ज्योतिष-ज्योति आद्य शंकर

ज्योतिष-ज्योति आद्य शंकर  

देवभूमि भारतवर्ष के पुण्य क्षितिज पर अनादि काल से ऋषि-महर्षि गण मानव रूप में अवतरित होते रहे हैं। उन्हीं में भारतवर्षीय प्राचीन ग्रह गणितज्ञ भी हैं जिन्होंने वेदों में वर्णित आकाशीय ग्रह-पिंडों की गतिविधियों का सूक्ष्म रहस्य, ग्रह गणित, खगोल ज्ञान, अंक विद्या एवं अन्य पद्धतियों का सर्वप्रथम प्रकाश भारतभूमि से किया जो विश्व विज्ञान के अक्षय कोष हैं। परंतु मिथ्या यशाभिलाषी पाश्चात्य लेखकांे का यह दावा कि हाइपसिक लेसस टाॅल्मी, व्याविलोनियां आदि के माध्यम से अंक, कला-विकला, गणित आदि की पद्धतियां भारतवर्ष को प्राप्त हुईं भ्रमोत्पादक, हास्यास्पद और यथार्थता से परे हैं। सच्चे अध्येताओं को भारतदेश के अपौरुषेय ग्रंथ ऋक्-साम-यजुः वेद-स्मृति-पुराण आदि में अंकों और उनकी गणना पद्धतियों का यथाक्रम वर्णन सृष्टि के आरंभ काल से ही मिलता है। अर्थात मंत्र द्रष्टा भारतीय ऋषियों के मानस चक्षु में अंकों और उनकी गणना की विविध पद्धतियों का प्रादुर्भाव बहुत पहले आदिकाल में ही हो चुका था। ‘‘द्वादश प्रधयश्चक्रमेकं ऋषि नम्यानिकउतच्चिकेत सस्मिन्त्साकं त्रिंशता न शंकवोडर्पिताः पष्टिर्न चलाचलासः।। ऋ सं. 1,164,48) अन्यंच- यजुर्वेद रुद्राष्टाध्याय के अष्टम अध्याय में एकाच मे, त्रिस्रश्चमे, पंचचमे, सप्तच मे, नव च मे..... तथा चतसं्रचमे, अष्टौ च मे, द्वादश च षोऽशच मे... से वेदों में ज्योतिष की गणना से अंकों के वर्ग घनः द्वि त्रि गुणनफल आदि का वर्णन विश्व मानव के लिए ज्वलंत प्रमाण हैं। (1)2 = 1, (2)2 = 4, (3)2 9, (4)2 = 16 क्रमशः 3, 5 अंतर = 6 दोनों का वर्गांतर = 3 (2)2 =(2)2 , 4, (3)2 = 9 अंतर = 5 (4)2 =16, (5)2 = 25 अंतर 9 इस प्रकार से एकाचमे, त्रिस्रश्चमे, पंच में, सप्तच मे आदि मंत्रों में दो संस्थाओं का वर्गांतर विदित है। वर्तमान समय मंे अंकों का पहाड़ा पढ़ाने का क्रम जैसे, 4 एके 4, 4 दूने 8, 4 तिगुने 12, 4 चैगुने 16, प्रसिद्ध है। यह क्रम आज का नूतन नहीं बल्कि वेदमंत्रों में पूर्व ही आविष्कृत हो चुका था। उदाहरणार्थ- चतस्रश्चमे, अष्टो च मंे, द्वादश (12) च में, षोडशच में द्रष्टव्य हैं। वस्तुतः आधुनिक गणित प्रक्रिया का मूल स्रोत वेदों में सर्वथा उपलब्ध होता है। सिद्धांत शिरोमणि में भी उक्त प्रणाली का पर्याप्त अनुवर्तन मिलता है। काल ज्ञान बोधक षडांगवेद ज्योतिष शास्त्र के वर्तमान विकसित स्वरूप में आचार्य लगधमुनि की महत्वपूर्ण भूमिका रही। विशिष्ट शोध के उपरांत ज्ञात होता है कि उज्जैन के अक्षांश 23/10 से भूपृष्ठीय किसी भव्य तपोभूमि पर वेदांग ज्योतिष के प्रणेता आचार्य लगध ने जन्म लिया था। वेदांग ज्योतिष में मुहूर्त आदि ज्ञान के लिए वेध से समय ज्ञान का प्रकार श्लोक 42 में स्पष्ट है ‘‘काल ज्ञानं प्रवक्ष्यामि“। लगध ने षडांग वेद ज्योतिष विद्या की दिव्य दृष्टि प्राप्त करने के लिए एवं इस वैदिक विद्या की शाश्वत् प्रतिष्ठा व प्रचार-प्रसार के लिए उस ज्योतिर्मयी भूमि को ही अपनी आराध्यस्थली बनाया। विद्या की प्रतिष्ठा एवं ज्योतिषीय दृष्टि में हिमसेतु पर्यंत समस्त वैदिक कर्मकांड उपासना, पर्व, यज्ञ यागादि अनुष्ठान की अनिवार्यता के लिए, सनातन वैदिक धर्म हिंदू संस्कृति के संरक्षणार्थ अवतीर्ण शंकरावतार भगवत्पाद श्री आद्य जगदगुरु शंकराचार्य ने ‘‘ज्योतिष पीठ’’ की प्रतिष्ठा बदरीकाश्रम में की थी। प्रसिद्ध है कि महात्मा लगध बदरीकाश्रम के ज्योतिष पीठ में तप करते हुए ज्योतिष शास्त्र का दिव्य ज्ञान भी प्रसारित करते रहे। काल ज्ञान बोधक ज्योतिष शास्त्र का वर्तमान विकसित स्वरूप आचार्य लगध मुनि की उत्कृष्ट तपस्या की ही देन है। कालांतर में महर्षि वेदव्यास ने जिस प्रकार श्रुति, स्मृति, पुराण आदि का संस्कार करके वैदिक ज्ञान का संरक्षण एवं संवर्धन किया और सनातन धर्मोद्धारक भगवान श्री आद्य शंकराचार्य ने श्रुति-स्मृति-पुराण आदि वैदिक साहित्य अशेष वृद्धि कर सर्वत्र प्रतिष्ठा की उसी प्रकार महात्मा लगध ने वेदांग ज्योतिष शास्त्र की प्रतिष्ठा अक्षुण्य की एवं उसके ज्ञान विज्ञान का सर्वत्र प्रचार प्रसार किया। वेदांग ज्योतिष (याजुष ज्योतिष) आचार्य लगध द्वारा प्रणीत है तथा शास्त्रों में भी काल ज्ञानं प्रवक्ष्यामि लगध महात्मनः से सिद्ध है। आचार्य लगध तपोनिष्ठ महात्मा थे जिनका जन्म स्थल ज्योतिषशास्त्राधिदैव ज्योतिर्लिंग महाकाल की प्रिय नगरी- सप्तमोक्षदायिनी पुरियों में विश्रुत, प्रसिद्ध वेधस्थली अवन्तिका थी। अविन्तकानाथ राज राजेश्वर महाराजाधिराज भगवान श्री महाकाल की प्रेरणा से पुण्यात्मा लगध ने उत्तराखंड बदरीकाश्रम की यात्रा की और आद्यशंकराचार्य द्वारा स्थापित ज्योतिष पीठ को अपनी तपस्या एवं कालज्ञानार्जन का केंद्र बनाया तथा वहीं से सर्वत्र ज्योतिष शास्त्र का प्रकाश प्रसारित किया। इस प्रकार शास्त्रीय मीमांसा के क्रम में हम देखते हैं कि षडांग वेद ज्योतिष शास्त्र का अधिष्ठान द्वय ज्योतिर्लिंग महाकाल और आद्यशंकर स्थापित बदरीकाश्रम ज्योतिषपीठ है। शब्द शास्त्र (व्याकरण) के विमल शब्द वारि प्रवाह से अज्ञान मल निर्मोचित करने वाले माहेश्वर कृपा पात्र महर्षि पाणिनी सदृश दिव्य प्रकाश पुंज ज्योतिष ज्ञान द्वारा अज्ञानान्धकार का समूलोच्छेदन करने वाले महात्मा लगध ही हुए, जिनकी जन्म स्थली थी अवन्तिका और जो कृपा पात्र थे अवन्तिकानाथ के। सहस्रनाम में महाकाल स्वयं ज्योतिषशास्त्र को अक्षुण्णता प्रदान करने हेतु महाकाल की प्रेरणा हुई- ज्योतिष दिवस के रूप में एक वार्षिक पर्व अनुष्ठित हो। महाकाल के प्रणेतृत्व में ज्योतिष जगत् पुनः सौभाग्य संवर्धित हुआ। सिंहस्थ महाकुंभ 2061 वैशाख शुक्ल पंचमी को शिप्रास्नान के परम पुण्यकाल में ज्योतिर्लिंग महाकाल कोटि तीर्थ संधि स्थित विशाल सभागार में पहली बार ‘‘ज्योतिष दिवस पर्व’’ विश्वव्यापी ज्योतिष महाकुंभ के रूप में आयोजित किया गया जो सिंहस्थ महाकुंभ उज्जैन के इतिहास में अप्रतिम रहा। यह वही ग्रह-नक्षत्रों की परम पुण्यमयी तिथि थी जब 2513 वर्ष पूर्व ‘‘दुष्टाचार विनाशाय प्रादुर्भूतो महीतले। स एव शंकराचार्य साक्षात कैवल्यनायकः।’’ का महानाद मूर्त हुआ अर्थात पापाचार-अनाचार और अवैदिक दुर्मतों से सनातन वैदिक धर्म संस्कृति की रक्षा करने तथा कर्मोपासना, पर्व, तीर्थ-देवालय, शास्त्र, श्रुति, स्मृति पुराण की मर्यादा प्रतिष्ठित करने के पवित्र संकल्प से साक्षात कैवल्यनायक देवाधि देव महादेव ने शंकराचार्य के रूप में इस धराधाम पर अवतार धारण किया था ‘‘प्रविष्टम इमवत् किलशैवतेजः।’’ सनातन वैदिक संस्कृति का साम्राज्य पुनः पुष्पित पल्लवित हुआ। उपर्युक्त मीमांसा क्रम से यह ज्ञात होता है कि कालचक्र प्रवर्तक अवन्तिकानाथ श्री महाकालेश्वर की प्रिय राजधानी अवन्तिका थी जिसने वेदांग ज्योतिष शास्त्र के प्रणेता महर्षि लगधाचार्य को जन्म दिया वहीं ‘‘वैशाख शुक्ल पंचमी-ज्योतिष दिवस पर्व’’ प्रादुर्भूत कर ज्योतिष जगत को नूतन आह्लाद देते हुए अपनी अनंत ऊर्जा प्रवाह को पुनः उद्भाषित किया। श्री लगधाचार्य ने परमाधिक दिनमान 36 घटी = 14 घंटा 24 मिनट के तुल्य जो उल्लेख किया है, तदनुसार यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि लगधाचार्य उत्तराखंड हिमालय के प्रसिद्ध शिखर समीपस्थ गुफा में तपोनिष्ठ थे। जैसा कि पहले स्पष्ट किया जा चुका है आद्यशंकराचार्य द्वारा स्थापित ज्योतिष पीठ बदरीकाश्रम श्री लगधाचार्य की आराध्य एवं तपस्थली थी जहां से उन्होंने इस अंक विद्या के माध्यम से आकाशीय ग्रह-पिंडों की गतिविधियों को जानकर ग्रह, गणित, खगोल ज्ञान को मानव जगत में विस्तारित करने का सफल प्रयास किया था। श्री लगधाचार्य ग्रह वेध करने में भी कुशल खगोलज्ञ थे। क्यों न हो ऐसा? उन्हें स्वयं महाकाल की वेधस्थली अवन्तिका ने जो जन्म दिया था। लगधाचार्य की खगोलज्ञता स्वयं उन्हीं के कथन से कैसे पुष्ट होती है देखें। याजुष ज्योतिष में उल्लखित है- प्रपद्यते श्रविण्ठादौ सूर्या चंद्रमसावुदक्। दक्षिणाकिस्तु माधश्रावणयोः सदा। (श्लोक 7) अर्थात सूर्य और चंद्रमा जब धनिष्ठा नक्षत्र के आदि में होते हैं तब उत्तरायण और चित्रा नक्षत्र के आर्ध में होते हैं तब दक्षिणायन होता है। तात्पर्य यह है कि सदा सूर्य चान्द्र मासों के संबंध में चान्द्र मास में उत्तरायण और श्रावण मास में दक्षिणायन होना कहा गया है। वहीं यह भी कहा गया है: पंचसंवत्सरमयं युगाध्यक्षं प्रजापतिम्। दिनत्र्वयनमासागं प्रणम्य शिरसा शुचिः। ज्योतिषामयनं पुण्यं प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः। सम्मतं ब्राह्मणेन्द्राणा यज्ञकालासिद्धये। अर्थात वेदांग ज्योतिष प्रणेता के अनुसार 5 वर्ष के एक युग की मान्यता से 5 युग में उत्तरायण$दक्षिणायन = 10 होता है। एक अयन से दूसरे अयन तक की दिन संख्या एक चांद्र वर्ष संबंधी दिन संख्याओं का अर्ध भाग होता है यानी एक चान्द्र वर्षीय चान्द्र दिन संख्या = 372 का आधा = 372 » 2 = 186 तिथियां होंगी। 186 » 30 = चान्द्र महीने $ 6 चान्द्र तिथियां होती हैं प्रथमायन की तिथि में 6 जोड़ने से द्वितीयायन तिथि का मान = 6$1$6 =1/71319/25/17/13/19/25 तिथियों में दूसरी अयन तिथि होगी, यह स्पष्ट है। इसी प्रकार तीसरा अयनारम्भ माघ शुक्ल त्रयोदशी को हो तो 186 $ 13 = 199 » 30 = शेष 19-15 = 4, अतः श्रावण कृष्ण चतुर्थी को द्वितीय अयन होना सिद्ध होता है। प्रथमं सप्तमं चाहुरयनाद्यं त्रयोदश। चतुर्थ दशमं चैव द्वियुग्माद्यं बहुलेऽप्यृतौ...। इस प्रकार वेदांग सम्मत वर्तमान प्रणाली पर उक्त युक्ति कितना घटित हो रही है विचारणीय है।


रुद्राक्ष एवं सन्तान गोपाल विशेषांक  मई 2006

ऐसा माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के अश्रु कणों से हुई है। ज्योतिष में प्रचलित अनेक उपायों में से रुद्राक्ष का उपयोग ग्रहों की नकारात्मकता एवं इनके दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है ताकि पीड़ा को कमतर किया जा सके। अनेक प्रकार के रुद्राक्षों को या तो गले में या बांह में धारण किया जाता है। रुद्राक्ष अनेक प्रकार के होते हैं। इनमें से अधिकांश रुद्राक्षों का नामकरण उनके मुख के आधार पर किया गया है जैसे एक मुखी, दो मुखी, तीन मुखी इत्यादि। इस विशेषांक में रुद्राक्ष के अतिरिक्त सन्तान पर भी चर्चा की गई है। इस विशेषांक के विषय दोनों है। इसमें रुद्राक्ष एवं संतान दोनों के ऊपर अनेक महत्वपूर्ण आलेखों को सम्मिलित किया गया है जैसे: रुद्राक्ष की उत्पत्ति एवं महत्व, अनेक रोगों में कारगर है रुद्राक्ष, सन्तान प्राप्ति के योग, कैसे जानें कि सन्तान कितनी होंगी, लड़का होगा या लड़की जानिए स्वर साधना से, सन्तान बाधा निवारण के ज्योतिषीय उपाय, इच्छित सन्तान प्राप्ति के सुगम उपाय, सन्तान प्राप्ति के तान्त्रिक उपाय आदि। इन आलेखों के अतिरिक्त दूसरे भी अनेक महत्वपूर्ण आलेख अन्य विषयों से सम्बन्धित हैं। इसके अतिरिक्त पूर्व की भांति स्थायी स्तम्भ भी संलग्न हैं।

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