अभीष्ट फल नहीं मिलते। ज्योतिषी और जातक दोनों चिंतित होते हैं कि ऐसे बलवान ग्रह के फल क्यों नहीं मिल रहे? यही बाधक दोष है। फिर भी, ऐसे जातक का विवाह शीघ्र हो जाता है, बशर्ते कि सप्तम भाव शनि से दृष्ट न हो। इसी प्रकार, मिथुन और कन्या लग्न वालों के लिए सप्तम भाव और सप्तमेश बृहस्पति बाधक हैं। सप्तम भावगत बृहस्पति से हंस योग बनने पर भी इसका सर्वाधिक असर वैवाहिक सुख पर पड़ता है। इसका उदाहरण जयललिता की कुंडली है, जिसके सप्तम भाव में बृहस्पति है, लेकिन बाधक बृहस्पति ने उनका विवाह नहीं होने दिया। ज्योतिष ग्रंथों में बाधक दोष का विस्तृत वर्णन नहीं है, इसलिए यह व्यापक शोध का विषय है। एक प्रश्न है कि बाधक स्थान के स्वामी के लिए कुंडली में कौन सा उपयुक्त स्थान है? हम जानते हैं कि कुंडली में केंद्र और त्रिकोण भाव उन्नयन के स्थान हैं, मगर तृतीय, षष्ठ, अष्टम और द्वादश भाव अवनयन के। इस कारण केंद्र और त्रिकोण के स्वामी की बलवान अवस्था और दुष्ट भाव के स्वामी की निर्बल अवस्था अभीष्ट है। इस तथ्य के आधार पर हम कह सकते हैं कि बाधक स्थान के स्वामी की अपने भाव से केंद्र या त्रिकोण स्थान में उपस्थिति बलवृद्धि कारक होगी और ऐसे में उसका बाधक दोष बढ़ जाएगा, किंतु अपने भाव से तृतीय, षष्ठ, अष्टम और द्वादश भाव में स्थित होकर वह बलहीन होकर बाधक दोष से मुक्त होगा। धीरुभाई अंबानी की कुंडली क्रमांक 2 में बाधक ग्रह बुध द्वादश भावगत है, जो सप्तम से षष्ठ स्थान पर होने के कारण बाधक दोष से मुक्त है और यश, धन एवं व्यापार वृद्धि के लिए लाभकारी है, किंतु कुंडली क्रमांक 1 में यही बुध शुभ ग्रह बृहस्पति से युक्त हो स्वगृही होने पर भी व्यापारिक कार्यों के लिए प्रबल बाधक है। बुध के अतिरिक्त सप्तम भावगत बृहस्पति और केतु भी बाधक हैं। इन ग्रहों की अंतर्दशा मे जातक को यश, धन, विद्या-बुद्धि और वैवाहिक सुख हेतु कोई शुभफल नहीं मिला। ऐसी अवस्था में जातक के लिए नौकरी करना उपयुक्त है, व्यापार करना नहीं। सूर्य-बृहस्पति की दशा में जातक की पत्नी सिर के दर्द, बदन के दर्द, जोड़ों के दर्द और चक्करों के आने से बहुत बीमार हो गयी थी, जिनसे वह अब तक परेशान है। बाधक ग्रह की एक और परिभाषा है कि जिस भाव में खर और मांदी उपस्थित हों, उस भाव का स्वामी भी बाधक दोष से युक्त होता है। इसके अतिरिक्त जिन स्थिर लग्न राशियों की कुंडलियों में दीर्घायु का अभाव है, उनमें बाधक नवमेश मारक स्थान (तृतीय, षष्ठ, सप्तम या अष्टम भाव ) में स्थित होकर मारक हो जाता है। इस प्रकार एक योग कारक ग्रह भी अच्छा फल नहीं दे पाता। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या वृष लग्न वालों के लिए नवमेश शनि नवम से तृतीय स्थान पर मीन राशि में, नवम से सप्तम स्थान पर कर्क राशि में, नवम से अष्टम स्थान पर सिंह राशि में और नवम से द्वादश स्थान पर धनु राशि में मारक होगा? क्या सिंह लग्न वालों के लिए नवमेश मंगल नवम से अष्टम स्थान पर स्वराशि वृश्चिक में मारक होगा? क्या कुंभ लग्न वालों के लिए नवमेश शुक्र नवम से अष्टम स्थान पर स्वराशि वृष में मारक होगा? विद्वानों का एक विचार यह भी है कि बाधक ग्रह का दोष तब प्रकट होता है, जब वह षष्ठेश से युक्त हो। ऐसी अवस्था में जातक शत्रुओं के द्वारा आर्थिक, दैहिक, सामाजिक और राजनैतिक रूप से कष्ट भोगता है। अनेक पंच सितारा होटलों के मालिक मोहन सिंह ओबराय की वृष लग्न की कुंडली क्रमांक 3 में नवमेश शनि नवम से द्वादश स्थान पर धनु राशिस्थ है। उनकी आयु 90 वर्ष से अधिक थी और उन्होंने अपने जीवन में बहुत यश, धन एवं संपत्ति एकत्र की। उनके जीवन में अनेक बार शनि की अंतर्दशा आने पर भी उन्हें कोई हानि नहीं हुई। प्रश्न मार्ग में बाधक स्थान की परिभाषा आरुढ़ लग्न की स्थिति के आधार पर दी गई है। आरुढ़ लग्न चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशि में स्थित होने पर उस आरुढ से क्रमशः एकादश, नवम और सप्तम स्थान बाधक है। बाधक स्थान से केंद्र स्थान भी बाधक होता है। सिंह, कन्या, वृश्चिक और धनु राशियों के लिए वृश्चिक बाधक होती है। वृष राशि के लिए मकर, कुंभ के लिए कर्क और मिथुन तथा मीन के लिए धनु राशि बाधक होती है। बाधक स्थानाधिपति और उससे युक्त ग्रह अपनी दशा में रोग, शोक और दुःखदायक होते हैं। इनकी दशा में विदेश जाना पड़ता है। उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि- स सभी चर राशियों के लिए स्थिर राशि अधिष्ठित स्थान बाधक हैं। स सभी स्थिर राशियों के लिए चर राशि अधिष्ठित स्थान बाधक हैं। स सभी द्विस्वभाव राशियों के लिए द्विस्वभाव राशि अधिष्ठित स्थान बाधक हैं। कुंडली क्रमांक 4 कर्क लग्न की कुंडली है। चर लग्न राशि होने के कारण इसमें एकादश स्थान और इसका स्वामी शुक्र बाधक दोष से युक्त है। इस प्रकार, एकादश भावगत केतु भी बाधक है। सामान्यतः चतुर्थ और एकादश भाव का स्वामी होने के कारण शुक्र एक योगप्रद और शुभ फलदायक ग्रह होता है। इस कुंडली में शुक्र स्वगृही होने के कारण मालव्य योग का भी निर्माण का रहा है, जिसके शुभ फलों की ज्योतिष के सभी गं्रथों में उल्लेख हैं, किंतु इस कुंडली के लिए शुक्र बाधक होकर दुःखदायक बना बैठा है। इस व्यक्ति के जीवन में शुक्र की महादशा मई 1991 से शुरु हुई। शुक्र-राहु की दशा में इस व्यक्ति की आर्थिक स्थिति निर्बल होने लगी, आय के साधन सीमित होने लगे। बाधक केतु का प्रत्यंतर काफी दुःखप्रद रहा। थोड़े दिन पहले इस व्यक्ति का पुत्र एक दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो गया, जिसके बचने की उम्मीद धूमिल हो गई थी। उसके इलाज में लाखों रुपये खर्च हो गए। शुक्र में गुरु, शनि और बुध की अंतर्दशाएं भी विशेष सुखदायी नहीं रहीं, जिनमें पग-पग पर बाधाएं आती रही हैं। इस प्रकार, शुभ और योगप्रद प्रतीत होने वाले ग्रह भी बाधक दोष से ग्रस्त होने पर व्यक्ति को अतिकष्ट प्रदान करता है।



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