कब्ज : खान-पान में सावधानी का अभाव

कब्ज : खान-पान में सावधानी का अभाव  

कब्ज़ खान-पान में सावधानी का अभाव आचार्य अविनाश सिंह आयुवर्ेेद और अन्य चिकित्सा प्रणालियों का मानना है कि कब्ज आंतों मेंें बसने वाला वह शैतान है, जो अनेक रोग उत्पन्न करता है,ै, जैसे मधुुमेह, कफ विकार, आंत्रशोथ, नसों की सूूजन, कैैंंसर और कब्ज के रहते किसी भी रोगेगेग का उपचार नहीं हो सकता। कब्ज़ है क्या? : अधिसंखय लोग दिन में केवल एक बार मल त्याग करते हैं। कुछ लोग दिन में 2 या 3 बार भी शौच के लिए जाते हैं। इसके विपरीत कुछ ऐसे भी हैं, जो 2 दिन, या फिर पूरे सप्ताह में केवल 2, या 3 बार ही शौच के लिए जाते हैं, फिर भी पूर्णतः स्वस्थ रहते हैं और कुछ 24 घंटे में एक बार शौच न आने पर परेशान रहते हैं; अर्थात् 'कब्ज' का तात्पर्य मल त्याग से है और मल त्याग मल की प्रवृत्ति पर निर्भर करता है। यदि मल अत्यंत शुष्क, कठोर और कठिनाई के साथ कम मात्रा में आये, पेट का निचला भाग सखत और भारी प्रतीत हो, पेट में धीमा-धीमा दर्द रहने लगे, मल त्याग के लिए बार-बार किसी विरेचक औषधि का सहारा लेना पड़े, मल गांठों के रूप में आये तथा गुदा द्वार से गैस तक निकलने में कठिनाई महसूस हो, तो इसे 'कब्ज' रोग का लक्षण मानना चाहिए। मल की मात्रा आहार के प्रकार और मात्रा पर निर्भर करती है। यदि पाचन संस्थान में भोजन पूरी तरह पचा न हो, आहार में रेशे का अंश अधिक हो, तब मल की मात्रा अधिक होती है। इसके विपरीत मांसाहारी, परिशोधित तथा डिब्बा बंद आहार का अधिक सेवन करने वाले व्यक्तियों में मल की मात्रा में कमी आ जाती है। एक स्वस्थ व्यक्ति के मल में थोड़ी बहुत गंध ही पायी जाती है। किंतु कब्ज की अवस्था में प्रोटीन वाले आहार के अंतड़ियों में सड़ने से मल में तीव्र गंध उत्पन्न हो जाती है। यदि मल से तीव्र प्रकार की दुर्गंध आती है, तो यह पाचन दोष और कब्ज़ रोग का एक प्रमुख लक्षण है। कब्ज निम्न आंत्र संस्थान से संबंधित रोग है, जो वृहत आंत्र की निष्क्रियता, कम मात्रा में मल का निर्माण, या आहार में तरल पदार्थों के अभाव आदि के कारण उत्पन्न होता है। यदि निश्चित समय पर मल का त्याग न हो, शौच क्रिया में देरी हो, मल की मात्रा सामान्य से कम हो, वह अत्यंत शुष्क और कठोर हो, इसके साथ पेट में भारीपन महसूस हो तथा मल कठिनाई के साथ निकले तथा मल त्याग के लिए जोर लगाना पड़े, तो उसे कब्ज़, मलबंध, कोष्ठबद्धता माना जाता है। कब्जग्रस्त रोगियों का मलाशय मल से ठसाठस भरा रहता है। मल संचय से मलाशय में सूजन आ जाती है। आयुर्वेद शास्त्र में इस रोग को 'वृहदांज प्रवाह' कहते हैं। इस रोग में मल विसर्जन तो होता है, पर वह संचित मल के नीचे एक पतली राह बना कर बाहर आता है। संचित मल वैसे का वैसा ही रहता है। संचित मल रक्त शुद्धि में बाधा बनता है और कीड़े पैदा करता है। चरक संहिता में उल्लेख है कि मलावरोध से क्षुधा नाश और कुस्वाद होता है। मीठी और भारी चीजें देर से पचती हैं। भोजन के बाद छाती-पेट में जलन, भोजन के पचने का अनुभव न होना, पैरो में सूजन, निरंतर शारीरिक शिथिलता पैदा होती है। परिश्रम से सांस फूल जाता है। पेट में मल का संचय होता रहता है। पेट का बढ़ना, पेट के आसपास के हिस्सों में दर्द उत्पन्न होना, हल्का और अल्प मात्रा में भोजन करने के बाद भी पेट का तन जाना, नसों में उभार आदि अनेक व्याधियां जन्म लेती हैं; अर्थात् सभी रोगों का कारण कुपित मल 'कब्ज' ही है। कब्ज़ का उपचार : कब्ज का सबसे उत्तम उपचार परहेज है। स्वास्थ्य संबंधी नियमों में आहार, आचार, विहार को प्रमुखता दी गयी है। अतः आहार से संबंधित नियमों का पालन करना चाहिए। मल की उत्पत्ति के लिए इस प्रकार के आहार की आवश्यकता होती है, जिसमें रेशे की मात्रा अधिक हो, जैसे हरी साग-सब्जियां, छिलके सहित फल, चोकर सहित अनाज, मोटा चावल, छिलके वाली दालें इत्यादि। इनके साथ ही मल नरम रखने के लिए दिन भर में पर्याप्त मात्रा में पानी तथा अन्य तरल पदार्थों का सेवन भी करना चाहिए, क्योंकि मल का अधिकतर भाग पानी ही होता है, जो इसे नर्म बनाए रखता है। मल त्याग के लिए भारतीय शौचालय पद्धति, पश्चिमी शौचालयों की अपेक्षा, अधिक लाभदायक होती है, क्योंकि इसमें पैरों के बल बैठना पड़ता है, जिससे जंघाओं का दबाव पेट पर पड़ता है तथा मल त्याग में सहायता मिलती है। पेट की मांसपेशियों का व्यायाम भी कब्ज के लिए बहुत आवश्यक है। पेट की हल्की मालिश, पश्चिमोत्तानासन, वज्रासन, धनुरासन, हलासन आदि का भी अभ्यास करने से आंतों पर विशेष प्रभाव पड़ता है, जिससे कब्ज दूर होता है। आयुर्वेदिक चिकित्सा : रात्रि का भोजन करने के 1-2 घंटे बाद गर्म दूध में 1, या 2 चम्मच एरंडी का शुद्ध तेल मिला कर पीने से प्रातः काल मल खुल कर आ जाता है, जिससे पेट हल्का हा े जाता है। कितं ु एरडं ी क े तले का सेवन वर्षा ऋतु में न करें। सायं 4-5 बजे के लगभग ईसबगोल की भूसी के 1-2 चम्मच, मीठे पानी, या दूध में मिला कर कुछ दिन सेवन करने से कब्ज में आराम मिलता है और पेट हल्का रहता है। सौंठ 20 ग्राम, छोटी हरड़ 40 ग्राम, सौंफ 20 ग्राम, सनाय पत्र 4 ग्राम, एरंडी तेल 10 मि. ग्राम, सेंधा नमक 10 ग्राम, इन सबको बारीक पीस कर चूर्ण बना लें। रात्रि को सोने से पूर्व 6-8 ग्राम गुनगुने पानी के साथ सेवन करने से शौच खुल कर आता है। रोगी को भूख भी लगने लगती है। सनाय पत्र का चूर्ण 1-2 चम्मच रात्रि को सोने से पहले गर्म पानी के साथ लेने से कब्ज़ से मुक्ति मिलती है। रात्रि को सोने से पूर्व एक चम्मच आंवला और मेथी का चूर्ण गर्म दूध, या पानी के साथ सेवन से कब्ज से छुटकारा मिलता है। गुलाब के फूलों से बने गुलकंद में ईसबगोल की भूसी मिला कर दूध के साथ खाने से कब्ज खुल जाता है। गुलकंद का सेवन रोज करने से कब्ज की शिकायत हमेशा के लिए दूर हो जाती है। इसके साथ आहार का परहेज भी जरूरी है। प्राकृतिक चिकित्सा : कब्ज होने पर सर्वप्रथम प्रातःकाल खाली पेट को गर्म तौलिया, या गर्म पानी की थैली से 7-10 मिनट तक सेक करें एवं मिट्टी की पट्टी पेट पर आधे घंटे तक रखें। आधे घंटे बाद पेट और कमर की हल्की मालिश करें। उसके उपरांत 1 लिटर गुनगुने पानी में एक नींबू निचोड़ कर, आधा चम्मच सेंधा नमक मिला कर एनीमा दें। रोग की अवस्था के अनुसार ठंडा कटि स्नान, कटि स्नान, सौम्य कटि स्नान 15 से 20 मिनट तक दें। इसके पश्चात पेट पर गीली चादर लपेट कर 15-30 मिनट तक रहना चाहिए। एक-एक दिन के अंतराल में, रोगी की आवश्यकतानुसार, चिकित्साक्रम में परिवर्तन कर सकते हैं। सप्ताह में एक दिन संपूर्ण वाष्प स्नान देना भी लाभदायक रहता है। कब्ज की जीर्णावस्था में रात्रि को भी मिट्टी की पट्टी पेट पर लपेट देना उचित रहता है। आहार से चिकित्सा : सुबह उठते ही तांबे के बर्तन में रखा पानी, जितना पी सकें, पीएं। पुराने कब्ज में गुनगुने पानी में नींबू का रस और शहद डाल कर पिएं। अदरक का रस भी डाल सकते हैं। पानी पीने के बाद पेट फुलाते-चिपकाते हुए टहलें। रोगी की स्थिति को देखते हुए नींबू पानी, शहद, फल का रस, उबली सब्जियां, छाछ द्वारा आंशिक उपवास कराएं। उपवास करने से आंतों को आराम मिलता है और वे पुनः शक्तिशाली हो जाती हैं। उसके उपरांत धीरे-धीरे क्रमशः पूर्व आहार पर ले आएं। नाश्ते में मौसमी फल लें। फलों में नाशपाती, पपीता, अंगूर, गाजर, टमाटर, अमरूद, सेब, चीकू, अनार, भीगे हुए किशमिश, मुनक्का, अंजीर तथा दूध लेने चाहिएं। दोपहर और रात्रि के भोजन में मोटे आटे की रोटी, उबली हुई सब्जी और टमाटर, पत्ता गोभी, गाजर, मूली, प्याज आदि का सलाद, दही, आंवला, या नारियल की चटनी लें। खट्टी चीजों का उपयोग न करें। इसके अतिरिक्त : खाना खाने से पूर्व सब्जी का सूप पीएं। टमाटर, पालक, पत्ता गोभी, शलगम, मूली आदि काट कर उन्हें पानी में उबालें और उस पानी को धीरे-धीरे पीएं। इससे पाचन शक्ति सबल होगी। प्रतिदिन भोजन के पश्चात आधा प्याला करेले के रस के सेवन से दस्तावर औषधि लेने की आवश्यकता नहीं होगी। रात के भोजन में चौलाई, घिया, शलगम को उबाल कर, उस पानी में सेंधा नमक, काली मिर्च भी डाल कर, पीएं। सुबह नियत समय पर पेट साफ हो जाएगा। एक कच्चा प्याज नित्य भोजन के साथ खाने से कब्ज का निवारण हो जाता है। लहसुन की चटनी भोजन के साथ प्रतिदिन लें। गाजर, मूली, चुकंदर, शलगम, टमाटर, पालक तथा चौलाई के पत्तों एवं नारियल की गिरी को छोटा-छोटा काट कर, सलाद के रूप में, नींबू का रस और सेंधा नमक डाल कर भोजन से पूर्व सेवन करें। कब्ज में पका हुआ पपीता अत्यंत लाभकारी है। भूखे पेट प्रतिदिन सेब का सेवन करें, तो कभी कब्ज की शिकायत नही होगी। नाश्ते में संतरे का रस, पाचन शक्ति तीव्र कर, कब्ज दूर करता है। रात को मुनक्का, किशमिश, अंजीर पानी में भिगो दें। प्रातः उठ कर उनको खूब मसल कर पानी मिला कर पी लें। पुराने से पुराना कब्ज इससे ठीक हो जाता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण : कब्ज आतों में बसने वाला रोग है, जो पेट के निचले भाग में होता है। काल पुरुष की कुंडली में षष्ठ भाव पेट में स्थित आंतों का है। क्योंकि सभी रोग, जैसे कि ऊपर उल्लेख किया गया है, आंतों में मल के रहने से उत्पन्न होते हैं। इसलिए षष्ठ भाव को रोग भाव भी कहते हैं। इसके साथ सप्तम भाव मलाशय का है, जहां पर सारा मल संचित हो कर विसर्जित होता है। आंतों के कारक ग्रह केतु और शुक्र हैं। कब्ज होने पर जातक की आंतों में रहने वाले मल में शुष्कता आ जाती है, जो सूर्य और चंद्र के दुष्प्रभाव से होता है। इसलिए लग्नेश, केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्र, षष्ठ भाव, षष्ठेश और सप्तम भाव तथा सप्तमेश के दुष्प्रभावों में रहने के कारण 'कब्ज' से जातक पीड़ित रहता है। रोग का समय उपर्युक्त ग्रहों की दशांतर्दशा और गोचर ग्रह स्थिति पर निर्भर करता है। विभिन्न लग्नों में कब्ज रोग : मेष लग्न : लग्नेश सूर्य से युक्त सप्तम भाव में, शनि से दृष्ट षष्ठेश बुध और सप्तमेश शुक्र षष्ठ भाव में केतु से दृष्ट, या युक्त हो, तो जातक कब्ज का रोगी होता है। वृष लग्न : षष्ठेश और लग्नेश द्वादश भाव में सूर्य से अस्त हों, सप्तमेश मंगल षष्ठ भाव में केतु से युक्त, या दृष्ट हो, चंद्र गुरु से दृष्ट, या युक्त सप्तम भाव में हो, तो गुरु, या मंगल की दशांतर्दशा में कब्ज रोग होता है। मिथुन लग्न : लग्नेश बुध त्रिक भावों में सूर्य से अस्त हो, मंगल-चंद्र से युक्त षष्ठ भाव में, सप्तमेश गुरु शनि से युक्त, या दृष्ट सप्तम भाव पर दृष्टि रखे, या सप्तम भाव में रहे, केतु षष्ठ, या सप्तम भाव पर दृष्टि रखे, तो मंगल की दशांतर्दशा में जातक को 'कब्ज' से जूझना पड़ता है। कर्क लग्न : लग्नेश सूर्य से युक्त पंचम भाव में, बुध षष्ठ भाव में केतु से दृष्ट, या युक्त हो, गुरु सप्तम भाव में, सप्तमेश शनि-शुक्र से दृष्ट, या युक्त लग्न में हो, तो जातक को 'कब्ज' रोग की शिकायत बुध की दशांतर्दशा में होती है। सिंह लग्न : लग्न में शनि-बुध, द्वादश भाव में सूर्य, केतु षष्ठ भाव में, षष्ठेश शनि पर मंगल की दृष्टि हो, तो शनि की दशांतर्दशा में रोग हो सकता है। कन्या लग्न : लग्नेश तृतीय भाव में सूर्य से युक्त, मंगल षष्ठ भाव में, षष्ठेश शनि की लग्न पर दृष्टि, केतु गुरु से युक्त सप्तम भाव में, शुक्र द्वितीय भाव में हो, तो मंगल, या गुरु, या केतु की दशांतर्दशा में 'कब्ज' रोग होता है। तुला लग्न : गुरु लग्न में, लग्नेश शुक्र केतु से युक्त सप्तम भाव में, सप्तमेश मंगल षष्ठ भाव में, सूर्य पंचम भाव में बुध से युक्त हो, तो गुरु, या केतु की दशांतर्दशा में 'कब्ज' रोग होता है। वृश्चिक लग्न : लग्नेश और षष्ठेश मंगल सप्तम भाव में, बुध षष्ठ भाव में, शुक्र पंचम भाव में, सूर्य से अस्त हो, केतु की दृष्टि षष्ठ, सप्तम, या लग्न पर हो, तो जातक को बुध, या केतु की दशांतर्दशा में 'कब्ज' रोग होता है। धनु लग्न : षष्ठेश केतु से युक्त हो कर लग्नेश पर दृष्टि रखे, शनि षष्ठ भाव में, सूर्य-बुध सप्तम भाव में, बुध अस्त न हो, तो शुक्र की दशांतर्दशा में 'कब्ज' रोग हो सकता है। मकर लग्न : लग्नेश शनि सूर्य से अस्त हो, गुरु सप्तम भाव में, सप्तमेश षष्ठ भाव में, षष्ठेश एवं शुक्र केतु से दृष्ट द्वितीय भाव में हों, तो गुरु, या केतु की दशांतर्दशा में 'कब्ज' रोग होता है। कुंभ लग्न : लग्नेश शनि गुरु से युक्त हो कर सप्तम भाव में हो और सूर्य लग्न में रह कर सप्तम भाव पर दृष्टि रखे, बुध अस्त हो, चंद्र केतु से युक्त, या दृष्ट षष्ठ भाव में हो, तो केतु, या गुरु की दशांतर्दशा में 'कब्ज' से पीड़ा होती है। मीन लग्न : सूर्य-बुध सप्तम भाव में, लग्नेश गुरु शनि से युक्त, या दृष्ट षष्ठ भाव में, केतु की दृष्टि षष्ठ, सप्तम, या लग्न पर रहे, तो सूर्य, या बुध की दशातं'कब्ज' रागे सकता उपर्युक्त सभी ग्रह स्थितियां चलित पर आधारित हैं।



दुर्गा पूजा विशेषांक  अकतूबर 2010

दुर्गा उपासना शक्ति उपासना का सुंदरकांड है। इस अंक में शक्ति उपासना नवरात्र व्रत पर्व महिमा, दुर्गासप्तशती पाठ विधि, ५१ शक्तिपीठ, दशमहाविद्या, ग्रह पीड़ानिवारण हेतु शक्ति उपासना आदि महत्वपूर्ण विषयों की विस्तृत जानकारी उपलब्ध है। इन लेखों का पठन करने से आपको शक्ति उपासना, देवी महिमा व दुर्गापूजा पर्व के सूक्ष्म रहस्यों का ज्ञान प्राप्त होगा।

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