वर्तमान भौतिकवादी युग में तेज रफ्तार जीवन ने व्यक्ति को अत्यन्त तनाव युक्त कर दिया है वैज्ञानिक व अभियान्त्रिकी दौड़ में इच्छाओं की पूर्ति में बाधा व्यक्ति के अवसाद का कारण बन रही है। एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ सामाजिक व भौतिक मूल्यों के ह्रास के साथ-साथ मानसिक पतन की ओर ले जा रही है। भौतिक व वैज्ञानिक विकास के साथ हम अपनी प्राचीन अमूल्य विधाओं के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं। वैज्ञानिक प्रगति के साथ यह प्रमाणित होता जा रहा है कि रोग के लक्षण भले ही शरीर पर दिखाई दे परंतु उनका अधिकांश कारण मन में भी छिपा रहता है। ज्योतिष, हस्तरेखाओं के माध्यम से इन तनाव की स्थितियों का ज्ञान आसानी से किया जा सकता है और ज्योतिषीय, योग व शास्त्रीय उपायों से कुछ सीमाओं तक तनाव मुक्ति का प्रयास किया जा सकता है। ज्योतिषीय कारण - शनि उदासीन ग्रह है और जब भी शनि चन्द्रमा अर्थात् मन व चतुर्थ भाव को प्रभावित करता है तो व्यक्ति को एकाकी व उदासीन प्रवृत्ति का बना देता है लेकिन चन्द्रमा व चतुर्थ भाव के पीड़ित होने के साथ चन्द्र शनि का सम्बन्ध अवसाद जैसे रोग का कारण बन जाता है। इसी प्रकार चन्द्रमा के साथ राहु की युति भ्रमित करती है। भावना अर्थात् चन्द्र और बुद्धि अर्थात बुध दोनों का बिगड़ना ही पागलपन है। मन-मस्तिष्क का सम्बन्ध चतुर्थ भाव व चतुर्थेश, पंचम भाव व पंचमेश से भी होता है। चतुर्थ व पंचम भाव व भावेश, चन्द्र तथा बुध के पीड़ित होने-पाप ग्रहों से युक्त व दृष्ट होने तथा शुभ प्रभाव से रहित होने पर मनुष्य पागल हो सकता है क्योंकि भावनाओं व बुद्वि का बिगड़ना ही पागलपन है। यह कुण्डली उन्माद व पागलपन के रोगी की है। यहां लग्नेश व चतुर्थेश बुध व पंचमेश शुक्र दोनों ही पाप कत्र्तरी मंे हैं। चन्द्रमा राहु के साथ युति मंे और शनि व केतु से दृष्ट है। इस पर कोई शुभ प्रभाव भी नहीं है। स्वराशि के गुरु की चतुर्थ पर दृष्टि है किंतु गुरु स्वयं मंगल, सूर्य, केतु (शनि युति युक्त) की दृष्टि से पीड़ित है। चतुर्थ भावधिपति चन्द्र हो और चतुर्थ भाव तथा चन्द्र पर युति व दृष्टि से केवल राहु का प्रभाव हो तो भय से पीड़ित व्यक्ति होता है। ऐसा व्यक्ति भय से बेहोश भी हो सकता है। मन व बुद्धि संबंधी दोनों ग्रह चंद्र व बुध जब जल तत्व राशियों-कर्क, वृश्चिक व मीन में हांे तो व्यक्ति भावात्मक व संवेदनशील होते हैं। ऐसे लोग भावुक हो जाते हंै। इन ग्रहों के जल तत्व राशियों मंे स्थित होने के साथ-साथ यदि इन पर पाप प्रभाव भी हो तो मन-मस्तिष्क में किसी एक बात को लेकर विचारधारा निरन्तर चलती रहती है जिससे कुछ समय बाद इन्हें मानसिक जटिलताओं का सामना करना पड़ता है। यह पाप-प्रभाव उन्माद, अवसाद, खण्डित मानसिकता का कारण बनता है। मंगल उग्र ग्रह है चन्द्र मन का कारक व बुध संपूर्ण स्नायु तंत्र को इंगित करता है जब मन अर्थात् चंद्र व संवेदना अर्थात बुध दोनों पर उग्र ग्रह मंगल का प्रभाव हो जाता है तो व्यक्ति में संवेगात्मक प्रवृत्ति बहुत अधिक हो जाती है। इन लोगों मंे अपनी प्रतिष्ठा के प्रति संवेदनशीलता देखी जाती है। इनमें विपरीत परिस्थितियों को सहन करने की सामथ्र्य कम होती है ये शीघ्र ही मानसिक आघात की स्थिति में पहुंच जाते हैं। इनके मन व बुद्वि दोनों में ही विचारों का जाल होता है जिसमें उलझना ही इनकी परेशानी का कारण बनता है। ये बहुत शीघ्र विद्वेष व शत्रुता की भावनाओं से ग्रसित हो जाते हैं। बहुत विपरीत स्थितियों मंे इस तरह के लोग आतंकवादियों की श्रेणी में पहुंच जाते हैं। केतु आकस्मिक कत्र्ता है। यदि मन अर्थात चंद्र पर केतु का प्रभाव हो तो व्यक्ति आकस्मिक निर्णय लेता है। यदि बुध व लग्न बली न हो तो यह आकस्मिक निर्णय जीवन के विपरीत भी हो सकता है। इसी प्रकार चंद्र-बुध की युति व इन पर शनि-राहु व केतु का प्रभाव अवसाद, निम्न रक्तचाप और आत्महत्या के प्रयास को भी इंगित करता है। यदि लग्न व लग्नेश भी पीड़ित हो तो व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है अथवा ऐसे व्यक्ति का जीवन निराशा में डूबा हुआ, मृत्यु तुल्य भी हो सकता है। जन्मपत्रिका में पीड़ित चतुर्थ भाव, चतुर्थेश, चन्द्र व बुध के होने पर व्यक्ति तनाव, दबाव, अवसाद, पागलपन जैसे मानसिक रोगों से ग्रस्त हो सकता है। यदि जन्मपत्रिका में स्थित इन ग्रहों की स्थिति के साथ-साथ हस्तरेखाओं में भी विपरीत स्थितियां देखने को मिलें तो दोषपूर्णता अधिक निश्चित हो जाती है। हस्तरेखाओं का निरीक्षण करते समय व्यक्ति की मनःस्थिति व बुद्धि-विवेक के लिए चंद्र पर्वत, मस्तक रेखा, बुध पर्वत आदि का अवलोकन करना चाहिए। मस्तिष्क रेखा का चैड़ापन ज्ञान की कमी और मस्तिष्क रेखा का हाथ मंे उपस्थित न होना व्यक्ति में मानसिक विकारों को दर्शाता है। मस्तिष्क रेखा का जीवन रेखा से अलग होना व्यक्ति मंे स्वतंत्र भावना को दर्शाता है। यह दूरी कम होने की स्थिति में आत्मविश्वास व स्वतंत्रता को प्रकट करती है लेकिन बहुत ज्यादा दूरी अदूरदर्शिता व दुस्साहस दिखाती है साथ में मंगल उन्नत हो तो शीघ्रता में व्यक्ति गलत निर्णय ले लेता है। मस्तिष्क रेखा शुक्र क्षेत्र के अंदर से या मंगल क्षेत्र के निचले भाग से निकलकर, जीवन रेखा को काटकर मंगल के ऊपरी क्षेत्र की ओर बढे़ तो व्यक्ति चिड़चिडे़ स्वभाव का होता है। चंद्र का पर्वत अति उन्नत या अवनत हो और मस्तिष्क रेखा झुकती हुई चन्द्र पर्वत पर आ जाये हृदय रेखा व्यवस्थित नहीं हो तो व्यक्ति मानसिक रूप से संतुलित नहीं होता। इस प्रकार की झुकी हुई मस्तक रेखा द्वीपयुक्त या खण्डित हो तो मानसिक रोग का लक्षण है। आरंभ में सीधी फिर ढ़ाल लेकर चंद्र पर्वत की ओर जाने वाली रेखा अधिक दोषपूर्ण नहीं है, सीधे ढ़ाल लेकर दूषित चंद्र पर्वत पर जाने से दोष पूर्ण मानसिक स्थितियां देखने में आती है। चंद्र के पर्वत पर धब्बा या जाल का चिन्ह तनावपूर्ण स्थिति को दर्शाता है। दोनों हाथों में समान स्थिति फल की निश्चितता को प्रकट करती है। कार्यशील हाथ में रेखाओं का प्रभाव अधिक होगा। यदि मस्तिष्क रेखा से शाखा या स्वयं मस्तिष्क रेखा ऊपर उठ कर हृदय रेखा को छू ले तो व्यक्ति किसी के प्रति अति आकर्षण के कारण बुद्धि विवेक खो देता है। हाथ में बहुत अधिक रेखाओं का जाल भी विचारों के अधिक्य को दर्शाता है। अतः निर्दोष मस्तिष्क रेखा, हृदय रेखा, संतुलित चंद्र पर्वत जन्मपत्रिका के चतुर्थ भाव, चर्तुर्थेश, चंद्र व बुध की सामान्य दोष रहित स्थिति व शुभ प्रभाव सभी मनः स्थिति के संतुलन को प्रकट करते हैं। राधाकृष्णन ने कहा था हम संसार के घटनाक्रम व समाज में उत्पन्न हो रही उथल पुथल को अपनी इच्छानुसार नहीं बदल सकते परंतु हम अपने अंदर इतना मनोबल अवश्य उत्पन्न कर सकते हैं कि उनका कोई प्रभाव हमें किसी प्रकार विचलित न करे। वास्तविकता यही है कि वर्तमान विज्ञान की सफलता के बाद की मानस रोगों व तनाव की पहचान व माप का पैमाना नहीं है। जो भी तनाव ग्रस्त हैं इसके खतरों से सतर्क नहीं हो पाते हंै अतः लक्षणों का अनुमान करने और तनावग्रस्त स्थिति का ज्ञान करने के लिए व्यक्ति के व्यवहार, संवेदना, भावना और शरीर को माध्यम बनाया जा सकता है। 1. व्यवहारिक लक्षण - तनाव व्यक्ति को गलत आदतों की ओर आकर्षित करता है जैसे तंबाकू, एल्कोहल का सेवन, मादक द्रव्यों की मात्रा में वृद्धि। साथ ही नाखून चबाना, घुटनों को हिलाना भी मानसिक तनाव के व्यवहारिक लक्षण हैं। 2. संवेदनशील लक्षण - अपनी चेतना गंवा देना, अधीरता व बेचैनी इसी तरह के लक्षण हैं। 3. भावनात्मक लक्षण - चिड़चिड़ापन, अधीरता, अति आक्रामक हो जाना विशेष लक्षण हैं। अनिद्रा, दुःस्वप्न व अवसाद की स्थिति भावनात्मक मानसिक तनाव के लक्षण हैं। 4. शारीरिक लक्षण - मांसपेशियों में तनाव, गर्दन व पीठ में दर्द, सांस का कम व अनियमित हो जाना, शारीरिक तनाव के लक्षण हैं। मुख सूख जाना या हाथ में अत्यधिक पसीना आना भी इसी प्रकार के लक्षण हंै। तनाव व दबाव के लक्षणों को प्रकट रूप में प्रत्यक्ष करने पर व्यक्ति की तनावग्रस्त स्थिति को जीर्ण तनाव की स्थिति मंे जाने से बचाया जा सकता है। योगशास्त्र में आसन, प्रणायाम, मुद्रा व ध्यान के अभ्यास के निर्देश दिये गये हंै। सामान्य रूप मंे शशंाक आसन व दीर्घ श्वास का अभ्यास तनाव मुक्ति मंे सहयोगी होगा। अनुलोम-विलोम, प्राणायाम, यौगिक विज्ञान के सिद्वांत, नाड़ी द्वारा मस्तिष्क के दोनों भागों का प्रयोग होता है इस सिद्धांत के आधार पर यह तारतम्य इड़ा व पिंगला नाड़ी द्वारा नियंत्रित होता है। अनुलोम-विलोम प्राणायाम से दोनों की क्रिया मंे सामंजस्य स्थापित हो जाता है। रक्त से कार्बनडाईआक्साइड की सान्ध्रता पर भी नियंत्रण होता है। रक्त मंे ब्व्2 की सान्द्रता की कमी व ब्व्2 की सही मात्रा से मस्तिष्क में न्यूरोपेप्टाईडस का उत्पादन नियमित होता है। इस प्रकार अनुलोम-विलोम प्राणायाम जटिल रोगों को दूर करता है। मुद्राओं के प्रयोग से मानसिक तनाव दूर करने में सहयोग मिलता है। तर्जनी को अंगूठे के पोर से मिलाते हुए ज्ञान मुद्रा के अभ्यास से ज्ञान तंतु क्रियान्वित होते हंै और एकाग्रता व प्रसन्नता बढ़ती है। किसी भी तरह का मानसिक रोग पागलपन, चिड़चिड़ापन, अस्थिरता, घबराहट अनिश्चितता, उन्माद, बेचैनी, अवसाद, चंचलता व व्याकुलता दूर होती है साथ ही क्रोध, उत्तेजना, भय आदि भी कम होते हैं। ध्यान की किसी भी विधा से श्वास संतुलित व मन नियंत्रित होने से तनाव से मुक्ति प्राप्त करने मंे सहयोग मिलता है। प्रेक्षाध्यान भी ध्यान की एक विधा है। प्रेक्षा का अर्थ है देखना। प्रेक्षा के विभिन्न प्रकारों-श्वास प्रेक्षा, शरीर प्रेक्षा के माध्यम से शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक स्तर पर सकारात्मक परिवर्तन होते हैं। प्रेक्षाध्यान के चार स्तर-शिथिलीकरण, श्वास निरीक्षण, शरीर प्रेक्षा व अन्तर्यात्रा व्यक्ति को सभी स्तरों पर संतुलित करते हैं। प्रेक्षाध्यान के अभ्यास के द्वारा व्यक्ति न केवल शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तनावों या दबाबों से मुक्त होता है बल्कि उसके व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास भी संभव होता है। प्रेक्षाध्यान एवं इसके विभिन्न अवयवों के नियमित अभ्यास के द्वारा व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक स्तर पर सकारात्मक एवं सार्थक परिवर्तन होते हंै। कायोत्सर्ग शिथलीकरण की एक उत्कृष्ट प्रक्रिया है। शिथलीकरण के द्वारा हम सर्वप्रथम अपने शारीरिक तनावों अथवा दबावों का निस्तारण करते हैं। कायोत्सर्ग वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति स्वतः सूचन पद्धति से अपने शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तनावों को विसर्जित करता है। इस प्रक्रिया में सर्वप्रथम शरीर के प्रत्येक अवयव पर चित्त को केन्द्रित कर शिथिलता का सुझाव देकर शिथिलता का अनुभव किया जाता है। धीरे-धीरे पूरे शरीर की शिथिलता को साधा जाता है। इस प्रक्रिया से शरीर को गहन विश्राम मिलता है जो शरीर को पुनः ऊर्जामय बनाने में सहायक होता है। स्नायु मण्डल सहित शरीर के सभी संस्थानों को भी गहन विज्ञान मिलता है। उनकी क्रियाओं में सुधार आता है और असामान्य क्रियाएं भी सामान्य होने लगती हंै। इस प्रक्रिया से शरीर का लचीलापन भी बढ़ता है। प्रेक्षाध्यान के किसी भी अवयव के अभ्यास से पूर्व कायोत्सर्ग किया जाता है। श्वास प्रेक्षा: श्वास प्रेक्षा के दो प्रकार हैं-दीर्घ श्वास प्रेक्षा तथा समवृत्ति श्वास प्रेक्षा। श्वास प्रेक्षा की प्रक्रिया में श्वास का संतुलन किया जाता है क्योंकि श्वास के असंतुलन का प्रभाव न केवल हमारे शरीर पर बल्कि मन और भावनाओं पर भी पड़ता है। श्वास संतुलन का अभ्यास करके हमारी शारीरिक और मानसिक क्रियाओं को संतुलित करते हैं जिसका सीधा एवं सकारात्मक प्रभाव हमारे तनाव-दबाब प्रबंधन प्रक्रिया पर पड़ता है। क्योंकि यदि व्यक्ति शारीरिक रूप से स्वस्थ एवं मानसिक रूप से जागरूक रहे तो उसे तनाव या दबाब कम प्रभावित करते हंै। शरीर प्रेक्षा: शरीर प्रेक्षा का अभ्यास हमारे शरीर में तनावों एवं दबावों के द्वारा उत्पन्न असंतुलन को दूर करता है। जब हम शरीर के विभिन्न अवयवों पर चित्त को केन्द्रित करते हंै, हमारे मस्तिष्क की शक्तियां उस स्थान पर केन्द्रिभूत हो जाती है। इससे वहां पर जो भी कोई असंतुलन या तनाव होता है, दूर हो जाता है। दबावों एवं तनावों के विसर्जन हो जाने पर शरीर में हल्केपन का अनुभव होता है एवं हमारी कार्यक्षमता में भी वृद्धि होती है। दबावों या तनावों की अवस्था में हमारे शरीर के सभी अंग असंतुलित हो जाते हंैं और उनकी कार्यक्षमता में कमी आ जाती है। जिसके परिणामस्वरूप शरीर में ऊर्जा का उत्पादन भी कम हो जाता है। अन्तर्यात्रा हमारी चेतना की शक्ति का ऊध्र्वारोहण करने की प्रक्रिया है। हमारी सुषुम्ना के अंतिम छोर में ऊर्जा का स्थान माना गया है। जब तक यह शक्ति हमारी सुषुम्ना के अंतिम सिरे में स्थित होती है तब तक यह निष्क्रिय होती है। अंतर्यात्रा की प्रक्रिया के नियमित अभ्यास के द्वारा हम चेतना की इस शक्ति का सुषुम्ना के मार्ग से मस्तिष्क की ओर ऊध्र्वारोहण करते हैं। शक्ति का ऊध्र्वारोहण हमें दबावों और तनावों से मुक्त रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अन्तर्यात्रा की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप हमारा पूरा शरीर चेतनामय एवं शक्ति सम्पन्न हो जाता है। चैतन्य केन्द्र पे्रक्षा द्वारा हमारे शरीर में चेतना के असंख्य केन्द्रों में से प्रमुख तेरह (13) चैतन्य केन्द्रों को जागृत किया जाता है। चैतन्य केन्द्र हमारे शरीर के वे स्थान अथवा बिंदु हैं जहां हमारी चेतना की रश्मियां घनीभूत रूप से विद्यमान रहती है। चेतना की ये रश्मियां हमारे शरीर में चलने वाली विभिन्न गतिविधियों को प्रभावित करती है। वैज्ञानिक आधार पर चैतन्य केन्द्र वे हैं, जहां हमारी तंत्रिकाओं के समूह पाए जाते हंै साथ ही चैतन्य केन्द्रों का क्षेत्र हमारी अन्तःस्रावी गं्रथियों से भी संबंधित है। चैतन्य केंद्र पे्रक्षा की प्रक्रिया में हमारे शरीर में स्थित विभिन्न चैतन्य केन्द्रों पर चित्त को केन्द्रित करते हैं। ऐसा करने के परिणामस्वरूप चेतना के ये सघन केन्द्र जागृत होते हैं। चैतन्य केन्द्रों के जागरण होने का तात्पर्य हमारी अन्तःस्रावी ग्रंथियों के स्राव संतुलित होने से है। परिणामस्वरूप हमारी चेतना का अर्थात् ऊर्जा का जागरण होता है। हमारे शरीर के अन्य तंत्र एवं उनकी क्रियाएं भी संतुलित होने लगती हैं और हम दबाव व उससे उत्पन्न परिस्थितियों से कुशलता से निपटने में सक्षम होते हैं। इस प्रकार तनाव के लक्षणों को जान कर उनको ध्यान, आसन, प्राणायाम के माध्यम से दूर करने का प्रयास किया जा सकता है। ज्योतिषीय उपायों के रूप में चतुर्थ भाव से संबंधी नकारात्मक ग्रह की शांति व चंद्र की अनुकूलता प्राप्त कर मानसिक दबावों का प्रबंधन करने में सहयोग मिलता है। प्राणायाम, ध्यान व हस्तमुद्राओं के प्रयोग से जहां मन की एकाग्रता बढ़ती है वहीं विभिन्न सामान्य विकास दूर होते हैं। इसीलिए प्राचीन ऋषियों ने इन्हें संस्कारों से जोड़कर नित्य पूजा के रूप में प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य कर दिया था। आज संस्कारों व संस्कृति से बढ़ती हुई दूरी तनाव के सामान्य समाधान से भी व्यक्ति को दूर करती जा रही है अतः पुनः संस्कृति की ओर लौट जाने की आवश्यकता है।


परा विद्यायें विशेषांक  अकतूबर 2010

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