जैसा खाओगे अन्न वैसा बनेगा मन (16 कक्षों की कल्पना के कारण में भोजनालय भी है।) इसलिये रसोईघर घर का सबसे संवेदनशील स्थान होता है। यह सर्वविदित है कि प्रत्येक प्राणी के जीवन में भोजन का बहुत महत्त्व है। क्योंकि यह शारीरिक व मानसिक दोनों प्रकार का स्वास्थ्य प्रदान करता है। स्वास्थ्य ही सुखी जीवन का आधार है इसी पर चारों पुरुषार्थ टिके हैं भोजन बनाते समय अग्नि तत्व का प्रचुर मात्रा में प्रयोग होता है। अतः अग्नि तत्व वाले कोण में (दक्षिण-पूर्व) में रसोई बनाना सर्वोत्तम होता है। यदि रसोई को अन्य किसी स्थान पर बना दिया जाये तो पेट व हृदय रोग हो सकते हैं क्योंकि उन अन्य स्थानों पर अग्नि देव का स्वतः निवास न होने से भोजन दूषित व कच्चा पक्का बनकर हमारा स्वास्थ्य खराब हो सकता है। रसोई ठीक जगह पर बनी हो तो ईंधन व राशन की बचत के साथ-साथ भोजन स्वादिष्ट एवं स्वास्थ्यदायक बनता है। अग्निकोण का देवता अग्नि है और ग्रह शुक्र है जो अति महत्वपूर्ण है। आग और शुक्र ऊर्जा और आनंद, तेज और वैभव यही जीवन है। “वास्तुपुरुष नमस्तेस्तु भूशरूयानिरत प्रभो। मद्गृहं धनधान्यादिसमृद्धं कुरु सर्वदा।। भूमि शैय्या पर शयन करने वाले वास्तु पुरुष आपको मेरा नमस्कार है। प्रभो! आप मेरे घर को धन-धान्य आदि से संपन्न कीजिए। अग्नि कारक है- ऊर्जा का, तेज का, क्षमताओं का, ऊष्मा का, प्रकाश का, शक्ति का, बल का, रसोईघर से प्रसन्नता का वातावरण बनता है। शुक्र कारक है- जलीय तत्व का (भोजन में) स्वाद का, सुगंध का, साफ सफाई का, सौंदर्य का, वीर्य का, प्रेम तथा रोमांस का। मधुमेह, ऊर्जा, इन्द्रियों का सुख, स्वास्थ्य शरीर आदि का विचार भी पश्चिम दिशा में शाम के समय अक्सर दिखाई देने वाले इस चमकीले ग्रह द्वारा किया जाता है। संगीत के लिये ऊर्जा-विद्युत चाहिए, कार मेें डैक, शादी विवाह में संगीत, आनंद तथा रसोई में महिला का कारक भी शुक्र है। इसीलिए परिवार के सदस्यों का यौवन, सौंदर्य, स्वास्थ्य सब कुछ रसोई में बने भोजन पर ही निर्भर करता है। रसोईघर की आंतरिक व्यवस्था Û चूल्हे का स्थान पूर्व में दीवार से थोड़ा हटाकर रखें। Û चूल्हा रसोईघर के द्वार के बिल्कुल सामने न हो। Û खाना पकाने वाले का मंुह पूर्व या पश्चिम दिशा में हो सकता है। Û रसोई में पानी का निकास पूर्व, उत्तर-पूर्व, उत्तर में शुभ है। पश्चिम, उत्तर-पश्चिम में भी हो सकता है। Û भोजन पकाते समय भोजन का कुछ अंश देवताओं के लिये निकालें, फिर पहली रोटी गाय को व अंतिम रोटी कुत्ते को डालें। Û रसोईघर में सूर्य का प्रकाश व ताजगी Û रसोईघर में प्रदूषण व दुर्घटना से रक्षा के साधन Û वास्तु और रंग व्यवस्था, हल्के रंग, हल्का पीला, हल्का चाकलेटी, सफेद, हल्का गुलाबी। भोजन पकाने का स्थान- रसोईघर में भोजन पकाने के स्थान का फर्श घर के फर्श से थोड़ा ऊंचा होना चाहिए। स्वच्छता की वजह से ऐसा है क्योंकि इससे गंदे पैर, गंदा पानी आदि के दूषित प्रभाव से बचेंगें। खाना बनाने की स्लैब की ऊंचाई भी खाना पकाने वाली स्त्री के कद के अनुरुप सुविधाजनक ढंग से रखी जानी चाहिए। रसोईघर का द्वार- पूर्व, उत्तर या उत्तर-पश्चिम के पश्चिम में रखा जा सकता है। मतान्तर से उत्तर-पूर्व में भी बना सकते हंै। अग्निकोण का उपयोग- बिजली के उपकरण, बायलर, ट्रंासफार्मर, कैन्टीन, पार्टी स्थल, सुरक्षा विभाग, शस्त्रधारी लोंगों का स्थान, होटल। आग्नेय कोण मुखी भूखण्डों में व्यवसाय- होटल, ढाबा, रेस्टोरेंट, हलवाई की दुकान, आटोमोबाइल, विभिन्न मशीनों आदि के इंजन और भवन निर्माण की सामग्री का काम, ब्यूटी पार्लर इत्यादि। दक्षिण-पूर्व- रुप सौन्दर्य, लौकिक तथा भौतिक सुविधाऐं, भोग और वैभव का प्रतीक, सुन्दर पौशाकें, वाहन, रत्नाभूषण तथा काम सुख का प्रदाता है शुक्र। सावधानियाॅं Û रसोईघर की झाडू, चप्पल, अलग रखें। इसे उत्तर-पश्चिम रखें। रसोईघर का द्वार दक्षिण दिशा में न रखें। Û रसोईघर का द्वार किसी भी कोने में न हो। Û रसोईघर का द्वार किसी भी कोने में न हो। Û रसोईघर का एक्सास्ट फैन, फ्रिज, वाश बेसिन, मैगजील फ्लोर सदैव साफ सुथरे व उचित दिशा में रखें। Û बच्चों को या अन्य लोगों को जुत्ते ले जाने से रोके। Û रसोई में भोजन बनाते समय अन्नपूर्णा देवी को, अग्नि देव को, जल देव को प्रातः नमस्कार करना न भूले Û रसोईघर को स्नानघर या शौचालय के साथ सटा हुआ नहीं होना चाहिए। Û रसोईघर का द्वार शौचालय या स्नानघर के सामने नहीं होना चाहिए। Û रसोई में डाइनिंग टेबल कुछ वास्तुविद् सदैव अशुभ मानते हैं (मगर प्राचीन काल में रसोईघर में भोजन करने से राहु सदैव शुभ फल दाता रहता है ऐसी मान्यता ठीक थी। जिनका राहु अशुुभ फलकारी हो उन्हें रसोई में ही भोजन करना चाहिए। Û रसोईघर का मुख्य द्वार दक्षिण-पश्चिम के प्लेटफार्म को देखते हुए नहंी होना चाहिए। रसोई में ही बीतता है तो इसका सबसे पहले अशुभ प्रभाव वहाॅं काम करने वाली स्त्राी पर ही होगा ऐसे में स्त्राी सदस्य पूरी तरह परिवार में घुल-मिल नहीं पाती। इससे परिवार के सदस्यों के बीच संवाद नहीं बैठ पाता है और संवाद के अभाव में मामूली सा विवाद भी असाधारण घटना का रुप धारण कर सकता है। Û ग्रेनाइट न लगाये हीट नहीं सोखता- पेट टूटता है हर्निया आदि हो सकता है। Û रसोईघर की खिडकियाॅं बडी हो, सम संख्या में रखना उचित है। Û सीढियों के नीचे रसोई न बनायें, अचानक दुर्घटनाऐं होती है औरत जल कर मर सकती है। Û भवन के प्रवेश द्वार से रसोई सटी हुई नहीं होनी चाहिए वरना अतिथियों के आगमन में वृद्धि होती है। Û रसोईघर में खाली डिब्बे रखना अशुभ होता है। Û रसोईघर में मन्दिर न बनायें क्योंकि झूठे बर्तन छोडे जा सकते हैं। Û आड़ी तिरछी या संकली गली सरीखी रसोई घर में मतभेद, वैर-विरोध तथा आजीविका में बाधा देती है। Û रसोई के भीतर ही गेहॅूॅ-चावल भंडार की व्यवस्था हो तो परिवार के पुरुष सदस्यों के कार्यक्षेत्रा में विध्न व बाधाऐं आती है। खर्चा बढ़ने से धन संचय कठिन हो जाता है। Û रसोईघर में यदि स्नानघर हो तो पुरुष सदस्यों को रोग, पीड़ा व धन की कठिनाई होती है। Û यदि शयन कक्ष का दरवाजा रसोई में खुले या रसोई में से होकर शयन कक्ष में जाना पडे़ तो पति-पत्नी के बीच गलतफहमी से तनाव रहता है और पुरुष सदस्यों का आचरण कुल की परम्परा या मर्यादा के विरुद्ध रहता है। Û यदि रसोई के सामने बना शयन कक्ष तथा दोनों के दरवाजे भी आमने सामने होने से स्नेह व सहयोग तो परिवार में बढ़ता है किन्तु स्वास्थ्य की हानि होती है। Û यदि रसोईघर में कुआ या जलाशय स्थित हो तो परिवार में मतभेद बढता है गृहस्वामी का अपमान होता है या पुरुष दूर देश, परदेश आदि में ज्यादा रहते हैं। विशेष Û यदि रसोई भोजन कक्ष का अंग हो तो पत्नी का अपने माता-पिता व भाई-बहनों से मनमुटाव होता है बच्चे स्कूल में पिछड़ जाते है, पढाई से जी चुराते है। पुरुष सदस्य अपने मित्रों के साथ आमोद प्रमोद में घर से बाहर ज्यादा समय बिताते हैं और उनके पथभ्रष्ट रहने की आशंका रहती है। (जबकि प्राचीन काल में रसोई में खाना शुभ मानते थे) Û यदि शयन कक्ष तथा रसोई का दरवाजा आमने-सामने हो तो पति-पत्नी रोमांसप्रिय तथा विवाहोतर संबंध बनाने वाले होते हैं। Û यदि रसोईघर का प्रवेशद्वार मुख्यद्वार के सम्मुख हो तो विचार वैमनस्य के कारण परस्पर स्नेह, सहयोग व सम्मान में कमी होती है। परिवार के सदस्य एक दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं व परस्पर शत्रुतापूर्ण व्यवहार करते हैं। Û हमारे शरीर के खून में प्रति सौ क्येसिक सैंटीमीटर में चीनी की मात्रा 90 से 110 मिलिग्राम होनी चाहिए। शरीर को इतनी आवश्यकता होती है इससे कम चीनी हो तो शरीर पर असर आता है भावनात्मक स्वभाव बिगड़ जाता है। Û विटामिन ए की कमी से चिडचिडापन आता है। निराशा की भावना आती है। Û विटामिन बी की कमी से अवसाद, हत्या का विचार, भय की प्रवृति आती है। Û अधिक प्रोटीन से भी मानसिक संतुलन बिगडता है-प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति को एक दिन में 10-15 ग्राम प्रोटीन चाहिए होता है। यह मांस या अण्डे में ज्यादा होता है इससे ज्यादा हो तो मानसिक संतुलन बिगड़ता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से आहार पर विचार- सर्दी, गर्मी, वर्षा (प्रमुख ऋतुएं है) की ऋतु का आहार अलग अलग होता है इसी प्रकार प्रातः काल, मध्यान्ह, सांयकाल का आहार अलग- अलग हो सकता है। प्रमुख दिशा व उपदिशाओं में रसोईघर होने के परिणाम 1 उत्तर-पूर्व- परिवार के वरिष्ठ सदस्यों का अपमान, सिर के पिछले भाग, गर्दन व कन्धो में पीड़ा, पति-पत्नी में तनाव, जीवन में बडा नुकसान सहना पड़ सकता है। वंशवृद्धि की गति धीमी होती है। मानसिक क्लेश से दुर्घटना का भय रहता है। धन संबंधी चिंताएं संकुचित मनोवृति से गृह क्लेश, महिलाओं को शारीरिक कष्ट हो सकता है। कुछ अवपाद स्वरुप होटल की रसोई उत्तर-पूर्व में बनाई जा सकती है। 2 पूर्व- धन वैभव बढ़ता है। प्रसिद्धि और उन्नति के कार्यों में थोड़े से प्रयास से लाभ मिलता है। पुरुष क्रौध स्वभाव के हो सकते है। तथा अचानक बाधा पाने वाले और घर की महिलायें स्नायुविक दुर्बलता व महिलाओं को कभी-कभी गुप्त रोग भी हो जाते है। महिलाओं को सब सुख मिलने पर भी कभी खुश नहीं रहती। 3 दक्षिण-पूर्व- अत्यंत शुभ स्थिति, धन वैभव, सुख-संतोष की वृद्धि, भोजन स्वादिष्ट व स्वास्थयवर्धक रहता है। कम खर्च में ज्याद काम। 4 दक्षिण- महिलाओं को मानसिक संताप, उद्विग्नता, बैचैनी, अवसाद, आर्थिक स्थिति डावाडोल, भोजन पुष्टिवर्धक नहीं बन पाता है। अतः स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। यमराज का बुलावा समय से पूर्व। 5. दक्षिण-पश्चिम जीवन में संघर्षों का सामना करना पड़ता है। रोग बढ़ते हैं। आग से खतरा रहता है। परिवार के सदस्यों की मानसिक शांति भंग, एक दूसरे से कलह व शिकायतें जीवन में उन्नति व सफलता पाने के लिये सभी प्रयासों में कठिनाईयां, पति-पत्नी में अनबन, महिलाएं वात रोग से पीड़ित, अवसाद पीड़ित। अपवाद- महिलाओं को रोमान्टिक तथा पथभ्रष्ट बनाता है अथवा कभी रोग व कभी संतान की चिंता रहती है। 6. पश्चिम-परिवार में मतभेद, महिलाओं का शासन चले, यदि गृहणी घर की मुखिया हो तो सुख बढे़ वरना हानि की संभावना रहती है। व्यय भार बढ जाता है। महिलाएं मानसिक तनाव या पीड़ा झेलती है धन संचय में बाधक, बचत शून्य। 7. उत्तर-पश्चिम- परिवार की वरिष्ठ महिलाऐं मानसिक तनाव झेलती है। परिवार में कलह-क्लेश, खर्चा ज्यादा, कर्ज की संभावनाएं, प्रगति की धीमी गति, गर्म पानी या आग से जलने का भय संभव, पुरुषों का रोमांटिक स्वभाव, परिवार की शांति नष्ट, घर के सदस्य (तीन-तेरह) अस्थिर दुर्बल व्यक्तित्व के हो सकते हैं परदारा सक्त, अग्नि भय। अपवाद- संयुक्त परिवार हो तो परिवार की बहुओं का काम करने में मन नहीं लगता और एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाती रहती है। 8 उत्तर - नोट जलाकर खाना बनता है। जितनी कमाई उससे ज्याद खर्चा, अर्थहानि, घर की जरुरतें भी पूरी नहीं होतीं दीवालियापन, सम्पति भी बिक सकती है। मगर संभवतः घर की महिलाएं धन व उच्च घराने की आती हैं या होती है। बेवजह भाई-बन्धु व रिश्तेदारों का तांता लगा रहता है। कुछ महत्वपूर्ण सुझाव Û सूर्य सातवें में हो तो रोटी पकाकर पहले अग्नि में भोजन की आहूति दे। Û रात को रोटी पकाने के बाद की आग को दूध से बुझावे- यदि दोबारा काम करना हो तो इस बर्नर न जलाये। Û विवाहित अच्छे रहेंगें। स्त्री रोगी नहीं रहेगी। सफेद दाग ठीक तथा सरकार से ठीक संबंध रहेंगें। Û राहु चैथे में में हो तो सीढियों के नीचे रसोई न रखें। शौचालय की जगह न बदलें। छत पर ईंधन न रखें। Û राहु आठवें में हो तो दक्षिण दिशा में मुख्यद्वार न रखें। Û केतु ग्यारहवे में हो तो रसोई में काला सफद चकला रखना चाहिए। माता या नर संतान दोनों की उम्र लम्बी होगी, मानसिक परेशानियों से छुटकारा मिलेगा। Û राहु बारहवें में हो तो घर के आंगन में धुआॅं न करें, रसोई में (चिमनी) धुआदानी न रखना। राहु (1, 4, 8, 10) की शुभता बढाने के लिये घर में या आंगन में धुआ न करना, दक्षिण दिशा का दरवाजा न रखें। नववधू द्वारा पाक कर्म मुहूत्र्त पाकारम्भ मुहूर्त- विवाह के पश्चात पहली बार ससुराल में आने के बाद वधु द्वारा पहली बार रसोई में खाना बनाया जाता है। इसके लिये निम्न मुहूत्र्त चाहिए। शुभवार सोम, बुध, गुरु एवं शनिवार मतान्तर से शुक्रवार भी ग्राहृय है। शुभ तिथि कृष्ण पक्ष का पड़वा-एकम्-प्रतिपदा- शुक्ल पक्ष की 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 12 इसमें रिक्ता तिथियां (4, 9, 14), क्षयतिथि व अमावस्या छोड़ दें। नक्षत्र कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, उत्तरात्राय अर्थात् तीनों उत्तरा नक्षत्र, विशाखा, ज्येष्ठा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा और रेवती (कुल 13 नक्षत्र) शुभ लग्न स्थिर लग्न 2, 5, 8, 11 विशेष लग्न बलवान हो, लग्न की शुद्धि हो सप्तम व अष्टम भाव में कोई पापग्रह न हो चतुर्थ भाव ग्रह रहित हो। रसोईघर: भोजशाला या पाकशाला आपके भवन में एक पावर हाऊस के रूप में काम कर रही होती है। जिसमें बना भोजन आपको स्वस्थ व निरोगी बनाता है। इसलिये जापान के लोग अपने रसोईघर में माँ सरस्वती की फोटों लगाते हैं वे लोग ऐसा सोचते है सरस्वती देवी रसोई में बने भोजन में सब रसों को भरती है जिससे भोजन स्वादिष्ट व पोष्टिक बनता है। वहाँ भी सरस्वती के हाथा में वीणा है अर्थात् भोजन बनाते और भोजन करते समय लयबद्ध मध्यम स्वर संगीत भोजन की गुणवत्ता को बढ़ाता है। वे लोग भी भारतीयों की तरह भोजन बनाकर अग्नि देव को समर्पित करते है इसे हमारे यहाँ ‘होम’ कहते है वे लोग इसे गोम कहते हैं। अपनी रसोई में माँ सरस्वती की फोटो लगायें माँ सरस्वती जी के जन्म दिन यानि बसन्त पंचमी को इसकी विशेष पूजा अर्चना करें (माघ शुक्ल पंचमी को बसंत पंचमी कहते है)। भारतीय परंपरा में रसोई में अन्नपूर्णा देवी का चित्र लगाना तथा उनका स्तोत्र या ध्यान करके भोजन बनाना घर में सुख-शांति व सामंजस्य बढ़ाने में सहायक सिद्ध होता है। व्यंजन द्वादशी व्रत- जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि इस त्यौहार/व्रत करने से पूरे वर्ष भोजन बनाने में शालीनता व धैर्य से स्वादिष्ट व पौष्टिक भोजन बनाने की योग्यता बनी रहती है और गृहणी प्रशंसा की पात्रा बन जाती है।


परा विद्यायें विशेषांक  अकतूबर 2010

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