संतान जन्म से पूर्व विचारणीय बिंदु: एक ज्योतिषीय दृष्टि

संतान जन्म से पूर्व विचारणीय बिंदु: एक ज्योतिषीय दृष्टि  

जन्म काल निर्धारण के द्वारा बालक का जन्म निश्चय ही तेजस्वी और प्रतिभावान संतान के जन्म के रुप में परिणत होगा। जन्मकाल का निर्धारण वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आॅपरेशन द्वारा बालक के जन्म के रुप में लिया जाने लगा है। इस हेतु अकारण भी सामान्य प्रसव को शल्य द्वारा बालक जन्म रुप में बदल दिया जाता है। इससे माता और संतान दोनों को कष्ट होता है। भारतीय ज्योतिष व वर्ण-फल सिद्धांत के अनुसार हमारे सभी संबंध एक सीमा तक निश्चित है ऐसी स्थिति में (1) संतान कैसी होगी, (2) संतान होगी अथवा नहीं (3) संतान से सुख प्राप्त है अथवा नहीं। सभी सत्य कुछ सीमा तक निश्चित है। इन्हीं आधारों पर आधान लग्न निर्धारित होते हंै। पूर्व सत्य को स्वीकार करते हुए भी पूर्ण भाग्यवादी न होकर हमारे शास्त्रीय मार्ग निर्देश को स्वीकार कर व्यक्ति स्वंय की रचना को सुंदर व प्रतिभासम्पन्न बना सकता है। माता पिता की सन्तान कैसी होगी, इसके लिए (1) माता पिता की जन्म पत्रिका के पंचम भाव (2) संतान कारक गुरु की स्थिति (3) माता पिता की जन्म पत्रिका में पंचमेश की स्थिति (4) माता पिता की जन्म पत्रिका के सप्तमांश लग्न (5) माता पिता की जन्म पत्रिका के सप्तमांश कुण्डली का पंचम भाव देखा जायेगा। (6) माता पिता की जन्म पत्रिका के कुछ विशिष्ट योग Û विविध प्रकार के शाप वशाद् संतान संबंधी दोष 1. सर्प दोष 2. पितृ दोष 3. मातृ दोष 4. मातुलशाप 5. ब्रह्म दोष 6. स्त्री दोष 7. गुरु दोष 8. धेनु दोष 9 प्रेत दोष 10. दारा दोष संतान संबंधी विशेष योग, प्रश्न द्वारा संतान की स्थिति यदि हम संतान संबंधी विषय पर विचार करते हंै तो संतान के जन्मकाल, उसकी ग्रह स्थिति पूर्व महत्वपूर्ण बिंदुओं पर निर्भर करती है। पंचम भाव की स्थिति: लग्न से पंचम भाव में शुभ ग्रह का योग, पंचमेश पंचम में होना या पंचम भाव को उसका स्वामी या शुभ ग्रह देखता हो तो पुत्र सुख अच्छा हो। चंद्र स्थान से पंचम भाव का स्वामी अपने स्थान को देखता हो या शुभ ग्रह उस स्थान को देखते हो तो पुत्र सुख अच्छा होता है। अर्थात् लग्नात्पुत्रकलत्रभे शुभपतिप्राप्ते ऽथवाऽऽलोकिते चन्द्राद्वा यदि सम्पदस्ति हि तयोज्र्ञेऽन्यथाऽसम्भवः । पाथोनोदयगे रवौ रविसुते मीनस्थिति दारहा पुत्रस्थानगतस्य पुत्रमरणं पुत्रोऽवनेर्यच्छति ।।8।। जातक पारिजात 13 पुनः एक स्थान पर कहा हैः- पुंवर्गे पुरूषग्रहेक्षितयुते जातस्तु पुत्राधिष्टो जीवात्प´्चमराशितश्च तनयप्राप्तिं वदेद् दैेशिकः । यदि पंचमेश अथवा नवमेश पुरुष ग्रह के वर्ग में हो और पुरुष ग्रह से देखा जाय तो जातक के बहुत पुत्र होते हैें । पुत्र कारक बृहस्पति है, अतः बृहस्पति से और पंचम स्थान से पुत्र का विचार करना चाहिए। प्ंाचम का स्वामी सप्तम स्थान में हो तो जातक पुत्रहीन या भार्याविहीन होता है दशम स्थान व द्वादश स्थान में पाप ग्रह हो तो जातक कुलध्वसंक होता है, अर्थात् उसके संतान नहीं होती। राहु पंचम में हो और पंचमेश छठे, आठवें या बारहवें हो तो पुत्र का नाश करता है। लग्नेश पुत्र स्थान में हो अर्थात् पंचम में हो और पंचमेश लग्न में हो तो जातक बेटा गोद लेता है। पुत्रस्थे मदनाधिपे वितनयो जायाविहीनोऽथवा पुत्रादष्टमशत्रुरिष्फगृहगाः पापाः कुलध्वसंकः। राहौ नन्दनराशिगे तदधिपे दुःस्थानगे पुत्रहा पुत्रस्थे तनुपे तनौ सुतपतौ गुह्यणाति दत्तात्मजम्।।9।। - जातक पारिजात 13 दुःस्थौ विलग्नसुतपौ समुपैेति पुत्रं दत्तात्मजं च शुभखेचरवीक्षितौ चेत् । तद्भावराशियुतकारकवर्गमूलाद् गृह्णाति दत्ततनयं परतस्त्वखेटात् । -13 अध्याय 13 जातक पारिजातकार ने कहा है लग्नेश और पंचमेश छठे, आठवें या बारहवें हों (साथ या पृथक पृथक) और शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो जातक बेटा गोद लेता है। पंचम भाव में जो ग्रह हो (यदि स्थित है) उसे बृहस्पति के षट्वर्ग में देखेंगें। वह स्थान राहुयुक्त न हो, उस वर्ग से जिस जाति का बोध होता है उस जाति से बालक गोद लेता है। यहां पंचम भावगत और बृहस्पति दो ग्रह कहे गये हैं इनमें से बली ग्रह देखा जायेगा । पंचमेश की स्थिति: जातक परिजातकार के अनुसार पंचम स्थान का स्वामी केंद्र, त्रिकोण में से शुभग्रह की राशि में हो सूर्य युक्त हो तो कम अवस्था में ही पुत्र होता है। राहु से युक्त पांचवें स्थान का स्वामी हो और उस पंचमेश की अंतर्दशा में पुत्र हो तो वह अल्पायु होता है। पंचमेश के साथ यदि राहु हो तो उस राहु की अंर्तदशा में पुत्र हो तो वह दीर्घायु होता है। केन्द्रत्रिकोणगृहगः सुतपः शुभक्र्षे सौम्यान्वितो यदि सुतं समुपैति बाल्ये भोगीशयुक्तसुतराशिपभुक्तिजातः स्वल्पायुरेतिफणिभुक्तिभवश्चिरायुः ।। पंचम भाव व पंचम भाव का स्वामी व गुरु शुभ ग्रह से दृष्ट हो तथा शुभ ग्रह युक्त हो तो निसंदेह पुत्र की प्राप्ति होती है। लग्नेश पांचवें घर में हो और पंचम भाव का स्वामी बलवान हो और बृहस्पति पूर्ण बली हो तो अवश्य पुत्र की प्राप्ति होती है। पूर्ण बली बृहस्पति पंचम भाव में हो उसे लग्नेश देखता हो तो निःसन्देह पुत्र प्राप्ति का योग बनता है। पुत्रस्थाने तदीशे वा गुरौ शुभबीक्षिते शुभ ग्रहेण संयुक्ते पुत्रप्राप्तिर्न संशयः।।6।। लग्नेश पुत्रभावस्थे पुत्रेशे बलसंयुक्ते। परिपूर्णबले जीवे पुत्रप्राप्तिर्न संशयः।।7।। पुत्रस्थानगते जीवे परिपूर्णबलान्विते। लग्नाधिपेन संदृष्टे पुत्रप्राप्तिर्न संशयः।।8।। उपर्युक्त योगों को मात्र एक जन्मपत्रिका में नहीं देखना चाहिए। यदि पुरूष की जन्मपत्रिका में अनुकूल योग हैं और स्त्री की कुण्डली में सन्तान बाधा का योग है तो सन्तानोत्पति में बाधा होगी। इसके साथ ही सन्तान बाधा के योग पृथक कहे गये हैं। पुत्र स्थानगते पापे तदीशे पापमध्यगे। सौम्यदृग्योमरहिते वक्तव्या त्वनपत्यता।।27।। पापग्रहों में मध्य पंचम का स्वामी हो और पंचम में पाप ग्रह हों तो पंचम व पंचमेश पर शुभ दृष्टि न हो तो सन्तान रहित होता है। पाप मध्य में बृहस्पति हो, पुत्रेश बली न हो और शुभ ग्रह युक्त न हो, दृष्ट न हो तो संतान रहित होता है। पापमध्यगते जीवे पुत्रेशे बलवर्णिते सौम्यदृगयोगरहिते वक्तव्या त्वनपत्यता।।28।। -जातकपारिजात 13 इसी प्रकार हमारे शास्त्रों में अनेक योग संतान बाधा के संबंध में कहे हैं। संतान होने पर पूर्व श्राप के कारण संतान नाश का योग भी माता पिता की जन्म पत्रिका में दृष्टिगोचर होता है। जातक पारिजात के 13वें अध्याय में 32 से 37 तक तक श्लोक संख्या विप्र, शत्रु, पिता, माता, सर्प के प्रति दोष व दुर्भाग्य से पुत्र नाश की बात कही है। संतान योग, उत्तम संतान योग, संतान बाधा-योग, संतति हानि, इन सभी से संबंधी ज्योतिषीय योगों के साथ संतान प्रश्न विचार भी किया जाता है। प्रश्न कुण्डली में (1) मान्दि एवं चंद्रमा की युति हो (2) सुतभाग में उसके स्वामी की स्थिति हो (3) किसी भी स्थान में बैठे चंद्र पर मंगल की दृष्टि हो (4) नवम भाव में शुभ ग्रह बैठे हों, (5) पंचम भावेश गुलिक के साथ बैठा हो (6) पंचमेश गुलिक से दृष्ट हो (7) गुलिक एवं चंद्र के नवांशों के स्वामियों में परस्पर दृष्टि युति का संबंध हो- ये आठ योग गर्भ-सूचक हैं। -प्रश्नमार्ग अष्टादश अध्याय-83 यदि प्रश्नकुण्डली में केंद्र में मंगल सूर्य बैठे हों, आयु स्थान में (अष्टम भाव) कोई पाप ग्रह बैठा हो तथा गुरू केंद्र को छोड़कर अन्यत्र बैठा हो, (2) चंद्रमा केंद्र में बैठा हो, गुरु केन्द्रातिरिक्त स्थान में हो तथा अष्टम भाव में कोई पाप ग्रह बैठा हो (3) चंद्रमा लग्न में बैठा हो तथा पाप ग्रह यहां पर अठारहवें द्रेष्टकाण में हो।(लग्न से) (4) केंद्र में गुरु, अष्टम भाव में मंगल शनि-इन सभी योगों में से कोई योग होने पर गर्भ स्राव होता है। अतः सावधानी रखी जानी चाहिए। तात्पर्य यह है कि माता पिता की जन्म पत्रिका के योगों और संतान के संबंध में किये गये प्रश्नों से संतान की स्थिति का निर्णय किया जा सकता है। यह ज्ञात होने पर कि कैसी संतान प्राप्त होगी। ज्योतिषीय आधार पर कहे गये सिद्धांतों को दृष्टि में रख कर उपाय किये जाने चाहिए। माता-पिता की जन्मपत्रिका में दोषपूर्ण ग्रहों की स्थिति का उपाय करते हुए प्रश्न आधारित कुण्डली में बाधक ग्रहों की स्थिति के प्रतिकार के उपाय किये जाते हैं। यदि सूर्य अनिष्ट स्थान पर सम राशिगत हो तो गया आदि तीर्थ क्षेत्रों में पितरों के निमित्त पिण्डदान करना चाहिए। यदि सूर्य अकेला ही सम या विषम किसी राशि में अनिष्ट स्थान गत है तो सूर्य मंत्र का जप करना चाहिए। इसी प्रकार चंद्रमा अनिष्ट स्थानगत हो तो गयादि तीर्थों में पितरों के लिए श्राद्ध करना चाहिए या देव मंदिर में देव आराधना के लिए नृत्य, गीत भजन कीर्तनादि का आयोजन करना चाहिए। सभी पूर्व तथ्यों को ध्यान में रख कर शास्त्रीय नियमों के आधार पर कथित तिथियों पर समयानुसार गर्भाधान संस्कार निश्चय ही उत्तम सन्तान कारक होगा।


योजनापूर्वक इच्छित संतान विशेषांक  जनवरी 2012

शोध पत्रिका के इस अंक में अधिकतर आलेख योजनापूर्वक इच्छित संतान प्राप्ति के महत्वपूर्ण विषय पर हैं।

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