भाग्य वृद्धि के लिए ज्योतिष एवं वास्तु की उपयोगिता का चयन

भाग्य वृद्धि के लिए ज्योतिष एवं वास्तु की उपयोगिता का चयन  

भाग्य वृद्धि के लिए ज्योतिष एवं वास्तु की उपयोगिता का विवेचन प्रश्न : किसी जातक को भाग्यवृद्धि हेतु उपाय वास्तु के अनुसार करने चाहिए या ज्योतिष के आधार पर? आप जो उपाय अधिक कारगर समझते हैं, उसके पक्ष में उचित साक्ष्य एवं कारणों का विस्तारपूर्वक वर्णन करें। किसी जातक के लिए भाग्य वृद्धि का अर्थ क्या हो सकता है? हर एक जातक या व्यक्ति का भाग्य या प्रारब्ध विधाता ने निश्चित कर रखा है तो फिर वृद्धि का क्या अर्थ है? वस्तुतः ग्रह नक्षत्रों के संतुलन, प्रादुर्भाव, आधिक्य और क्षीण स्थिति से हर जातक प्रवाहित होता है। यह उसके कुंडली से भी ज्ञात होता है। प्रारब्ध या भाग्य की स्थिति भी इससे ज्ञात होती है। लेकिन, कर्महीन होकर भाग्य भरोसे रहने से भी कुछ नहीं होता। भाग्य वृद्धि में ज्योतिष शास्त्र का महत्व वेदांगों में ज्योतिष सर्वोपरि स्थान पर है। ज्योतिष एक अदभुत विज्ञान है जो जीवन के सभी रास्तों पर शुभता लाने में सक्षम है। जन्मकुंडली के नवम भाव को भाग्य भाव की संज्ञा दी गई है। भाग्य वृद्धि के लिए भाग्य भाव, भाग्येश, भाग्य राशि आदि पर विचार करते हैं और पूर्ण भाग्यवृद्धि में अवरोधक ग्रहों की भी विवेचना करते हैं। साधरणतया इसे ऐसे समझा जा सकता है कि परमात्मा हमारा हाथ पकड़कर भाग्य के चरम तक नहीं पहुंचाता है, बल्कि हमारे जन्मकुंडली के माध्यम से समुचित विचार, अच्छे-बुरे की समझ और हमारी क्षमता के अनुरूप बुद्धि देकर भाग्य जगाने की प्रेरणा देता है। बस, उसके अनुसार कर्म करने की आवश्यकता होती है। श्रद्धा, धीरज और विश्वास से सर्वप्रथम अपने इष्ट को जानना आवश्यक है। कौन से इष्ट देवता किस कुंडली के अनुरूप है। इस हेतु 36 देवताओं के मंत्र पूजन का विशेष महत्व है। बारह राशियां होती हैं, हर राशि में 9 अक्षर सभी ज्योतिषीय ग्रंथों में वर्णित हैं। जैसे मेष राशि में- चू, चे, चो ला, ली, लू, ले, लो, अ। इसी प्रकार वृष, मिथुन से मीन तक 12 राशियों में 9-9 अक्षर होते हैं जो जातक या व्यक्तित्व के राशि नाम का प्रथम अक्षर होता है। इन 12 राशियों में 12 ग 9 = 108 अक्षरों का समावेश है और भारत के महर्षियों, ज्योतिषियों ने इन्हें 36 देवताओं के अधीन माना है। नीचे एक तालिका दी जा रही है। इस तालिका से सुलभता से यह ज्ञात किया जा सकता है कि सर्वमनोरथ पूर्ति हेतु किस इष्ट की शरण में जाना उपयुक्त है। राशि नाम के अक्षरों के अनुसार जो इष्ट हों उनका मंत्र जप, अभिषेक एवं पूजन होना चाहिये। जब सर्वमनोरथ की पूर्ति होगी तो निश्चित रूप से व्यक्ति संतुष्ट होगा और भाग्य या प्रारब्ध की ऊंचाई तक पहुंचने में समर्थ होगा। निरंतर धनात्मक विचार रखने से हमारा भाग्य जाग जाता है। साथ-साथ जन्मकुंडली का विश्लेषण कर भाग्य भाव को यथासंभव शुद्ध करना भी आवश्यक है। मनुष्यों के जन्मकालीन ग्रह स्थिति, नक्षत्र आदि के विचार का विषय ज्योतिष के होरा शास्त्र में आता है और महर्षि पराशर, वराहमिहिर आदि ने श्लोकों के माध्यम से भाग्यवृद्धि, भाग्य जागरण की उम्र का निर्धारित भी किया है। अतः ज्योतिष द्वारा इस पर विवेचना को प्रमुख रूप से माना जा सकता है कि किस होरा या लग्न, नक्षत्र में व्यक्ति का जन्म हुआ है। उनसे जातक के प्रारब्ध का संकेत मिलता है। कोई अवरोध हो तो उपचार, मंत्र, रत्न, पूजा आदि विशेष प्रयोजनों से भाग्य वृद्धि के उपाय किए जा सकते हैं। वैसे इस संदर्भ में अपने इष्ट की आराधना अधिक व्यावहारिक है। जब जातक स्वयं में निर्मल, भाग्यवान होगा तो उसे श्री युक्त स्थान की प्राप्ति अवश्य होगी। ज्योतिष शास्त्र का धरातल पंचांग है जिसमें कई योगों का समावेश होता है। योग अर्थात् जोड़ना, सम्मिश्रित करना। अमृत योग, सिद्ध योग में किया गया कार्य, यात्रा, व्यवसाय में सफलता देता है और पूर्ण भाग्य की प्राप्ति करता है। इस अर्थयुग में धनवृद्धि ही भाग्यवृद्धि नहीं है, आत्मिक और मानसिक संतुष्टि से धनवान होना ही भाग्यवान व्यक्ति माना जा सकता है। ज्योतिष हमारे जीवन का आधार है। वेदों में इसे पांचवां वेद और शास्त्रों में इसे नेत्र माना जाता है। ज्योतिष की भांति वास्तु और भाग्य का भी जीवन में बड़ा उपयोग है। क्या ज्योतिष और वास्तु के द्वारा भाग्य बदलना संभव है, इस प्रश्न के उत्तर के लिए यह जानना आवश्यक है कि भाग्य का निर्माण केवल ज्योतिष और वास्तु से ही नहीं होता, वरन् इनके साथ कर्म का योग होना भी अति आवश्यक है। इसलिए ज्योतिषीय एवं वास्तुसम्मत ज्ञान के साथ-साथ विभिन्न दैवीय साधनाओं, वास्तु पूजन एवं ज्योतिष व वास्तु के धार्मिक पहलुओं पर भी विचार करना अत्यंत आवश्यक है। भाग्यवृद्धि में वास्तु शास्त्र का महत्व वास्तु विद्या बहुत ही प्राचीन विद्या है। ज्योतिष शास्त्र के ज्ञान के साथ-साथ वास्तु शास्त्र का ज्ञान भी उतना ही आवश्यक है जितना कि ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान। विश्व के प्राचीनतम् ग्रंथ ऋग्वेद में भी इसका उल्लेख मिलता है। वास्तु के गृह वास्तु, प्रासाद वास्तु, नगर वास्तु, पुर वास्तु, दुर्गवास्तु आदि अनेक भेद हैं। भाग्य वृद्धि के लिए वास्तु शास्त्र के नियमों का महत्व भी कम नहीं है। घर या ऑफिस का वास्तु ठीक न हो तो भाग्य बाधित होता है। वास्तु और भाग्य का जीवन में कितना संयोग है? क्या वास्तु के द्वारा भाग्य बदलना संभव है? इस प्रश्न के उत्तर के लिए यह जानना आवश्यक है कि भाग्य का निर्माण वास्तु से नहीं अपितु कर्म से होता है और वास्तु का जीवन में उपयोग एक कर्म है और इस कर्म की सफलता का आधार वास्तुशास्त्रीय ज्ञान है। पांच आधारभूत पदार्थों भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश से यह ब्रह्मांड निर्मित है और ये पांचों पदार्थ ही पंच महाभूत कहे जाते हैं। इन पांचों पदार्थों के प्रभावों को समझकर उनके अनुसार अपने भवनों का निर्माण कर मनुष्य अपने जीवन और कार्यक्षेत्र को अधिक सुखी और सुविधा संपन्न कर सकता है। प्राचीन महर्षियों व आधुनिक विद्वानों ने यह सिद्ध कर दिखाया है कि आकाशस्थ ग्रहों के रूप, रंग, गुण, धर्म, स्वभाव व लक्षण आदि का प्रभाव एक-दूसरे से भिन्न है। प्रत्येक ग्रह अपने गुण धर्म के अनुसार माता के गर्भ में शिशु पिंड पर अपना प्रभाव प्रथम मास में दिखाते हैं। जैसे प्रथम मास में शुक्र, द्वितीय मास में मंगल, तृतीय मास में गुरु, चतुर्थ मास में सूर्य, पंचम मास में चंद्र, षष्ठ मास में शनि, सप्तम मास में बुध, अष्टम मास में लग्नेश और नवम मास में पुनः चंद्र का प्रभाव पड़ने पर बालक का जन्म होता है। इस कारण प्रत्येक मनुष्य में भिन्न-भिन्न रूप रंग, गुण, धर्म, स्वभावादि दिखाई देते हैं। उक्त ग्रहों के आधार पर भी वास्तुशास्त्रीय उपाय किये जाते हैं। ज्योतिष शास्त्र के ज्ञान से मनुष्य पूर्व जन्मों के शुभाशुभ कर्मों का ज्ञान प्राप्त कर सकता है और वास्तु शास्त्रीय ज्ञान प्रगति की ओर उन्मुख होने में सबंध मिलता है। कुछ आधुनिक विचारधारा के लोग यह आक्षेप लगाते हैं कि ईश्वर निर्मित घटनाओं का होना निश्चित है तो उसे जानकर ज्योतिषीय या वास्तुशास्त्रीय उपाय करने से क्या लाभ होगा? इसका उत्तर यह है कि मनुष्य को भविष्य में होने वाले अशुभ घटनाओं का ज्ञान यदि उसे पूर्व में ही प्राप्त हो जाए तो उन घटनाओं के प्रतिकार के लिए उपाय निश्चित करने में सहायता नहीं मिलेगी? आने वाले अशुभ प्रसंगों से वह सावधान व सतर्क रहना संभव नहीं होगा? सूर्य चंद्रमादि अन्य ग्रहों और तारों आदि का पृथ्वी के वातावरण पर कितना प्रभाव पड़ता है, यह स्पष्ट है। सूर्य इस ब्रह्मांड की आत्मा है और ऊर्जा का मुखय स्त्रोत भी है। सूर्य और अन्य तारों से प्राप्त ऊष्मा और प्रकाश सभी आकाशीय पिंडों की परस्पर आकर्षण शक्ति, पृथ्वी पर उत्पन्न चुंबकीय बल क्षेत्र और इस प्रकार के अन्य भौतिक कारकों का पृथ्वी की भौतिक दशा, वातावरण और जलवायु पर निश्चित प्रभाव पड़ता है और इन सबका मानव जीवन पर अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अतः वास्तु शास्त्र का ज्योतिष और खगोल से निकट संबंध है। मनुष्य के रहन-सहन को ज्योतिष और खगोलीय कारक प्रभावित करते हैं। जहां प्राचीन शास्त्रों में वर्णित सिद्धांतों के अनुसार भवन, मंदिर, प्रासाद आदि निर्मित किए गए हैं और उनसे संबंधित सभी व्यक्तियों को सभी प्रकार से सुख-समृद्धि और शांति की प्राप्ति हुई है। दूसरी ओर, ऐसे भवन भी है। जो वास्तु सम्मत नहीं बने हैं। उनमें रहने वाले व्यक्तियों को भयंकर कष्ट सहने पड़े हैं। धन और स्वास्थ्य की हानि, परिवार जनों की मृत्यु, सुख-शांति का अभाव, गरीबी, पीड़ा आदि से जूझना पड़ा है। विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र के अनुसार, ''वास्तु शास्त्र के कारण ही समस्त ब्रह्मांड, सुख, वैभव और समृद्धि प्राप्त करता है। मनुष्य को देवत्व प्राप्त होता है। शिल्प-शास्त्र के ज्ञान और संसार के अस्तित्व में निकट का सह-संबंध है। वास्तु शास्त्र के अनुपालन करने वालों को न केवल सांसारिक सुख की प्राप्ति होती है, वरन् उन्हें नैसर्गिक सुख-शांति का भी अनुभव होता है। आज के युग में वैज्ञानिकों ने भी माना है कि सूर्य की महत्ता का विशेष प्रतिपादन सत्य है, क्योंकि उन्होंने भी यह सिद्ध कर दिया कि सूर्य महाप्राण जब शरीर क्षेत्र में अवतीर्ण होता है तो आरोग्य, आयुष्य, तेज, ओज, बल, उत्साह, स््फूर्ति, पुरुषार्थ और विभिन्न महानता मानव में परिणत होने लगती है। आज भी वैज्ञानिक मानते हैं कि सूर्य की प्रातःकालीन अल्ट्रावॉयलेट रश्मियों में विटामिन डी प्रचुर मात्रा में होता है। इन किरणों के प्रभाव से मानव, जीवों तथा पेड़-पौधों में ऊर्जा का विकास होता है। इनसे शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से अनेक लाभ होते हैं। आज भी वास्तु विज्ञान में भवन निर्माण के तहत पूर्व दिशा को मुखय स्थान दिया गया है जिससे सूर्य की प्रातःकालीन किरणें भवन के अंदर अधिक से अधिक प्रवेश कर सकें और उसमें रहने वाले मानव स्वास्थ्य एवं मानसिक दृष्टिकोण से उन्नत रहें। वास्तु शास्त्र की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पंचमहाभूतों से निर्मित प्राणी के जीवन में इन महाभूतों से निर्मित वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करने को प्राथमिकता देता है और मानव मात्र की शारीरिक एवं मानसिक क्षमताओं को उन्नत करता है। इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर अपने नियमों एवं सिद्धांतों का प्रतिपादन एवं विवेचन करता है। कहा जाता है कि वास्तु के नियम के विपरीत यदि कोई भवन निर्माण करता है तो प्राकृतिक शक्तियों का कोप उसे झेलना पड़ता है। यदि वास्तु के नियम के अनुसार भवन का निर्माण होता है तो प्राकृतिक शक्तियों का आशिर्वाद भवन के स्वामी को सत्ता प्राप्त होता रहता है, ऐसा विद्वानों का मानना है। भवन निर्माण इन सभी मूल आधार शक्तियों को ध्यान में रखकर किया जाता है ताकि भवन में रहने वाला जीव इन शक्तियों से वंचित न रहे, क्योंकि इन्हीं शक्तियों के आधार पर ही उसका तन मन एवं जीवन संतुिलत एवं र्स्फूत रहता है, भाग्य वृद्धि होती है। वास्तु शास्त्र एवं ज्योतिष शास्त्र दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं क्योंकि दोनों एक-दूसरे के अभिन्न अंग हैं। जैसे शरीर का अपने विविध अंगों के साथ अटूट संबंध होता है। ठीक उसी प्रकार ज्योतिष शास्त्र का अपनी सभी शाखायें प्रश्न शास्त्र, अंक शास्त्र, वास्तु शास्त्र आदि के साथ अटूट संबंध है। ज्योतिष एवं वास्तु शास्त्र के बीच निकटता का कारण यह है कि दोनों का उद्भव वैदिक संहितायों से हुआ है। दोनों शास्त्रों का लक्ष्य मानव मात्र को प्रगति एवं उन्नति की राह पर अग्रसर कराना है एवं सुरक्षा देना है। अतः प्रत्येक मनुष्य को वास्तु के अनुसार भवन का निर्माण करना चाहिए एवं ज्योतिषीय उपचार (मंत्र, तंत्र एवं यंत्र के द्वारा) समय-समय पर करते रहना चाहिए, क्योंकि ग्रहों के बदलते चक्र के अनुसार बदल-बदल कर ज्योतिषीय उपचार करना पड़ता है। वास्तु तीन प्रकार के होते हैं- त्र आवासीय - मकान एवं फ्लैट त्र व्यावसायिक -व्यापारिक एवं औद्योगिक त्र धार्मिक- धर्मशाला, जलाशय एवं धार्मिक संस्थान। वास्तु में भूमि का विशेष महत्व है। भूमि चयन करते समय भूमि या मिट्टी की गुणवत्ता का विचार कर लेना चाहिए। भूमि परीक्षण के लिये भूखंड के मध्य में भूस्वामी के हाथ के बराबर एक हाथ गहरा, एक हाथ लंबा एवं एक हाथ चौड़ा गड्ढा खोदकर उसमें से मिट्टी निकालने के पश्चात् उसी मिट्टी को पुनः उस गड्ढे में भर देना चाहिए। ऐसा करने से यदि मिट्टी शेष रहे तो भूमि उत्तम, यदि पूरा भर जाये तो मध्यम और यदि कम पड़ जाये तो अधम अर्थात् हानिप्रद है। अधम भूमि पर भवन निर्माण नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार पहले के अनुसार नाप से गड्ढा खोद कर उसमें जल भरते हैं, यदि जल उसमें तत्काल शोषित न हो तो उत्तम और यदि तत्काल शोषित हो जाए तो समझें कि भूमि अधम है। भूमि के खुदाई में यदि हड्डी, कोयला इत्यादि मिले तो ऐसे भूमि पर भवन नहीं बनाना चाहिए। यदि खुदाई में ईंट पत्थर निकले तो ऐसा भूमि लाभ देने वाला होता है। भूमि का परीक्षण बीज बोकर भी किया जाता है। जिस भूमि पर वनस्पति समय पर उगता हो और बीज समय पर अंकुरित होता हो तो वैसा भूमि उत्तम है। जिस भूखंड पर थके होकर व्यक्ति को बैठने से शांति मिलती हो तो वह भूमि भवन निर्माण करने योग्य है। वास्तु शास्त्र में भूमि के आकार पर भी विशेष ध्यान रखने को कहा गया है। वर्गाकार भूमि सर्वोत्तम, आयताकार भी शुभ होता है। इसके अतिरिक्त सिंह मुखी एवं गोमुखि भूखंड भी ठीक होता है। सिंह मुखी व्यावसायिक एवं गोमुखी आवासीय दृष्टि उपयोग के लिए ठीक होता है। किसी भी भवन में प्राकृतिक शक्तियों का प्रवाह दिशा के अनुसार होता है अतः यदि भवन सही दिशा में बना हो तो उस भवन में रहने वाला व्यक्ति प्राकृतिक शक्तियों का सही लाभ उठा सकेगा, किसकी भाग्य वृद्धि होगी। किसी भी भवन में कक्षों का दिशाओं के अनुसार स्थान इस प्रकार होता है। पूजा कक्ष - ईशान कोण, स्नान घर- पूर्व रसोई घर-आग्नेय, मुखिया का शयन कक्ष- दक्षिण, युवा दम्पति का शयन कक्ष वायव्य कोण एवं उत्तर के बीच, बच्चों का कक्ष वायव्य एवं पश्चिम, अतिरिक्त कक्ष- वायव्य, भोजन कक्ष-पश्चिम अध्ययन कक्ष- पश्चिम एवं र्नैत्य कोण के बीच, कोषागार- उत्तर एवं स्टोर- र्नैत्य कोण जल कूप या बोरिंग-उत्तर दिशा या ईशान कोण, सीढ़ी घर - र्नैत्य कोण, जल कूप या बोरिंग - उत्तर दिशा या ईशान कोण, सीढ़ी घर- नै र्त्य कोण, शौचालय- पश्चिम या उत्तर पश्चिम (वायव्य) अविवाहित कन्याओं के लिये शयन कक्ष-वायव्य। भवन में सबसे आवश्यक कक्ष पूजा घर है। ईशान कोण पूर्व एवं उत्तर से प्राप्त होने वाली उर्जा का क्षेत्र है। इस कोण के अधिपति शिव हैं, जो व्यक्ति को मानसिक शक्ति प्रदान करते हैं। प्रातः कालीन सूर्य की किरणें सर्वप्रथम ईशान कोण पर पड़ती है। इन किरणों में निहित अल्ट्रॉवायलेट किरणों में इतनी शक्ति होती है कि वे स्थान को कीटाणुमुक्त कर पवित्र बनाते हैं। पवित्र स्थान पर पूजा करने से व्यक्ति का ईश्वर के साथ तादात्म्य स्थापित होता है जिससे शरीर में स्फूर्ति, शक्ति का संचार होता है साथ ही भाग्य बली होता है। आग्नेय कोण में अग्नि के देवता के स्थित होने से भोजन को तैयार करने में सहायता मिलती है एवं भोजन स्वादिष्ट होता है। भोजन बनाते समय गृहणी का मुख पूर्व दिशा में होना चाहिये इसका कारण यह है कि पूर्व दिशा से आने वाली सकारात्मक ऊर्जा गृहणी को शक्ति प्रदान करती है। ईशान कोण में रसोई नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह जल के क्षेत्र हैं। जल तथा अग्नि में परस्पर शत्रुता है। र्नैत्य कोण में रसोई बनाने से परस्पर शत्रुता पारिवारिक कष्ट एवं अग्नि से दुर्घटनाओं का भय तथा जन-धन की हानि होती है। दक्षिण दिशा के स्वामी यम हैं तथा ग्रह मंगल हैं। यम का स्वभाव आलस्य एवं निद्रा को उत्तन्न करता है। सोने से पहले मनुष्य के शरीर से आलस्य एवं निद्रा की उत्पत्ति होने से मनुष्य को अच्छी नींद आती है। भरपूर नींद के बाद शरीर फिर से तरोताजा हो जाता है। इसीलिए परिवार के मुखिया का शयन कक्ष दक्षिण दिशा में होना चाहिए। अतिथि गृह का वायव्य कोण में होना लाभप्रद है। इस दिशा के स्वामी वायु होते हैं तथा ग्रह चंद्रमा। वायु एक जगह नहीं रह सकते तथा चंद्रमा का प्रभाव मन पर पड़ता है। अतः वायव्य कोण में अतिथि गृह होने पर अतिथि कुछ ही समय तक रहता है तथा पूर्व आदर-सत्कार पाकर लौट जाता है, जिससे परिवारिक मतभेद पैदा नहीं होते। वास्तु शास्त्र के आर्षग्रन्थों में बृहत्संहिता के बाद वशिष्ठसंहिता की भी बड़ी मान्यता है तथा दक्षिण भारत के वास्तु शास्त्री इसे ही प्रमुख मानते हैं। इस संहिता ग्रंथ के अनुसार विशेष वशिष्ठ संहिता के अनुसार अध्ययन कक्ष निवृत्ति से वरुण के मध्य होना चाहिए। वास्तु मंडल में निऋति एवं वरुण के मध्य दौवारिक एवं सुग्रीव के पद होते हैं। दौवारिक का अर्थ होता है पहरेदार तथा सुग्रीव का अर्थ है सुंदर कंठ वाला। दौवारिक की प्रकृति चुस्त एवं चौकन्नी होती है। उसमें आलस्य नहीं होती है। अतः दौवारिक पद पर अध्ययन कक्ष के निर्माण से विद्यार्थी चुस्त एवं चौकन्ना रहकर अध्ययन कर सकता है तथा क्षेत्र विशेष में सफलता प्राप्त कर सकता है। पश्चिम एवं र्नैत्य कोण के बीच अध्ययन कक्ष के प्रशस्त मानने के पीछे एक कारण यह भी है कि यह क्षेत्र गुरु, बुध एवं चंद्र के प्रभाव क्षेत्र में आता है। बुध बुद्धि प्रदान करने वाला, गुरु ज्ञान पिपासा को बढ़ाकर विद्या प्रदान करने वाला ग्रह है। चंद्र मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करता है। अतः इस स्थान पर विद्याभ्यास करने से निश्चित रूप से सफलता मिलती है। टोडरमल ने अपने 'वास्तु सौखयम्' नामक ग्रंथ में वर्णन किया है कि उत्तर में जलाशय जलकूप या बोरिंग करने से धन वृद्धि कारक तथा ईशान कोण में हो तो संतान वृद्धि कारक होता है। राजा भोज के समयंत्रण सूत्रधार में जल की स्थापना का वर्णन इस प्रकार किया-'पर्जन्यनामा यश्चाय् वृष्टिमानम्बुदाधिप'। पर्जन्य के स्थान पर कूप का निर्माण उत्तम होता है, क्योंकि पर्जन्य भी जल के स्वामी हैं। विश्वकर्मा भगवान ने कहा है कि र्नैत्य, दक्षिण, अग्नि और वायव्य कोण को छोड़कर शेष सभी दिशाओं में जलाशय बनाना चाहिये। तिजोरी हमेशा उत्तर, पूर्व या ईशान कोण में रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त आग्नेय दक्षिणा, र्नैत्य पश्चिम एवं वायव्य कोण में धन का तिजोरी रखने से हानि होता है। ड्राईंग रूम को हमेशा भवन के उत्तर दिशा की ओर रखना श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि उत्तर दिशा के स्वामी ग्रह बुध एवं देवता कुबेर हैं। वाणी को प्रिय, मधुर एवं संतुलित बनाने में बुध हमारी सहायता करता है। वाणी यदि मीठी और संतुलित हो तो वह व्यक्ति पर प्रभाव डालती है और दो व्यक्तियों के बीच जुड़ाव पैदा करती है। र्नैत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) में वास्तु पुरुष के पैर होते हैं। अतः इस दिशा में भारी निर्माण कर भवन को मजबूती प्रदान किया जा सकता है, जिससे भवन को नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव से बचाकर सकारात्मक शक्तियों का प्रवेश कराया जा सकता है। अतः गोदाम (स्टोर) एवं गैरेज का निर्माण र्नैत्य कोण में करते हैं। जिस भूखंड का ईशान कोण बढ़ा हुआ हो तो वैसे भूखंड में कार्यालय बनाना शुभ होता है। वर्गाकार, आयताकार, सिंह मुखी, षट्कोणीय भूखंड पर कार्यालय बनाना शुभ होता है। कार्यालय का द्वार उत्तर दिशा में होने पर अति उत्तम होता है। पूर्वोत्तर दिशा में अस्पताल बनाना शुभ होता है। रोगियों का प्रतीक्षालय दक्षिण दिशा में होना चाहिए। रोगियों को देखने के लिए डॉक्टर का कमरा उत्तर दिशा में होना चाहिए। डॉक्टर मरीजों की जांच पूर्व या उत्तर दिशा में बैठकर करना चाहिए। आपातकाल कक्ष की व्यवस्था वायव्य कोण में होना चाहिए। यदि कोई भूखंड आयताकार या वर्गाकार न हो तो भवन का निर्माण आयताकार या वर्गाकार जमीन में करके बाकी जमीन को खाली छोड़ दें या फिर उसमें पार्क आदि बना दें। भवन को वास्तु के नियम से बनाने के साथ-साथ भाग्यवृद्धि एवं सफलता के लिए व्यक्ति को ज्योतिषीय उपचार भी करना चाहिए। सर्वप्रथम किसी भी घर में श्री यंत्र एवं वास्तु यंत्र का होना अति आवश्यक है। श्री यंत्र के पूजन से लक्ष्मी का आगमन होता रहता है तथा वास्तु यंत्र के दर्शन एवं पूजन से घर में वास्तु दोष का निवारण होता है। इसके अतिरिक्त गणपति यंत्र के दर्शन एवं पूजन से सभी प्रकार के विघ्न-बाधा दूर हो जाते हैं। ज्योतिष एवं वास्तु एक-दूसरे के पूरक हैं। बिना प्रारंभिक ज्योतिषीय ज्ञान के वास्तु शास्त्रीय ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता और बिना 'कर्म' के इन दोनों के आत्मसात ही नहीं किया जा सकता। इन दोनों के ज्ञान के बिना भाग्य वृद्धि हेतु किसी भी प्रकार के कोई भी उपाय नहीं किए जा सकते।



अपने विचार व्यक्त करें

blog comments powered by Disqus
.